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स्पेन के जिस शहर पर रहा मुसलमानों का रहा सदियों तक कब्जा, वहाँ खुले में ईद-बकरीद भी नहीं मना पाएँगे मुस्लिम: इस्लामी कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए ईसाई हुए एकजुट

                                                                                                                                साभार: कैनवा
यूरोप में इस्लामी कट्टरपंथ के बढ़ते खतरे को अब सरकारें भी महसूस कर रही हैं। इसी क्रम में स्पेन में जुमिला नाम के शहर में ईद-बकरीद जैसे त्योहारों को पब्लिक प्लेस पर मनाने पर बैन लगा दिया गया है। स्पेन का जुमिला शहर कभी सदियों तक मुसलमानों के कब्जे में रहा था। खुद स्पेन के बड़े हिस्से पर इस्लामी सल्तनत ने राज किया था, लेकिन अब जुमिला की लोकल अथॉरिटी ने बाकायदा एक प्रस्ताव पास किया है। इसके मुताबिक, ‘ईसाइयों’ के शहर में ‘इस्लामी’ त्योहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन को रोक दिया गया है।

ईसाइयों की पार्टी ने ‘गायब’ रहकर पास कराया प्रस्ताव

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रस्ताव को कंजर्वेटिव मानी जाने वाली पीपल्स पार्टी (पीपी) ने पेश किया था और वामपंथी पार्टियों ने इसका विरोध किया। वहीं, वोटिंग के दौरान दक्षिणपंथी पार्टी ‘वॉक्स’ अनुपस्थित रही थी लेकिन फिर भी इस प्रस्ताव को पास करा लिया गया है।

इस प्रस्ताव में कहा गया है, “नगरपालिका खेल सुविधाओं का उपयोग हमारी पहचान से अलग की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता, जब तक कि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा इसका आयोजन न किया जाए।”

‘वॉक्स’ पार्टी ने इस फैसले पर कहा, “वॉक्स के चलते स्पेन के सार्वजनिक जगहों पर इस्लामी त्योहारों पर प्रतिबंध लगाने का पहला कदम पारित हो गया है। स्पेन हमेशा से ईसाइयों का रहा है और हमेशा रहेगा।”

क्या कह रहे हैं विरोधी दल और मुस्लिम नेता?

इस फैसला का विरोधी दलों और मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया है। स्पैनिश फेडरेशन ऑफ इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख मुनीर बेनजेलून अंडालूसी अज़हरी ने एक अखबार से बातचीत में दावा किया कि यह प्रतिबंध इस्लामोफोबिक और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा, “30 वर्षों में पहली बार मुझे डर लग रहा है। वे किसी दूसरे धर्म पर नहीं सिर्फ हमारे धर्म पर हमला कर रहे हैं।”
वहीं, मर्सिया क्षेत्र के समाजवादी नेता फ्रांसिस्को लुकास ने इस फैसले को लेकर कहा, “पीपी पार्टी संविधान का उल्लंघन करती है और सिर्फ सत्ता की चाह में सामाजिक एकता को खतरे में डाल रही है।” शहर के पूर्व समाजवादी मेयर जुआना गार्डियोला ने कहा, “यहाँ सदियों पुरानी मुस्लिम विरासत का क्या होगा?”

कोर्ट में जाएगा मामला?

जानकारी के मुताबिक, स्थानीय कानून विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस फैसले के खिलाफ अदालत का रुख किया जा सकता है। यह फैसला स्पेन के संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन है।

इस अनुच्छेद में कहा गया है, “व्यक्तियों और समुदायों की विचारधारा, धर्म और पूजा की स्वतंत्रता की गारंटी दी जाती है और उनकी अभिव्यक्ति पर कोई अन्य प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, सिवाय इसके कि कानून द्वारा संरक्षित सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए यह आवश्यक हो।”

जुमिला और इस्लाम

जुमिला शहर का इतिहास रोमन साम्राज्य से जुड़ा है। 8वीं शताब्दी में अरबों द्वारा कब्जा किए जाने के पहले यह रोमन साम्राज्य का हिस्सा होता था। इसके बाद यह सदियों तक अरबों का शहर रहा और इसका नाम युमिल-ला हुआ करता था।

इसके बाद 13वीं शताब्दी के मध्य में कैस्टिले के अल्फोंसो X के नेतृत्व में ईसाइयों ने इस पर हमला कर वापस इसे अपने कब्जे में ले लिया था। मौजूदा समय में जुमिला की आबादी करीब 27,000 है, जिसमें करीब 7.5% आबादी मुस्लिमों की है।

बकरीद पर खुद का गला रेत दी क़ुरबानी ईश मोहम्मद ने, बेवा ने बताया- ‘भूत-प्रेत का साया’: मौलवी बोले- खुद की कुर्बानी देना इस्लाम में नाजायज

उत्तर प्रदेश के देवरिया में एक ईश मोहम्मद नाम के व्यक्ति ने बकरीद पर अल्लाह को अपनी ही कुर्बानी दे डाली। शख्स ने ऐसा करने से पहले एक नोट भी लिखा जिसमें उसने बताया कि किसी ने उसका कत्ल नहीं किया, वो खुद ये कर रहा है। वहीं उसकी बीवी ने बताया कि उसके शौहर पर भूत-प्रेत का साया था जो उन्हें पटकता भी था। इस घटना के बाद हर कोई हैरान है। मौलवियों का कहना है कि खुद की कुर्बानी देना में नाजायज होता है। ऐसा नहीं किया जाना चाहिए।

पूरी घटना देवरिया गौरी बाजार थाना क्षेत्र की है। 60 वर्षीय ईश मोहम्मद ने शनिवार (7 जून 2025) को बकरीद के मौके पर एक सुसाइड नोट लिखने के बाद अपना गला रेत लिया। घर के बाहर बनी झोपड़ी से उसके तड़पने की आवाज सुन कर परिवार वाले आए तो उन्होंने देखा कि झोपड़ी में चारो तरफ खून बिखरा था और ईश मोहम्मद दर्द से तड़प रहा था। आनन – फानन में उसे गोरखपुर मेडिकल ले जाया गया, जहाँ उसने दम तोड़ दिया।

ईश मोहम्मद ने मरने से पहले एक सुसाइड नोट लिखा था। नोट में उसने लिखा है, ”इंसान बकरे को बेटे की तरह पोसकर कुर्बानी करता है। वो भी जीव हैं। कुर्बानी करनी चाहिए। मैं खुद अपनी कुर्बानी अल्लाह के रसूल के नाम से कर रहा हूं। किसी ने मेरा कत्ल नहीं किया है। सुकून से मिट्टी देना। किसी से डरना नहीं है।”

