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पीठ दिखाती, स्तन छिपाती औरतें: आतंकी यासीन मलिक की पाकिस्तानी बीवी की अधनंगी पेंटिंग्स

                                                यासीन मलिक और उसकी बीवी मुशाल मलिक
कश्मीर के अलगाववादी नेता व कश्मीरी पंडितों के नरसंहार के आरोपित आतंकी यासीन मलिक की बीवी मुशाल हुसैन मलिक अक्सर अपनी भारत विरोधी मानसिकता की वजह से सुर्खियों में आती हैं। हाल में उन्होंने कुछ ट्वीट करके भारत के ख़िलाफ़ प्रोपेगेंडा फैलाना चाहा था। इससे पहले वह अधनंगी पेंटिंग्स बनाने के कारण चर्चा में कई बार रह चुकी हैं।

मौजूदा जानकारी के अनुसार, अलगाववादी नेता की पाकिस्तानी बीवी मुशाल 6 साल की उम्र से पेंटिंग बनाती हैं और उनकी खासियत ही ये है कि वो अधनंगी औरतों की पेंटिंग बनाती हैं। उनकी कुछ पेंटिंग में जो महिला दिखती है उसे पीठ दिखाते, स्तन छिपाते देखा जा सकता है। वह पेस्टल, चारकोल के अलावा ग्लास पेंटिंग भी करती हैं वरना पहले वो वाटर कलर पेटिंग्स तक सीमित थीं।

                                           मुशाल की पेटिंग्स (साभार: starsunfolded)
                                          मुशाल की पेटिंग्स (साभार: starsunfolded)

मुशाल की कुछ पेंटिंग्स में कश्मीर को लेकर उनका जो एजेंडा है वो साफ दिखाई देता है। वह फिलहाल पीस एंड कल्चर ऑर्गेनाइजेशन की अध्यक्ष हैं और उनके संबंध कई वरिष्ठ राजनेताओं व ब्यूरोक्रेट्स से भी हैं। आपको जानकर शायद हैरानी न हो, कश्मीर में आतंक मचाने वाले आतंकियों को मुशाल कश्मीरी स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर देखती हैं और बुरहान वानी जैसे आतंकी को श्रद्धांजलि देती रहती हैं। एक बार मुशाल ने कहा था, “बुरहान एक क्रांतिकारी प्रतीक और आइकन था जिसने कश्मीर के लिए बलिदान दिया।”

कश्मीर के ख़िलाफ़ फैलाई फर्जी खबर

कुछ दिन पहले ही 80 हजार फॉलोवर्स वाली मुशाल ने ट्वीट में दावा किया था कि  कि 1989 से लेकर अब तक कश्मीर में भारतीय सेना ने 11, 250 औरतों का रेप किया है जबकि 22 हजार से ज्यादा औरतें सेना के कारण विधवा हो गई हैं। उनके ट्विटर पर उन्हें अपनी पहचान प्राउड वाइफ ऑफ यासीन मलिक बताते देखा जा सकता है।

यासीन मलिक और मुशाल मलिक का निकाह

यासीन मलिक और मुशाल मलिक की जान पहचान 2005 में हुई थी। इसके बाद दोनों ने साल 2009 में निकाह किया। ये पूरी निकाह सेरेमनी लाइव टेलीकास्ट हुई थी। निकाह के समय मुशाल की उम्र 23 थी और यासीन 42 साल का था। निकाह के समय तक जहाँ यासीन अलगाववादी होने के चलते पाकिस्तान में एक जाना-माना नाम था वहीं उसकी बीवी रावलपिंडी की ही थी लेकिन लोग उन्हें कम जानते थे। मुशाल ने एक बार बताया था कि उन्हें यासीन की एक स्पीच पसंद आई थी। फिर उन्होंने उससे ऑटोग्राफ माँगा और नजदीकियाँ बढ़ने पर दोनों ने निकाह कर लिया। मुशाल की माँ पाकिस्तान मुस्लिम लीग की पूर्व महासचिव रह चुकी हैं जबकि भाई यूएस में प्रोफेसर और नेवल ऑफिसर है।

