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ईरान-US के बीच सीजफायर: क्या खोखला है अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का ‘जीत का दावा’


ईरान और अमेरिका ने 38 दिन के युद्ध के बाद आखिरकार सीजफायर की घोषणा कर दी है। दो हफ्तों के लिए घोषित हुए इस सीजफायर के बाद युद्ध में अमेरिका अपनी जीत का दावा कर रहा है, वहीं ईरान भी इसे अपनी तरफ से जीत बता रहा है। लेकिन सवाल अब भी कायम है कि इस युद्ध में आखिरकार किसकी जीत हुई है?

आईए इस जीत को जमीनी हकीकत के रूप में आँकते हैं। युद्ध में किसको-कितना नुकसान हुआ से लेकर किसको सीजफायर से फायदा हुआ के गणित से पता करते हैं कि आखिरकार किसकी जीत हुई? ये सब जानने के लिए ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण जानना बेहद जरूरी है।

ईरान-अमेरिका के बीच तनाव का कारण?

ईरान और अमेरिका के बीच तनाव का सबसे बड़ा मुद्दा न्यूक्लियर प्रोग्राम है। अमेरिका का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बना सकता है, जबकि ईरान कहता है कि उसका प्रोग्राम सिर्फ ऊर्जा के लिए है। इसी वजह से पहले JCPOA न्यूक्लियर समझौता हुआ था, लेकिन बाद में अमेरिका उससे बाहर निकल गया जिससे तनाव और बढ़ गया।

दूसरा बड़ा कारण है मिडिल ईस्ट में प्रभाव की लड़ाई। ईरान और अमेरिका दोनों अलग-अलग देशों और समूहों को सपोर्ट करते हैं। इस वजह से कई बार सीधे नहीं, बल्कि ‘प्रॉक्सी वॉर’ यानी दूसरों के जरिए लड़ाई जैसी स्थिति बनती रहती है।

तीसरा कारण है सैन्य घटनाएँ और हमले। पिछले कुछ सालों में कई बार अमेरिकी बेस पर हमले हुए या ईरान से जुड़े समूहों पर अमेरिका ने जवाबी कार्रवाई की। जैसे 2020 में कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद तनाव बहुत बढ़ गया था। इसी तरह दिसंबर 2025 में ईरान में नागरिकों द्वारा प्रदर्शन को भी अमेरिका ने सपोर्ट किया और इस्लामी रिजीम का विरोध किया।

सैन्य ताकत में अमेरिका की बराबरी नहीं कर सकता ईरान

वैसे तो दोनों देशों की सेना की ताकत के नजर से देखा जाए तो अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष बराबरी का है ही नहीं। अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर सैन्य ताकत वाला देश है, जबकि ईरान 16वें स्थान पर आता है। अमेरिका की सैन्य शक्ति ईरान की तुलना में कहीं अधिक और उन्नत है। दूसरी तरफ ईरान इस युद्ध में सिर्फ अपनी भौगोलिक और रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका को चुनौती देता रहा है।

अमेरिका और ईरान की सैन्य ताकत की तुलना करें, तो जहाँ अमेरिका का सालाना रक्षा बजट लगभग 895 अरब डॉलर है, जो कि ईरान के 9 अरब डॉलर के रक्षा बजट से करीब 100 गुना है। अमेरिका के पास लगभग 13.3 लाख सक्रिय सैनिक और 7,99,500 रिजर्व सैनिक हैं। वहीं ईरान के पास उससे लगभग आधे 6,10,000 सक्रिय और 3,50,000 रिजर्व सैनिक हैं।

वायुसेना और नौसेना की ताकत की तुलना करें, तो अमेरिका के पास 13 हजार से ज्यादा एयरक्राफ्ट हैं, जो कि दुनिया के सबसे उन्नत विमानों में आते हैं। सिर्फ अमेरिका के पास सबसे बड़ी संख्या में चौथी और पाँचवी पीड़ी के विमान है। दूसरे ओर ईरान के पास केवल 550 के आसपास विमान हैं, जिनमें से ज्यादातर पुराने सोवियत युग के मिग और सुखोई हैं। वहीं अमेरिका की नौसेना के पास 464 पोत हैं, इसके मुकाबले ईरान के पास केवल 109 पोत मौजूद हैं।

इसी के साथ अमेरिका के पास 25 हजार से 30 हजार मिसाइले हैं। जबकि ईरान के पास लगभग 3 हजार बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का ही जखीरा है। थलसेना की बात करें तो अमेरिका के पास 4,666 टैंक और 4,09,660 बख्तरबंद गाड़ियाँ हैं। वहीं ईरान के पास 2,675 टैंक और 75,939 बख्तरबंद वाहन हैं।

ताकत में फर्क के बावजूद युद्ध में कैसे टिका ईरान?