परिवार वालों का कहना है कि ईश मोहम्मद एक मजहबी इंसान था। सुबह बकरीद के मौके पर वह ईद-उल-अजहा की नमाज पढ़कर घर आया था। घर आने के बाद वह बाहर बनी झोपड़ी में चला गया था। उसकी कराह सुनकर घर वाले अंदर पहुँचे तो देखा कि उसने अपना गला रेत लिया है। वहीं मृतक की पत्नी हाजरा खातून ने बताया कि उनके पति पर भूत-प्रेत का साया था और वे अक्सर आज़मगढ़ की दरगाह जाया करते थे। तीन दिन पहले ही दरगाह से लौटा था। इसके बाद ये घटना हुई।

अब इस मामले पर ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा, “इस्लाम की रोशनी में खुद की कुर्बानी देना बिल्कुल नाजायज है। इस्लाम इस तरह की कुर्बानी की इजाजत नहीं देता है। अल्लाह ने इंसान को बनाया है, वो इंसान की कुर्बानी नहीं चाहता है।”

स्वीडन : फाड़ी और जलाई जाएगी कुरान, वो भी मस्जिद के सामने: कोर्ट और पुलिस ने दे दी है अनुमति

स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में मस्जिद के सामने कुरान जलाई जाएगी। वहाँ की पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को इसकी अनुमति भी प्रदान कर दी है। स्वीडिश पुलिस ने इस संबंध में जानकारी दी है कि मुस्लिमों के फेस्टिवल ईद-अल-अज़हा की शुरुआत के दिन बुधवार (28 जून, 2023) को प्रदर्शनकारियों ने मस्जिद के सामने कुरान जलाने के लिए अनुमति माँगी थी। पुलिस ने अनुमति प्रदान करते हुए अपने आदेश में लिखा है कि सुरक्षा को लेकर वैसे खतरे नहीं हैं कि इस माँग को नकार दिया जाए।

पुलिस ने मौजूदा कानूनों के हिसाब से फैसला लिए जाने की बात कही है। इससे पहले पुलिस ने कुरान जलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था, लेकिन 2 सप्ताह पहले अदालत ने फटकार लगाते हुए पुलिस को अपना आदेश बदलने के लिए कहा। उस समय पुलिस ने सुरक्षा से जुड़े खतरों का हवाला दिया था। इससे पहले स्वीडन में तुर्की के दूतावास के बाहर कुरान जलाया गया था, जिसके बाद कई हफ़्तों तक दंगे थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे।

कई इस्लामी मुल्कों में स्वीडन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए वहाँ के उत्पादों के बहिष्कार की बात की गई। साथ ही NATO में स्वीडन की एंट्री को भी बाधित कर दिया गया। तुर्की ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्वीडन को रोकने का काम किया और कहा कि उसने कुर्द विद्रोहियों पर कार्रवाई नहीं की है। तुर्की कुर्द लड़ाकों को आतंकवादी मानता है। स्वीडन ने इसके बाद कुरान जलाने की दो माँगों को निरस्त किया – जहाँ एक माँग एक व्यक्ति ने की थी, वहीं एक संगठन भी ऐसा करना चाहता था।

इस साल फरवरी में ही तुर्की के साथ-साथ इराक के दूतावास के बाहर भी कुरान जलाने की माँग की गई थी। लेकिन, जून के मध्य में अदालत ने पुलिस के आदेश को नकारते हुए कहा कि सुरक्षा का कोई खतरा नहीं है। 37 वर्षीय सालवन मोमिका का कहना है कि स्टॉकहोम की बड़ी मस्जिद के सामने न सिर्फ कुरान को फाड़ा जाएगा, बल्कि इसे जलाया भी जाएगा। मस्जिद के पास सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और सुरक्षा बलों की कई कारण वहाँ पर हैं।

स्वीडन के कई राजनेताओं ने कुरान जलाए जाने का विरोध किया, लेकिन साथ ही ये भी कहा कि यहाँ लोगों के पास अपनी अभिव्यक्ति के प्रदर्शन का अधिकार है। स्वीडन उत्तरी यूरोप में स्थित एक देश है, जो स्कैन्डिनेवियाई प्रायद्वीप में स्थित है। इसकी सीमाएँ नॉर्वे, फ़िनलैंड और डेनमार्क से लगती हैं। 1.1 करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश के 52% लोग ‘चर्च ऑफ स्वीडन’ में आस्था रखते हैं। वहीं 8% जनसंख्या मुस्लिम है।

स्कूल में बुर्का/हिजाब आर्टिकल 25 के तहत यह अधिकार नहीं : कर्नाटक Advocate General


कर्नाटक बुर्का विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने कहा कि यूनिफॉर्म की अनिवार्यता किसी भी छात्र या छात्रा के धार्मिक/मजहबी अधिकारों का हनन नहीं है। कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता (AG: Advocate General) ने कोर्ट को यह भी बताया कि ऐसे कदम से शैक्षणिक संस्थानों में किसी भी प्रकार के मज़हबी कपड़े पहन कर आने से रोक लगेगी, जिसमें हिजाब भी शामिल है। उच्चतम न्यायालय में यह सुनवाई 21 सितम्बर 2022 को हुई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ये सुनवाई जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की बेंच कर रही है। इसी सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता (एडवोकेट जनरल) प्रभुलिंग नवदगी ने दलील देते हुए कहा कि हिजाब समर्थक तमाम छात्राएँ इसे स्कूल के बाहर पहन सकती हैं। समान यूनिफॉर्म को कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने एकता और अनुशासन के लिए बेहद जरूरी बताते हुए कहा कि इससे पढ़ाई का अच्छा माहौल तैयार होता है।

वहीं हिजाब के समर्थन में बहस कर रहे वकीलों ने आर्टिकल 25 का उल्लेख करते हुए कोर्ट को बताया कि इसे पहनना मुस्लिम छात्राओं का ‘मज़हबी अधिकार’ है। इन्हीं वकीलों ने हिजाब की माँग को भी आर्टिकल 19 के तहत ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ करार दिया।

‘मज़हबी अधिकार’ या ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ वाली दलील के जवाब में कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने साल 1958 में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई का हवाला देते हुए बताया कि कैसे तब बकरीद में गाय की कुर्बानी को जायज ठहराने की माँग उठाते हुए उसे मजहबी अधिकार बताया गया था, जिसे मुख्य न्यायाधीश सहित 5 जजों की बेंच ने ख़ारिज कर दिया था।

कर्नाटक सरकार के महाधिवक्ता ने अपनी दलील में आगे बताया कि साल 1958 के बाद सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मौकों पर धार्मिक/मजहबी अधिकारों के स्वतंत्रता की व्याख्या की है। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ये बता चुका है कि हर मज़हबी गतिविधि को धार्मिक/मजहबी अधिकारों की स्वतंत्रता के नाम पर लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।

