संदीप घोष को स्वास्थ्य विभाग में बनाया गया ओएसडी (फोटो साभार : एबीपी बांग्ला) कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष से केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) पूछताछ कर रही है। इसी मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के साथ रेप-हत्या के बाद संदीप घोष को इस्तीफा देना देना पड़ा था, लेकिन तुरंत उन्हें कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल नियुक्त कर दिया गया। इस पर कलकत्ता हाई कोर्ट ने फटकार लगाई और छुट्टी पर भेजने के लिए कहा, तो अब ममता सरकार ने संदीप घोष को स्वास्थ्य मंत्रालय में बुलाकर ओएसडी ही बना दिया है।
खास बात ये है कि संदीप घोष जैसे दागी व्यक्ति को न सिर्फ एक से बढ़कर एक महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात किया जा रहा है, बल्कि उसके कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल बनने के पीछे भी एक बड़ी जानकारी सामने आई है कि वो मेरिट लिस्ट में 16वें नंबर पर होने के बावजूद कैसे कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिंसिपल बनने में कामयाब रहा। यही नहीं, उस पर कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में तमाम अनियिमतताओं का भी आरोप है।
ममता बनर्जी ने डॉ संदीप घोष को बनाया ओएसडी
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बुधवार (21 अगस्त 2024) को जारी अधिसूचना में डॉ संदीप घोष को पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय में ओएसडी नियुक्त किया गया है।
डॉ संदीप घोष के हटाने की खबर के बीच ही फिर खबर आई है कि संदीप घोष को संदीप घोष को ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बनाया गया है। आंदोलनकारी छात्रों ने सवाल किया है कि आखिर सरकार ने संदीप घोष को बर्खास्त क्यों नहीं किया, जबकि उनके खिलाफ लगातार आरोप लग रहे हैं। क्या वह इतने प्रभावशाली हैं कि सरकार उनके खिलाफ कदम नहीं उठा पा रही है?
कौन हैं संदीप घोष?
एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, संदीप घोष ने अपनी स्कूली शिक्षा कोलकाता के पास बोंगांव हाई स्कूल से पूरी की थी। मेडिकल और इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए संयुक्त प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल करने के बाद उन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई की। डॉ. घोष ने 1994 में एमबीबीएस की पढ़ाई पूरी की और एक आर्थोपेडिक सर्जन बने। साल 2021 में वो आरजी कर मेडिकल कॉलेज के प्रिसिंपल बने। इससे पहले, उन्होंने कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज में उप-प्रिंसिपल के रूप में कार्य किया था।
हालाँकि संदीप घोष के आरजी कर मेडिकल कॉलेज और अस्पताल का प्रिसिंपल बनने के पीछे अलग कहानी नजर आ रही है। आजतक के मुताबिक, जब प्रिसिंपल के पद को लेकर इंटरव्यू चल रहे थे, तो संदीप घोष का नाम 16वें स्थान पर था। लेकिन रातोंरात वो सभी कैंडिडेट्स को पीछे छोड़कर लिस्ट में टॉप पर पहुँच गए और प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त हो गए।
बायोमेडिकल वेस्ट और मेडिकल सामानों की तस्करी बाँग्लादेश तक
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार संदीप घोष को लेकर मेडिकल कॉलेज के पूर्व डिप्टी सुप्रीटेंडेंट अख्तर अली ने दावा किया कि संदीप घोष तो अस्पताल से बायोमेडिकल वेस्ट और मेडिकल सप्लाई की तस्करी बांग्लादेश में भी करते थे। अख्तर अली का दावा है कि साल 2023 में उन्होंने इस बात की चिंता राज्य सतर्कता आयोग के समक्ष उठाई थी। जाँच में वह दोषी भी पाए गए लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
बीवी को बेरहमी से पीटा, पड़ोसी आज तक नहीं भूले
इंडिया टुडे की एक अन्य मीडिया रिपोर्ट बताती है कि आरजी कर अस्पताल के पूर्व प्रिंसिपल अपनी पत्नी को बेरहमी से मारने के कारण भी बदनाम हो चुके हैं। रिपोर्ट के अनुसार संदीप घोष पहले बारासाट में रहते थे। वहीं के पड़ोसी ने इंडिया टुडे को बताया कि कैसे 12 साल पहले जब संदीप ने अपनी पत्नी को उस समय बुरी तरह पीटा था जब उसकी सिजेरियन हुए 14 दिन ही हुए थे।