अमेरिका के मुकाबले आधी से भी कम औसत में सैन्य ताकत होने के बावजूद ईरान युद्ध में टिका रहा और अपनी शर्त मनवाने के बिना सीजफायर के लिए नहीं माना। क्योंकि ईरान ने युद्ध में अपनी भौगोलिक, रणनीतिक और असममित क्षमताओं का फायदा उठाया।

ईरान की सबसे बड़ी ताकत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज है, जो कि यूरोप और एशिया समेत दुनिया के लिए कई क्षेत्रों के लिए इकलौता तेल मार्ग माना जाता है। यहाँ से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। ईरान ने इस मार्ग को बाधित कर दिया जिससे, दुनिया भर में तेल की कीमतें उछली और पूरी दुनिया के साथ-साथ अमेरिका पर भारी आर्थिक दबाव पड़ा।

इसके साथ ईरान ने अमेरिका से सीधे टकराने के बजाए अलग-अलग तरीकों से पलटवार किया। ईरान ने अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का सहारा लिया, जैसे यमन के हूती विद्रोही लाल सागर के अहम शिपिंग रूट को बाधित कर रहे हैं और इजरायल पर मिसाइलें दाग रहे हैं। इसके अलावा लेबनान में हिज्बुल्लाह का साथ लिया और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सहयोगियों को निशाना बनाया।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध में ईरान की रणनीति अमेरिका को हराना नहीं, बल्कि खुद को बचाने की है। इसी को वह अपनी जीत मानता है। दूसरी तरफ अमेरिका ने ईरान के सैन्य ठिकानों और राजनीतिक महकमे को निशाना तो बनाया लेकिन ईरान की असल ताकत हॉर्मुज और खर्ग द्वीप पर हमले के लिए सोचता रहा, क्योंकि उसे अपने सैनिक जाने का डर सताता रहा।

अमेरिका की जीत का दावा, पर ईरान की तरफ आए नतीजे

सीजफायर की घोषणा के बाद अमेरिका और ईरान दोनों ही अपनी जीत का दावा कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की जीत यह है कि उसने खुद को बचा लिया। ईरान ने अपने रणनीतिक, भौगोलिक स्थिति को ध्वस्त नहीं होने दिया। वहीं अमेरिका इसीलिए अपनी जीत का डंका बजा रहा है क्योंकि उसने ईरान के सुप्रीम लीडर से लेकर सेना के कई टॉप कमांडर और देश के भीतर भी तबाही मचाई, जैसा कि अमेरिका की सैन्य ताकत के लिए यह कोई बड़ा टास्क रहा भी नहीं।

लेकिन अमेरिका की जीत के दावे खोखले नजर आते हैं। क्योंकि ईरान की सरकार अब भी पूरी तरह कंट्रोल में है, वहाँ न तो सरकार गिरी और न ही कोई बड़ा अंदरूनी बदलाव हुआ। हॉर्मुज अभी भी ईरान के असर में है, यानी दुनिया के सबसे अहम तेल रास्ते पर उसका दबदबा बना हुआ है।

और अमेरिका के लिए जंग शुरू करने का सबसे बड़ा मुद्दा- ईरान का परमाणु कार्यक्रम, वो भी अभी सुलझा नहीं है। ईरान का एनरिच्ड यूरेनियम उसके पास ही है, जिसे न तो खत्म किया गया और न ही कहीं हटाया गया।

सैन्य ताकत की बात करें तो ईरान को नुकसान जरूर हुआ है, लेकिन उसकी सेना पूरी तरह खत्म नहीं हुई। उसकी मिसाइलें, एयर डिफेंस और कमांड सिस्टम अब भी काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं ईरान ने ये भी दिखाया कि वह दूर-दूर तक हले करने की क्षमता रखता है और खाड़ी क्षेत्र में कई जगह निशाना साध सकता है।