The Kashmir Files : ‘दोबारा शुरू हो कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार की जाँच’: राष्ट्रपति को पहुँची याचिका

                            कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी जैसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं
‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म ने हिंसा और पलायन के शिकार कश्मीरी हिंदुओं का मामला उठाकर मामले को मुख्यधारा के बहस में ला दिया है। अब इस पूरे मामले की जाँच नए सिरे की कराने की माँग की जा रही है।

दिल्ली के वकील विनीत जिंदल ने साल 1990 में हुए कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की दोबारा जाँच के लिए रामनाथ कोविंद (Ram Nath kovind) के पास याचिका भेजी है। अपनी याचिका में जिंदल ने इस पूरे नरसंहार की जाँच एसआईटी (SIT) कराने की माँग की है।

सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता जिंदल ने अपनी याचिका में कहा कि उस साल कश्मीर में हिंदुओं का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ। इस हत्याकांड के बाद केंद्र और राज्य सरकारों ने कश्मीरी पंडितों को न्याय का भरोसा दिया, लेकिन कुछ नहीं हुआ। उन्होंने आगे कहा कि इस नरसंहार को लेकर 215 प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इन मामलों की जाँच जम्मू-कश्मीर पुलिस ने की थी, लेकिन वह आतंकवादियों को दंडित करने के लिए कोई उपाय करने में विफल रही।

जिंदल ने कहा कि अगर सिखों के नरसंहार के 33 साल बाद केस को ओपन किया जा सकता है और उसकी दोबारा जाँच हो सकती है तो 27 साल पहले कश्मीरी पंडितों के साथ हुई हिंसा के केस को खोला जा सकता है और इसकी दोबारा जाँच कराई जा सकती है। अधिवक्ता ने कहा कि यह एक भयानक घटना थी जब कश्मीरी पंडितों के साथ सामूहिक बलात्कार, हत्या, अपहरण ने उन्हें हमेशा के लिए सदमे में धकेल दिया।

वहीं, भरत गुप्ता नाम के एक यूजर ने ट्वीट कर सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि इस मामले वह स्वत: संज्ञान लेते हुए कार्रवाई करे। उन्होंने लिखा, “मैं भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से अपील करता हूँ कि वे 1990 में कश्मीर घाटी में हुए हिंदू नरसंहार का स्वत: संज्ञान लेते हुए आरोपितों की पहचान का आदेश दें। इतने सारे सबूतों के बीच नूरेमबर्ग ट्रायल की तरह आदेश देना उनका कर्तव्य है।”

इसका जवाब देतेे हुए कश्मीर फाइल्स के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा, “अगला कदम यह होना चाहिए। क्या कोई कानूनी विशेषज्ञ सलाह दे सकता है कि इस मसले को हम कैसे आगे बढ़ा सकते हैं?” इस पर सुप्रीम कोर्ट में वकील और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने रास्ता बताया। उपाध्याय ने कहा, “पीड़ितों को जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल से NIA जाँच की सिफारिश करने का अनुरोध करना चाहिए। अगर उपराज्यपाल सिफारिश नहीं करते हैं तो पीड़ितों को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना चाहिए। यदि जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय याचिका को खारिज करता है तो मैं उच्चतम न्यायालय में उपलब्ध हूँ।”

अवलोकन करें:-

जब जगमोहन ने कर दिया था जुमे पर कश्मीर में इस्लामी फतह की प्लानिंग को नेस्तनाबूद : वो तारीख जिसक

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जब जगमोहन ने कर दिया था जुमे पर कश्मीर में इस्लामी फतह की प्लानिंग को नेस्तनाबूद : वो तारीख जिसक

कश्मीर फाइल्स रिलीज होने के बाद से चर्चा में है। यह फिल्म 7 दिन में 100 करोड़ रुपए से अधिक की कमाई कर चुकी है।

मौलवियों, NGO, नेताओं की मिलीभगत से जम्मू में बसाए गए रोहिंग्या: डेमोग्राफी बदलने की साजिश, मदरसों-मस्जिदों में पनाह

नागरिकता संशोधक कानून की आड़ में जगह-जगह बनाए शाहीन बाग़ों की असलियत सामने आनी शुरू चुकी है। शाहीन बाग़ों का आयोजन असल में कुर्सी के भूखे नेताओं ने उन रोहिंग्यों को बचाने के लिए आम मुसलमानों को भड़का कर लगवाए थे। इन्हीं रोहिंग्यों की वोटों के दम पर जनता को पागल बनाने वाले नेता क्या देश के सगे हो सकते हैं?

केंद्र और राज्य सरकारों को रोहिंग्यों को बसाने वाले एनजीओ और नेताओं के बैंक खाते सील कर सख्त कार्यवाही करनी चाहिए। क्योकि जिन्हें कोई मुस्लिम देश रखने को तैयार नहीं, उन्हें ये किस आधार पर बसा कर रख रहे हैं? इन लोगों को शायद नहीं मालूम कि जिस दिन ये रोहिंग्या समुदाय बहुसंख्यक हो गया, आम मुसलमानों के साथ-साथ संरक्षण देने वालों  जीना हराम कर देंगे। इनकी ऐसी खतरनाक मानसिकता की वजह से कोई मुस्लिम देश इन्हें रखने को तैयार नहीं। आम मुसलमानों को भी इनसे सचेत रहने की की जरुरत है।    

म्यांमार की न तो सीमा जम्मू कश्मीर से लगी हुई है और न ही दोनों संस्कृतियों के बीच कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध है, फिर भी प्रदेश में रोहिंग्या मुस्लिमों की संख्या इतनी कैसे हुई? हजारों की तादाद में रोहिंग्या मुस्लिमों का यहाँ पहुँच कर बस जाना किसी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। असल में इससे पहले भी देश में एक खास मजहब के कट्टर लोगों द्वारा ‘डेमोग्राफी बदलने’, अर्थात जनसंख्या में दबदबा बढ़ाने की साजिश की बात होती रही है।

‘दैनिक जागरण’ की एक विस्तृत खबर के अनुसार, इस साजिश में राजनीतिक लोगों के साथ-साथ कई NGO भी शामिल हैं। सुरक्षा एजेंसियों की नाक के नीचे इतना सब कुछ अंजाम दिया गया। बांग्लादेश के रास्ते रोहिंग्या मुस्लिमों की खेप कोलकाता पहुँचती रही है, जबकि अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड की सीमाएँ सीधे म्यांमार से लगती हैं। पता चला है कि उन्हें मालदा लाकर वहाँ से जम्मू भेजा जा रहा था।

 इन सब चीजों के तार दिल्ली से भी जुड़ते हैं, जहाँ संयुक्त राष्ट्र से सम्बद्ध संस्था द्वारा इन रोहिंग्या मुस्लिमों का पंजीकरण किया जाता है। ये संस्थाएँ ‘शरणार्थियों की मदद’ के नाम पर दिल्ली से लेकर कोलकाता तक सक्रिय रहती हैं। इन तत्वों द्वारा रोहिंग्या मुस्लिमों को विश्वास दिलाया जाता है कि जम्मू कश्मीर एक मुस्लिम बहुल इलाका है, जहाँ उन्हें कोई दिक्कत नहीं आएगी। वहाँ उन्हें इस्लाम प्रैक्टिस करने से कोई नहीं रोकेगा।

ये NGO और इस्लामी संस्थाएँ रोहिंग्या मुस्लिमों को जम्मू पहुँचाती थीं और उनकी यात्रा से लेकर रहने और खाने-पीने तक की व्यवस्था का पूरा जिम्मा उठाती थीं। जम्मू, सांबा और बाड़ी ब्राह्मणा में इनके लोग पहले से मौजूद रहते थे, जो मस्जिदों और मदरसों में इनके रहने का बंदोबस्त करते थे। फिर उन्हें झुग्गियों में बसा दिया जाता था। खास बात ये है कि उन्हें उन्हीं क्षेत्रों में बसाया जा रहा था, जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या कम है।