रिपोर्ट में खुद को संदीप का पूर्व पड़ोसी बताने वाला शख्स कहता है, “एक बार मेरे और घोष के बीच बहस हुई थी। उनका व्यवहार हमेशा खराब रहता था। बाद में मुझे पता चला कि वह एक डॉक्टर थे। यहाँ रहने के दौरान एक घटना हुई जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी को इतनी बुरी तरह पीटा कि उनके सिजेरियन टांके फट गए और उन्हें खून बहने लगा। शुरुआत में स्थानीय लोगों ने हस्तक्षेप नहीं किया क्योंकि इसे पारिवारिक मामला माना गया, लेकिन जब मामला बहुत गंभीर हो गया तो सभी ने विरोध करना शुरू कर दिया।”
आरजी कर अस्पताल में महिला डॉक्टर के रेप और हत्या के मामले में घोष को 12 अगस्त को रिजाइन देना पड़ा था। बाद में सीबीआई ने उनसे पूछताछ शुरू की और संदीप से जुड़े विवाद सामने आते रहे। बांग्लादेश में तस्करी, बीवी से मारपीट के अलावा संदीप घोष पर जून 2023 में भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। उस समय उन्हें वित्तीय गड़बड़ी के आरोप में मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज ट्रांसफर किया गया था। हालाँकि बाद में दोबारा उनका आरजी कर अस्पताल में कार्यभार मिल गया।
अस्पताल में हुई रहस्यमयी मौतें, देह व्यापार का भी दावा
जिस तरह आरजी कर अस्पताल के प्रिंसिपल का नाम पहली बार विवादों से नहीं जुड़ा, उसी तरह इस अस्पताल का नाम भी विवादों में पहली बार नहीं आया है। कहा जा रहा है कि इस अस्पताल मेंपहले भी रहस्यमयी मौते हुई हैं। कभी यहाँ मेडिकल प्रोफेशनल मारे गए तो कभी प्रोफेसर और कभी हाउस स्टाफ।
25 अगस्त, 2001 को ऐसी एक घटना हुई थी जब चौथे वर्ष के छात्र सौमित्र विश्वास को छात्रावास के कमरे में ही फंदे से मृत लटका हुआ पाया गया था। उनकी मौत को भी प्रशासन ने आत्महत्या बताया था, लेकिन तब भी हॉस्टल में अश्लील फिल्मों के निर्माण की बात उड़ी थी। अरोमिता दास और अमित बाला नामक उसके 2 सहपाठियों की गिरफ़्तारी के बावजूद ये मामला अनसुलझा रहा, जबकि कलकत्ता हाईकोर्ट ने CID जाँच का आदेश दिया था।
5 फरवरी, 2003 को अरिजीत दत्ता नामक हाउस स्टाफ ने आत्महत्या की थी। बताया गया कि उसने पहले खुद को हाथ में एनेस्थीसिया का इंजेक्शन दिया, फिर कलाई की नस काट ली और फिर छत से कूद गया। वो बीरभूम के सिउरी के रहने वाले थे। न कोई सुसाइड नोट मिला, न आत्महत्या का कारण पता चला।
घटना के कुछ ही दिन बाद 16 फरवरी को प्रवीण गुप्ता ने आत्महत्या का प्रयास किया। हरियाणा के प्रवीण मानिकतल्ला स्थित लालमोहन हॉस्टल में रहते थे, उन्होंने अपनी दोनों कलाई की नस काटने का प्रयास किया था। प्रवीण के पिता ने बेटे के किसी बात से परेशान होने की बात कही थी, वहीं पुलिस ने प्रेम-प्रसंग बता कर कहा कि उसने अपनी प्रेमिका को सुसाइड नोट भेजा था। हालाँकि, उसके साथियों ने उसे कभी अवसादग्रस्त नहीं पाया।
24 अक्टूबर, 2016 को 52 वर्षीय मेडिसिन के प्रोफेसर गौतम पाल का सड़ा-गला शव दक्षिणी दमदम स्थित उनके किराए के घर से बरामद हुआ था। दरवाजा अंदर से बंद था तो हार्ट अटैक से अचानक मौत की बात कह पुलिस ने पल्ला झाड़ लिया।
कोरोना महामारी के दौरान स्नातकोत्तर द्वितीय वर्ष की छात्रा पौलमी साहा की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी। पुलिस ने अस्पताल की छठी मंजिल से कूद कर आत्महत्या की बात कही, सहपाठियों ने उसके अवसाद में होने की बात कही थी। आज तक ये भी रहस्य है।
इन रहस्यमयी मौतों के अलावा इस अस्पताल में देह-व्यापार का धंधा चलने से लेकर यहाँ ड्रग्स तस्करों तक के सक्रिय रहने की बातें होती रही हैं… अब इन बातों की सच्चाई क्या है जाहिर सी बात है ये जाँच के बाद ही सामने आ पाएगा, लेकिन सवाल तो उठता है कि अगर एक राज्य में किसी अस्पताल से जुड़ी इतनी गड़बड़ घोटालों को लेकर खुलासे हो रहे हैं तो फिर जाँच क्यों नहीं हुई। क्यों संदीप घोष को मुर्शिदाबाद से दोबारा आरजीकर अस्पताल में अपनी नौकरी वापस मिल गई, क्यों बार-बार ट्रांसफर होते-होते रह गया।
कहावत है 'चोरों को सारे नज़र आते हैं चोर', कांग्रेस पर सटीक बैठती है। फोन टेप करते हैं खुद, आरोप भाजपा पर लगाते हैं कि बीजेपी विपक्ष के फोन टेप कर/करवा रही है। याद हो, ऐसी अभी कुछ समय पूर्व चर्चा थी। जबकि राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अपने ही सहयोगी सचिन पायलट का फोन टेप कर रहे थे। ज्ञात हो, यूपीए के कार्यकाल में केंद्रीय मंत्री रहे प्रणव मुखर्जी की जासूसी किये जाने की बहुत चर्चा थी, लेकिन जासूसी कैमरा हटाने पर यह कह कर पर्दा डाला गया था कि "चिनगाम" थी। अब कोई यूपीए से पूछे कि 'क्या किसी मिनिस्टर के कमरे में कोई दीवारों पर "चिनगाम" फैंकता हैं?
