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स्वतंत्रता का प्रतीक ‘सेंगोल’, जब संविधान में श्रीराम-श्रीकृष्ण विराजमान, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए बदल दिया वेदों की भूमि का इतिहास

                यही है वो 'सेंगोल', जिसे चोल काल में सत्ता हस्तांतरण के लिए इस्तेमाल किया जाता था (फाइल फोटो)
मोदी विरोधियों द्वारा संसद के नए भवन के उद्घाटन के विरोध करने को गंभीरता से लेना चाहिए। ये मोदी विरोध नहीं बल्कि सनातन का विरोध का है। ये विरोध कई विरोधों का भी पटाक्षेप करता है। दोगले नेताओं द्वारा अक्सर यह कहते सुना जाता है कि 'देश संविधान से चलेगा', सत्य वचन, क्योकि जब संविधान में श्री राम और श्रीकृष्ण के चित्र विराजमान हैं, देश उन्ही के अनुसार चलना चाहिए, लेकिन जनता जिन्हें जनहितैषी मानती रही, वह सनातन विरोध कर भारतीय संस्कृति और सनातन का अपमान करते रहे हैं। यदि ये सनातन विरोधी विरोध करने की बजाए सम्मिलित हो जाते हैं, फिर इनका तुष्टिकरण कार्ड पूर्णरूप से फेल हो जाता। 

अब ज्वलंत प्रश्न है कि "क्या विरोध करने वाले अब नए संसद भवन में जायेंगे या फिर चुनाव प्रक्रिया का भी हमेशा के लिए बहिष्कार करेंगे, क्योकि जीतने के बाद भी इसी भवन के प्रांगण में ही जाना है?" जनता इनसे पूछे कि अपनी तुच्छ सियासत के लिए गौरवशाली चोल साम्राज्य को धूमिल करने का दुस्साहस क्यों किया? जब संविधान में श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र हो उन्हीं के जन्मस्थलों को क्यों विवादित बनाया? जो कुर्सी की खातिर अपने धर्म का नहीं हुआ, वह किसी भी धर्म/मजहब का नहीं हो सकता। 

भारत सनातन की भूमि है। ये वेदों की भूमि है। ये धरती है भगवान श्रीराम की, श्रीकृष्ण की, रामायण-महाभारत की। ये वो भूमि है जहाँ वेद व्यास और वाल्मीकि जैसे विद्वान ऋषि एवं लेखक हुए। जिस महाराज भरत के नाम पर इस देश का नामकरण हुआ, उनका जिक्र भी पुराणों से ही आया है। आजकल इनकी चर्चा करने पर कह दिया जाता है कि ये सब तो हिन्दू धर्म की बातें हैं, इनसे भय का माहौल बनता है और एक सेक्युलर देश में ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए।

हम ये क्यों नहीं सोचते कि ये चीजें भारतीय पहले है, बाद में धार्मिक। क्या इस देश का नाम सिर्फ इसीलिए बदल दिया जाए क्योंकि ये पुराणों में वर्णित एक राजा के नाम पर है? रामायण-महाभारत भारत भूमि की कथाएँ हैं, इतिहास हैं, बाद में इसमें हिन्दू धर्म आता है। यहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और जगद्गुरु श्रीकृष्ण पर गौरव होना चाहिए, क्योंकि वो इसी भूमि पर मानवता के नए मूल्य स्थापित कर के गए, जीवन की कई समस्याओं का समाधान बता कर गए।

ये कितना बेहूदा तर्क है कि ‘जय श्री राम’ या ‘जय श्री कृष्ण’ नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि इस देश में अन्य मजहबों के लोग भी रहते हैं। अमेरिका का राष्ट्रपति बाइबिल पर हाथ रख कर शपथ लेता है, इंग्लैंड के राजा का राज्याभिषेक ईसाई पादरियों की निगरानी में होता है और मलेशिया जैसे लोकतांत्रिक मुल्क का भी आधिकारिक मजहब इस्लाम वहाँ के संविधान में वर्णित है। फिर भारत में यहाँ के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं का पालन करना, इसकी चर्चा करना और इस पर गौरव करना कैसे ‘सेक्युलर’ विचारधारा के विपरीत हो गया?

