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जिस रामचरितमानस का भारत में सनातन विरोधियों ने किया अपमान, उसे UNESCO ने अपनी सूची में दिया स्थान

राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को 'यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर' में जगह (फोटो साभार : PIB)
भारत में राजनीती नहीं बल्कि सियासत(क्योकि हिन्दू शास्त्र राजनीती सिखाते हैं, सियासत नहीं) कहना चाहिए कि कुर्सी की लालसा में तुष्टिकरण के आगे घुटने टेक अपने धार्मिक ग्रंथों का अपमान करने से नहीं चूकते, जबकि भारत से बाहर उसी सनातन को सिर का मुकुट बनाया जा रहा है, जो सनातन विरोधियों के लिए डूब मरने की बात है। 

भारत की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक विरासत को यूनेस्को की ‘मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में जगह मिली है। भारत के राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन को इस खास रजिस्टर में शामिल किया गया है। रामचरितमानस’, ‘पंचतंत्र’ और ‘सहृदयलोक-लोकन’ ने भारत के सामाजिक, धार्मिक एवं जीवन दर्शन पर गहरा असर डाला है और भारतीय साहित्य और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है, देश के नैतिक ताने-बाने और कलात्मक अभिव्यक्तियों को आकार दिया है।

इन साहित्यिक कृतियों ने समय और स्थान से परे जाकर भारत के भीतर और बाहर दोनों जगह पाठकों और कलाकारों पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उल्लेखनीय है कि ‘सहृदयालोक-लोकन’, ‘पंचतंत्र’ और ‘रामचरितमानस’ की रचना क्रमशः पं. आचार्य आनंदवर्धन, विष्णु शर्मा और गोस्वामी तुलसीदास ने की थी।

रामचरितमानस : भगवान राम के जीवन चरित- रामचरितमानस को तुलसीदास ने 16वीं शताब्दी में हिंदी भाषा की अवधी बोली में लिखा था। यह रामायण से भिन्न है जिसे ऋषि वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में लिखा था। रामचरितमानस चौपाई रूप में लिखा गया ग्रंथ है। रामकथा को देश दुनिया में प्रसारित करने में रामचरितमानस को सबसे अहम माना जाता है। आज भी रामचरितमानस का पाठ सामूहिक रूप से किया जाता है।

पंचतंत्र की कथाएँ: पंचतंत्र दुनिया की दंतकथाओं के सबसे पुराने संग्रहों में से एक है जो संस्कृत में लिखा गया था। विष्णु शर्मा जो महिलारोप्य के राजा अमर शक्ति के दरबारी विद्वान थे, उन्हें पंचतंत्र का श्रेय दिया जाता है। इसकी रचना संभवतः 300 ईसा पूर्व के आसपास हुई थी। इसका अनुवाद 550 ईसा पूर्व में पहलवी (ईरानी भाषा) में किया गया था।

‘सहृदयालोक-लोकन: ‘सहृदयालोक-लोकन’ की रचना आचार्य आनंदवर्धन ने संस्कृत में की थी। आचार्य आनंदवर्धन,10वीं शताब्दी के उत्तरार्ध और 11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के दौरान कश्मीर में रहते थे।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) ने मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमेटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (एमओडब्ल्यूसीएपी) की 10वीं बैठक के दौरान एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उलानबटार में हुई इस सभा में, सदस्य देशों के 38 प्रतिनिधि, 40 पर्यवेक्षकों और नामांकित व्यक्तियों के साथ एकत्र हुए। तीन भारतीय नामांकनों की वकालत करते हुए, आईजीएनसीए ने ‘यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में उनका स्थान सुनिश्चित किया।

आईजीएनसीए में कला निधि प्रभाग के डीन (प्रशासन) और विभाग प्रमुख प्रोफेसर रमेश चंद्र गौड़ ने भारत से इन तीन प्रविष्टियों- राम चरित मानस, पंचतंत्र और सहृदयालोक-लोकन को सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया। प्रो. गौर ने उलानबटार सम्मेलन में नामाँकनों का प्रभावी ढंग से समर्थन किया। यह उपलब्धि भारत की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए आईजीएनसीए के समर्पण को प्रदर्शित करती है, साथ ही वैश्विक सांस्कृतिक संरक्षण और भारत की साहित्यिक विरासत की उन्नति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है।

यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-पैसिफिक रीजनल रजिस्टर के बारे में 2008 में ही सहमति बना ली गई थी, लेकिन पहली बार इसके लिए नामाँकन जमा किए गए। गहन विचार-विमर्श से गुजरने और रजिस्टर उपसमिति (आरएससी) से सिफारिशें प्राप्त करने और बाद में सदस्य देशों के प्रतिनिधियों द्वारा मतदान के बाद, सभी तीन नामांकनों को शामिल किया गया, जिससे 2008 में रजिस्टर की स्थापना से पहले की महत्वपूर्ण भारतीय प्रविष्टियों को चिह्नित किया गया