विधानसभा चुनावों में पराजय के बाद अब राजस्थान में कांग्रेस सरकार की करतूतों की पोल उनके अपने ही खोल रहे हैं। सचिन पायलट की निगरानी किए जाने का चौंकाने वाला खुलासा लोकेश शर्मा ने किया है। शर्मा निवर्तमान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के विशेष कार्याधिकारी (OSD) रह चुके हैं।
शर्मा के अनुसार पायलट के हर मूवमेंट पर नजर रखी जाती थी। उनका फोन टैप कराया गया था। सचिन पायलट का कहना है कि वे इस मुद्दे को पार्टी विधायक दल की बैठक में उठाएँगे। शर्मा ने इससे पहले चुनावों में कांग्रेस की हार का कसूरवार भी गहलोत को ही बताया था।
न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार पायलट की निगरानी और फोन टैप किए जाने के उनके समर्थकों के आरोपों को लेकर शर्मा से सवाल किया गया था। इसके जवाब में उन्होंने कहा, “ये तो निश्चित रूप से सबके सामने था कि वे कहाँ जा रहे थे, किससे मिल रहे थे, किससे बात कर रहे थे, इस पर नजर रखी गई थी।”
लोकेश शर्मा ने का यह भी कहना है कि उन्होंने कुछ विधायकों के टिकट काटने और सचिन पायलट द्वारा उठाए गए मुद्दों पर ध्यान देने की सलाह मुख्यमंत्री गहलोत को दी थी। उन्होंने कहा, “अपने सर्वेक्षणों के आधार पर, मैंने मुख्यमंत्री से कहा था कि उन्हें मौजूदा विधायकों को बदलने की जरूरत है। उन्हें सचिन पायलट द्वारा उठाए गए पेपर लीक मुद्दे पर भी ध्यान देना चाहिए। लेकिन उनकी आपसी लड़ाई ने उस चुनाव में पार्टी को भारी नुकसान पहुँचाया, जिसे हम जीत सकते थे।”
लोकेश शर्मा ने बताया कि अशोक गहलोत ने उनके सुझावों पर कोई एक्शन नहीं लिया। कांग्रेस आलाकमान को गलत रिपोर्ट भेजकर अँधेरे में रखा है। इसी कारण से पार्टी राज्य में हारी। लोकेश बीकानेर या भीलवाड़ा से लड़ना चाहते थे लेकिन कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया था। गौरतलब है कि राजस्थान विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की करारी हार हुई है। पाँच साल सत्ता में रहने के बाद अब 2023 के विधानसभा चुनाव में मात्र 69 सीटें मिली हैं। भाजपा ने 115 सीटों के साथ राज्य में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया है।
लोकेश बीकानेर या भीलवाड़ा से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस ने उन्हें टिकट नहीं दिया था। ऐसे में विधानसभा चुनाव में पार्टी को महज 69 सीटें मिलने के बाद से उन्होंने मोर्चा खोल रखा है। नतीजों के बाद उन्होंने कहा था, “तीसरी बार लगातार सीएम रहते हुए गहलोत ने पार्टी को फिर हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया। आज तक पार्टी से सिर्फ लिया ही लिया है, लेकिन कभी अपने रहते पार्टी की सत्ता में वापसी नहीं करवा पाए गहलोत।”
लोकतंत्र में जनता ही माई-बाप है और जनादेश शिरोधार्य है, विनम्रता से स्वीकार है।
मैं नतीजों से आहत जरूर हूँ, लेकिन अचंभित नहीं हूँ.. कांग्रेस पार्टी #Rajasthan में निःसंदेह रिवाज़ बदल सकती थी लेकिन अशोक गहलोत जी कभी कोई बदलाव नहीं चाहते थे। यह कांग्रेस की नहीं बल्कि अशोक गहलोत जी…
आगे उन्होंने लिखा था,”आलाकमान के साथ फरेब, ऊपर सही फीडबैक न पहुँचने देना, किसी को विकल्प तक न बनने देना, अपरिपक्व और अपने फायदे के लिए जुड़े लोगों से घिरे रहकर आत्ममुग्धता में लगातार गलत निर्णय और आपाधापी में फैसले लिए जाते रहना, तमाम फीडबैक और सर्वे को दरकिनार कर अपनी मनमर्जी और अपने पसंदीदा प्रत्याशियों को उनकी स्पष्ट हार को देखते हुए भी टिकट दिलवाने की जिद, आज के ये नतीजे तय थे।”