अप्रैल 3 को News18 पर 'भईया जी कहिन' लाइव शो में यह भी चौकाने वाला मुद्दा सामने आया कि कुछ 5/3 स्टार होटल 1 रूपए महीना दे रहे हैं लेकिन लाखों रूपए महीना दूसरे रास्ते से दिए जा रहे हैं। हालाँकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है, अगर यह बात सत्य है तो मतलब खुलेआम हो रही लूट पर लगाम। वक्फ कानून की असीमित शक्तियों पर लगाम कसने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल पेश किया, जिसे संसद के दोनों सदनों में पारित कर लिया गया है। अब इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह कानून बन जाएगा। इस बीच मुस्लिमों के विरोध को लेकर सरकारें सतर्क हैं। खासकर पिछले कुछ समय से रामनवमी पर हिंदुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को देखकर यह सतर्कता लाजिमी है।
हालात का अनुमान लगाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने तो पुलिस कर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं। उन्हें सेवा में वापस लौटने के लिए कह दिया गया है। दरअसल, वक्फ बिल को लेकर मुस्लिमों के मजहबी नेता से लेकर मुस्लिम संगठनों के प्रमुख तक वक्फ को लेकर अफवाह फैला रहे हैं और मुस्लिमों को एक तरह से उकसाने का काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने यहाँ तक धमकी दे दी है कि कृषि कानूनों की तरह इसे भी वापस लेना होगा।
वक्फ संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान हैदराबाद से सांसद और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन औवेसी पहले ही सदन में उसकी कॉपी फाड़ चुके हैं। वो ये भी कह चुके हैं कि इस बिल के माध्यम से सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों को ही नहीं, बल्कि उनके मजहबी स्थलों- मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान आदि पर कब्जा कर लेगी। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही थी।
हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा, “ये बिल मुस्लिमों के साथ अन्याय है। यह एक जंग का ऐलान है। हमारे मदरसों और मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इसके जरिए मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का शहरी बनाने की कोशिश की जा रही है।”
इस्लामी नेता इसहाक गोरा ने कहा कि यह बिल मुस्लिमों के धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनी हकों पर सीधा हमला है। इससे मुस्लिमों की वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण हो जाएगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, “विधेयक पास हो जाता है तो हम इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। हम चुप नहीं बैठेंगे।”
वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस बिल को बहुसंख्यकवादी मानसिकता वाला बताया है। संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सरकार जबरन इस बिल को संसद में लाई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद मुंबई के अध्यक्ष मौलाना सिराज खान ने तो धमकी तक दे डाली। उन्होंने कहा, “सरकार ध्यान से सुन ले, हम जेल जाने से डरते नहीं हैं।”
सिराज ने कहा, “हमारे किसी भी मामले में अगर सरकार दखलअंदाजी करेगी तो हम जेलों को आबाद करेंगे। हम अपनी आजादी के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। हमारे नबी ने जीने का जो तरीका बताया है, हम उसी के हिसाब से जीने की कोशिश करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग की तरह देश भर में धरना प्रदर्शन किया जाएगा। महाराष्ट्र में भी शाहीन बाग की तरह आंदोलन किया जाएगा।”
