सबसे बड़ा आरोप लगाया जा रहा है कि The Assam Compulsory Registration of Muslim Marriage and Divorce Bill, 2024 केवल मुसलमानों के लिए है और इसलिए यह उनके लिए भेदभावपूर्ण (Discriminatory) हैं। जबकि हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने कहा है कि बिल का लक्ष्य child marriage / बिना सहमति के शादी और बहु विवाह को रोकना है और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करके Institution of Marriage को मजबूत करना है।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
दरअसल यह हिंदुओं के साथ भेदभावपूर्ण है क्योंकि उन्हें तो अपनी शादी register करानी ही पड़ती है जिसका कोई विरोध नहीं करता जैसे आज मुस्लिम कर रहे हैं असम में, शादी करवाने वाले पंडित को शादी का प्रमाणपत्र देने का अधिकार नहीं है जो काजी को है, इतना ही नहीं वर्षों से आर्य समाज मंदिरों में विवाह किए जा रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने आर्यसमाज का यह अधिकार भी अवैध घोषित कर दिया। क्या ऐसा करने के लिए काजी पर भी रोक लगाना जरूरी नहीं था।
मुसलमानों का कहना है कि इस्लाम में शादी नहीं निकाह होता है और निकाह एक अनुबंध (contract) होता है लेकिन Contract कौन कर सकता है यह Indian Contract Act, 1872 में परिभाषित है लेकिन मुस्लिम समाज किसी कानून को नहीं मानता, बस अपना इस्लामिक कानून चाहिए।
इस कानून के अनुसार Valid Contract करने वाले की आयु 18 वर्ष होनी जरूरी है और यदि किसी के लिए कोर्ट से Guardian नियुक्त हुआ हो तो उस केस में 21 वर्ष से कम को नाबालिग माना जाता है; दूसरी शर्त यह है कि 18 वर्ष के बालिग Contract तब ही कर सकते हैं जब वे मानसिक रूप से स्वस्थ हों Sound Mind के हों जिन्हें पता हो कि contract में क्या लिखा है और उनके हित के लिए है या नहीं, Unsound Mind वाले व्यक्ति द्वारा किया हुआ Contract शुरू से ही Void माना जाता है।
यह सबसे बड़ी समस्या है मुसलमानों के लिए कि सरकार के पास रजिस्ट्रेशन के समय आयु पकड़ी जाएगी जिससे 18 से कम उम्र के लोगों का निकाह नहीं हो सकेगा। दूसरी मुख्य बात है जिससे मुसलमान असम में परेशान हैं कि रजिस्ट्रेशन के समय लड़का लड़की को साबित करना होगा कि वे असम के ही नागरिक है। बांग्लादेशी पकडे जाएंगे, रोना बस इस बात है।
बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF ने कहा है कि वो इस कानून को कोर्ट में चुनौती देंगे - कोर्ट जाना तो हर किसी का अधिकार है, आप भी जाएं लेकिन पहले यह विचार कर लेना कि यदि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी कानून पर मुहर लगा दी तो क्या आपको स्वीकार होगा क्योंकि कोर्ट के ऐसे फैसले मुस्लिम संगठन शरिया के खिलाफ बता कर मानने में आनाकानी करते हैं। अभी हाल ही का सुप्रीम कोर्ट के मुस्लिम महिलाओं को तलाक़ के बाद गुजारा भत्ता के अधिकार देने के फैसले को लेकर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने नाखुशी जाहिर की थी।
मुस्लिम समुदाय को समय के अनुसार अपने में बदलाव लाने चाहिए, निकाह रजिस्टर होने दीजिये, प्रतिष्ठा का मुद्दा ( Prestige Issue) न बनायें।


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