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भारत की ऋषि परंपरा का गुणगान होना समय की आवश्यकता : भाजपा जिलाध्यक्ष नूना

 

अजय कुमार आर्य, उगता भारत, गाज़ियाबाद 

टीकमगढ़। भारत को समझो अभियान के राष्ट्रीय प्रणेता डॉ राकेश कुमार आर्य ने यहां नगर भवन में आयोजित हिंदू इतिहास की गौरव गाथा और इतिहास का पुनर्लेखन आवश्यक क्यों ? विषय पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि इतिहास क्रूरता का नहीं वीरता का बनता है। हमारे देश के लोगों ने क्रूरता का सामना करने के लिए वीरता का प्रदर्शन किया। जिन्हे इतिहास से ओझल कर दिया गया। हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि संसार के लोगों को सर्व प्रथम महर्षि कणाद ने बताया था कि भौतिक जगत की उत्पत्ति सूक्ष्मातिसूक्ष्म कण अर्थात परमाणुओं के संघनन से होती है। हमारे ज्ञान विज्ञान की चोरी करने में पारंगत रहे पश्चिमी जगत के लोगों ने बाद में हमारे इस महान ऋषि का परमाणु संबंधी यह ज्ञान विज्ञान जॉन डाल्टन ( 6 सितंबर 1766 से 27 जुलाई 1844) के खाते में दर्ज कर दिया।

इतिहास क्रूरता का नहीं, वीरता का लिखा जाना चाहिए : डॉ राकेश कुमार आर्य

डॉक्टर आर्य ने कहा कि हमारे राष्ट्रनिर्माता रामचंद्र जी महाराज ने 14 वर्ष की योजना वनवास के दौरान बनाई और संपूर्ण भूमंडल से राक्षसों का संहार करने में सफलता प्राप्त की । इसी प्रकार श्री कृष्ण जी ने अपने समय में राक्षसों का संहार करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी। इसका कारण केवल एक था कि इस देश के मौलिक संस्कार और मौलिक संस्कृति में ही इस प्रकार के विचार अंतर्निहित रहे हैं कि राक्षसों का संहार करने में किसी प्रकार का कोई दोष नहीं होता। डॉ आर्य ने कहा कि जब तेजस्वी राष्ट्र निर्माता आगे आते हैं तो भारत विश्व गुरु बनता है और जब समझौतावादी तुष्टीकरण की नीति अपनाने वाले लोग सत्ता में बैठते हैं तो राष्ट्र पिछड़ता है।

श्री आर्य ने कहा कि भारत में श्री कृष्ण जी और रामचंद्र जी को भगवान इसलिए माना जाता है कि उन्होंने राक्षसों के संहार में तनिक भी प्रमाद नहीं किया। इस देश ने उसी महान व्यक्तित्व को सर्वोपरि स्वीकार किया है जिसने अपने जीवन काल में राक्षसी व्रतियों का संहार किया हो, परंतु वर्तमान इतिहास राक्षसी वृत्तियों से संपन्न चोर, लुटेरे, बदमाश, आतंकवादी, अत्याचारी और बलात्कारी लोगों का वंदन करता है ।जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।

सभा में भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय संयोजक लखनलाल आर्य ने भारत को समझो अभियान समिति के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम भारत के गौरवशाली इतिहास को दोबारा लिखकर जनता के सामने लाने के लिए कृत संकल्प है। राष्ट्रीय संरक्षक आर्य पुरुषोत्तम मुनि जी ने कहा कि भारत की आध्यात्मिक विचार परंपरा से ही विश्व में शांति स्थापित हो सकती है इसलिए भारत को समझो अभियान का अंतिम उद्देश्य भारत की आध्यात्मिक ऋषि परंपरा को स्थापित करना है।

इस अवसर पर भाजपा के जिला अध्यक्ष अमित कुमार जैन नूना ने अपने ओजस्वी विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत के लिए अपने ऋषियों की वैदिक परंपरा को अपनाकर आगे बढ़ना ही समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत का गौरवशाली इतिहास पुनर्स्थापित हो जिस से आने वाली पीढ़ी के भीतर गर्व और गौरव का बोध स्थापित करने में हमें सहायता प्राप्त हो सके। भारत की ऋषि परंपरा का गुणगान करना समय की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि चाहे आध्यात्मिक क्षेत्र हो, चाहे भौतिक क्षेत्र हो ,चाहे विज्ञान का क्षेत्र हो और चाहे बौद्धिक क्षेत्र हो, सभी क्षेत्रों में भारत ने विश्व का नेतृत्व किया है। इसीलिए भारत विश्व गुरु रहा है । आज भी भारत अपने यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में अपनी नई और उत्कृष्ठ भूमिका के लिए तैयार है।