इसके अलावा अमेरिका और इजरायल के बीच भी युद्ध को लेकर मतभेद सामने आए, जिसका फायदा ईरान ने उठाया। इस लड़ाई में अमेरिका को अपने एयर डिफेंस सिस्टम का काफी इस्तेमाल करना पड़ा, जिससे उसके संसाधनों पर दबाव पड़ा। और सबसे अहम बात, ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका के कई बड़े सैन्य ठिकानों और सिस्टम्स को नुकसान पहुँचाया। इससे साफ होता है कि अमेरिका की जीत के दावे खोखले तो हैं। वहीं ईरान को भी युद्ध में काफी नुकसान पहुँचा है।

पाकिस्तान का एक-एक इंच भारत की जद में, बिना किसी की मदद के कर दिया नेस्तनाबूत: अफगानिस्तान के पूर्व उप-राष्ट्रपति ने गिनाया कैसे सफल रहा ‘ऑपरेशन सिंदूर’

                       अमरुल्लाह साहेल, अफगानिस्तान के पूर्व उप राष्ट्रपति (फोटो साभार: ChatGPT/Canva)
अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने रविवार (11 मई 2025) को भारत और पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव को लेकर भारत की कार्रवाई को एक बड़ी रणनीतिक सफलता बताया। उन्होंने कहा कि भारत का ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ साफ तौर पर एक निर्णायक जीत है और इसके बाद हुआ युद्धविराम भारत की कूटनीतिक कामयाबी को दिखाता है।
पाकिस्तान के DGMO के निवेदन को नरेंद्र मोदी द्वारा स्वीकार करने से पाकिस्तान और इसके समर्थक देशों को जरुरत से ज्यादा सतर्क रहने की जरुरत है। प्रोटोकॉल तोड़ पाकिस्तान जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ मिलना भी मोदी द्वारा पाकिस्तान को सुधरने का खुला न्यौता था। लेकिन आतंकवादियों के इशारे पर नाचने वाली पाकिस्तान सरकार मोदी की रणनीति को समझने में पूरी तरह से फेल रहे हैं। दूसरे, वर्तमान आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में भारत ने विश्व को दिखा दिया कि पाकिस्तान की सरकार और फौज आतंकियों के पैरों में सिर झुकाये हुए है। फिर भी जो भी देश पाकिस्तान को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन देता है वह आतंकवाद का समर्थक है। उन देशों को जनता की जान और माल की बिलकुल भी चिंता नहीं।  

सालेह ने भारत के ऑपरेशन सिंदूर की तुलना पाकिस्तान के ऑपरेशन ‘बनयान उल मरसूस’ से करते हुए कहा कि भारत का नजरिया ज़्यादा साफ, आत्मनिर्भर और रणनीतिक रूप से असरदार रहा। उन्होंने भारत की उस नीति की तारीफ की जो उसके सैन्य और राजनीतिक फैसलों को निर्णायक बनाती है।

भारत की रणनीतिक आजादी और आत्मविश्वास

अमरुल्लाह सालेह ने ऑपरेशन सिंदूर को भारत की रणनीतिक आजादी का प्रतीक बताया। सालेह ने कहा कि भारत ने इस बार पहली बार किसी भी तरह से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) से न तो अनुमति माँगी और न ही कोई सहानुभूति, उसने पाँचों महाशक्तियों को नजरअंदाज दिया। यह भारत के आत्मविश्वास, संप्रभुता और स्वतंत्र सोच का मजबूत संदेश था।

आतंकियों और उनके मददगारों दोनों पर सीधा वार

सालेह ने कहा कि भारत ने आतंकवादियों और उसे पालने-पोसने वाले, दोनों को एकसाथ निशाना बनाकर ये दिखा दिया कि अब राज्य प्रायोजित आतंकवाद बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। भारत ने यह सोच खत्म कर दी कि आतंकी अपने राज्य से अलग-थलग काम करते हैं। भारत ने पाकिस्तान में न सिर्फ आतंकियों, बल्कि उन्हें पालने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई की, जो अब एक नए रणनीतिक दौर की ओर इशारा करता है। इससे पाकिस्तान की ‘इनकार की नीति’ पर सवाल खड़े हो गए हैं।

