क्या मानवाधिकार ने सुप्रीम कोर्ट को सब्जी मंडी समझा हुआ है? विदेशी फण्ड पर पल रहे ये मानवाधिकार वालों की क्या विदेशों से घुसपैठियों को निकाले जाने के खिलाफ कोर्ट में जाने की हिम्मत है? उत्तर एक ही मिलेगा नहीं, क्योकि किसी ने माँ का दूध ही नहीं पिया। अगर पिया होता तो जिस तरह अमेरिका ने अवैध रूप से घुसे भारतीयों को निकाला है, क्या वह मानवाधिकार में नहीं आता? आखिर सुप्रीम कोर्ट ऐसे मुकदमों को पहली ही तारीख पर ख़ारिज क्यों नहीं करती? सुप्रीम कोर्ट को इन मानवाधिकार वालों से पूछना चाहिए कि क्या वे खुद अवैध रूप से किसी भी विदेश में रह सकते हैं?
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (31 जुलाई 2025) को कहा कि वह यह तय करेगा कि भारत में रह रहे अवैध रोहिंग्या ‘शरणार्थी’ माने जाएँगे या ‘अवैध घुसपैठिए’। कोर्ट में रोहिंग्या से जुड़े कई मामलों की सुनवाई हो रही है। जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और एन. कोटिश्वर सिंह की तीन जजों की पीठ ने कहा कि यह मामला अब तीन दिनों तक विस्तार से सुना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान जिन प्रमुख मुद्दों पर विचार करने की बात कही, वे हैं:
- क्या रोहिंग्या लोगों को ‘शरणार्थी’ घोषित किया जा सकता है? अगर हाँ, तो उन्हें किस प्रकार की सुरक्षा और अधिकार मिलेंगे?
- अगर रोहिंग्या अवैध रूप से भारत में घुसे हैं, तो क्या भारत सरकार और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बनती है कि उन्हें कानून के अनुसार देश से बाहर निकाला जाए?
- अगर रोहिंग्या को अवैध घुसपैठिया मान भी लिया जाए, तो क्या उन्हें अनिश्चित समय तक हिरासत में रखा जा सकता है? या फिर उन्हें कुछ शर्तों के साथ जमानत दी जानी चाहिए?
- जो रोहिंग्या हिरासत में नहीं हैं और शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं, क्या उन्हें पीने का पानी, स्वच्छता, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएँ मिल रही हैं? क्या यह सब संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) के अनुसार है?
अवैध रोहिंग्याओं को निर्वासित कर रहा भारत
गैर सरकारी संगठन उन अवैध रोहिंग्याओं की करना चाहते हैं रक्षा जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हैं खतरा
फिर भी, तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकील राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इनके पक्ष में आवाज उठा रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि रोहिंग्या धीरे-धीरे देश के कई हिस्सों में फैल गए हैं। इनमें से कई लोगों ने फर्जी आधार कार्ड और अन्य स्थानीय पहचान पत्र भी बना लिए हैं, जिसका फायदा उन्हें तुष्टिकरण की राजनीति से मिला।
संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के आँकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर 2024 तक भारत में 95,000 से ज्यादा रोहिंग्या मुस्लिम रह रहे हैं। इनमें से लगभग 22,500 लोग शरणार्थी और शरण की माँग करने वाले हैं। इन्हें संयुक्त राष्ट्र ने ‘राज्यविहीन’ माना है।
भारत अवैध रोहिंग्याओं को रखने के लिए कानूनी रूप से नहीं है बाध्य
1951 शरणार्थी सम्मेलन (Refugee Convention) एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जो यह तय करती है कि शरणार्थी किसे कहा जाता है और इस पर हस्ताक्षर करने वाले देशों की शरणार्थियों और शरण की माँग करने वालों के प्रति क्या जिम्मेदारियाँ होती हैं। इस संधि के अनुसार, किसी भी देश को शरणार्थियों को उस देश में वापस नहीं भेजना चाहिए जहाँ उन्हें उत्पीड़न या खतरा हो सकता है।
हालाँकि, भारत ने इस 1951 सम्मेलन पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, इसलिए भारत इस संधि के नियमों से कानूनी रूप से बँधा नहीं है। इसका मतलब यह है कि भारत को शरणार्थियों को अपने देश में रखना जरूरी नहीं है और वह अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या मुस्लिमों को निर्वासित कर सकता है।