विश्व गुरु भारत के निर्माण में शानदार भूमिका निभा रहे भारत को समझो अभियान के मिशन और विजन की भी उन्होंने खुलकर प्रशंसा की।

मुन्नी लाल यादव पतंजलि किसान सेवा मध्य प्रदेश, डॉक्टर हरिशरण समरी सह राज्य प्रभारी पतंजलि योग समिति मध्य प्रदेश, अनिल कुमार सेन राज्य प्रभारी पतंजलि युवा भारत मध्य प्रदेश, संतोष कुमार ताम्रकार, महेश रावत, नारायणदास वर्मा जिला प्रभारी भारत स्वाभिमान ट्रस्ट टीकमगढ़, गौरीशंकर सेन मडावरा ,पंडित महेंद्र द्विवेदी अध्यक्ष पत्रकार कल्याण संगठन, किशोर पांडे अध्यक्ष किसान कांग्रेस , और धर्मेंद्र सिंह बुंदेला ने भी अपने विचार व्यक्त किए । सभी वक्ताओं ने मां भारती के गौरव और सम्मान को सुरक्षित रखने के लिए संगठित होकर ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से नवजागरण का सूत्रपात करने और देश को बौध्दिक गुलामी से बाहर लाने के लिए संकल्प व्यक्त किया।

राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम

राजकीय बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए राष्ट्रीय प्रणेता डॉ आर्य ने कहा कि आधुनिक संसार परमाणु बम के जनक के रूप में भी भारत की ओर न देखकर इस बम के तथाकथित आविष्कारक जे0 रॉबर्ट ओपेनहाईवर की ओर देखता है। 

महर्षि कणाद परमाणु वाद के इतने दीवाने हो गए थे कि अपने अंतिम समय में भी उन्होंने पीलव:, पीलव:, पीलव: अर्थात परमाणु, परमाणु, परमाणु शब्द ही उच्चरित किए थे। इन शब्दों का अभिप्राय केवल एक ही था कि वह परमाणु में भी उस परमपिता परमेश्वर को सत्ता को समाहित देख रहे थे। जिसके कारण यह सारा जगत और ब्रह्मांड की सभी शक्तियां गतिमान हैं।

भास्कराचार्य जी ने “सिद्धांत शिरोमणि” के अतिरिक्त करणकुतूहल और वासनाभाष्य (सिद्धान्तशिरोमणि का भाष्य) तथा भास्कर व्यवहार और भास्कर विवाह पटल नामक दो छोटे ज्योतिष ग्रंथ भी लिखे हैं। उन्होंने सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी के लगने वाले समय की जानकारी सबसे पहले हमको दी थी इसके अलावा न्यूटन से पहले ग्रुप आकर्षण के नियमों की विवेचना भी हमारे इसी ऋषि ने की थी। ग्रहण और चंद्र ग्रहण के वैज्ञानिक कारणों की जानकारी देने वाले भी ऋषि भास्कर थे। डॉक्टर आर्य ने कहा कि वाराह्मीहिर भारत के एक महान गणितज्ञ थे जिन्होंने दिल्ली में वेधशाला के रूप में विशाल स्तंभ का निर्माण करवाया जिसे आजकल कुतुबमीनार कहते हैं। उन्होंने कहा कि

क्षेत्र में भी हमारे यहां धन्वंतरी चरक और सुश्रुत जैसे कितने ही वैज्ञानिक आचार्यों चिकित्सा शास्त्रियों की लंबी परंपरा है जिन्होंने मानव जीवन को स्वस्थ बनाए रखने के क्षेत्र में विशेष और उल्लेखनीय कार्य किया।

अवसर पर कॉलेज की प्राचार्य श्रीमती शीलम गुप्ता ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि हमको इतिहास की जिस बारीक जानकारी को आज प्रस्तुत किया गया है यह निश्चय ही आने वाली पीढ़ी के लिए क्रांतिकारी परिवर्तन की सूचक है। इस प्रकार का पाठ्यक्रम विद्यालयों में यथाशीघ्र जारी किया जाना चाहिए जिससे आने वाली पीढ़ी को अधिक से अधिक लाभ प्राप्त हो सके।