महाधिवक्ता ने कहा कि शिक्षा में समानता स्थापित करने के लिए क्लास 10 तक के सभी बच्चों को मुफ्त में यूनिफॉर्म देने का फैसला किया है। इसी मामले में एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलील देते हुए कहा कि क्या इसी को धार्मिक/मजहबी अधिकारों की स्वतंत्रता कहा जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट में ही मुस्लिम नमाज़ और हिन्दू हवन करना शुरू कर दें? उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक/मजहबी अधिकारों को मिलाने का विरोध भी किया।

उडुप्पी के जिस संस्थान से बुर्का विवाद की शुरुआत हुई थी, वहाँ के शिक्षकों ने इसी सुनवाई के दौरान अपने वकील आर वेंकटरमानी के माध्यम से कहा कि स्कूल में धार्मिक/मजहबी प्रतीकों की लड़ाई से वहाँ पढ़ाई का माहौल खराब होता है। अध्यापकों का पक्ष रखते हुए एक अन्य वकील डी शेषाद्रि नायडू ने कहा कि धर्म/मजहब बच्चों के दिल में होना चाहिए और उन्हें धार्मिक/मजहबी विवादों से दूर रह कर सिर्फ पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में 8 दिनों से चल रही यह सुनवाई अब अपने अंतिम दौर में है। इन 8 दिनों में 6 दिनों तक हिजाब समर्थक वकीलों ने अपना पक्ष कोर्ट में रखा था। बाकी 2 दिनों में कर्नाटक सरकार ने अपने पक्ष से सुप्रीम कोर्ट को अवगत करवाया है।

बकरीद है बर्बर और घिनौना इस्लामी हत्याकांड: डच सांसद गीर्ट वाइल्डर्स

डच सांसद गीर्ट वाइल्डर्स
आतंक और धार्मिक असहिष्णुता को लेकर बेहद मुखर रहने वाले डच सांसद गीर्ट वाइल्डर्स (Geert Wilders) ने पशु हिंसा को लेकर अपनी आवाज बुलंद की है। उन्होंने कहा कि बकरीद के नाम पर मुस्लिमों द्वारा पशुओं की खिलाफ की जाने वाली हिंसा बंद होनी चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद (Prophet Muhammad) और मजहबी किताब कुरान (Quran) के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने की अपील की।

गीर्ट ने मुस्लिमों के त्योहार बकरीद को लेकर ट्वीट कर कहा, “आज से शुरू हो रहे घिनौने बर्बर इस्लामी बलिदान का त्योहार #ईद हत्याकांड पर रोक लगाओ।” गीर्ट ने इसके साथ ही एक भेड़ की हत्या का वीभत्स फोटो भी साझा किया है।

अपने अन्य ट्वीट में गीर्ट ने कहा कि पैगंबर मुहम्मद और कुरान के खिलाफ लोगों को शिकायत दर्ज करानी चाहिए और अदालत में साबित करना चाहिए कि इसके मूल में हिंसा, भेदभाव और असहिष्णुता है। इसके बिना समाज अधिक स्वतंत्र और सुरक्षित रहेगा।

गीर्ट इस्लाम और जिहाद के नाम पर हिंसक रूप के आलोचक रहे हैं। देश में नूपुर शर्मा को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शन और उदयपुर में कन्हैया लाल एवं अमरावती में उमेश कोल्हे की हत्या पर उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथ पर सवाल उठाए थे।

गीर्ट ने ट्विटर पर एक वीडियो पोस्ट किया है, जिसमें उन्हें आग में जलता दिखाया गया है। वीडियो में लिखा हुआ है ‘गीर्ट वाइल्डर्स को सजा दो। हम उसे कभी माफ नहीं करेंगे।’ इसके लिए उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों पर निशाना साधा और कहा कि वे कभी किसी के सामने नहीं झुकेंगे।

अपने ट्वीट में गीर्ट ने लिखा, “वे मुझे ये भेजते हैं क्योंकि मैं नूपुर शर्मा और हिंदुत्व का समर्थन करता हूँ तथा हिंसक एवं अधिनायकवादी इस्लामी अवधारणा ईशनिंदा के खिलाफ खड़ा हूँ। लेकिन, मैं इस तरह की बर्बरता के आगे कभी नहीं झुकूँगा और आजादी के लिए अपनी लड़ाई जारी रखूँगा। हमेशा!”

उदयपुर में कन्हैया लाल की गला काटकर हत्या पर गीर्ट ने कहा था कि कट्टरवाद, आतंकवाद और जिहादियों से हिंदुत्व को बचाना जरूरी है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “एक दोस्त होने के नाते मैं भारत को सलाह दे रहा हूँ कि असहिष्णुता के प्रति सहिष्णु होना बंद कीजिए। जिहादियों, आतंकवादियों और कट्टरपंथियों से हिंदुत्व की रक्षा कीजिए। इस्लाम का तुष्टिकरण नहीं करिए, नहीं तो यह बहुत भारी पड़ेगा। हिंदुओं को ऐसे नेता चाहिए जो शत प्रतिशत उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हों।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा है, “भारत में हिंदुओं को सुरक्षित होना चाहिए। यह उनका देश है। उनकी मातृभूमि है। भारत उनका है। भारत कोई इस्लामिक देश नहीं है।” गौरतलब है कि जून की शुरुआत में वाइल्डर्स ने नूपुर शर्मा का समर्थन करते हुए कहा था कि अपराधी और आतंकवादी अपनी धार्मिक असहिष्णुता और घृणा व्यक्त करने के लिए सड़क पर हिंसा करते हैं।

इसके बाद उन्हें कट्टरपंथियों की ओर से धमकी भी मिली थी। इसके स्क्रीनशॉट साझा करते हुए उन्होंने लिखा था, “यही कारण है कि मैं बहादुर नूपुर शर्मा का समर्थन कर रहा हूँ। जान से मारने की सैकड़ों धमकियाँ। यह मुझे उनका समर्थन करने के लिए और भी अधिक दृढ़ बनाता है। क्योंकि, बुराई कभी नहीं जीत सकती। कभी नहीं।”

गीर्ट ने कहा था कि इस्लाम (Islam) असहिष्णु है और इसकी विचारधारा दुनिया के लिए खतरा है। उन्होंने कहा था कि भारत से माफी माँगने वाले मुल्क देश बेहद क्रूर शरिया शासन से संचालित होतेे हैं और उनका मानवाधिकार का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब है।

वाइल्डर्स ने कहा था कि जो मुल्क अपने यहाँ के अल्पसंख्यकों की हत्या कर देते हैं और उन्हें जेल में डाल देते हैं, वे कानून द्वारा शासित एक लोकतांत्रिक देश से माफी की माँग करते हैं तो यह सबसे बड़ा पाखंड है। उन्होंने कहा कि दुनिया जानती है कि ईरान, कतर, सऊदी अरब जैसे इस्लामिक अपने अल्पसंख्यकों को कितना प्रताड़ित करते हैं। उन्होंने इस्लामिक देशों को सबसे बड़ा पाखंडी बताया।