‘सेंगोल’: भारतीय परंपरा का ऐसा प्रतीक जिसे नेहरू ने भुला दिया

उदाहरण के लिए, ‘सेंगोल’ को ही ले लीजिए। ये शब्द आजकल काफी चर्चा में है। ‘सेंगोल’ अर्थात, चोल वंश का राजदंड। इसे मुख्य पुरोहित द्वारा एक शासक को सौंपा जाता था, जिसके साथ ही उसके शासन का शुभारंभ हो जाता था। चोल साम्राज्य भारत के सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक राज करने वाले राजवंशों में से एक रहा है। 300 ईसापूर्व में भी इसका वर्णन मिलता है। 1500 से भी अधिक वर्षों तक इस राजवंश ने शासन किया।
11वीं शताब्दी में इस साम्राज्य ने अपने शिखर को छुआ। चेरा और पंड्या के अलावा चोल राजवंश ने दक्षिण भारत में अपनी प्रभुता स्थापित की और कई मंदिर बनवाए। सामान्यतः, चोल राजा शिवभक्त होते थे। यही कारण है कि ‘सेंगोल’ में सबसे ऊपर भगवान शिव के वाहन वृषभ की, नंदी की प्रतिमा है। तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोल राजवंश की निर्माण कला का सबसे उत्कृष्ट नमूना है। राजेंद्र चोल को इस राजवंश का सबसे महान शासक माना जाता है।
                                             ऐसा दिखता है ‘सेंगोल’, जो था चोल वंश का राजदंड
जब से ये सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस ‘सेंगोल’ को ग्रहण किया जाएगा और इसे नए संसद भवन में स्थापित किया जाएगा, तब से एक बार फिर से ‘सेक्युलरिज्म’ का नाम लेकर रोना-धोना शुरू हो गया है। न तो वेद विदेशी है और न ही ‘सेंगोल’, जब दोनों ही भारतीय परंपरा और सभ्यता का हिस्सा रहे हैं तो फिर ऐसी चर्चा क्यों हो रही है कि इससे ‘सेक्युलरिज्म’ को नुकसान पहुँचेगा? ‘सेंगोल’ तो न्यायप्रियता, सत्य और शक्ति का प्रतीक है।
वेदों की धरती पर अगर वैदिक मंत्रोच्चार नहीं होने तो क्या फिर अरब और यूरोंप की परंपराएँ उधार ली जाएँगी? हाल ही में हम सबने देखा कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के पीएम एंथोनी अल्बानीज सिडनी स्थित कुडोस बैंक एरिना में प्रवासी भारतीयों के कार्यक्रम में पहुँचे तो वहाँ वैदिक मंत्रोचार के साथ उनका स्वागत किया। जब आसट्रेलिया में इससे कोई समस्या नहीं है तो फिर वेदों की धरती पर वेद से किसी को दिक्कत क्यों?
आगे बढ़ने से पहले ‘सेंगोल’ के बारे में थोड़ा और जान लेते हैं। इसके लिए हमें चलना होगा तब के ज़माने में, जब इस देश को आज़ादी मिल गई थी और बस इसकी औपचारिकता बाक़ी थी। इस देश का दुर्भाग्य है कि जब पंडित जवाहरलाल नेहरू से अंग्रेजों के अंतिम गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने पूछा कि आपके देश में सत्ता हस्तांतरण को लेकर क्या रीति-रिवाज हैं, तो नेहरू को कुछ जवाब नहीं सूझा। आखिर वो ‘सेक्युलर’ जो ठहरे!