शाहीन बाग की तर्ज पर हिंसा भड़काने की कोशिश
जिस तरह मुस्लिम नेता और मौलाना बयान दे रहे हैं, वह भड़काने वाला है। इसी तरह बात नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर फैलाई गई थी कि CAA और NRC कानून के जरिए मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। ठीक उसी तर्ज पर वक्फ बिल को लेकर भी अफवाह फैलाने की कोशिश। की जा रही है कि सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों और मस्जिद-दरगाहों पर कब्जा कर लेगी।
अगर मुस्लिम नेताओं से लेकर धर्मगुरुओं के बयानों को देखें तो वक्फ संशोधन बिल को लेकर भी ये अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मुस्लिमों को भ्रमित करके अधिक से अधिक उनका समर्थन हासिल किया जा सके। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को लेकर भी ऐसी ही अफवाह फैलाई गई थी।
उस समय तमाम नेता ने ऐसा ही किया था। जेल में बंद शरजील इमाम ने जामिया से लेकर तमाम देश के दूसरे हिस्सों तक में इसको लेकर अफवाह फैलाई थी। शरजील इमाम ने पैंफलेट छपवाकर कई मस्जिदों और यूनिवर्सिटी में बँटवाया और खुद बाँटा था। पैंफलेट में लिखा था कि मुस्लिमों को नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (CAA-NRC) का विरोध करना चाहिए।
पैंफलेंट सभी मुस्लिमों को एक साथ मिलकर विरोध करने की अपील की गई थी। मुस्लिमों को भड़काने के लिए इसमें कश्मीर से लेकर बाबरी ढाँचे तक का जिक्र गया था। उसमें लिखा गया था कि पहले कश्मीर, फिर बाबरी मस्जिद और अब CAA हुआ है। इस पैंफलेट में दिल्ली को डिस्टर्ब करने के लिए कहा गया था, ताकि दुनिया भर की मीडिया का ध्यान इस ओर जाए।
इस पैंफलेट बाँटने के एक दिन बाद 15 दिसंबर 2020 को कई जगहों पर हिंसा फैल गई थी। इसमें दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिर्विसटी की हिंसा भी शामिल थी। आगे चलकर CAA-NRC के नाम पर की किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को हिंसक बना दिया गया और आखिरकार फरवरी 2020 में पूर्वी दिल्ली के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई थी।
रामनवमी और हनुमान जयंती को लेकर सावधानी
शाहीन बाग की तर्ज पर ही वक्फ संशोधन बिल के विरोध के नाम पर एक बार फिर दिल्ली एवं अन्य जगहों को दहलाने की कोशिश की जा सकती है। रामनवमी पर वैसे भी पिछले कई सालों से सुनियोजित तरीके से हमले किए जा रहे हैं। ये हमले सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि यूपी-बिहार और झारखंड से लेकर कर्नाटक एवं महाराष्ट्र तक में दिया जाता रहा है।
कट्टरपंथियों द्वारा रामनवमी पर हिंसा की इस परिपाटी को वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध के नाम पर दोहराने की कोशिश इस साल भी की जा सकती है। वैसे तो मूर्ति-पूजक हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिम बहुल इलाकों में हमला करने की घटनाएँ अक्सर आती रहती हैं, लेकिन साल 2019 के बाद रामनवमी एवं हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर हमले की घटनाएँ अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई हैं।
साल 2019 भारतीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। इसी साल 5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। इसको लेकर कुछ कट्टरपंथियों के मन में एक कसक पैदा हो गई। इसी बीच 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 140 से अटके अयोध्या विवाद पर हिंदुओं के पक्ष में फैसला दे दिया।
