CJI सूर्यकांत ने सिब्बल को फटकार तो सही लगाई रोहिंग्याओं के लिए, लेकिन जांच इस बात की होनी चाहिए कि ये सिब्बल और अन्य बड़े वकीलों को “गरीब घुसपैठियों” के लिए फीस कौन देता है?

सुभाष चन्द्र

रोहिंग्या घुसपैठियों का मामला सबसे पहले वर्ष 2017 में दायर हुआ जिसे भिखारी से दिखाई देने वाले 2 रोहिंग्या मोहम्मद सलीमुल्लाह और मोहम्मद शाकिर ने किया था और उनके लिए देश के दिग्गज वकील खड़े हुए थे सुप्रीम कोर्ट में जिनके नाम थे फाली नरीमन, प्रशांत भूषण, कपिल सिब्बल, राजीव धवन, कांग्रेसी अश्वनी कुमार और कॉलिन गोंसाल्वेस - किसने इन वकीलों को फंडिंग की?

घुसपैठिया चाहे वह रोहिंग्या हो, बांग्लादेशी, पाकिस्तानी या फिर आतंकी इनकी पैरवी करने वाले वकीलों से सिर्फ पूछना नहीं चाहिए बल्कि कोर्ट को सरकार से इन वकीलों के बैंक खाते जांच करने के भी आदेश देने चाहिए। दूसरे, यह भी पूछना चाहिए कि क्या वे किसी भी देश में घुसपैठिया बन रह सकते हो? जिस दिन निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक ने यह काम कर दिया कोई नहीं मिलेगा पूछने वाला इन दलाल वकीलों को। ये दलाल वकील देश को दीमक की तरह की खा रहे हैं। ये दलाल वकील भारतीय न्याय प्रणाली ही नहीं भारतीय संविधान के लिए भी खतरनाक हैं। ये दलाल वकील अपनी तिजोरियां भरने के लिए इन अपराधियों की पैरवी करने 24X7 खड़े रहते हैं। आज जब सुप्रीम कोर्ट तक इन वकीलों के खिलाफ सख्त हो रही है जनता को ऐसे वकीलों का सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। 

केंद्र सरकार ने उस मामले में हलफनामा देकर कहा था कि किसी रोहिंग्या को सरकार ने “शरणार्थी” का दर्जा नहीं दिया है क्योंकि सरकार ने UN के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किया है और ये रोहिंग्या घुसपैठिए देश की सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं अफ़सोस है कि सुप्रीम कोर्ट ने उस मामले को गंभीरता से नहीं लिया और तब के 40 हजार रोहिंग्या अब 8 साल में  पता नहीं कितने बढ़ गए होंगे 

अब 3 दिसम्बर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच एक Human Right Activist रीता मनचंदा और कपिल सिब्बल द्वारा दायर की गई 5 गायब हुए रोहिंग्याओं की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें चीफ जस्टिस ने बड़े सख्त लहजे में कहा कि हम क्या रोहिंग्या घुसपैठियों के लिए रेड कारपेट बिछा कर स्वागत करेंगे

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चर्चित YouTuber 
CJI ने सुनवाई के दौरान कहा कि पहले, आप प्रवेश करते हैं, आप अवैध रूप से सीमा पार करते हैं. आप सुरंग खोदते हैं या बाड़ पार करते हैं... फिर आप कहते हैं, अब जब मैं प्रवेश कर चुका हूं, तो आपके कानून मुझ पर लागू होने चाहिए आप कहते हैं, मैं भोजन का हकदार हूं, मैं आश्रय का हकदार हूं, मेरे बच्चे शिक्षा के हकदार हैं। क्या हम कानून को इस तरह से खींचना चाहते हैं? हमारे देश में भी गरीब लोग हैं वे नागरिक हैं क्या वे कुछ लाभों और सुविधाओं के हकदार नहीं हैं? उन पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करना बहुत "काल्पनिक" है बंदी प्रत्यक्षीकरण मामले में, हिरासत में लिए गए किसी भी व्यक्ति को न्यायाधीश के लिए अदालत के समक्ष पेश किया जाना चाहिए ताकि वह यह आकलन कर सके कि हिरासत वैध है या नहीं 

एक तरफ SIR में बांग्लादेशी और रोहिंग्याओं के निकाले जाने के डर से विपक्ष लामबंद होकर सुप्रीम कोर्ट में SIR को चुनौती दे रहा है और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट में ही सिब्बल जैसे बड़े बड़े दलाल वकील SIR के खिलाफ और घुसपैठियों के पक्ष में अलग से पैरवी कर रहे हैं यह पूरा गोलमाल है, राज्य सरकारें तो वकीलों को पैसा दे रही होंगी अपना वोट बैंक बचाने के लिए लेकिन अलग अलग घुसपैठियों की वकालत करने के लिए वकीलों को कौन पैसा दे रहा है, यह जांच का विषय है और सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में पहल करनी चाहिए क्योंकि अगर सरकार कुछ करेगी तो ये वकील रोना पीटना मचा देंगे कि हमारे मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है मगर सुप्रीम कोर्ट किसी वकील को देश के दुश्मन घुसपैठियों की वकालत करने की छूट नहीं दे सकता 

मेरी नज़र में यह सीधा सीधा टेरर फंडिंग या ऐसे देशो की फंडिंग का मामला हो सकता है जो भारत की डेमोग्राफी बदल कर अराजकता फैलाना चाहते हैं

हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को घुसपैठियों पर नरमी नहीं दिखानी चाहिए कुछ दिन पहले कोलकाता हाई कोर्ट ने निर्वासित किए गए 6 बांग्लादेशियों को वापस लाने के आदेश दे दिए और अपील में सुप्रीम कोर्ट ने भी उन्हें वापस लाने के लिए आदेश दिए और कहा कि उन्हें लाकर फिर से उनकी जांच करो यह उचित नहीं है

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