श्रीमती शीतल बडोनिया बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम

श्रीमती शीतल बडोनिया बालिका इंटर कॉलेज में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ आर्य ने कहा कि यह दुर्भाग्य का विषय है कि आज हमारे देश के सभी महान वैज्ञानिक ऋषियों के बारे में साहित्य में कुछ नहीं पढ़ाया जता और इतिहास से इन्हें निकाल कर बाहर फेंक दिया गया है । उसके पीछे तर्क दिया गया है कि ऋषि मुनियों का इतिहास से कोई संबंध नहीं होता इतिहास में केवल राजनीतिक हस्तियों की चर्चा होती है। इस प्रकार संवेदना शून्य चोर, उचक्के, डकैत और क्रूर लोगों के हाथों में हमारा वह इतिहास चला गया जिसे हमारे अत्यंत पवित्र हृदय वाले ऋषियों के चिंतन के आधार पर तैयार किया गया था। 

इस अवसर पर डॉ आर्य ने कहा कि लाल किला कभी लाल कोट था जो कि दिल्ली के राजा अनंगपाल तंवर द्वारा 1060 ईस्वी में बनवाया गया था। ताजमहल कभी आमेर के राजा सवाई जय सिंह की संपत्ति हुआ करती थी। जिसकी साक्षी शाहजहांनामा में ही दी गई है। इसी प्रकार आगरा का लाल किला भी हिंदू निर्माण शैली का उत्कृष्ट नमूना है। जो कभी बादलगढ़ के नाम से जाना जाता था। डॉ आर्य ने तथ्यात्मक विवरण देते हुए कहा कि दिल्ली की कुतुबमीनार भी वाराह्मीहिर जैसे वैज्ञानिक ने अपने खगोल संबंधी शोध को संपन्न करने के लिए तैयार करवाई थी।

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज का कार्यक्रम

इससे पहले डॉ आर्य ने सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज महरौनी में बोलते हुए कहा कि शेरशाह सूरी को मारने वाले शूरवीर हिंदू की कहानी हमसे छुपा दी गई, अकबर द्वारा एक लाख हिंदुओं की लाशों को गिद्धों के लिए छोड़ देने की घटना को भी छुपा दिया गया, हेमचंद्र विक्रमादित्य के गौरवशाली कार्यों को भी इतिहास से ओझल कर दिया गया। उन्होंने कहा कि लार्ड मैकाले की शिक्षा नीति इस देश के लिए घातक रही ,यह तो बार-बार बताया गया पर कांग्रेस के द्वारा अपनी वर्धा स्कीम के माध्यम से जिस प्रकार स्वतंत्र भारत की शिक्षा नीति को चूना लगाया गया वह नहीं बताया गया।

डॉक्टर आर्य ने कहा कि 1857 की क्रांति के सूत्रधार महर्षि दयानंद थे। जिन्होंने इस क्षेत्र की मिट्टी से जन्मी रानी लक्ष्मीबाई और उनके अन्य क्रांतिकारियों को क्रांति के लिए प्रेरित किया था।

शीतल बड़ोनिया इंटर कॉलेज महरौनी, राजकीय कन्या इंटर कॉलेज महरौनी में आयोजित सभाओं में भी अपने विचार व्यक्त किए और महमूद गजनवी ,मोहम्मद गौरी, नादिरशाह, बलबन, अकबर, औरंगजेब आदि क्रूर सुल्तानों बादशाहों को इतिहास में अनुचित रूप से दिए जा रहे सम्मान को लेकर कहा कि हमारे उन वीर बलिदानी लोगों का इतिहास में स्थान सुरक्षित किया जाना चाहिए, जिन्होंने वीरता का प्रदर्शन करते हुए देश के सम्मान के लिए अपना सर्वस्व बलिदान दिया।

इस अवसर पर विद्यालय के प्राचार्य प्रभारी जुगल किशोर व शिक्षक संतोष तिवारी, राम कुमार त्रिपाठी , श्री एस आर यादव रामबाबू पुरोहित द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किए गए और भारत को समझो अभियान के साथ अपना पूर्ण सहयोग देने का आश्वासन दिया गया।