कट्टरपंथियों पर यह दोहरी मार थी। अभी एक महीना भी नहीं बीते होंगे कि 11 दिसंबर 2019 को भारत सरकार ने नागरिक संशोधन विधेयक (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) कानून पास कर दिया। यह वह ऐसा था, जिसमें पड़ोसी इस्लामी देशों में रहने वाले वहाँ के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था।
इसको लेकर भी कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं भारत विरोधी शक्तियों ने मुस्लिमों को भड़काना शुरू कर दिया कि इससे मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। इसके बाद बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई थी। मन में बसी यह कसक रामनवमी जैसी धार्मिक यात्रा पर हमला करके कट्टरपंथी निकालते रहते हैं। इस बार भी वे कुछ ऐसा ही करने की सोच रहे हैं। इससे सतर्क रहने की जरूरत है।
विपक्ष ने वक्फ बिल को JPC में भेजने की मांग की तो सरकार ने भी कोई इसमें कोई नानुकर नहीं की। मंद बुद्धि विपक्ष मोदी की चाल में फिर फंस गया। जबकि सरकार चाहती तो बिल लोकसभा में पास करा सकती थी। मुसलमानों के विरुद्ध मोदी के विरुद्ध शोर मचाने का सुनहरा मौका गँवा दिया। लेकिन अब मोदी इसे तुम्हारे ही खिलाफ मुसलमानों में तुम्हारी औकात दिखाने के लिए इस्तेमाल करेगा। अब जो भी रिपोर्ट आएगी JPC की उस पर विपक्ष को बोलने का ज्यादा अधिकार नहीं रहेगा। वैसे JPC की रिपोर्ट अक्सर Party Lines पर ही आती है।
JPC में संसद के दोनों सदनों के 30 सदस्य होंगे, 20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से और उन्हें लोकसभा स्पीकर नामित करेंगे। JPC की पहली बैठक होने के 3 महीने बाद उसे अपनी रिपोर्ट देनी होगी। मतलब कुछ समय के लिए मामला लटका है लेकिन मोदी सरकार ने गोटियां सोच समझ कर बैठाई हैं।
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अखिलेश यादव की एक बात पर मेरा ध्यान गया। उसने कहा कि वक्फ बोर्ड में 2 सदस्य गैर-मुस्लिम रखने का क्या मतलब है जबकि अन्य धर्मों के साथ ऐसा नहीं किया जाता। DMK की कनिमोझी ने भी कहा कि क्या ईसाई और मुस्लिम किसी हिंदू मंदिर के बोर्ड में शामिल हो सकते हैं। कांग्रेस के के सी वेणुगोपाल ने कहा, आज आप मुस्लिमों के लिए कानून बना रहे हो, कल ईसाइयों के लिए बनाएंगे, फिर आप जैन लोगों के लिए और फिर पारसी लोगों के लिए करेंगे।
शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने कहा कि बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह पीड़ादायक है और किसी भी देश की जिम्मेदारी होती है अल्पसंख्यकों की रक्षा करना। लेकिन इंडी गठबंधन के नेता चुप हैं हिंदुओं की दुर्दशा पर।
ओवैसी कह रहा है कि यह बिल संविधान के Basic Structure पर हमला है, ये न्यायिक स्वतंत्रता और Separation of Powers की अवहेलना करता है। उसने यह भी कहा कि “आप मुसलमानों के दुश्मन हैं और यह बिल इसका सबूत है”।
वेणुगोपाल जी, मुस्लिमों द्वारा 9 लाख एकड़ जमीन पर कब्ज़ा करने के साथ, ईसाइयों की चर्चों के लिए अंग्रेजों की फ्री में दी हुई जमीनों की 100 वर्ष की लीज़ कब की ख़त्म हो चुकी है, क्या करें उसका, आप ही बताओ। उसके विपरीत जैन और पारसी समाज ने कभी देश को कोई कोई समस्या नहीं दी, वो देश को देते है जबकि मुस्लिम तो लूट ही रहे हैं। जैन तो हिंदू ही हैं, आपने अलग किया उन्हें।