हॉलैंड की सबसे बड़़ी पार्टी के प्रमुख और वहाँ की संसद में विपक्ष के नेता वाइल्डर्स ने एक अन्य ट्वीट में कहा था, “केवल अपराधी और आतंकवादी अपनी धार्मिक असहिष्णुता और घृणा व्यक्त करने के लिए सड़क पर हिंसा का उपयोग करते हैं। असहिष्णु के प्रति सहिष्णु होना बंद करो। हम जीवन को संजोते हैं, वे मृत्यु को संजोते हैं।”

नृसिंह मंदिर के पास बकरीद में गोकशी: पथराव में 2 थाना प्रभारी सहित कई पुलिस वाले घायल

बकरीद गोकशी हजारीबाग
बकरीद के मौके पर मंदिर के पास गौ हत्या को लेकर सांप्रदायिक तनाव (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
झारखंड के हजारीबाग जिला स्थित कटकमदाग थाना क्षेत्र के नृसिंह मंदिर के खबरियावा-बनहा इलाके में बकरीद के दौरान गोकशी की सूचना मिलते ही दो समुदाय के आमने-सामने आने के बाद गाँव में साम्प्रदायिक तनाव उत्पन्न हो गया। इसके बाद यहाँ समुदाय विशेष द्वारा जमकर पथराव हुआ। वहीं इस घटना में कुछ लोगों के घायल होने की भी सूचना है। फिलहाल पुलिस ने मौके पर पहुँच कर स्थिति को नियंत्रण में कर लिया है।
रिपोर्ट के अनुसार, यह घटना कटकमदाग थाना क्षेत्र के नृसिंह मंदिर के पास के इलाके में विशेष समुदाय द्वारा बकरीद के मौके पर गाय काटने के खुलासे के बाद हुआ। गाँव में हिंदुओं द्वारा प्रतिबंधित पशु गाय की हत्या का विरोध करने पर समुदाय विशेष ने इस मामले पर बहस करना शुरू कर दिया।
मामला इतना बढ़ गया कि लोग आपस में एक दूसरे को मारने पर उतारू हो गए। लोगों ने आपस में जम कर पत्थरबाजी की। इस दौरान उपद्रवियों ने उत्तेजित हो कर एक बाइक को आग के हवाले कर दिया जबकि भीड़ द्वारा कई गाड़ियों को भी निशाना बनाया गया।
साम्प्रदायिक तनाव को बढ़ता देख पुलिस को सूचना दी गई। जिसके बाद पुलिस ने मौके पर पहुँच कर भीड़ को काबू करने की कोशिश की। बेकाबू भीड़ को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को हवाई फायरिंग भी करनी पड़ी। इस दौरान सदर थाना प्रभारी इंस्पेक्टर गणेश कुमार सिंह, कटकमदाग थाना प्रभारी धनंजय कुमार समेत कुछ अन्य पुलिसकर्मी और अन्य लोग भी घायल हो गए।

मामले की गंभीरता को देखते हुए डीआईजी एवी होमकर और एसडीएम मेघा भारद्वाज ने घटना स्थल पर पहुँच कर स्थिति का जायजा लिया। फिलहाल पुलिस ने इलाके को सील कर हालातों पर काबू पा लिया है। पुलिस ने लोगों से शांत रहने की भी अपील की है। इसके साथ ही भारी संख्या में जवानों को भी तैनात किया गया है।
वहीं घटना की जानकारी देते हुए डीसी रामगढ़ सह हजारीबाग संदीप सिंह ने बताया, “मवेशी को मारकर फेंके जाने के बाद दोनों ओर से पत्थरबाजी हुई है। हम लोगों का फोकस है कि आगे किसी तरह की घटना न हो। घटना के पीछे कौन हैं, इसकी जाँच की जा रही है। दोषियों को किसी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।”

RJ सायमा नैतिकता की अपील बस दिवाली पर करती हैं, बकरीद उन्हें ‘शांति’ से मनाने दी जाए, क्यों?

बकरीद, आरजे सायमा
कुछ वर्षों से देश में छद्दमवाद का बहुत अधिक बोलबाला हो गया है। छद्दम समाजवाद और छद्दम धर्म-निरपेक्षता की चादर ओड साम्प्रदायिक तत्व साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैलाने से नहीं चूकते। अब चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि इन साम्प्रदायिकों को कौन फंडिंग कर रहा है?
लेकिन जब उनकी जहरीली बातों का जवाब दिया जाता है, तब ये ही लोग जवाब देने वालों को फिरकापरस्त कहकर माहौल ख़राब करने का प्रयास करते हैं।  
इस सन्दर्भ में नीचे दिए वीडियो को इन साम्प्रदायिकता का जहर फ़ैलाने वालों को जरूर सुनना चाहिए, जब आरिफ मोहम्मद खान The Wire की पत्रकार आरफा खानम को कहते हैं कि "जब तुम किसी पर एक उंगली उठाते हो, तो दूसरी तरफ से चार उँगलियाँ तुम्हारी तरफ भी उठेंगी ....."
मीडिया हिप्पोक्रेसी आखिर क्या है? इसका जवाब आपको इन दिनों सोशल मीडिया पर बहुत अच्छे से देखने को मिलेगा। बकरीद आ रही है और हर वामपंथी अपनी गंगा-जमुनी तहजीब की आड़ लेकर यहाँ पर एक अलग ही स्तर की लड़ाई लड़ रहा है।
ये लड़ाई उन लोगों के ख़िलाफ़ है जो बकरीद को लेकर सवाल उठाते हैं। ये लड़ाई उन लोगों के ख़िलाफ़ है जो बकरीद के मौके पर कुर्बानी की जगह कोई सवाब का काम करने को कहते हैं। ये लड़ाई उन लोगों के भी खिलाफ है जो सोचते हैं कि उनके अपील करते रहने से एक दिन कट्टरपंथियों का हृदय परिवर्तन हो जाएगा और वह इस त्योहार को मनाने के लिए कोई अन्य तरीका ढूँढ निकालेंगे।
पिछले कुछ समय से बकरीद ट्विटर पर एक बड़ी चर्चा का विषय रहा है। कई लोगों ने इस पर ट्वीट किया है। इनमें कुछ ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिन्होंने कुर्बानी न करने की माँग को हिन्दुत्व की माँग बता दिया। कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने बिना कुछ कहे ये दर्शा दिया कि इस देश में मुस्लिम समुदाय को उनका त्योहार शांति से मनाने ही नहीं दिया जाता।