शाहजहाँ: जिसने अपनी हवस के लिए बेटी जहाँआरा का नहीं होने दिया निकाह

सबसे क्रूर मुग़ल शासक शाहजहां 
शायद ही कभी कांग्रेस, वामपंथी और छद्दम धर्म-निर्पेक्षों ने सोंचा भी नहीं होगा कि हिन्दू गौरवविंत इतिहास को धूमिल कर आतताई मुग़लों के रक्तरंजित इतिहास पर पर्दा डाल, महान बताकर पढ़ने को मजबूर किया है, कभी हमारे इस महाझूठ के ऊपर से पर्दा भी उठेगा। जब कभी किसी इतिहास जानकर ने वास्तविक से रूबरू करवाने का प्रयास किया, उसे इन पाखंडी कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों ने साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शांति के दुश्मन और न जाने कितने नामों से अलंकृत कर बदनाम करते रहे। परन्तु सच्चाई अधिक समय तक लुप्त नहीं हो सकती। वर्तमान सरकार को चाहिए कि जिन इतिहासकारों ने ऐसा निंदनीय एवं घृणित काम वाह-वाही लूट सरकारी सुख-सुविधाओं को भोगा है, उन्हें दण्डित किया जाए। 
आतंकी संगठन आईएसआईएसआई के बारे में जब हम पढ़ते हैं कि वह अल्पसंख्यक यजीदी महिलाओं को यौन गुलाम बना रहा है तो हमें आश्चर्य होता है, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल बादशाहों ने भी बहुसंख्यक हिन्दू महिलाओं को बड़े पैमाने पर यौन दासी यानी सेक्स स्लेव्स बनाया था।

इसमें मुगल बादशाह शाहजहाँ का हरम सबसे अधिक बदनाम रहा, जिसके कारण दिल्ली का रेड लाइट एरिया जीबी रोड बसा। शाहजहाँ के हरम में 8000 रखैलें थीं जो उसे उसके अब्बू जहाँगीर से विरासत में मिली थी। उसने अब्बू की सम्पत्ति को और बढ़ाया। उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छँटनी की तथा बुजुर्ग महिलाओं को भगा कर अन्य हिन्दू परिवारों से जबरन महिलाएँ लाकर हरम को बढ़ाता ही रहा।

कहते हैं कि उन्हीं भगाई गई महिलाओं से दिल्ली का रेडलाइट एरिया जीबी रोड गुलजार हुआ था और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी। जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ प्रश्रय देता था और अक्सर अपने मंत्रियों और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था। यह शख्स यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित और उत्साही था कि हिन्दू महिलाओं का मीना बाजार लगाया करता था, यहाँ तक कि अपने महल में भी। 

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर ने अपनी किताब travels in the mughal empire में इस विषय में टिप्पणी की थी कि महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार, जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं का, क्रय-विक्रय हुआ करता था, राज्य द्वारा बड़ी संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था और नपुसंक बनाए गए सैकड़ों लड़कों की हरमों में उपस्थिति, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान के लिए ही थी।

शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए, आठ हजार औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार ही कहा जाएगा। आप यह जानकर हैरान हो जाएँगे कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं, बल्कि उसका असली नाम ‘अर्जुमंद-बानो-बेगम’ था और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार की इतनी डींगे हाँकी जाती है वो शाहजहाँ की ना तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी।

मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी। इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले 3 शादियाँ कर रखी थी और मुमताज से शादी करने के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी उस ने 3 शादियाँ और की, यहाँ तक कि मुमताज के मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना से शादी कर ली थी। जिसे उसने रखैल बना कर रखा था, जिससे शादी करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था। अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और शादियाँ क्यों की?

शाहजहाँ की सातों बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत बानो थी, जो कि उसकी पहली बीबी थी। शाहजहाँ से शादी करते समय मुमताज कोई कुँवारी लड़की नहीं थी बल्कि वो भी शादीशुदा थी और उसका शौहर शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम ‘शेर अफगान खान’ था। शाहजहाँ ने शेर अफगान खान की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।

गौर करने लायक बात यह भी है कि 38 वर्षीय मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी। यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला था। शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी सगी बेटी जहाँआरा के साथ सम्भोग करने का दोषी तक कहा है।

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को भोगना शुरू कर दिया था। जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया। बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में चर्चा शुरू हुई, तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक बुलाई गई और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा – “माली को अपने द्वारा लगाए पेड़ का फल खाने का हक है।”

इतना ही नहीं, जहाँआरा के किसी भी आशिक को वह उसके पास फटकने नहीं देता था। कहा जाता है कि एक बार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ ने तंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा जला दिया।

दरअसल, अकबर ने यह नियम बना दिया था कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं होगी। इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं। इसका परिणाम यह होता था कि मुगल खानदान की लड़कियाँ अपनी जिस्मानी भूख मिटाने के लिए अवैध तरीके से दरबारी, नौकर के साथ-साथ, रिश्तेदार यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी। कहा जाता है कि जहाँआरा अपने बाप के लिए लड़कियाँ भी फँसाकर लाती थी।

जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था। शाहजहाँ के राज ज्योतिषी की 13 वर्षीय ब्राह्मण लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे से नशा देकर बाप के हवाले कर दिया था, जिससे शाहजहाँ ने अपनी उम्र के 58वें वर्ष में उस 13 वर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह किया था। बाद में इसी ब्राह्मण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

The legacy of muslim rule in India के अनुसार शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि वह तिमूर (तैमूरलंग) का वंशज है जो भारत में तलवार और अग्नि लाया था। उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तैमूर से और उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से वह इतना प्रभावित था कि उसने अपना नाम तैमूर द्वितीय रख लिया था।

बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों (हिन्दुओं) के विरुद्ध युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी। अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था, “शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी पर अधिकार कर लिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं का भीषण नरसंहार किया था।” शाहजहाँ की सेना ने भयानक बर्बरता का परिचय दिया। हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित धन को दे देने के लिए विवश किया गया और अनेकों उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग किया गया।

1632 में कश्मीर से लौटते समय शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनाई गई महिलाएँ ‘घर वापसी’ करते हुए फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में शादी कर ली है। शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी बना लिया गया। उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका, तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को चुन लेने का विकल्प दिया गया। 

जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया, उन सभी पुरूषों का सिर काट दिया गया। हजारों महिलाओं को जबरन मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।

हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है। किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था।

शाहजहाँ के राज में इस्लाम का ही कानून था। या तो मुसलमान बन जाओ या मौत के घाट उतर जाओ। आगरा में एक दिन इसने 4,000 हिन्दुओं को मौत के घाट उतारा था। जवान लड़कियाँ इसके हरम भेज दी जाती थीं। शाहजहाँ के आते-आते मुगल शासन पुराने मुसलमानी ढर्रे पर चल पड़ा था।

इतिहासकार अब्दुल हमीद लाहौरी के ’बादशाहनामे’ के अनुसार शाहजहाँ के ध्यान में यह बात लाई गई कि पिछले शासन में बहुत से मूर्ति मंदिरों का निर्माण प्रारंभ किया गया था किन्तु कुफ्र के गढ़ बनारस में बहुत से मंदिरों का निर्माण पूरा नहीं हुआ था। काफिर उनको पूरा करना चाहते थे। मजहब के रक्षक बादशाह सलामत ने आदेश दिया कि बनारस और उसके पूरे साम्राज्य में तमाम नए मंदिर ध्वस्त कर दिए जाएँ। इलाहाबाद के सूबे से सूचना आई कि बनारस में 76 मंदिर गिरा दिए गए हैं। यह घटना 1633 की है। हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करने की प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।

1634 में शाहजहाँ के सैनिकों ने बुन्देलखंड के राजा जुझारदेव की (जो जहाँगीर के कृपा पात्रों में था) रानियों, दो पुत्रों, एक पौत्र और एक भाई को पकड़कर शाहजहाँ के पास भेजा। शाहजहाँ ने दुर्गाभान और दुर्जनसाल नामक अवयस्क एक पुत्र और पौत्र को जबरन मुसलमान बनवाया। एक वयस्क पुत्र उदयभान और भाई श्यामदेव का, इस्लाम स्वीकार न करने के कारण वध करवा दिया। रानियों को हरम में भेज दिया गया।

गुलामी के लिए अथवा व्यभिचार के लिए इस मुस्लिम व्यवहार के विपरीत दुर्गादास राठौर ने औरंगजेब की पौत्री सफीयुतुन्निसा और पौत्र बुलन्द अख्तर को, जिन्हें औरंगजेब का पुत्र और शाहजहाँ का पौत्र शाहजादा अकबर उसके संरक्षण में छोड़ गया था, नियमानुसार इस्लाम की शिक्षा दिलाकर, सम्मानपूर्वक औरंगजेब को 13 वर्ष के बाद, जब वह जवान हो गए थे, वापस कर दिया। यह इस्लाम और हिन्दू धर्म की शिक्षा के कारण हुआ। यह दो ऐतिहासिक उदाहरण हिन्दू और मुसलमान मानसिकता के अंतर पर प्रकाश डालने के लिए पर्याप्त हैं।

शाहजहाँ की धार्मिक नीतियाँ लगातार विवाद में रहीं। हिंदू माता की कोख से जन्मी ये संतान इस्लाम को लेकर ज्यादा ही आग्रही था। उसने हिंदुओं की तीर्थयात्रा पर भारी कर लगाए। साथ ही कई ऐसे आदेश दिए, जो हिंदुओं को परेशान करने वाले थे।

