बिहार की नवनिर्वाचित बिहार विधानसभा में शिक्षा मंत्री बनाए गए मेवा लाल ने इस्तीफा दे दिया है।दरअसल मेवा लाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप हैं। यानि भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वच्छ प्रशासन के लिए हुए मतदान में भ्रष्टाचारी को ही जितवाने का मतलब है कि जनता ही भ्रष्टाचार को दूर नहीं करना चाहती। दूसरे, यह कि जब राजनितिक पार्टियां भ्रष्टाचार दूर करने की बात करती हैं, फिर क्यों एक भ्रष्टाचारी को टिकट दिया? यानि खुद भी खाओ, पार्टी को भी खिलाओ और जनता को पागल बनाओ।
Bihar Minister Ashok Chaudhary given additional charge of the education department, following the resignation of Mewa Lal Choudhary over corruption allegations https://t.co/CizDvwECFM
— ANI (@ANI) November 19, 2020
आप सभी प्रदेशवासियों के आशीर्वाद से आज सुबह विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग, भवन निर्माण विभाग, समाज कल्याण विभाग एवं अल्पसंख्यक कल्याण विभाग का कार्यभार ग्रहण किया।
— Dr. Ashok Choudhary (@AshokChoudhaary) November 19, 2020
मैं अपने बिहार के लोगों को विश्वास दिलाता हूं कि आपके विकास एवं कल्याण हेतु पूर्ण समर्पण के साथ काम करूंगा। pic.twitter.com/IH2E2RkGDS
आप कांग्रेस में थे तब भी यही विश्वाश दिलाया करते थे यहां भी वही कर रहे हैं वहा भी यही करते थे कोई बदलाव नहीं बदला है तो सिर्फ पार्टी आचरण तो वही है।
— news (@newsriprot) November 19, 2020
Abhi toh shuru kiya tha, 2 din me ghapla kar diya bc.
— छावा (@spartan2point0) November 19, 2020
This Govt will Go Very Soon @BJPforBihar @NitishKumar
— श्रीपाद धोंड (@sripad3) November 19, 2020
नीतीश कुमार के नेतृत्व में बनी एनडीए सरकार में मेवा लाल को शिक्षा मंत्री बनाया गया था जिसके बाद से ही उन पर लगे अनियमित्ताओं के आरोपों को नए सिरे से हवा मिल रही थी। जिस नेता को करप्शन के मामले में खुद नीतीश ने पार्टी से हटाया था, उसे सीधा मंत्री कैसे बना दिया था जबकि उस मामले की जांच जारी थी।शायद यही वजह है कि मेवा लाल पर इस्तीफे का दवाब बना और उन्होंने मंत्रीपद से इस्तीफा दे दिया है।बताया जा रहा है कि मेवा लाल मुख्यमंत्री आवास पर पहुंचे थे और फिर वहां से एक चिट्ठी राजभवन पहुंच गई है जिसमें मेवा लाल का इस्तीफा पत्र है।
बिहार के कृषि विश्वविद्यालय में लगभग 160 सहायक प्राध्यापक और कनीय वैज्ञानिकों की नियुक्ति में अनियमित्ताओं की शिकायत के बाद जांच की गई तो पता चला कि वहां के तत्कालीन कुलपति और मेवालाल चौधरी की मिलीभगत से धांधली हुई और पास अभ्यर्थिर्यो को फेल कर वेबसाइट पर रिजल्ट जारी कर दिया था। जानकारी के मुताबिक विश्वविद्यालय से बहाली से जुड़े कागजात भी गायब कर दिए गए थे। मामले सामने आने के बाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज ने मामले की जांच की। राजभवन के निर्देश पर फरवरी, 2017 में पूर्व कुलपति के खिलाफ सबौर थाना में केस दर्ज किया गया था। इस मामले में पूर्व कुलपति से एसआईटी ने भी पूछताछ की जिसके बाद वो अंडरग्राउंड हो गए। बाद में पता चला कि उन्होंने हाइकोर्ट से बेल भी ले लिया।

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