उत्तर प्रदेश : समाजवादी पार्टी विधायक को तुलसीदास के ग्रन्थ से दिक्कत, कहा – हिम्मत है तो मेरी ताड़ना कर के दिखाओ

 सपा विधायक पल्लवी पटेल
सनातन धर्म को कलंकित कर यदि छद्दम धर्म-निरपेक्ष सत्ता तक पहुँच जाएंगे अपने इस पाखंड को सुधारने में उनकी भलाई है। अगर अखिलेश यादव अपनी पार्टी को बचाना चाहते हैं, इन कुरीतियों पर लगाम लगानी होगी। सनातन धर्म पर कीजड़ फेंकने से हिन्दू तो क्या मिलने वाले मुस्लिम वोटों में उम्मीद से अधिक गिरावट देखोगे, क्योकि कट्टरपंथियों को छोड़ आम मुसलमान भी समझ रहा है कि 'जो अपने धर्म का नहीं, वह किसी के मजहब की क्या इज्जत करेगा', जो समस्त छद्दम धर्म-निरपेक्ष पार्टियों के लिए खतरे की घंटी है। सनातन पर जितने अधिक हमले होंगे, उतनी ही तेजी से वोट ध्रुवीकरण भी हो रहा है, इस सच्चाई को भी गंभीरता से समझना होगा।

रामचरितमानस को अपमानित करने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। रामचरितमानस पर सबसे अधिक सवाल समाजवादी पार्टी उठा रही है। सबसे पहले सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने इस ग्रंथ पर आपत्ति जताई और अनर्गल बयान दिए। अब इस कडी में सिराथू सीट से सपा विधायक और अपना दल (कमेरावादी) की नेता पल्लवी पटेल ने विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि वह रामचरितमानस को नहीं मानती हैं और इसमें शूद्र शब्द हटाने के लिए आंदोलन करेंगी। जरूर करना चाहिए, क्योकि पार्टी को गठ्ठे में फेंकने का और कोई सुगम मार्ग दूर तक नज़र भी नहीं आ रहा। 
साभार सोशल मीडिया 

उन्होंने इसके साथ ही सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य के बयान पर अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया और साथ ही पूछा कि उन्होंने इतनी देर से आपत्ति क्यों उठाई। अगर उन्हें इस बात का बुरा लगा था तो उन्होंने पहले ही पार्टी छोड़ देनी चाहिए थी। लेकिन वह भाजप के साथ बने रहे। पल्लवी दरअसल स्वामी प्रसाद मौर्य के उस बयान का संदर्भ दे रही थी जिसमें उन्होंने कहा था कि अखिलेश यादव ने जब सीएम की कुर्सी छोड़ी थी, तब उस कुर्सी को गंगाजल से धोया गया था।

पललवी ने रामचरितमानस से कुछ शब्दों को हटाने की माँग की और अपने बयान में कहा, “बहुत से लेखकों ने इसे लिखा है। और, वाल्मीकि जी की रामायण को जिन्होंने अनुवाद किया है, उन्होंने सभी रामायणों का अनुवाद करके और उसमें अपने विचार मिलाकर रामचरितमानस का निर्माण किया है। इस्लाम और कुरान में लिखा है कि मूर्ति पूजन हराम है, लेकिन मैं यह नहीं मानती। हमारे लिए मूर्ति पूजा साकार ब्रह्म है। जिसको मैं मानती नहीं हूँ। उसकी मैं बात नहीं करती हूँ। किसी पंक्ति को हटाना, महत्वपूर्ण नहीं है। हमें आंदोलन इतना बड़ा करना है कि लोगों की मानस पटल से यह बात हटें। सबसे पहले शूद्र शब्द को हटाने की बात होती है। शूद्रों का जिस तरह से दमन हुआ है। उनका शोषण हुआ है। इस चीज को लोगों के मन से हटना जरूरी है।”

उन्होंने आगे कहा कि रामचरितमानस में यह भी लिखा हुआ है कि ढोल्, गँवार, शुद्र, पशु, नारी, सब हैं ताड़न के अधिकारी। साथ ही धमकी के अंदाज़ में कहा कि मैं आपके सामने नारी बैठी हुई हूँ, कोई करके दिखा दे मेरी ताड़ना। यह पूछे जाने पर कि क्या आप रामचरितमानस में विश्वास नहीं करती हैं, उन्होंने कहा, “मैं रामचरितमानस में विश्वास नहीं करती हूँ। मैं उन्हें संत नहीं मानती हूँ। मैं उन्हें केवल एक अनुवादक मानती हूँ। वो एक ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने सभी रामायण को पढ़ते हुए एक नई रामायण का निर्माण किया।”