जवाहर लाल नेहरू ने भले ही ‘भारत: एक खोज’ लिखी, लेकिन ये आश्चर्य की बात है कि इस धरती की परंपराओं को आगे बढ़ाने में उन्हें शर्म महसूस होती थी। उन्होंने ‘स्वतंत्रता पार्टी’ के संस्थापक रहे चक्रवर्ती राजगोपालचारी से इस बारे में पूछा, जो भारतीय संस्कृति की गहरी समझ रखते थे। चक्रवर्ती राजगोपालचारी बाद में भारत के गवर्नर-जनरल और गृह मंत्री भी बने। उन्होंने इस समस्या का समाधान ‘सेंगोल’ के रूप में किया।
जवाहरलाल नेहरू से ज्यादा चिंता तो लॉर्ड माउंटबेटन को थी कि इस सत्ता हस्तांतरण की प्रतीकात्मकता क्या हो और इस समारोह को विशेष बनाने के लिए क्या किया जाए। इस तरह चोल राजाओं का एक विधि अनुष्ठान भारत की आज़ादी के सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम का हिस्सा बना। प्राचीन काल में गैर-ब्राह्मण ‘आधीनम्‌’ पुरोहितों द्वारा इस अनुष्ठान को संपन्न कराया जाता था। ये शैव संप्रदाय में आते थे। थिरुवावदुथुरई मठ से राजाजी के आग्रह पर स्वतंत्रता समारोह में परंपराओं के वहन का कार्य संभाला।
इस दौरान तमिल कवि संत थिरुज्ञानसंबंधर द्वारा रचित ‘कोलारु पदिगम’ का गायन किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच 14 अगस्त, 1947 को सेंगोल को जवाहर लाल नेहरू को सौंपा गया, पुरोहितों द्वारा इसे शुद्ध जल से पवित्र किए जाने के बाद। जिस ‘सेंगोल’ का उस समय इस्तेमाल हुआ था, उसे मद्रास के स्वर्णकार वुम्मिडि बंगारू चेट्टी ने हस्तशिल्प कारीगरी द्वारा बनवाया था। दुर्भाग्य है कि जवाहरलाल नेहरू और फिर कॉन्ग्रेस ने दशकों तक इस देश पर राज करने के बावजूद ‘सेंगोल’ को कभी याद नहीं किया। आखिर ‘सेकुलरिज्म’ जो खतरे में आ जाता।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये है कि तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK भी नए संसद भवन के उद्घाटन के बॉयकॉट कर रही है। उन्हें तो खुश होना चाहिए, जिस तमिलनाडु की जनता ने उन्हें चुना है उस तमिल संस्कृति को दिल्ली में अपना कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का ध्येय लेकर चल रहे हैं। जो लोग दक्षिण भारत में क्षेत्रीय कट्टरवादी विचारधारा को पोषण देते हैं और आर्य-द्रविड़ वाले खेल से भारतीय समाज को विभाजित करने का उपक्रम चलाते हैं, उन्हें भला ‘सेंगोल’ का दिल्ली में स्थापित किया जाना कैसे पसंद आएगा?
‘सेंगोल’ तमिलनाडु को दिल्ली से जोड़ रहा है। ‘सेंगोल’ चोल राजवंश की अनुष्ठान परंपरा को जीवंत कर रहा है। ‘सेंगोल’ भारत के इतिहास, प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक बन कर सामने आ रहा है। ‘सेंगोल’ की स्थापना वेदों की इस भूमि पर वैदिक रीति-रिवाजों का सम्मान है। ‘सेंगोल’ हजारों वर्ष पुरानी इस जीवंत सभ्यता की समृद्धि का प्रतीक है। ‘सेंगोल’ सत्ता को शिव से जोड़ता है। ‘सेंगोल’ सत्ताधीशों को सत्य और न्याय की याद दिलाता रहेगा।