हम बात कर रहे हैं रेडियो जगत के सुप्रसिद्ध नाम- आरजे सायमा की। आरजे सायमा, जो अपने शो में अक्सर हमें इंसानियत, हर किसी से प्रेम और एक-दूसरे की मदद करने की बातें कहानियों की जरिए अपनी मधुर आवाज में सुनाती हैं और जिनसे सैंकड़ों लोग प्रभावित होते हैं। उन्होंने ही ट्विटर पर बकरीद को लेकर लिखा है कि ये बहुत शर्मनाक बात है कि एक समुदाय के लोगों को उनका त्योहार शांति से नहीं मनाने दिया जा रहा।
हाँ-हाँ! आप इस बात को हास्यास्पद समझ सकते हैं कि सायमा जैसा इंसान इन दिनों बकरीद के त्योहार को ‘शांति’ से मनाने देने की अपील कर रहा है। शायद, शांति शब्द का इस्तेमाल करते हुए वह यहाँ पर सिर्फ़ इंसानी जुबान पर लगाम की गुहार लगा रही है। उनकी अपील से ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि उनका पशुओं की चीखों से कोई सरोकार है।
वे लिखती हैं,”ये बहुत शर्मनाक है कि आप एक समुदाय को उनका त्योहार शांति, खुशी और उल्लास के साथ मनाने देना नहीं चाहते। मैं इसको कोई तूल नहीं देती। ये मजाक तुम पर नहीं है। तुम ही मजाक हो।”
अब सायमा के इस ट्वीट पर कई प्रतिक्रियाएँ आईं हैं। कुछ कट्टरपंथियों की। तो कुछ ऐसे लोगों की जो बकरीद पर कुर्बानी रोकने की गुहार लगा रहे हैं, लेकिन सायमा की मधुर आवाज के भी फैन हैं। एक यूजर उन्हें लिखता है, “सायमा मैं तुम्हारा प्रशंसक रहा हूँ। तुम रेडियो पर श्रेष्ठ से भी ऊपर हो। लेकिन तुम्हारे समुदाय के लोग जैसे एकतरफा ट्वीट करते हैं ये बेहद निराशाजनक है। कोई तुम्हें तुम्हारा त्योहार मनाने से नहीं रोक रहा। इसलिए चिल्लाना बंद करो।”
आरजे सायमा इसी ट्वीट के जवाब में लिखती हैं कि जब आप सोशल मीडिया पर #Bakralivesmatter जैसा हैशटैग हर रोज देखते हैं तो ये निश्चित तौर पर चिंता का विषय हो जाता है।
जिस हैशटैग का हवाला देते हुए आरजे सायमा अपने ट्वीट को जस्टिफाई कर रही हैं, उसमें ऐसा क्या है? उस हैशटैग में लोग कुर्बानी के बिना बकरीद मनाने की अपील कर रहे हैं। या ये बता रहे हैं कि हर साल एक त्योहार के नाम पर कितने बकरे काट दिए जा रहे हैं। लेकिन पेटा जैसा कोई संगठन इसके लिए आवाज नहीं उठा रहा और कट्टरपंथी भी नहीं सुधर रहे।
इस हैशटैग के अंतर्गत कुछ लोग मार्मिक तस्वीरें शेयर कर रहे हैं जिसमें माँ और बच्चे के जरिए ये समझाने की कोशिश हो रही हैं कि पशुओं के भीतर भावनाएँ होती है, वो भी मातृत्व प्रेम समझते हैं… आखिर इसमें गलत क्या है? सायमा भी तो अपने शो में यही सब संदेश देती हैं। फिर उन्हें इस हैशटैग से क्या दिक्कत है। क्या समझ लिया जाए कि जो बातें वो सिखाती हैं वो सिर्फ़ आम दिनों में खुद के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए होती हैं। या फिर ये समझ लिया जाए कि आरजे सायमा की सोच भी कट्टरपंथियों की सोच से इतर नही है।
आखिर हैशटैग में दिक्कत क्या है। जिन्हें लगता है कुर्बानी गलत है वो केवल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर अपनी राय ही तो रख रहे हैं। मानना है मानिए नहीं मानना मत मानिए। अपने पाखंडी रवैये की पोल तो मत खोलिए।
जो इवन डेज में आपको दिवाली-होली पर पॉल्यूशन और पानी पर ज्ञान देने के लिए उकसाता है, जबकि ऑड दिनों में ये कहलवाता है कि बकरीद को शांति से मनाने दिया जाए। दिवाली पर सायमा जैसों को फौरन उन लोगों की चिंता सता जाती है जिन्हें धुएँ से परेशानी होती है। क्या उनका विवेक उन्हें उन लोगों के लिए आवाज उठाने को नहीं बोलता जिन्हें खून से भरी नालियाँ देखकर घबराहट शुरू हो सकती हैं।
भगवान के नाम पर या बीमारों का ख्याल करते हुए हिंदू मुमकिन है एक दिन बिलकुल पटाखे जलाना छोड़ दें। लेकिन क्या यही अपेक्षा या ऐसा ही त्याग दूसरे समुदाय के लोगों से हिन्दू कर सकते हैं? खुद सोचिए, क्या शरीर से निकाला गया खून शांति का प्रतीक होता है? नहीं। उसे हिंसा का चिह्न ही मानते हैं। फिर आप उसे युद्ध के नाम पर बहाइए या फिर त्योहार के नाम पर।
आज ये बात भी हम मानते हैं कि आम दिनों में लोगों ने इसे अपना स्वाद बना लिया है। फिर चाहे वो हिंदू हो या कोई पंडित। इसके लिए अलग से टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है या वीडियोज और तथ्य डालकर प्रमाण देने की जरूरत नहीं है।
हम ये बात जानते हैं कि हिंदुओं में भी अधिकाँश लोग मांसाहारी भोजन खाते हैं। लेकिन हमें ये भी पता है कि इसके पीछे क्या कारण है। वो त्योहार के नाम पर इतनी बर्बरता नहीं दिखाते। आज #bakralivesmatter हैशटैग में कई वीडियोज, कई तथ्य, कई स्क्रीनशॉट आपको ऐसे देखने को मिलेंगे, जो ये साबित करने के लिए डाले जा रहे हैं कि जो खुद मांसाहार खाते हैं वो बकरीद पर भावुक होकर सिर्फ़ इस्लाम को ट्रोल कर रहे हैं।
लेकिन, ये बात समझने की आवश्यकता है कि आम दिनों में मांसाहार खाने वाले लोगों के पीछे भौगोलिक परिस्थितियाँ, इतिहास में अदला-बदली की गई संस्कृतियाँ या फिर आर्थिक मजबूरियाँ उत्तरदायी होती हैं। हाँ! आज के परिप्रेक्ष्य में ये सारा मामला व्यापार और स्टेटस पर जरूर आ टिका है। मगर, क्या कभी किसी ने सुना है कि कोई हिंदू इस तरह के तर्क दे रहा हो कि उसने कई सैकड़ों पशुओं को इसलिए काट दिया क्योंकि उसे गरीबों को भोजन देना था? शायद कभी नहीं। क्योंकि जो आर्थिक रूप से मजबूत इंसान है वो किसी का पेट भरकर पुण्य कमाने के लिए ऐसी हिंसा को विकल्प ही नहीं मानता।
आरजे सायमा या फिर उनके अन्य कट्टरपंथी समर्थकों को हम किसी भी रूप में मांसाहारी भोजन करने से नहीं रोक रहे। हमारा ये उद्देश्य बिलकुल भी नहीं हैं। हमें मालूम है देश की अर्थव्यवस्था में मीट का निर्यात एक महत्वपूर्ण कारक है। हम ये भी मानते हैं कि आखिर इंसान की प्रवृति यही है कि जो गले से नीचे उतर जाए और पेट में जाकर पच जाए वही उसे मील लगने लगता है, तो फिर वह सेवन क्यों न करे।
लेकिन, हम ये जरूर पूछते हैं कि किसी त्योहार के नाम पर करोड़ों पशुओं का एक साथ मारना कहाँ तक उचित है? कहाँ तक उचित है पूरे साल बच्चों को इंसानियत के नाम पर ढकोसलों से भरी बातें सिखाना और एक दिन छूरी लेकर उन्हें ये दिखाना कि एक चलता-फिरता जीव त्योहार के नाम पर काटा जा सकता है… इसमें कुछ गलत नहीं है। क्या औचित्य है ऐसी धारणाओं का जो हमारे भीतर ऐसी मानसिकता पैदा करे कि एक जीव को मारकर दूसरे जीव का पेट भरा जाएगा?
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जहाँ एक तरफ PETA हिन्दुओं को शाकाहार का पाठ पढ़ाता है और उनके पर्व-त्योहारों को बदनाम करने का प्रयास करता है, वहीं दूसर.....
आरजे सायमा को त्योहार पर शांति चाहिए ताकि वे इसे खुशी से मना पाएँ। हम पूछते हैं क्या उन्हें किसी ने रोका है। खुद सोचिए अगर आज पूरी दुनिया इस त्योहार पर दी जाने वाली कुर्बानी के विरोध पर आ खड़ा हो और कोई कानून या फरमान निकाला जाए, तब भी तो एक तबका ऐसा होगा जो अपने अस्तित्व का खतरा बताकर आजादी माँगने लगेगा। शाहीन बाग ऐसे निराधार बातों पर हुए प्रदर्शनों का सबसे हालिया उदहारण है ही।

