हिमंत विस्वा सरमा
असम सरकार ने मंगलवार (25 नवंबर, 2025) को ऑफिशियल त्रिभुवन प्रसाद तिवारी कमीशन की रिपोर्ट की कॉपी 126 मेंबर वाले हाउस के मेंबर और दूसरे लोगों में बांटी। इसके अलावा नॉन-गवर्नमेंट जस्टिस (रिटायर्ड) टी.यू. मेहता कमीशन की रिपोर्ट भी असेंबली में पेश की। दोनों ही रिपोर्ट 1983 हिंसा को लेकर थी। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने कभी भी रिपोर्ट को सदन के पटल पर नहीं रखा।
40 साल बाद असम की हिमंत सरकार ने रिपोर्ट रख कर कॉन्ग्रेस के सियासत की पोल खोल दी। चार महीने चली इस हिंसा में हजारों लोग मारे गए और लाखों बेघर हुए।
कब हुआ तिवारी आयोग का गठन
तिवारी आयोग का गठन 21 अगस्त 1983 को किया गया था। माना गया कि 6 महीने में आयोग अपनी रिपोर्ट सौंप देगी। आयोग ने 1983 में जनवरी से अप्रैल तक राज्य में फैली अशांति और हालात को लेकर जाँच की। मई 1984 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार को सौंपा। आयोग में एस मनोहरन आईएएस, को सेक्रेटरी बनाया गया जबकि सीएक वर्मा और आरसी जैन दोनों रिटायर आईएएस थे, उन्हें सदस्य के तौर पर शामिल किया गया। 9 फरवरी 1984 तक 257 गवाहों से पूछताछ की गई। इनमें 106 आधिकारिक और 151 गैर आधिकारिक थे।
आयोग ने एडवोकेट जनरल एसएन भुइयां, वकील एसएल लश्कर, असम सरकार के वकील बुरागोहे समते कई लोगों का पक्ष भी सुना। असम पुलिस की भी राय जानी। कमीशन ने पहले राउंड में सभी जिलों में घूमकर स्थिति को परखा। दूसरे दौर में हर जिले के गणमान्य लोगों और न्यूज पेपर्स के एडिटर्स, पुलिस वगैरह से जानकारी ली। वजह क्या था? क्यों सैकड़ों की संख्या में लोग जमा हुए? घटनास्थल से हजारों सबूत आयोग ने जमा किए। इसके बाद रिपोर्ट तैयार की।
रिपोर्ट में कहा गया कि किछार और नॉर्थ कछार हिल्स को छोड़कर पूरे राज्य में हिंसा फैली और लोग प्रभावित हुए।
हिंसा की शुरुआत फरवरी 1983 में हुए विवादित तीन-चरण के विधानसभा चुनावों के दौरान हुआ, जब असम में राष्ट्रपति शासन था। इसमें हजारों लोग मारे गए। इसके बावजूद चुनाव हुए और हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। मुख्यमंत्री सैकिया ने ही त्रिभुवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में जाँच आयोग बनाया था।
1984 में जस्टिस मेहता के नेतृत्व में भी एक न्यायिक आयोग का गठन किया गया था जिसने असम हिंसा की जाँच की। दोनों रिपोर्ट सीएम सैकिया को सौंपे गए। लेकिन इसे सार्वजनिक नहीं किया गया। 1985 में प्रफुल्ल महंत सरकार ने कोशिश की, लेकिन सदन के पटल पर नहीं रख सकी। करीब 40 साल बाद बीजेपी की हिमंत सरमा सरकार ने रिपोर्ट विधानसभा में पेश की है, जिस पर बवाल मचा हुआ है।
चुनाव कराने का फैसला हिंसा का कारण नहीं- रिपोर्ट
नेल्ली हिंसा के दौर में ही तत्कालीन इंदिरा गाँधी की सरकार ने असम में चुनाव कराने का फैसला लिया। इसपर विपक्ष पार्टियों ने सत्ता हासिल करने के लिए कॉन्ग्रेस पर चुनाव कराने का आरोप लगाया। लेकिन तिवारी आयोग ने अपनी रिपोर्ट में इसे खारिज कर दिया है। रिपोर्ट कहता है कि चुनाव कराने का फैसला हिंसा का कारण नहीं था। रिपोर्ट में 1950,1954,1960, 1968 1972 1977,1978, 1979, 1980, 1981 और 1982 में हुए हिंसा का जिक्र किया। ज्यादातर हिंसा का चुनाव से कोई संबंध नहीं था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर यह बात मान ली जाती है कि हिंसा का खतरा होने पर चुनाव नहीं होना चाहिए, तो यह राजनीतिक ब्लैकमेलिंग होता और उसके गंभीर नतीजे होंगे। ये पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खतरे में डालने जैसा है। इसमें कहा गया है कि “हमारा देश एक गरीब और विकासशील देश है। यहाँ रोज कई मुद्दे आते हैं । भारत जैसे देश में क्षेत्रीय और दूसरे मुद्दे हावी हैं। राज्यों के बीच पानी और नदियों के जल बंटवारे की समस्या है। सरकारी सेवा से जुड़े लोगों को पे स्केल की दिक्कत है। फैक्ट्री कर्मचारी वेज और वर्किंग कंडीशन से परेशान हैं। छात्रों के यूनियन परीक्षा और पढ़ाई को लेकर परेशान हैं। किसानों को फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने की समस्या है।”