1634 ई. में उन्होंने ही ये बात शुरू की कि अगर कोई हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़का शादी करें तो ये शादी तब तक जायज नहीं होगी, जब तक कि अगला पक्ष इस्लाम न स्वीकार कर ले। ये भी कहा जाता है कि हिंदुओं को मुसलमान बनाने के लिए इस मुगल बादशाह के राज में एक अलग विभाग बना हुआ था, जो केवल यही बात सुनिश्चित करता था। इस बात का जिक्र कई जगहों पर मिलता है।

अकबर ने उन किसानों के परिवारों को गुलाम बनाने और बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया था, जो सरकारी लगान समय से नहीं दे पाए थे। शाहजहाँ ने इस प्रथा को फिर से चालू कर दिया। किसानों को लगान देने के लिए अपनी स्त्रियों और बच्चों को बेचने पर मजबूर किया जाने लगा। किसानों को जबरन पकड़ कर (गुलामी में) बेचने के लिए मंडियों और मेलों में ले जाया जाता था। उनकी अभागी स्त्रियाँ अपने छोटे-छोटे बच्चों के लिये रुदन करती चली जातीं थीं। शाहजहाँ के आदेश थे कि इन हिन्दू गुलामों को हिन्दुओं के हाथ न बेचा जाए। मुसलमान मालिकों के पास गुलामों का अन्ततः मुसलमान हो जाना निश्चित था।

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कुतुब मीनार किसने बनवाया? NCERT बिना सबूत के पढ़ा रही – RTI से खुलासा

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कुतुब मीनार किसने बनवाया? NCERT बिना सबूत के पढ़ा रही – RTI से खुलासा

शाहजहाँ ने जितने भी युद्ध किए। उनमें कहीं भी उसने हिंदुओं के प्रति उदारता का प्रदर्शन नहीं किया, वह सदा उनके प्रति क्रूर बना रहा। जिससे देश की बहुसंख्यक प्रजा उससे आतंकित रही। हिंदू इतने घृणित अनाचार को सहन नहीं कर सकता था। इसलिए उसे विद्रोही होना था और विद्रोही बनकर अपनी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करना था।

यही कारण था कि हिंदुओं ने इस अनाचारी बादशाह को और प्रेम के कथित पुजारी व्यभिचारी शासक से मुक्ति पाने हेतु उसे दर्जनों बार चुनौती दी और उसे सर्वथा एक असफल शासक बनाकर रख दिया। इतना असफल कि उसका अपनी संतान पर भी नियंत्रण नहीं रहा और एक दिन उसके अपने पुत्र औरंगजेब ने ही उसे जेल में डाल दिया।

1657 में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी बेटी जहाँआरा के साथ आगरा के किले में बंद कर दिया, परन्तु औरंगजेब ने अपने बाप की अय्याशी का पूरा इंतजाम रखा। अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने साथ 40 रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी और दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी सभी को किले से बाहर निकाल दिया।

उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है। जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था। शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही 22 जनवरी 1666 में 74 साल में हुई। बताया जाता है कि अत्यधिक कामोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण उसकी मौत हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था। अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी बता कर महान बताया जाता है?

अगर शाहजहाँ को अपनी बीबी के प्रति थोड़ा भी प्यार होता तो मुमताज के साथ शादी करने के बाद वो इतनी रखैलें ना रखता, और ना ही उनकी मौत के बाद उसकी बहन से शादी करता और ना ही पिता-बेटी के पवित्र रिश्ते को कलंकित करता। क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर सकता है? क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमें खाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही करते हैं? 

शाहजहाँ को प्यार नहीं हैवानियत की हवस थी। उसने अपने अहंकार और शरीर में जलती हवस की ज्वाला को शांत करने के लिए मुमताज से विवाह किया था, ना कि उसकी सुंदरता से। जिसने कभी औरतों की इज्जत ना की हो, वो प्यार की ईबादत को क्या समझेगा। इसलिए ताजमहल को मुमताज की याद का मकबरा कहना गलत होगा।

दरअसल, ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए गढ़ी गई है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपाई जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान शिव का मंदिर तेजो महालय है। इतिहासकार पीएन ओक ने पुरातात्विक साक्ष्यों के जरिए बकायदा इसे साबित किया है और इस पर पुस्तकें भी लिखी हैं। असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण, लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर।