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‘मुस्लिम नहीं हैं अहमदिया’: आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के ‘फतवा’ पर मोदी सरकार सख्त, पूछा- किस अधिकार से घोषित किया ‘काफिर’

              अहमदिया पर आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के फतवे पर मोदी सरकार सख्त (फोटो साभार: ET/इंडिया टुडे)
आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के एक फतवे पर केंद्र की मोदी सरकार ने सख्त नाराजगी जताई है। इस फतवे के जरिए अहमदिया समाज को ‘गैर मुस्लिम’ और ‘काफिर’ घोषित किया गया है। केंद्र ने इसे घृणा फैलाने वाली हरकत बताते हुए राज्य सरकार से पूछा है कि किस ‘आधार’ और ‘अधिकार’ से यह फतवा जारी किया गया है। अहमदिया मुस्लिमों ने इसके खिलाफ केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय से शिकायत की थी।

आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के अहमदिया मुस्लिम के विरुद्ध फतवे के बहुत दूरगामी परिणाम होने वाले है। लेकिन यह उन सभी नेताओं और पार्टियों के लिए आंखें खोलने वाला है, जो छद्दम धर्म-निरपेक्षता का चोला ओढे हिन्दुओं को जातियों में विभाजित कर, मुस्लिम समाज के सिरमौर बनाए घूम रहे हैं। मुस्लिम समाज में ही कितना मनमुटाव है, उस पर उसी तरह पर्दा डाल जनता को पागल बनाते रहे, जिस तरह तुष्टिकरण के चलते भारत के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर आतताई मुगलों को महान पढ़ाते रहे। चर्चा है, पुष्टि नहीं हुई है, कि बहुत जल्दी 4 और जातियों के विरुद्ध फतवा आने वाला है। इतना ही नहीं, उन मुसलमानों के विरुद्ध भी फतवा आने को है, जो सनातन धर्म का समर्थन करते हैं। अभी तो यह शुरुआत है, देखना है कि फतवों का दौर कहाँ तक जाने वाला है। 

जिस तरह नूपुर शर्मा के बयान पर एक्स-मुस्लिम और कुछ मौलानाओं ने कट्टरपंथियों को आड़े हाथ लेते बेनकाब किया था, क्या यह 'फतवा' उसी का परिणाम है? अगर यह सम्भावना सच है, निस्संदेह यह आग जरूर फैलेगी, जिसे रोकना शायद असंभव हो। Jaipur Dialogue, Sach, News Nation पर 'इस्लाम क्या कहता है' और दूसरे अन्य चैनल पर नूपुर शर्मा के समर्थन में हुई इन चर्चाओं की गूंज बहुत दूर तक जाती दिख रही है। 'सर तन से जुदा' से हिन्दुओं को डराने की जो चिंगारी कट्टरपंथियों ने छोड़ी थी, उस आग में कट्टरपंथी अपने ही समाज को झुलसाने को आमादा है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश सरकार को लिखे पत्र में कहा है, “अहमदिया मुस्लिम समुदाय की ओर से 20 जुलाई 2023 को एक शिकायत प्राप्त हुई है। इसमें कहा गया है कि कुछ वक्फ बोर्ड अहमदिया समुदाय का विरोध कर रहे हैं और उन्हें इस्लाम से बाहर करने के लिए अवैध प्रस्ताव पारित कर रहे हैं। यह अहमदिया समुदाय के खिलाफ घृणा फैलाने वाली हरकत है। वक्फ बोर्ड के पास अहमदिया सहित किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान निर्धारित करने का अधिकार नहीं है।”

अल्पसंख्यक मंत्रालय ने यह भी कहा है कि वक्फ अधिनियम 1995 के तहत वक्फ बोर्ड को भारत में वक्फ संपत्तियों की देखरेख और उनका मैनेजमेंट का अधिकार है। राज्य वक्फ बोर्ड को इस तरह का आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। मंत्रालय ने आगे कहा है, “वक्फ अधिनियम 1955 के के तहत वक्फ बोर्ड राज्य सरकार के एक निकाय के रूप में काम कर सकता है। इसका मतलब यह है कि वक्फ बोर्ड राज्य सरकार द्वारा जारी आदेशों पर काम कर सकता है। उसे किसी भी गैर-सरकारी संगठनों द्वारा जारी फतवों पर संज्ञान लेने का कोई अधिकार नहीं है।”

मंत्रालय की ओर से यह भी कहा गया है कि वक्फ बोर्ड ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उसे इस तरह के आदेश जारी करने का कोई अधिकार नहीं है। खासकर तब, जब इस तरह के आदेश से किसी समुदाय विशेष के खिलाफ घृणा और असहिष्णुता पैदा हो सकती है।

क्या है मामला

इस पूरे मामले की शुरुआत साल 2012 में हुई। आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने अहमदिया को गैर-मुस्लिम घोषित करने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया था। वक्फ बोर्ड के इस फैसले को आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड के फैसले पर अंतरिम रोक लगा दी। बावजूद आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने इसी साल फरवरी में एक और प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि 26 मई, 2009 को जमीयत उलेमा द्वारा जारी किए फतवे को देखते हुए ‘कादियानी समुदाय’ को ‘काफिर’ घोषित किया जाता है। ये मुस्लिम नहीं हैं। बता दें कि अहमदिया मुस्लिमों को कादियानी भी कहा जाता है।

कौन हैं अहमदिया मुस्लिम

पंजाब के लुधियाना जिले के कादियान गाँव में मिर्जा गुलाम अहमद ने साल 1889 में अहमदिया समुदाय की शुरुआत की। मिर्जा गुलाम अहमद खुद को पैगंबर मोहम्‍मद का अनुयायी और अल्‍लाह की ओर से चुना गया मसीहा बताते थे। मिर्जा गुलाम अहमद ने इस्लाम के अंदर पुनरुत्थान की शुरूआत की थी। इसे अहमदी आंदोलन और इससे जुड़े मुस्लिमों को अहमदिया बोला गया। अहमदिया मुस्लिम गुलाम अहमद को पैगंबर मोहम्मद के बाद का एक और पैगंबर या आखिरी पैगंबर मानते हैं। इसी कारण अन्य मुस्लिम उनका विरोध करते हैं। चूँकि गुलाम अहमद कादियान गाँव से थे। इसलिए अहमदिया मुस्लिमों को कादियानी भी कहा जाता है।

बांग्लादेश : कब्र से निकाल कर फेंका नवजात बच्ची का शव, अहमदियों को बताया ‘काफिर’

बांग्लादेश अहमदी काफिरबांग्लादेश में इस्लामिक कट्टरपंथियों का कहर केवल हिंदुओं पर नहीं बरसता बल्कि अन्य अल्पसंख्यक समुदाय भी वहाँ की बहुसंख्यक आबादी के अत्याचार का शिकार होते हैं। ताजा मामला अहमदी मुसलमानों से जुड़ा है। अहमदी मुसलमानों को बांग्लादेश के कट्टरपंथी काफिर ही मानते हैं। खबर है कि जुलाई 11 को कट्टरपंथियों ने एक नवजात बच्ची के शव को कब्र से बाहर निकालकर सिर्फ़ इसलिए फेंक दिया क्योंकि वह अहमदी समुदाय की थी।
घटना ब्राह्मणबारिया जिले के सदर उपजिला के घाटुरा की है। यहाँ सरकारी कब्रिस्तान में एक नवजात को अहमदियों ने उसकी मृत्यु के बाद दफनाया था। लेकिन कुछ ही घंटों बाद कट्टरपंथियों ने उसकी कब्र को वापस खोदा और शव को रोड किनारे फेंक आए।
इस घटना का मालूम चलते ही अहमदी नेताओं में रोष व्याप्त हो गया। उन्होंने इस घटना के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करना शुरू कर दिया और माँग उठाई कि आरोपितों के ख़िलाफ़ सख्त से सख्त कार्रवाई हो।
रिपोर्ट्स के अनुसार, जिस शिशु के शव के साथ कट्टरपंथियों ने ये अमानवीयता की, उसे स्वप्न बेगम नाम की महिला ने जुलाई 9 को क्रिश्चियन मेमोरियल अस्पताल में सुबह 5:30 बजे जन्म दिया था। लेकिन, हालत नाजुक होने के कारण बच्ची को इनक्यूबेटर में रखा गया। हालाँकि बच्ची बच नहीं पाई और उसी दिन 7 बजे उसने दम तोड़ दिया। इसके बाद उसे सरकारी कब्रिस्तान में दफन किया गया। जिस पर कट्टरपंथियों ने ‘काफिर’ बच्ची को मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाने पर आपत्ति जताई और कब्र खोदकर उसे रोड पर फेंक दिया।
मामले की सूचना पाते ही घटनास्थल पर पुलिस भी पहुँची और बच्ची के शव को वहाँ से 16 किमी दूर जाकर कांदिरपारा गाँव में 11:30 बजे दफनाया गया। इसके बाद ब्राह्मणबारिया जिले के ऑफिसर इंचार्ज मोहम्मद सलीम ने इस संबंध में जानकारी दी कि स्थानीयों से बात करने के बाद कांदिरपारा गाँव में अहमदिया समुदाय के कब्रिस्तान में शव को दफना दिया गया है। लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि कट्टरपंथियों पर क्या कार्रवाई हुई है।
बच्ची के पिता सैफुल इस्लाम इस संबंध में कहते हैं कि वह उन लोगों को नहीं पहचान सकते, जिन्होंने उनकी बेटी की कब्र खोदकर उसे रोड पर फेंका। लेकिन अहमदिया मुस्लिम जमात की स्थानीय इकाई अध्यक्ष एसएम इब्राहिम लगातार अलग-अलग मस्जिदों के मौलवियों को इसके लिए जिम्मेदार बता रहे हैं। उनका आरोप है कि ये मौलवी गैर-अहमदियों को भड़काते हैं।
जबकि, आरोपों के बाद एक मुनीर हुसैन नामक मौलवी का कहना है कि इलाके के मुसलमानों ने बच्ची के माता-पिता के फैसले पर आपत्ति जताई थी कि वह मुस्लिम कब्रगाह में उसका शव न दफनाएँ। मौलवी के अनुसार, “ये शरिया के ख़िलाफ़ है कि मुस्लिम कब्रगाह में कोई काफिर दफनाया जाए। गाँव में अभी तक कट्टर मुस्लिमों ने ऐसा कभी नहीं होने दिया।”
बांग्लादेश में अहमदियों का शोषण लंबे समय से चला आ रहा है। उनकी गलती बस ये है कि वह पैगंबर को अपने मजहब का संस्थापक मानते हैं। जिसके कारण बांग्लादेश में अभी तक करीब 1 लाख अहमदियों पर हमला हो चुका है।
हाल की बात है जब मजहबी उलेमाओं ने प्रशासन को इसलिए धमकाया था कि वे अहमदियों को गैर मुस्लिम घोषित करें। इसके अतिरिक्त साल 2015 में अहमदी के मस्जिदों पर हमला भी हुआ था। इससे पहले 1999 में भी अहमदियों के मस्जिद को निशाना बनाया गया था।