ओवैसी मियां, कैसे ढक्कन हो तुम, संविधान में वक्फ बोर्ड कहां से Basic structure हो गया बल्कि इसका तो कॉलेजियम की तरह संविधान में कोई जिक्र ही नहीं है, और दुश्मन मुस्लिमों की भाजपा नहीं है, दुश्मन हिंदुओं के मुस्लिम हैं, तभी पाकिस्तान ले गए और आज भी एक और पाकिस्तान मांग रहे हैं, आज मुस्लिमों की हिंदुओं से दुश्मनी का सबूत बांग्लादेश में दिखाई दे रहा है। अरफ़ा खानुम का शिव लिंग की जगह कूड़ेदान दिखाना क्या हिंदुओं के मोहब्बत की निशानी है? भगवान शंकर का अपमान हर मुसलमान कर रहा है लेकिन आप कुछ नहीं कहते।
अखिलेश और कनिमोझी आप भी सुनो -
तमिलनाडु हर साल करोड़ों रुपया हिंदू मंदिरों से जबरन वसूल करती है और चर्च और मस्जिदों को देती है और ऐसा दक्षिण के सभी राज्य करते हैं;
तिरुपति मंदिर के बोर्ड का अध्यक्ष एक ईसाई को बनाया गया दो बार;
बंगाल में तारकेश्वर मंदिर के बोर्ड का अध्यक्ष 2017 में एक मुस्लिम फिरहाद हाकिम को बनाया जो ममता के बहुत करीब था और जो अपने चुनाव क्षेत्र को “Mini Pakistan” कहता था।
वर्ष 2013 में कुंभ मेले की आयोजन समिति का अध्यक्ष अखिलेश यादव ने एक मुसलमान आज़म खान को बनाया।
वक्फ बोर्ड बना कर और उसे असीमित शक्तियां देकर कांग्रेस ने भारत में दूसरा पाकिस्तान बनाने की कुटिल चाल चली जिससे मुस्लिम देश पर कब्ज़ा कर सकें। वक्फ बोर्ड किसी की भी सम्पत्तियों को हड़प रहा है और उसी लिए 2 गैर मुस्लिमों को बोर्ड में रखना जरूरी है जिससे हिंदुओं और अन्य की भूमि न हड़पी जा सके।
भारत सरकार की वक्फ बोर्ड की वेबसाइट के मुताबिक वक्फ शब्द की उत्पत्ति अरब जगत के वकुफा शब्द से हुई है, जिसका मतलब है पकड़ना, बांधना या हिरासत में लेना।
वक़्फ़ बिल को JPC को भेजना मोदी सरकार ने जो खेल खेला है, वह भाजपा की हार नहीं, भारत की अशिक्षित बनी शिक्षित जनता को नींद से जगाने के लिए खेल खेला है। याद करिए, जिस तरह मुस्लिम वोट लेने के लिए अयोध्या की तरह काशी और मथुरा को लटका कर मुसलमानों को डरा कर अपने वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है, ठीक उसी तर्ज पर मुसलमानों के साथ-साथ छद्दम सेकुलरिज्म का चोला ओढे पाखंडियों को बेनकाब किया जा रहा है। जिस तरह CAA पर घुसपैठियों को बचाने आम मुसलमानों को भड़काया गया था , उसी तरह वक़्फ़ पर भड़काया जा रहा है। भारत ही विश्व में ऐसा देश है जहाँ वक़्फ़ बोर्ड है, किसी भी मुस्लिम देश में नहीं। क्या भारत ही का मुसलमान इस्लामिक है मुस्लिम देशों का नहीं? पूछो इन मुस्लिम हिमायतियों और मौलानाओं से मक्का-मदीना में चल रहे बुलडोज़र पर क्यों नहीं बोलते? पूछों इनसे कि बुलडोज़र किन-किन मजहबी जगहों पर चला है? जितना इस बिल के पास होने में देरी होगी, उतना ही लोगों को मालूम होगा कि जवाहर लाल से लेकर कांग्रेस यूपीए सरकार द्वारा हिन्दुओं को सेकुलरिज्म की लॉलीपॉप देकर land jehad कर देश को गजवा - ए - हिन्द बनाने का खेल खेला जा रहा था।
पहले भारतीय रेलवे, उसके बाद भारतीय सेना और उसके बाद तीसरे नंबर पर इस मुल्क में अगर किसी एक संस्था के पास सबसे ज्यादा ज़मीन है तो वो है वक्फ बोर्ड। पूरे देश में इतनी ज़मीन कि अगर उसे एक साथ कर दिया जाए तो देश की राजधानी दिल्ली जैसे कम से कम तीन शहर बसाए जा सकते हैं। कुल करीब 9 लाख 40 हजार एकड़ ज़मीन. लेकिन अब इसी वक्फ बोर्ड को लेकर संसद में जो बिल आया है, उसने सत्ता पक्ष और विपक्ष को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है।
तो आखिर ये वक्फ बोर्ड है क्या, इसके पास इतनी ज़मीन आई कहां से, आजादी के बाद से अब तक इन ज़मीनों की देखभाल कौन करता है, इन ज़मीनों से होने वाली आमदनी कहां खर्च होती है और अब मोदी सरकार ऐसा क्या बदलाव कर रही है कि पूरे देश में हंगामा मच गया है, एक-एक करके सभी सवालों का जवाब तलाशने की कोशिश करेंगे विस्तार से।
वक्फ का मतलब क्या है?
भारत सरकार की वक्फ बोर्ड की वेबसाइट के मुताबिक वक्फ शब्द की उत्पत्ति अरब जगत के वकुफा शब्द से हुई है, जिसका मतलब है पकड़ना, बांधना या हिरासत में लेना। इस्लामिक मान्यता के मुताबिक अगर कोई भी शख्स अपने धर्म की वजह से या फिर अल्लाह की खिदमत करने की नीयत से अपनी ज़मीन या अपनी संपत्ति का दान करता है, तो उसे ही वक्फ कहते हैं। यानी कि इस्लाम में धर्म के आधार पर दान की गई चल या अचल संपत्ति वक्फ है। और जिसने दान किया है, उसे कहा जाता है वकिफा। लेकिन संपत्ति दान करने की एक शर्त ये होती है कि उस चल या अचल संपत्ति से होने वाली आमदनी को इस्लाम धर्म की खिदमत में ही खर्च किया जा सकता है। और इस खिदमत का मतलब मस्जिद की तामीर करवाना, कब्रिस्तान बनवाना, मदरसे बनवाना, अस्पताल बनवाना और अनाथालय बनवाना है। अगर कोई गैर इस्लामिक शख्स भी अपनी संपत्ति को वक्फ करना चाहे तो वो कर सकता है, बशर्ते वो इस्लाम को मान्यता देता हो और उसकी वक्फ की गई संपत्ति का मकसद भी इस्लाम की खिदमत हो।
इस्लाम में कहां से आया वक्फ का कॉन्सेप्ट?
इस्लाम में वक्फ का कॉन्सेप्ट पैगंबर मुहम्मद साहब के ही वक्त से है। भारत सरकार की वक्फ बोर्ड की वेबसाइट के मुताबिक एक बार खलीफा उमर ने खैबर में एक ज़मीन का टुकड़ा अपने कब्जे में लिया और पैगंबर मोहम्मद साहब से पूछा कि इसका सबसे बेहतर इस्तेमाल किस तरह से किया जा सकता है। तो मुहम्मद साहब ने जवाब दिया कि इस ज़मीन को कुछ इस हिसाब से इस्तेमाल करो कि अल्लाह के दिखाए रास्ते के जरिए ये ज़मीन इंसानों के काम आए। इसे किसी भी तरह से न तो बेचा जा सके, न ही किसी को तोहफे में दिया जा सके, न ही इस पर किसी तरह से तुम्हारे बच्चे या आने वाली पीढ़ियां काबिज हो सकें. इसके अलावा एक और मान्यता है कि 570 ईसा पूर्व मदीना में खजूरों का एक बड़ा बाग था, जिसमें करीब 600 पेड़ थे। उनसे होने वाली आमदनी का इस्तेमाल मदीना के गरीब लोगों की मदद के लिए किया जाता था। इसे वक्फ का शुरुआती उदाहरण माना जाता है। मिस्र की अल-अज़हर यूनिवर्सिटी और मोरक्को की अल-कुरायनीन यूनिवर्सिटी वक्फ संपत्ति पर बने सबसे पुराने संस्थान माने जाते हैं।
भारत में कैसे शुरू हुआ वक्फ का कॉन्सेप्ट?
भारत में वक्फ की शुरुआत हिन्दू साम्राज्य को भूल दिल्ली सल्तनत से मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि दिल्ली सल्तनत में सन 1173 के आस-पास सुल्तान मुईजुद्दीन सैम गौर ने मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गांव दिए थे। और यहीं से भारत में वक्फ परंपरा की शुरुआत हुई। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान वक्फ को खारिज कर दिया गया था। लेकिन आजादी के बाद भारत में बाकायदा कानून बनाकर वक्फ परंपरा को बरकरार रखा गया. सबसे पहले संसद ने 1954 में कानून बनाया। फिर उसमें संसोधन हुआ और 1995 में नरसिम्हा राव सरकार ने कानून में तब्दीली की। और आखिरी बार साल 2013 में मनमोहन सिंह की सरकार में इतनी बड़े बदलाव हुए कि वक्फ बोर्ड के पास अथाह ताकत आ गई, और वहीं से परेशानी की शुरुआत हो गई।
वक्फ संपत्ति की देख-रेख कौन करता है?