पाकिस्तान की सैन्य महत्वाकांक्षाएँ और उसकी कमजोर आर्थिक हालत

अफगानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने कहा कि युद्ध के दौरान ही पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) से कर्ज माँगा और हैरानी की बात है कि उसे कर्ज मिल भी गया। लेकिन यह जंग लड़ने के लिए काफी नहीं है। सालेह के मुताबिक, पाकिस्तान के पास युद्ध शुरू करने की ताकत हो सकती है, लेकिन उसे लंबे समय तक खींचने की क्षमता नहीं है। IMF से मिला पैसा कोई युद्ध नहीं जिता सकता।

रणनीतिक संयम की परीक्षा

सालेह ने बताया कि 22 अप्रैल को लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों ने भारत के रणनीतिक संयम की परीक्षा लेने की कोशिश की। संभव है कि वे जानते-बूझते यही नतीजा चाहते थे, लेकिन उन्हें इससे कोई फायदा नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि आतंकी शायद भारत को खुलेआम शर्मिंदा करना चाहते थे, लेकिन उनकी सोच आज भी 2008 में अटकी हुई लगती है।

नूर खान एयरबेस पर हमला – भारत की पहुँच का बड़ा संदेश

पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत ने अपनी ताकत और पहुँच का ज़बरदस्त प्रदर्शन किया है। रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस, जिसे पाकिस्तान का सबसे सुरक्षित इलाका माना जाता था, वह भी हमले से नहीं बच पाया। सालेह ने कहा, “मैं हमेशा सोचता था कि यह एयरबेस पाकिस्तान का सबसे महफूज़ ठिकाना है, लेकिन अब साफ हो गया कि पाकिस्तान का कोई भी हिस्सा भारत की पहुँच से बाहर नहीं है।”

मजहबी फतवों में भी भारत की कूटनीतिक जीत

पाकिस्तान ने हमेशा मुस्लिम दुनिया की सहानुभूति पाने के लिए मजहबी फतवों का सहारा लिया है, लेकिन इस बार यह दाँव भी नहीं चला। भारत के उलेमा, खासकर देवबंद के उलेमा ने भारत के समर्थन में फतवा जारी किया, जिससे पाकिस्तान का यह खास ‘हथियार’ भी उससे छिन गया। सालेह ने कहा, “पाकिस्तान अब इस्लामी दुनिया में सहानुभूति पाने के लिए जो मजहबी दावे करता था, वह अब खत्म हो चुके हैं। वैसे भी देवबंद भारत में ही है।”

भारत ने ऑपरेशन में पूरी गोपनीयता बरती

सालेह ने कहा कि भारत ने लोकतंत्र की तमाम चुनौतियों के बावजूद ऑपरेशन के दौरान जबरदस्त गोपनीयता बनाए रखी। जहाँ लोकतांत्रिक देशों में अक्सर जानकारी लीक हो जाती है, भारत से ऑपरेशन के बारे में बहुत कम खबरें बाहर आईं। यह बात दर्शाती है कि भारत ने ऑपरेशन की गोपनीयता को बनाए रखने में बेहद कुशलता दिखाई।

पाकिस्तान का ऑपरेशन – सिर्फ प्रचार और दावा

अफगान नेता ने पाकिस्तान के ऑपरेशन ‘बनयान उल मरसूस’ की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। सालेह ने कहा कि इससे जुड़ी कोई ठोस तस्वीर या सबूत सामने नहीं आया है। उन्होंने कहा, “मैंने पाकिस्तान के इस ऑपरेशन से जुड़ी कोई स्पष्ट तस्वीर (फोटो-वीडियो) नहीं देखा, जिससे लगता है कि यह शायद कभी ठीक से हुआ ही नहीं। वास्तव में युद्धविराम ने पाकिस्तान को शर्मिंदगी से बचा लिया।”
पूर्व अफगानी उप-राष्ट्रपति ने यह भी कहा कि पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व ने जरूर बड़ी-बड़ी बातें की हैं, लेकिन हकीकत में भारत का आकाश खुला रहा, उड़ानें सामान्य रहीं और न दिल्ली, न ही अमृतसर में कोई मिसाइल गिरने जैसी घटना हुई। इससे साफ होता है कि पाकिस्तान के दावे खोखले थे और युद्धविराम ने उसे बड़ी बेइज्जती से बचा लिया।