PETA का प्रमाणित होता हिन्दू विरोधी एवं मुस्लिम प्रेम

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
PETA ने अभी हाल ही में हिन्दुओं के त्यौहार रक्षा बंधन पर मांस से परहेज करने की शिक्षा दी थी, लेकिन वही PETA बकरा ईद पर मुस्लिम समाज को कुर्बानी की सलाह देना, द्वारा तुष्टिकरण करने का प्रमाण दे रही है। हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं का कर्तव्य है कि इस बात का संज्ञान लेकर हिन्दू विरोधी PETA के विरुद्ध मुहिम चलाकर इसे तुष्टिकरण त्याग धर्म-निरपेक्षता का पाठ पढ़ने के लिए मजबूर करे। क्यों इन तुष्टिकरण संस्थाओं को हिन्दू तीज-त्यौहारों पर ही सारे कायदे-नियम याद आते हैं? क्या मजहब देख नसीयत देना क्या साम्प्रदायिकता को बढ़ावा नहीं देता? इतना तय है कि "काश यह बकरा ईद मुसलमानों का त्यौहार न होकर हिन्दुओं का त्यौहार होता, निश्चित रूप से इन तुष्टिकरण तत्वों ने बंद करवा दिया होता।" 
पशु अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने का दावा करने वाली अंतरराष्ट्रीय संस्था PETA जहाँ एक तरफ हिन्दू घृणा का प्रदर्शन करते हुए हिन्दुओं के हर एक त्यौहार को बदनाम करने की कोशिश करती है, वहीं दूसरी तरफ इस्लाम के त्यौहारों को लेकर चुप रहती है। PETA इंडिया ने अपनी वेबसाइट पर PETA यूएस द्वारा रिकमेंड किए गए एक कंटेंट को प्रमोट किया है, जो इस्लाम व मुसलमानों से जुड़ा हुआ है।
PETA की वेबसाइट पर ‘एनिमल इस्लाम’ नामक एक वेबसाइट का प्रचार किया गया है और कहा गया है कि यहाँ उन मुस्लिमों की मदद के लिए एक उम्दा कंटेंट्स हैं, जो जानवरों को मारने में विश्वास नहीं रखते हैं। उसने उन मुस्लिमों को इस वेबसाइट पर विजिट करने की सलाह दी है, जो अपने समुदाय के भीतर इस्लामी विधि के हिसाब से दया और करुणा को बढ़ावा देना चाहते हैं। साथ ही उसने दावा किया कि उसकी हेल्प टीम ईद पर भी जानवरों को बचाने के लिए 24 घंटे कॉल पर उपलब्ध है।
PETA, इस्लामबेहतर मांस के लिए अल्लाह के जानवरों को तेज धार चाकू से काटें, कुर्बानी पढ़ते रहें: PETA की मुस्लिमों को 8 सलाह
साथ ही उसने जानवरों को मारने के लिए भी कई विधियाँ बताई हैं। ये आश्चर्यजनक है क्योंकि PETA उन हिन्दुओं को शाकाहारी बनने की सलाह देता है, जिनमें से कई पहले से ही शाकाहारी हैं और सामान्यतः उनके किसी भी त्यौहार में जीव-हत्या नहीं होती। लेकिन जब बात इस्लाम और मुसलमानों की आती है तो PETA जानवरों को मारने की विधि बताने लगता है। फिर वो शाकाहार की बातें क्यों करता है?
PETA ने जानवरों की हत्या करते समय क्या करना चाहिए और क्या नहीं, इस सम्बन्ध में सलाह जारी किया हुआ है। हिन्दुओं को शाकाहारी बनने की शिक्षा देने वाला PETA मुसलमानों को जानवरों को किन विधियों से मारने की सलाह देता है, वो देखिए:
  1. जानवरों को मारते समय एकदम सावधानी से हैंडल करें। किसी भी प्रकार का तनाव या क्रूरता हराम है। इससे गलत तरीके से खून निकलने लगेगा और माँस भी ठीक तरह का नहीं मिलेगा। एक जानवर को मारते समय वहाँ दूसरे जानवर को न रखें, ताकि वो एक-दूसरे की हत्या को देख नहीं पाएँ।
  2. चाकू की धार को एकदम तेज़ कर के रखें। उसे बार-बार धार दें। उसकी लम्बाई ठीक रखें। इसकी लम्बाई 45 सेंटीमीटर होनी चाहिए। चाकू को जानवरों को न देखने दें, नहीं तो वो डर जाएँगे।
  3. जानवर को ‘क्विब्ला’ की दिशा में रखें। उसकी गर्दन को किसी छेद या नाले में रख कर उसे मारें ताकि खून वहीं बह जाए। जानवर के ऊपर खड़ा नहीं हों। अगर जानवर बड़े आकार का है तो उसकी हत्या करते समय लोगों की मदद लें, जो उसके पाँवों को पकड़ सकते हैं।
  4. काफी अच्छे तरीके से जानवर की हत्या करें। तीन से ज्यादा बार वार न करें। गले के पास जितनी भी नसें हैं, उन सबको काट डालें। साँस और भोजन की नली को काट डालें। उस समय ‘क़ुर्बानी की दुआ’ पढ़ते रहें। जानवर को हाथ-पाँव मारने दें, ताकि खून जल्दी-जल्दी निकल जाए।
  5. ये याद रखें कि किसी की भी जान लेना सिर्फ अल्लाह के हाथ में है। हम अल्लाह द्वारा बनाई गई दुनिया का एक हिस्सा हैं, इसीलिए ज़िंदा रहने के लिए हम ऐसा करते हैं। दूसरे जीवों की तरह हमें भी अपना अस्तित्व बचाना है।
  6. जानवर को काटने के बाद 6 मिनट तक उसका खून बहने दें। भेंड़ या बकरों के मामले में 5 मिनट तक ब्लीडिंग होने दें।
  7. दूसरे जानवर को काटने से पहले खून को एकदम साफ़ कर दें क्योंकि खून की गंध से दूसरे जानवरों को तनाव होता है।
  8. याद रखें कि ये जानवर अल्लाह द्वारा बनाए हुए हैं और जन्नाह (जन्नत) जाते हैं। अगर हम उसके साथ बुरा व्यवहार करते हैं तो इसके लिए हमें जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
PETA ने मुसलमानों के लिए जानवरों को काटने का सबसे बेहतरीन तौर-तरीका बताया है। साथ ही सलाह दी है कि क़ुरबानी से पहले जानवरों को खरीदें और उनका पालन-पोषण करें, फिर देखें कि आप उन्हें काट सकते हैं या नहीं। PETA ने मुसलमानों को कहा है कि अगर आप उन जानवरों को नहीं काट सकते तो किसी को नहीं काटें। लेकिन, फिर भी काटने को लेकर तौर-तरीके बताए गए हैं।
शेफाली वैद्य ने PETA की वेबसाइट के स्क्रीनशॉट्स शेयर कर के उसके दोहरे रवैये का खुलासा किया। उन्होंने ऑपइंडिया को बताया था कि PETA ने पिछले 48 घंटों मे सारा का सारा ध्यान उन्हें ट्रोल करने में लगाया है और इसके सिवा कुछ नहीं किया है। उन्होंने कहा कि एक अंतरराष्ट्रीय संस्था एक महिला को निशाना बनाने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि PETA एक ट्रोल के सिवा कुछ नहीं है।
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भारत में कुछ संस्थाओं और लोगों को केवल हिन्दू त्योहारों पर ही कायदे-कानून याद आते हैं, अन्य धर्मों के त्यौहारों पर ....
शेफाली वैद्य ने इस दौरान PETA को दी गई चुनौती पर भी बात की, जिसमें उन्होंने ईद पर उसके द्वारा बैनर लगाने पर शाकाहारी बन जाने की बात कही थी। शेफाली ने कहा कि उनकी चुनौती का जवाब देने कि बजाए PETA दुनिया भर की बातें कर रहा है और ट्रोलिंग में लगा हुआ है। शेफाली वैद्य का सवाल था कि आखिर 2 दिन से एक इंटरनेशनल इन्स्टिट्यूशन एक प्राइवेट इन्डविजूअल को निशाना बनाने में क्यों लगा हुआ है?