1983 हिंसा में हजारों लोग मारे गए
त्रिभुवन प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में बनी तिवारी आयोग ने 1983 के शुरुआती 4 महीनों की परिस्थितियों के बारे में बताया है। उस समय विधानसभा चुनाव हो रहे थे और राज्य में बड़े आंदोलन का दौर जारी था। राज्य में बाहरी लोगों के खिलाफ आंदोलन चल रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में इस दौरान 8019 हिंसक घटनाएँ हुई। 248292 लाख लोगों को राहत शिविरों में रहना पड़ा, जबकि 225951 लोग बेघर हुए। करीब 22 रेलवे की संपत्तियों का नुकसान हुआ और 85 रेलवे ट्रैक प्रभावित हुए। 22436 प्राइवेट घरों को आग के हवाले कर दिया गया।
रिपोर्ट में हिंसा को ‘गैर सांप्रदायिक’ बताते हुए ‘मुस्लिम हिंसा’ की चर्चा
रिपोर्ट में उस दौर की हिंसा को ‘गैर सांप्रदायिक’ बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंसक घटनाओं को सांप्रदायिक रंग देना गलत है। पूरा समाज हिंसा का दंश भुगत रहा है। आरोपित किसी एक समुदाय के नहीं है। कई जगह असमिया लोग आरोपित हैं, लेकिन वे बांग्लाभाषी हैं।
कई जगहों पर मुस्लिम भीड़ ने असमिया लोगों पर आक्रमण किया। इस दौरान मुस्लिम भीड़ ने अपने समुदाय के लोगों का साथ दिया। नेल्लई के चमरिया और नलबारी और कामपुर पुलिस स्टेशन क्षेत्र में ऐसा हुआ। चोलखोवा इलाके में अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने अप्रवासियों पर हमले में साथ दिया। कई इलाकों में पीड़ित और आक्रमणकारी दोनों बहुसंख्यक समुदाय के थे। इसलिए इसे सांप्रदायिक हिंसा की तरह नहीं देखा जा सकता।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जनसंख्या का वितरण असम में इस तरह का है जिससे एक समुदाय एक इलाके में बहुसंख्यक है, वही दूसरे इलाके में अल्पसंख्यक है। जब हिंसा फैली तो इसकी प्रतिक्रिया भी हुई और पूरा इलाका इस ‘पागलपन’ का शिकार हुआ।
हिंसा के लिए AASU और AAGSU को जिम्मेदार ठहराया
रिपोर्ट में हिंसा की जिम्मेदारी असम गण संग्राम परिषद और ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन पर डाली गई। इसमें कहा गया AASU और AAGSU दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं। इस बात के बहुत सारे सबूत हैं कि चुनाव रोकने के लिए, आगजनी, दंगे करवाए गए।
बिल्डिंग,पुल, रेलवे संपत्ति को नुकसान और बंद के दौरान हिंसक घटनाएँ योजनाबद्ध तरीके से की गई। आयोग के अनुसार, बंद, विरोध और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने जैसी गतिविधियां पहले से तय थीं, लेकिन बाद में हालात आंदोलनकारी नेताओं के नियंत्रण से बाहर हो गए।
चुनाव कराना काफी मुश्किल भरा फैसला था
तिवारी आयोग ने भी माना कि तत्कालीन डीजीपी (स्पेशल ब्रांच) ने चुनाव में मशीनरी को होनेवाली कठिनाइयों के बारे में जानकारी दी थी। इसमें कहा गया कि असम में कानून व्यवस्था की स्थिति काफी सालों से एक चुनौती बनी हुई है। सालों से प्रशासन को पंगू बनाने की कोशिश की गई। यहाँ चुनाव करना खुद में काफी मुश्किल काम है।
राज्य के सरकारी कर्मचारी चुनाव प्रक्रिया का बायकॉट करने वाले हैं और बाहर से आए पोलिंग एजेंट को ये काम करना है। लोकल प्रेस में बैलेट पेपर प्रिंट करने से मना कर दिया है। राज्य में दूसरे अरेंजमेंट बाहर से करने होंगे।
इसमें कहा गया कि पोलिंग स्टेशन, परिवहन के रास्ते और पुल पर हमले हो सकते हैं। इसके अलावा दूसरी जरूरतों को पूरा करना भी नामुमकिन-सा है। काफी लोगों की जान जा सकती है और संपत्ति बर्बाद हो सकते हैं।
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