जिस संविधान की देते हैं दुहाई, उसमें भी भगवान श्रीराम

आपने अक्सर ‘सेक्युलर’ ब्रिगेड को बात-बार पर संविधान की चर्चा करते हुए देखा होगा। भारतीय संस्कृति के हर प्रदर्शन को वो संविधान से जोड़ कर कहने लगते हैं कि इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है। लेकिन, ये लोग भूल जाते हैं कि उसी संविधान की मूल प्रति में भगवान श्रीराम की तस्वीर है। आज ‘जय श्री राम’ को असंवैधानिक ठहराने की हर कोशिश हो रही है। संविधान भारतीय कलाकृति का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण है, आइए बताते हैं कैसे।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘विश्व भारती’ के कलाकारों ने इसे बनाया था, जिसमें 5 वर्ष लगे थे। भारत के संविधान की मूल प्रति में कलाकारी की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता के प्रतीक वृषभ से होती है, अर्थात साँड़। इसे उस समय के सील पर देखा गया था, जो आज तक इतिहासकारों में चर्चा का विषय है। भारत के वैदिक युग को भी हमारे संविधान की मूल प्रति में दर्शाया गया है, एक गुरुकुल के रूप में। इसी तरह ‘मूलभूत अधिकारों’ वाला हिस्सा भगवान श्रीराम से शुरू होता है।
रामायण से जो तस्वीर ली गई है, उसमें भगवान श्रीराम, उनके भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता को वनवास के लिए जाते हुए दिखाया गया है। भगवान राम को अदालत द्वारा ‘संवैधानिक देवता’ भी घोषित किया जा चुका है और उनकी इस तस्वीर का इस्तेमाल अयोध्या के एक जजमेंट में भी हुआ था। इसी तरह ‘राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत’ वाले हिस्से में श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं। युद्ध भूमि में श्रीकृष्ण के अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था, उसी तस्वीर को यहाँ उकेरा गया है।
                                    युद्ध भूमि में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते श्रीकृष्ण – संविधान की मूल प्रति में ये तस्वीर
इतना ही नहीं, महात्मा बुद्ध और महावीर भी हमारे संविधान की मूल प्रति में मौजूद हैं। यहाँ भी चोल राजवंश का कलेक्शन दिखता है। चोल राजवंश की नटराज प्रतिमा की तस्वीर उकेरी गई है। भाग-13, जिसमें व्यापार एवं वाणिज्य के बारे में बताया गया है, उसमें महाबलीपुरम में अर्जुन को तपस्या करते हुए दिखाया गया है। इसी तरह छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह की भी तस्वीर है। क्या राम, कृष्ण, अर्जुन, तपस्या और नटराज की बात करना ‘सेक्युलर’ नहीं है? वामपंथी अब भी ऐसा कहेंगे।
अवलोकन करें:-

