यूक्रेन-रूस युद्ध के तीन साल बाद UNO में एक अजीब नज़ारा देखने को मिला है। यूक्रेन के एक प्रताव को युरोपीयन यूनियन (EU) ने समर्थन दिया जिसमें रूस को युद्ध में आक्रांता बताया गया लेकिन अमेरिका और रूस दोनों ने इस प्रताव के विपक्ष में वोट दिया, दूसरी तरफ अमेरिका अपनी तरफ से एक प्रस्ताव लाया जिसमें रूस को युद्ध में “आक्रांता” नहीं कहा गया और यूक्रेन के क्षेत्रीय अखंडता के दावे को भी नकार दिया।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
दोनों प्रस्तावों पर अमेरिकी रुख का पुतिन ने स्वागत किया है।
इन बातों से लगता है अमेरिका और रूस की बीच एक नया समीकरण तैयार हो रहा है। मैंने अपने 23 जनवरी के लेख में लिखा था कि “मेरे विचार में अब वैश्विक शांति के लिए और वैश्विक शक्ति संतुलन के लिए अमेरिका और रूस को साथ आ जाना चाहिए जिससे चीन की विस्तारवादी नीति पर लगाम लगाई जा सकेगी।
बहुत लोग कह देते है कि अगर बर्लिन वाल गिर सकती है तो पाकिस्तान भारत एक साथ क्यों नहीं आ सकते। वह संभव नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के बीज में नफरत और आतंक भरा है। लेकिन अमेरिका और रूस एक साथ आ सकते हैं क्योंकि चीन अमेरिका का तो विरोधी है ही, उसे मौका मिलेगा तो रूस को भी छोड़ सकता है”।
उसी दिन अपने के वीडियो में मैंने यह भी कहा था कि यदि अमेरिका, रूस, भारत, इज़रायल और सऊदी अरब एक तरफ हो जाएं तो यह चीन को अलग थलग कर सकते हैं।
अमेरिका और रूस के नए समीकरण के पीछे नरेंद्र मोदी का योगदान नज़र आता है क्योंकि अभी 12-14 फरवरी वो अमेरिका की यात्रा पर थे। उसमें ही कुछ इस समीकरण की रूप रेखा बनी लगती है क्योंकि तब तक किसी को खबर नहीं थी कि मोदी रूस यात्रा पर जाएंगे लेकिन आज खबर थी कि वे 9 मई को रूस में होने वाले 80th anniversary of Victory in the Great Patriotic War उत्सव में शामिल होंगे।
उधर सऊदी अरब में यूक्रेन के लिए शांति वार्ता में यूक्रेन को ही शामिल नहीं किया गया।
जेलेंस्की को साफ़ नज़र आ रहा है कि उसके हाथ से युद्ध ही नहीं, रूस द्वारा छीने गए उसके क्षेत्र भी निकल जाएंगे और उसके minerals पर अमेरिका का कब्ज़ा होगा। ट्रंप कह चुका है कि यूक्रेन को दिया हुआ पैसा हम सूद समेत वापस लेंगे। इसलिए जेलेंस्की ने फिर पुराना राग अलापा है कि यूक्रेन को यदि NATO में शामिल कर लिया जाए तो वह सत्ता छोड़ने के लिए तैयार है। आज उसे NATO में कौन शामिल करेगा - यह होना होता तो पहले ही हो जाता।
जेलेंस्की ने एक बात बहुत गंभीर बोली है कि यूक्रेन को अमेरिका से दिए गए 177 बिलियन डॉलर में से केवल 75 बिलियन डॉलर मिले। यह आरोप कोई छोटी बात नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि यदि जेलेंस्की सही कह रहा है तो 100 बिलियन डॉलर कहां गया? यह भी हो सकता है कि यह माल अमेरिकी Deep State के लोग उड़ा ले गए या खुद जेलेंस्की ने घपला किया?
दोनों प्रस्तावों से लगता है ट्रंप और पुतिन अब जेलेंस्की को घुटनों पर ला कर छोड़ेंगे जिसकों समझ नहीं आया कि युद्ध समस्या का समाधान नहीं था और मोदी पुतिन से बार बार कहते रहे कि यह युद्ध का समय नहीं है। भारत यूक्रेन को केवल मानवीय सहायता देता रहा है जबकि अब वह हथियार भी मांग रहा है। जेलेंस्की तो पूरे Nato को रूस से युद्ध में भिड़ाना चाहता था।


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