पूरे देश में फैली वक्फ संपत्ति की देखरेख की जिम्मेदारी होती है वक्फ बोर्ड पर। और ये वक्फ बोर्ड भारत की संसद के कानून के तहत बनाया गया है। 1954 में भारतीय संसद ने वक्फ ऐक्ट 1954 पास किया। इसके तहत वक्फ की गई संपत्तियों की देखरेख की जिम्मेदारी वक्फ बोर्ड के पास आ गई। बाकी वक्फ बोर्ड के पास अभी जो इतनी बड़ी संपत्ति है कि वो तीन-तीन दिल्ली बना ले, वो संपत्ति भारत-पाकिस्तान बंटवारे की वजह से हैं।
1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो पाकिस्तान जाने वाले मु्स्लिम लोग अपनी चल संपत्ति तो ले गए, लेकिन अचल संपत्ति यानी कि उनके घर, मकान, खेत-खलिहान, दुकान सब यहीं रह गए। और तब 1954 में कानून बनाकर इस तरह की सभी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड के हवाले कर दिया गया। वक्फ बोर्ड बनाने के अगले ही साल यानी कि 1955 में संसद ने एक और कानून बनाया और इसके तहत देश के हर एक राज्य में वक्फ बोर्ड बनाने का अधिकार मिल गया. फिर 1964 में सेंट्रल वक्फ काउंसिल का गठन हुआ, जिसका मकसद राज्यों के वक्फ बोर्ड को सलाह-मशविरा देना था। लेकिन भारत में भी इस्लाम को मानने वाले दो बड़े धड़े हैं। एक धड़ा शिया समुदाय का है और दूसरा धड़ा सुन्नी समुदाय का।
तो वक्फ बोर्ड में शिया और सुन्नी के नाम पर भी बंटवारा हुआ। और इस्लाम को मानने वाली इन दोनों ही धाराओं के लोगों ने अपना-अपना वक्फ बोर्ड यानी कि शिया वक्फ बोर्ड और सुन्नी वक्फ बोर्ड बना लिया। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में शिया और सुन्नी के वक्फ बोर्ड अलग-अलग हैं।
वक्फ बोर्ड में होता कौन-कौन है?
भारत की संसद के बनाए कानून के मुताबिक सेंट्रल वक्फ काउंसिल में सबसे ऊपर केंद्र सरकार के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री होते हैं। और इस लिहाज से अभी देखें तो वक्फ बोर्ड में सबसे ऊपर हैं केंद्रीय मंत्री किरेन रिजीजू। दूसरे नंबर पर वक्फ के डायरेक्टर होते हैं, तो केंद्र सरकार के जॉइंट सेक्रेटरी लेवल के अधिकारी होते हैं। अभी एसपी सिंह तेवतिया वक्फ बोर्ड के डायरेक्टर हैं. इसके अलावा बोर्ड में आठ और सदस्य होते हैं। लेकिन अभी केंद्रीय वक्फ बोर्ड में इन सभी 8 लोगों की जगह खाली है।
राज्यों के वक्फ बोर्ड में कौन-कौन होता है?
अलग-अलग राज्यों के वक्फ बोर्ड में सबसे ऊपर चेयरमैन होता है। उसके अलावा सेक्रेटरी के स्तर का एक आईएएस अधिकारी होता है, जो एक तरह से सीईओ होता है। बाकी संपत्तियों का लेखा-जोखा रखने के लिए सर्वे कमिश्नर होता है। बाकी दो सदस्यों को उस राज्य की सरकार मनोनित करती है, जिसमें एक मुस्लिम सांसद और एक मुस्लिम विधायक होता है। बाकी उस बोर्ड का राज्य स्तर पर एक वकील होता है, एक टाउन प्लानर होता है और एक मुस्लिम बुद्धिजीवी होता है।
वक्फ बोर्ड के पास कितनी ताकत है?