शिवकाशी : जिसकी रगों में बहता है बारुद और सीने में धड़कते हैं पटाखे

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रामेश्वरम और शिवकाशी। एक का नाम राम से तो दूसरे का शिव से जुड़ा है। दोनों ही बेहद अलग हैं लेकिन पूरे देश को जोड़ते हैं। रामेश्वरम देश को श्रद्धा और धर्म से जोड़ता है और शिवकाशी लोगों को पटाखे जलाने से मिली खुशियों से। खुशियां यानी पटाखे, खासतौर पर बच्चों के लिए। चीन के बाद पटाखों के निर्माण में भारत दुनिया में दूसरे पायदान पर है। इसमें 90 फीसदी योगदान चेन्नई से 500 किमी दूर छोटे से शहर शिवकाशी का है।
भारत में दशहरा प्रारम्भ होते ही बम-पटाखों पर प्रदुषण की आड़ में पाबन्दी लगाने का शोर मचना शुरू हो जाता है। जैसे आतिशबाज़ी के ही कारण वातावरण दूषित होता है। न्यायालय का सहारा लिया जाता है, हमें उन लोगों को पहचानना होगा, जिन्हे केवल हिन्दू त्यौहारों पर ही रोना आता है। बात निकली है तो दूर तक जाएगी, किसी को गुस्सा नहीं होना चाहिए। अगर दीपावली पर आतिशबाज़ी से वातावरण दूषित होता है, तो क्या बकरीद पर नहीं होता। कभी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल या आतिशबाज़ी का विरोध करने वालों ने मुस्लिमों के पावन पर्व पर मुस्लिम क्षेत्रों और उसके पास बने कूड़ा घरों(ढलावों) के पास जाकर देखा है, बकरे, ऊंट और भैंसे का पेडू जब तक उठ नहीं जाता, वहाँ से निकलना कितना मुश्किल होता है। इतना ही नहीं, जब कूड़ा गाड़ी उस मल को जिस सड़क से गंतव्य की ओर जा रही होती है, उस गाड़ी के आगे या पीछे चलना कितना मुश्किल होता है। सिक्के के केवल एक ही पहलु पर रोना बंद होना चाहिए। और तो और, दिल्ली जामा मस्जिद पर जो बकरा मंडी लगती है, ईद के बाद, सफाई न होने तक, वहां से निकलना कितना कठिन होता है। लेकिन उन कारणों पर किसी में कोर्ट का दरवाज़ा खट-खटाने का साहस नहीं, जिनसे वातावरण दूषित होता है। कूड़ा घर की बगल में होटल खुल सकते हैं, लेकिन दिवाली पर आतिशबाज़ी नहीं। यह मात्र एक झलक है। 
करीब 20 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की पटाखा इंडस्ट्री और इस काम में लगे 7 लाख कामगारों पर 2018 का साल भारी है। हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के सिर्फ दो घंटे पटाखे चलाने और सिर्फ ग्रीन पटाखे बनाने आदेश ने शिवकाशी पटाखा इंडस्ट्री को संकट में डाल दिया है। देशभर में जहां इस फैसले पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, वहीं शिवकाशी सहम गई है क्योंकि 100 साल से इस शहर में सिर्फ पटाखों की बात होती है। शहर की बसाहट से कम से कम 3-4 किमी दूर फैले मैदानों में पटाखा फैक्ट्रियां फैली हुई हैं। आज यहां 800 पटाखा यूनिट्स हैं। 40 साल से इस इंडस्ट्री में काम कर रहे राममूर्ति कहते हैं पटाखे उनका धर्म हैं। यहां पटाखों के खिलाफ न कोई कुछ बोलता है और न सुनता है। इसीलिए जब देशभर में लोग दिवाली पर पटाखे जलाते हैं तो शिवाकाशी के लाखों परिवारों के चेहरे पर मुस्कुराहट आ जाती है। शिवकाशी को मिनी जापान भी कहा जाता है। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस शहर को यह नाम दिया था।
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शिवकाशी को पटाखों का शहर बनाया नडार बंधुओं ने
एक छोटे से शहर को आतिशबाजी की राजधानी बनाने का श्रेय शिवाकाशी के नडार बन्धुओं को जाता है। नडार बन्धुओं ने माचिस की छोटी सी डिबिया में बड़े सपने देखे। 1922 में एक बड़ा संकल्प लेकर दोनों भाई माचिस बनाने की कला सीखने कोलकाता पहुंच गए। दोनों ने करीब 8 महीने तक बिना शर्म मजदूरों की तरह काम करके तमाम बारीकियां सीखीं। शिवाकाशी लौटने पर दोनों ने कई जगह से पैसा इकट्ठा करके माचिस की एक छोटी से फैक्ट्री लगाई। जर्मनी से आधुनिक मशीनें मंगाने का पहला बड़ा जोखिम उठाया। 1926 में माचिस उद्योग की नींव जमने के बाद नडार भाइयों ने सहमति से अलग होकर कारोबार विस्तार किया। षणमुगम नडार ने अपने उत्पादों को काका (स्टैंडर्ड ब्रांड) का नाम दिया तो अय्या नडार ने गिलहरी व अनिल ब्रांड पटाखे बनाना शुरू किया।