साथ ही उन्हें जम्मू कश्मीर में चल रहे ‘जिहाद’ और म्यांमार में ‘बौद्धों के अत्याचार’ को जोड़ कर और कट्टर बनाया जाता है। उनसे कट्टर बातें कर के जिहादी तत्वों के लिए काम करने के लिए तैयार किया जाता था। पाकिस्तान के साथ जम्मू कश्मीर के सटे होने का उन्हें दोहरा फायदा मिलता था। उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल और बांग्लादेश के मुस्लिम जम्मू में पहले से बसे हुए हैं, इसीलिए किसी को शक नहीं होता था।

जब भी इस पर कोई आवाज़ उठती थी तो इनकी मददगार संस्थाएँ उन्हें पीड़ित बताते हुए अपने खेल शुरू कर देती थीं। नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, अवामी इत्तेहाद पार्टी और कॉन्ग्रेस ने रोहिंग्या मुस्लिमों को अपने वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया। भले ही उन्हें वोट का अधिकार न हो, लेकिन उन्हें संरक्षण देकर मुस्लिम समाज को खुश किया जाता था और उनके खिलाफ कार्रवाई न कर के तुष्टिकरण की राजनीति की जाती थी।

जम्मू कश्मीर की अंतिम मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने अपने कार्यकाल में कहा था कि रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर केंद्र सरकार ही निर्णय ले सकती है। जमात-ए-इस्लामी कश्मीर जैसे कई संगठन इनके लिए काम कर रहे हैं और उनके नाम पर जुलूस निकालते रहे हैं, क्षेत्र में तनाव का माहौल बनाते रहे हैं। ऑल पार्टी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के एक गुट के अध्यक्ष मीरवाइज मौलवी उमर फारूक ने रोहिंग्या के लिए कश्मीर में सांत्वना दिवस का भी आयोजन किया था।

कुछ वर्षों पहले म्यांमारी आतंकी छोटा बर्मी को सुरक्षाबलों ने एक मुठभेड़ में मार गिराया था। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI भी जम्मू कश्मीर के ‘जिहादियों’ और म्यांमार के ‘रोहिंग्याओं’ के बीच सेतु का काम कर रही है। कोलकाता के मौलवी भी उन्हें जम्मू पहुँचाने में मदद करते हैं। जम्मू कश्मीर में उन्हें रोजगार भी आसानी से मिल जाता है। कई रोहिंग्याओं का कहना है कि वो बिना किसी जाँच के ट्रेन से यहाँ आराम से पहुँच जाते हैं।

आँकड़े कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर में कुल 13600 विदेशी नागरिक अवैध रूप से रह रहे हैं। जिनमें सबसे ज्यादा संख्या रोहिंग्याओं और बांग्लादेशियों की है। जम्मू के बेली चराना और सांबा में भी इनकी बड़ी संख्या है। ड्रग्स रैकेट और आतंकी हमलों में इनका नाम सामने आता रहता है। जम्मू के बठिंडी में रोहिंग्याओं की संख्या बहुत ज्यादा है। अब वो स्थानीय आबादी में मिल गए हैं, जिससे उनकी पहचान खासी मुश्किल हो रही है।

हाल ही में जम्मू-कश्मीर में 155 ऐसे रोहिंग्या मिले थे, जो म्यांमार में अपनी सज़ा से बच कर यहाँ रह रहे थे। उन सभी को ‘होल्डिंग सेंटर’ भेज दिया गया है। पुलिस ने फॉरेनर्स एक्ट के अनुच्छेद-3(2)e के तहत ये कार्रवाई की। साथ ही पासपोर्ट एक्ट के अनुच्छेद-3 के तहत प्रवासियों के पास पुष्ट ट्रैवल दस्तावेज होने चाहिए, जो उनके पास नहीं थे। ऐसे अन्य अवैध घुसपैठियों की पहचान करने की कोशिशें भी जारी हैं। 

