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श्री हरिहर देसिका स्वामीगल सौंपेगे मोदी को राजदंड यानी सेंगोल

                                      श्री हरिहर देसिका स्वामीगल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
उनका नाम श्री हरिहर देसिका स्वामीगल (Sri Harihara Desika Swamigal) है। वे मदुरै अधीनम (Madurai Adheenam) के 293वें प्रधान पुजारी हैं। 28 मई 2023 को वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का राजदंड यानी सेंगोल सौंपेंगे, जो नई संसद भवन (New Parliament Building) में स्थापित किया जाएगा। 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ था, तब भी इसी मदुरै अधीनम के तत्कालीन प्रधान पुजारी ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को सेंगोल (Sengol) सौंपा था।

न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में श्री स्वामीगल ने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) अच्छा काम कर रहे हैं। उन्हें वैश्विक सराहना मिली है। देश में सभी को उन पर गर्व है। उन्होंने कहा, “पीएम मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें वैश्विक सराहना मिली है। वह लोगों के लिए अच्छा काम कर रहे हैं। 2024 में उन्हें फिर से प्रधानमंत्री बनना चाहिए और लोगों का मार्गदर्शन करना चाहिए। हम सभी को बहुत गर्व है क्योंकि विश्व के नेता हमारे पीएम मोदी की सराहना कर रहे हैं।”

श्री स्वामीगल ने बताया कि वे 28 मई को प्रधानमंत्री से मिलेंगे और उन्हें सेंगोल सौंपेंगे। बता दें कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सेंगोल और मदुरै अधीनम के पुजारियों का महत्वपूर्ण स्थान है। 1947 में भी सत्ता हस्तांतरण के समय यहीं के प्रधान पुजारी ने राजदंड सौंपा था। 28 मई को नई संसद भवन के उद्घाटन कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए थिरुवावादुठुरै अधीनम मठ के कम से कम 31 सदस्यों के आने की बात कही जा रही है। ये दो जत्थों में चार्टर्ड फ्लाइट से नई दिल्ली आएँगे।

सेंगोल इतिहास के पन्नों में गुम हो गया था। लेकिन नई संसद भवन के उद्घाटन के साथ ही यह चर्चा में आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इसकी सूचना कुछ साल पहले एक वीडियो से लगी थी। 5 फीट लंबे सेंगोल पर वीडियो ‘वुम्मिडी बंगारू ज्वेलर्स (VBJ)’ ने बनाई थी। इसके मैनेजिंग डायरेक्टर आमरेंद्रन वुम्मिडी ने कहा कि उन्हें सेंगोल के बारे में खुद भी नहीं पता था। उन्होंने 2018 में एक मैग्जीन में इसका जिक्र देखा और जब इसे खोजा तो 2019 में उन्हें ये इलाहाबाद के एक म्यूजियम में रखा हुआ मिला। म्यूजियम में यह नेहरू की ‘स्वर्ण छड़ी’ के तौर पर रखा गया था।

दरअसल सत्ता हस्तांतरण का यह प्रतीक चोल राजवंश के काल से प्रेरित है। यह भारत का सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक चलने वाला शासनकाल था। उस समय एक चोल राजा से दूसरे चोल राजा को ‘सेंगोल’ देकर सत्ता हस्तांतरण की रीति निभाई जाती थी। ये एक तरह से राजदंड था, शासन में न्यायप्रियता का प्रतीक।

चोल राजवंश भगवान शिव को अपना आराध्य मानता था। इस ‘सेंगोल’ को राजपुरोहित द्वारा सौंपा जाता था, भगवान शिव के आशीर्वाद के रूप में। इस पर शिव की सवारी नंदी की प्रतिमा भी है। इसी तरह के समारोह और रिवाज की सलाह नेहरू को चक्रवर्ती राजगोपालचारी ने दी थी। इसके बाद राजाजी ने मयिलाडुतुरै स्थित ‘थिरुवावादुठुरै आथीनम’ से संपर्क किया, जिसकी स्थापना आज़ादी से 500 वर्ष पूर्व हुई थी। मठ के तत्कालीन महंत अम्बालवाना देशिका स्वामी उस समय बीमार थे, लेकिन उन्होंने ये कार्य अपने हाथ में लिया था।