छत्तीसगढ़ : भगवान राम के ननिहाल में बनेगा माता कौशल्या का भव्य मंदिर

चंदखुरी, छत्तीसगढ़, राम, मंदिर
छत्तीसगढ़ के चंदखुरी स्थित माता कौशल्या के मंदिर
को किया जाएगा विकसित (फोटो साभार: CG Dekho Blog )
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
एक कहावत है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे?, इस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घंटी क्या बाँधी, इतने वर्षों से जो कांग्रेस अयोध्या में राममंदिर का विरोध करती आ रही थी, राम के अस्तित्व को नकार रही थी, काल्पनिक तक कहा दिया था, उसी कांग्रेस की राज्य सरकार अपने राज्य में रामायण से जुड़े स्थलों को विकसित करने में लग गयी है। छत्तीसगढ़ सरकार ने माता कौशल्या के मंदिर एवं अन्य स्थानों के लिए 134 करोड़ खर्च करने जा रही है। अब जनता, चाहे हिन्दू है या मुसलमान, अपनी आँखों खोलकर सच्चाई को जानने का प्रयत्न करना चाहिए कि कांग्रेस किस तरह मुसलमानों को मोहरा बनाकर अयोध्या में राममंदिर की सच्चाई को जनता से छुपाकर अपनी कुर्सी की खातिर दोनों कौमों को लड़वा रही थी? अरविन्द केजरीवाल भी अयोध्या जाने को बेताब नज़र आ रहे हैं। 
इतना ही नहीं, हर कांग्रेसी को 5 अगस्त को अपने-अपने घरों पर हनुमान चालीसा का पाठ करने के लिए कहा जा रहा है। 
भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या में भव्य मंदिर निर्माण की शुरुआत बुधवार (अगस्त 5, 2020) को भूमिपूजन के साथ ही हो जाएगी। इस बीच सुप्रीम कोर्ट में कभी राम के अस्तित्व को नकारने वाली कांग्रेस भी अब खुद को रामभक्त दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। जहाँ एक तरफ मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ मंदिर निर्माण का स्वागत कर रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ के चंदखुरी में माता कौशल्या का मंदिर बनाने की प्रक्रिया शुरू है।
माता कौशल्या की शरण में सीएम भूपेश ...
माता कौशल्या की शरण में कांग्रेस
मुख्यमंत्री भूपेश बघेल 
कांग्रेस सरकार ने दिए रामायण से जुड़े 9 स्थलों के विकास के लिए ₹134 करोड़
छत्तीसगढ़ के चंदखुरी में ही राजा दशरथ की पत्नी कौशल्या का मंदिर है, जो राम की माता भी हैं। इस हिसाब से इसे राम का ननिहाल भी माना जाता है। अगस्त के तीसरे हफ्ते के बाद से ही चंदखुरी में माता कौशल्या के मंदिर के जीर्णोद्धार के साथ-साथ सौंदर्यीकरण का कार्य भी शुरू हो जाएगा। आसपास के क्षेत्रों में विकास योजनाओं को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री भुवेश बघेल ने जुलाई 29 को अपनी पत्नी के साथ जाकर वहाँ के तैयारियों का जायजा लिया।
प्राचीन मंदिर के मूल स्वरूप को बनाए रखते हुए इसका पुनर्निर्माण करें और पूरे परिसर के सौंदर्यीकरण के लिए हो रही तैयारियों का जायजा खुद मुख्यमंत्री ने लिया। इसके लिए भूमि पूजन पहले ही किया जा चुका है और अब जब अयोध्या में भूमि पूजन के लिए सरगर्मियाँ तेज हैं, ऐसे समय में चंदखुरी प्रोजेक्ट को गतिशील बनाने का निर्णय लिया गया है। भगवान राम ने वनवास के दौरान भी इस इलाक़े में अच्छा-खासा समय व्यतीत किया था।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल ने बताया कि ‘राम वन गमन मार्ग’ योजना के अंतर्गत पूरे राज्य में भगवान राम की वनवास यात्रा के मार्गों को चिह्नित कर उन्हें एक बड़े पर्यटन स्थल नेटवर्क में तब्दील किया जाएगा। इसी क्रम में 15 करोड़ रुपए की लागत से छत्तीसगढ़ स्थित चंदखुरी में माता कौशल्या मंदिर व आसपास के क्षेत्रों का सौंदर्यीकरण किया जाएगा। उन्होंने अधिकारियों को तालाब में पुल और गोलाकार मार्ग बनाने के निर्देश दिए। सीएम ने कहा:
Mata Kaushalya Temple in Chandrakhuri,Raipur (कौशिल्या ...
प्रभु श्री राम के ननिहाल चंदखुरी का सौंदर्य अब पौराणिक कथाओं के नगरों जैसा ही आकर्षक होगा। राजधानी रायपुर के निकट स्थित इस गाँव के प्राचीन कौशल्या मंदिर के मूल स्वरूप को यथावत रखते हुए, पूरे परिसर के सौंदर्यीकरण की रूपरेखा तैयार कर ली गई है। हमारी महत्वाकांक्षी राम वन गमन पथ विकास परियोजना में शामिल चंदखुरी में यह पूरा कार्य 15 करोड़ 75 लाख रुपए की लागत से किया जाएगा। योजना के मुताबिक, चंदखुरी में मंदिर के सौंदर्यीकरण तथा परिसर विकास का कार्य दो चरणों में कार्य पूरा किया जाएगा। नागरिक सुविधाओं का विकास भी किया जाएगा। बीते 22 दिसंबर को चंदखुरी स्थित माता कौशल्या मंदिर के सौंदर्यीकरण के लिए भूमि-पूजन किया गया था।
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से कहा कि चंदखुरी में शौचालयों और धर्मशालाओं की पर्याप्त संख्या में व्यवस्था की जाए। वहाँ ग्रामीणों ने एक राष्ट्रीय बैंक का ब्रांच खोलने की भी माँग की है। साथ ही मंदिर के पास ही एक बाईपास रोड के निर्माण की भी अनुमति दे दी गई है। बता दें कि रामायण काल में छत्तीसगढ़ को दक्षिण कौशल के रूप में जाना जाता था और ये दण्डकारण्य का एक भाग था।