J&K में BJP का डंका: 74 सीटें जीत कर बनी सबसे बड़ी पार्टी, अब्दुल्ला-मुफ्ती-कांग्रेस-वामपंथी सब भगवा के सामने फुस्स

                                                        जम्मू कश्मीर में बीजेपी का डंका
जम्मू कश्मीर में डीडीसी चुनावों (DDC Election) के नतीजे सामने आने के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। बीजेपी ने इन चुनावों में 74 सीटों पर जीत दर्ज की है जबकि स्थानीय पार्टियाँ अकेले इस आँकड़े के पास नहीं पहुँच पाईं।

गुपकार गैंग ने जिला विकास परिषद के चुनावों में 100 से ज्यादा सीटों (101+) के साथ विजय जरूर पाई। मगर, पार्टी लिहाज से देखें तो इसमें 7 राजनीतिक दल एक साथ थे और किसी भी दल को अकेले इतनी सीटों (जितनी पर BJP ने जीत दर्ज की) पर जीत नहीं मिली।

इस गठबंधन में नेशनल कॉन्फ़्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रैटिक पार्टी, पीपल्स कॉन्फ़्रेंस, CPI-CPIM, अवामी नेशनल कॉन्फ़्रेंस और जम्मू और कश्मीर पीपल्स मूवमेंट जैसी क्षेत्रीय पार्टियाँ शामिल थीं। इनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस को 67 सीटें मिली हैं, जबकि पीडीपी को केवल 27।

ऐसे ही पीपल्स कॉन्फ्रेंस को 8, सीपीआई (एम) को 5 और पीपल्स मूवमेंट को 3 मिली हैं। जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी को 12 सीटें मिलने की खबर है और निर्दलीय ने इस चुनाव में 49 सीटें जीत कर उल्लेखनीय बढ़त बनाई है। वहीं कांग्रेस के हिस्से इस बार 26 सीट आई हैं।

अनुच्छेद 370 निरस्त होने के बाद केंद्र शासित प्रदेश में पहली बार कुल 280 सीटों पर चुनाव हुए हैं। इन चुनावों में प्रदेश में भाजपा की पकड़ साफ देखने को मिली। लोगों ने पीएम मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास जताया।

मुस्लिम बहुल क्षेत्र में 3 सीटों पर बीजेपी की जीत बताती है कि उनके प्रयास व्यर्थ नहीं हुए। श्रीनगर की खोनमोह-2 में बीजेपी के एजाज हुसैन जीते हैं, बांदीपोरा में एजाज अहमद खान ने जीत हासिल की है और पुलवामा के काकपोरा से मिन्हा लतीफ को जीत मिली है।

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने बीजेपी की इस बड़ी जीत पर कहा, “श्रीनगर से भाजपा के तीन उम्मीदवारों को जीत मिली है। यह सत्यापित करता है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों को केन्द्र शासित प्रदेश के विकास के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण पर भरोसा है।” वहीं बीजेपी के महासचिव विबोध गुप्ता ने पार्टी के विजेता उम्मीदवारों को, विशेष रूप से घाटी के उम्मीदवारों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि घाटी के लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपना विश्वास जताया है।

उधर, नतीजों के स्पष्ट होने के बाद जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्र पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कश्मीर के लोगों ने गुपकार के हक में वोट दिया है और केंद्र द्वारा जिस तरह गलत तरीके से अनुच्छेद 370 को हटाया गया, उसे पूरी तरह नकार दिया गया है। उनके अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि इन चुनावों उनकी पार्टी ने रेफरेंडम नहीं बनाया, ना ही उन्होंने अधिक कैंपेन किया, फिर भी लोगों ने उनका साथ दिया है।