वक्फ बोर्ड के पास अथाह ताकत होती है। वक्फ की सारी संपत्ति की देखरेख की जिम्मेदारी बोर्ड की होती है. कितनी आमदनी हुई, उसे कहां खर्च करना है, ये सब तय वक्फ बोर्ड ही करता है। किसकी संपत्ति वक्फ को लेनी है, संपत्ति किसको ट्रांसफर करनी है, संपत्ति का इस्तेमाल क्या करना है, ये सब वक्फ बोर्ड ही तय करता है। अगर एक बार संपत्ति वक्फ बोर्ड के पास आ गई तो उसे वापस नहीं किया जा सकता है। वो संपत्ति हमेशा-हमेशा के लिए वक्फ की हो जाती है। और इसको लेकर देश की किसी भी अदालत में कोई मुकदमा दायर नहीं हो सकता है। अगर वक्फ बोर्ड को ये लगता है कि कोई भी संपत्ति इस्लामिक कानूनों के मुताबिक वक्फ की है, तो वो वक्फ की हो जाती है। अगर उस ज़मीन पर किसी का दावा है, तो दावा किसी अदालत में नहीं बल्कि वक्फ बोर्ड के सामने ही कर सकता है। और अंतिम फैसले का अधिकार भी वक्फ बोर्ड का ही होता है।
अगर हिंदू या कहिए कि गैर-इस्लामिक शख्स की ज़मीन पर भी अगर वक्फ अपना दावा करे तो उस शख्स को वक्फ के पास जाकर ही ये साबित करना होता है कि ज़मीन उसकी है, वक्फ की नहीं। हालांकि वक्फ बोर्ड खुद भी ऐसी ही ज़मीन पर दावा कर सकता है जो 1947 के भारत-पाकिस्तान बंटवारे से पहले वक्फ के नाम पर दर्ज हो या फिर 1954 में भारत सरकार की ओर से वक्फ को दे दी गई हो। कुल मिलाकर एक लाइन में कहें तो वक्फ बोर्ड एक ऐसा बोर्ड है, जिसमें उसके खिलाफ भी अगर कोई बात हो तो उसपर फैसला उसे ही करना होता है, देश की कोई दूसरी अदालत उस मसले पर फैसला नहीं कर सकती है।
मोदी सरकार के नए कानून में क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
मोदी सरकार में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजीजू ने जो बिल संसद में पेश किया है, उसमें वक्फ बोर्ड की असीमित ताकतों को सीमित करने का प्रावधान है। उदाहरण के तौर पर
*अब वक्फ बोर्ड में सिर्फ मुस्लिम ही नहीं गैर मुस्लिम भी शामिल हो सकते हैं।
*वक्फ बोर्ड का सीईओ भी गैर मुस्लिम हो सकता है।
*अब वक्फ बोर्ड में दो महिला सदस्यों को भी शामिल किया जाएगा।
*वक्फ बोर्ड को किसी संपत्ति पर अपना दावा करने से पहले उस दावे का वेरिफिकेशन करना होगा।
*अभी तक मस्जिद या इस तरह की कोई धार्मिक इमारत बने होने पर वो ज़मीन वक्फ की हो जाती थी। लेकिन अब मस्जिद बने होने के बावजूद उस ज़मीन का वेरिफिकेशन करवाना ही होगा।
*भारत सरकार की सीएजी के पास अधिकार होगा कि वो वक्फ बोर्ड का ऑडिट कर सके।
*वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति को उस जिले के जिला मैजिस्ट्रेट के पास दर्ज करवाना होगा, ताकि संपत्ति के मालिकाना हक की जांच की जा सके।
*वक्फ की संपत्तियों पर दावेदारी के मसले को भारत की अदालत में चुनौती दी जा सकेगी और अंतिम फैसला वक्फ बोर्ड का नहीं बल्कि अदालत का मान्य होगा।
विपक्ष को सरकार के बिल पर एतराज क्यों है?
इस बिल के विरोध में लगभग पूरा विपक्ष एक साथ है। चाहे वो कांग्रेस हो, सपा हो, शरद पवार की एनसीपी हो, ममता बनर्जी की टीएमसी हो या फिर असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन, सबने इस बिल का विरोध किया है। और सभी विपक्षी दलों का मानना यही है कि बिल के जरिए सरकार वक्फ की संपत्ति पर अपना कब्जा चाहती है। ओवैसी ने इसे धर्म में हस्तक्षेप बताया है और कहा है कि सरकार मुस्लिमों की दुश्मन है। वहीं सपा मुखिया अखिलेश यादव ने वक्फ बोर्ड में गैर मुस्लिमों को शामिल करने पर ऐतराज जताया है। डीएमके का कहना है कि बिल एक मुस्लिों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है. विपक्ष के और भी तमाम दलों के तर्क कुछ ऐसे ही हैं।
अब इस बिल का भविष्य क्या होगा?
विपक्ष के विरोध को देखते हुए इस बिल को खुद केंद्रीय मंत्री किरेन रिजीजू ने जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव रखा है। यानी कि अब इस बिल की खूबियों और खामियों को देखने के लिए एक जॉइंट पार्लियामेंट्री कमिटी बनेगी। और उसकी सिफारिशों के आधार पर ही तय होगा कि अब इस बिल का भविष्य क्या है।