त्रेता युग में भगवान राम ने छत्तीसगढ़ में 4 महीने बीता कर वहाँ से लंका के लिए प्रस्थान किया था। उन्होंने हरचौका सीतामढ़ी के माध्यम से छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया थे। वो गवाई नदी में कोरिया जिले फिर उन्होंने सुकमा स्थित रामराम पहुँचने से पहले 75 जगहों पर डेरा डाला था। इनमें से 9 जगहों को ‘राम वेब गमन पर्यटन परिपथ’ के रूप में चिह्नित कर पहले फेज में पर्यटन स्थलों के रूप में विकसित किया जाएगा।
इनमें हरचौकी सीतामढ़ी (कोरिया), रामगढ़ (अंबिकापुर), शिवरीनारायण (जांजगीर-चंपा), तुरतुरिया (बलोदा बाजार), चंदखुरी (रायपुर) राजिम (गरीबन्द), सिहावा-सप्तर्षि आश्रम (धमतारी), जगदलपुर (बस्तर) और रामराम (सुकमा) शामिल है। इन 9 जगहों को विकसित करने के लिए 134.45 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट कॉस्ट रखा गया है। इस वर्ष के बजट में इसके लिए 10 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। 5 करोड़ रुपए पिछले बजट में जारी किया गया था।
जहाँ तक चंदखुरी की बात है, वहाँ मंदिर के पास स्थित झील के चारों तरफ परिक्रमा के लिए रास्ता भी तैयार किया जाएगा। इस पर एक हाईटेक ब्रिज भी बनेगा। झील के सामने पार्किंग स्थल बनेगा और लाइट-साउंड शो की व्यवस्था की जाएगी। साथ ही एक फ़ूड जॉइंट भी बनेगा। मंदिर परिसर में व उसके आसपास विभिन्न प्रजातियों के पेड़-पौधे भी लगाए जाएँगे। भूपेश बघेल पहले भी इस स्थल का दौरा करते रहे हैं।
5 अगस्त को कांग्रेसी अपने-अपने घरों पर हनुमान चालीसा का पाठ करें 
चंदखुरी में भगवान राम के प्रति लोगों में आस्था का आलम ये है कि हर वर्ष दीपावली के मौके पर लोग पहले कौशल्या माता के मंदिर में दीपक जलाते हैं, उसके बाद ही अपने-अपने घरों में रोशनी करते हैं। ऐसे में सीएम भूपेश बघेल द्वारा वहाँ मंदिर बनवा कर और उसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने को अयोध्या में मोदी सरकार द्वारा राम मंदिर के लिए किए जा रहे प्रयासों के प्रत्युत्तर के रूप में भी देखा जा रहा है।
इधर मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कमलनाथ 5 अगस्त के दिन होने वाले राम मंदिर के भूमि पूजन से एक दिन पहले भोपाल स्थित अपने आवास पर हनुमान चालीसा का पाठ कराएँगे। इस दिन मध्य प्रदेश कांग्रेस के तमाम नेता अपने घरों या स्थानीय मंदिरों में हनुमान चालीसा का पाठ करेंगे। कमलनाथ ने राम मंदिर के भव्य निर्माण का स्वागत किया था। कहा था कि मंदिर निर्माण हर भारतीय की सहमति से हो रहा है और यह केवल भारत में ही संभव है।