आजादी के बाद शिवकाशी को मिली नई पहचान
नडार परिवार की 1942 में स्थापित स्टैंडर्ड फायर वर्क्स और श्री कालिश्वरी फायर वर्क्स आज देश की दो सबसे बड़ी पटाखा निर्माता कम्पनियों में से एक है। इन कम्पनियों के मुर्गा, मोर, घंटी, गिलहरी, अनिल और स्टैंडर्ड ब्रांड पटाखे दुनिया के कई देशों में निर्यात भी किए जा रहे हैं। स्टैंडर्ड फायर वर्क्स ने तो एक कदम आगे बढ़ाते हुए पटाखों के जन्मदाता देश माने जाने वाले चीन में भी फैक्टरी शुरू की है। इसके अलावा कम्पनी ने चीन के लियुंग फीनिक्स फायर वर्क्स कम्पनी के साथ साझा उद्यम भी शुरूकिया है। शिवकाशी की एक और मशहूर कम्पनी कोरोनेशन फायर वर्क्स है जिसकी स्थापना 1974 में तमिल उद्यमी पी. कंगावल ने की थी।
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बच्चे और महिलाएं शिवकाशी की रीढ़
शिवकाशी में साल के 300 दिन पटाखे बनते हैं। बच्चे और महिलाएं शिवकाशी की रीढ़ हैं। ज्यादा मजदूरी कमाने के लिए पूरा परिवार पटाखा और माचिस बनाने के कारोबार में जुटा है। न बच्चों के लिए उम्र की सीमा है न बुजुर्गों के लिए। शिवाकाशी जितना पटाखा-माचिस, प्रिंटिंग कारोबार के लिए प्रसिद्ध है उतना ही बाल मजदूरी के लिए भी जाना जाता है। नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स की एक रिपोर्ट के अनुसार यहां 5-15 साल के बच्चों को नाममात्र की मजदूर पर 12 घंटेकाम कराया जाता है। हाथों की स्पीड ऐसी कि एक घंटे में 1000 पीस तैयार कर लेते हैं। सल्फर, एल्मुमिनियम पाउडर और बारूद के बीच पटाखा बनाने बच्चों के साथ बुजुर्गों तक 90 फीसदी लोग अस्थमा, आंखों में संक्रमण और टीबी की समस्या से जूझ रहे हैं। रंगीन पटाखों के काम में लगे कन्नन के पिता केमिकल एक्सपर्ट और जगन्नाथ कैमिकल्स के मालिक थानासेकरन 70 साल के हैं। आज भी अपनी मोपेड पर सुबह 8:30 बजे फैक्ट्री पहुंच जाते हैं। फिर शहर के बीच में बने ऑफिस आते हैं। कन्नन बताते हैं कि यहां लोग खूब मेहनत करते हैं, खूब कमाते हैं और फिर खूब खर्च भी करते हैं।
बदल रही शिवकाशी में सब कुछ है
तकनीकी कुशलता और बेहतर प्रबन्धन के दम पर शिवकाशी के उद्यमी प्रदूषण रहित पटाखे भी बनाने लगे हैं और बालश्रम रोकने के लिए भी कदम भी उठाए हैं। नडार परिवार के सहयोग से शिवकाशी में कई स्कूल-कॉलेज और संस्थाएं गरीब श्रमिकों की मददगार बनी हैं। चाइल्ड लेबर न हो इसके लिए 20 मॉनिटरिंग एजेंसियां हैं। अब यहां 42 एजुकेशनल इंस्टीट्यूट हैं। जिनमें तीन इंजीनियरिंग कॉलेज, एक वुमन कॉलेज, 2 पॉलीटेक्निक, एक फॉर्मेसी और तीन आर्ट कॉलेज हैं। यहां 3 आईसीएसई और2 सीबीएसई बोर्ड के स्कूल भी हैं। सभी को पटाखा कंपनी मालिकों से मदद मिलती है। इलाके में 8 फायर स्टेशन हैं जिसमें 20 गाड़ियां और टीम में 190 लोग हैं। फायर डिपार्टमेंट की टीमें स्कूल से लेकर कॉलेज और सरकारी ऑफिसों में भी फायरअवेयरनेस ट्रेनिंग देती है। देश का सबसे आधुनिक बर्न यूनिट यहां के सरकारी अस्पताल में है। आठ साल से सीथुराजपुरम की एक फैक्ट्री में काम कर रही सेलवी कहती हैं यहां काम करके हर हफ्ते वह 1000-1500 रुपए कमा लेती हैं। पति यहां की सबसे बड़ी 250 करोड़ के टर्नओवर वाली स्टैंडर्ड फायरवर्क में इसी सीजन से काम करने लगा है। वो 3000 हर हफ्ते घर लाता है। फैक्ट्री में 350 से कम रोज की मजदूरी किसी को नहीं मिलती। अनुभवी को 600 तक मिलते हैं।