हमने छठ पर भी संयम रखा, लेकिन दिल्ली को बार-बार बंधक बनाया जा रहा: राष्ट्रपति कोविंद को कपिल मिश्रा का पत्र

साल 2020 की शुरुआत से ही राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हालात किसी से छिपे नहीं हैं। पहले शाहीन बाग का प्रदर्शन, फिर उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगे, बाद में कोरोना की मार और अब किसान आंदोलन, दिल्ली की सड़कें यहाँ के निवासियों के लिए आए दिन असुविधा पैदा कर रही हैं।

ऐसे में भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है। पत्र में उन्होंने राष्ट्रपति से गुहार लगाई है कि दिल्लीवासियों को बार-बार बंधक बनाया जाना अब बंद हो और यहाँ की सड़कें खोली जाएँ।

कपिल मिश्रा के इस कदम का कहीं समर्थन कहीं विरोध :

भाजपा नेता ने इस पत्र को दिल्ली के लोगों की ओर से लिखने का दावा किया है। इसमें उन्होंने कहा है कि वह अत्यंत असहाय होकर इस पत्र को एक आशा की किरण के रूप में लिख रहे हैं। उन्होंने राष्ट्रपति से कहा है कि दिल्ली के निवासी देश की राजधानी के नागरिक होने के बावजूद अपने मूल अधिकारों से वंचित हो रहे हैं। यहाँ बार-बार उनसे दफ्तर जाने, दुकान खोलने, इलाज के लिए अस्पताल जाने, जैसे साधारण अधिकार छीने जा रहे हैं। 

पत्र में कपिल मिश्रा ने दिल्ली की वास्तविक स्थिति पर गौर करवाते हुए कहा कि कोरोना महामारी से बचने के लिए दूरी बनाना और भीड़भाड़ को एकत्रित न होने देना बेहद जरूरी है, लेकिन यहाँ इसका सरेआम उल्लंघन चल रहा है।

उन्होंने लिखा कि दिल्ली में स्थिति पहली बार ऐसी नहीं हुई है, बल्कि यहाँ बार-बार ऐसा हो रहा है। साल की शुरुआत में दिल्ली को जगह-जगह शाहीन बाग आंदोलन के नाम पर बंधक बनाया गया और राजधानी में नफरत व हिंसा का माहौल बनाया गया। बाद में स्वंय उच्चतम न्यायालय ने भी इस प्रकार सड़कों को बंद करने को गैर कानूनी घोषित किया। लेकिन, अब पिछले दिनों से कई राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता दिल्ली को दोबारा बंधक बना रहे हैं, जिससे दिल्ली वासियों की बुनियादी जरूरतें प्रभावित हो रही हैं।

कपिल मिश्रा ने कोरोना महामारी में दिल्ली की स्थिति पर चिंता जाहिर की और राष्ट्रपति को बताया कि यहाँ लगातार सरकार व कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करके बुजुर्ग माता-पिता और छोटे-छोटे बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।

उन्होंने राष्ट्रपति से कहा कि दिल्ली वालों ने बहुत संयम का परिचय दे दिया। सरकारी निर्देशों को मानते हुए छठ के त्योहार तक को सार्वजनिक तौर पर नहीं मनाया। मगर, आज दिल्ली वालों को चारों ओर से बंद कर दिया गया है। शहर में बिना टेस्टिंग के भीड़ की इकट्ठा हो रही है और दिल्ली सरकार पोस्टर, बैनर, होर्डिंग लगाकर लोगों को दिल्ली में बुला रही है।

पत्र में उन्होंने कहा है कि दिल्ली वासियों का जीवन भी उतना ही महत्व रखता है, जितना अन्य राज्य के लोगों की जिंदगी। यहाँ के नागरिकों के मूल अधिकारों को भी अन्य राज्यों के लोगों की तरह संविधान का संरक्षण प्राप्त है। लिहाजा दिल्ली वासियों की जिंदगी को इस प्रकार मौत के मुँह में बार-बार फेंके जाने के ख़िलाफ ठोस व निर्णायक निर्णय लिए जाएँ। साथ ही राजनीति के लिए करोड़ों लोगों की जिंदगी से ख़िलवाड़ न किया जाए।

कड़वा सच : ये किसान नहीं दलालों का जमावड़ा है 

आये दिन हमेशा से सुनते आ रहे हैं कि हर प्रांत का किसान कर्जे से आत्महत्या कर लेता है। उसके लिए किसान को आंदोलन करना चाहिए था। और अब जो आंदोलन हो रहा है, उसमे तथाकथित किसानों की बात भी ध्यानपूर्वक सुननी चाहिए, वह है "हम 6 महीने का राशन साथ लाए हैं।" यह इस बात को भी सिद्ध करती है कि किसान भूखा नहीं मर रहा था, दलालों की वजह से कर्जे में डूब कर आत्महत्या करने को विवश होता है।

निम्न दोनों ट्वीट बहुत कुछ किसानों की आर्थिक स्थिति को उजागर कर रहे हैं:-

लेकिन इस नये कानून पर इतनी हायतौबा विपक्षी दलों के बहकावे मे हो रही है। सबसे पहले और सबसे कीमती तो किसानों की जिंदगी है। कोई भी पार्टी हो और किसी भी राज्य की सरकार हो अगर गरीब किसान किसी राज्य मे दुखी होकर आत्महत्या कर रहा है तो सभी राज्यों की सरकारें गुनहगार हैं।

इसके लिए ये सब दल और नेता क्यों कभी कोई बड़ा आंदोलन नहीं करते? क्योंकि ऐसे मे सभी कटघरे मे खड़े होंगे।

लेकिन इस कृषि कानून पर सिर्फ राजनैतिक रोटियां सेकी जा रही है, अपने अपने एजेंडे के अनुरूप अगर आज सारी पार्टियों को इतनी चिंता और दर्द है किसानों का तो उनको कर्जे लेने की क्या जरूरत?

सब सरकारें किसानों को इतना सक्षम क्यों नहीं बनाती कि उनको कर्ज तले दबना न पड़े।

लेकिन आज इस कृषि क़ानून ने दलालों, बिचौलियों और किसानों के शोषको की दुखती रग पर हाथ रख दिया जिससे किसान कर्जदार होता था। और ये हंगामा मचाने वाले यही चाहते हैं कि किसान उसी हाल मे रहे जैसा था मेहनत वो करे मलाई ये लोग खायें ।

ये किसानों के हमदर्द नहीं सब अपने स्वार्थों के लिए हंगामा कर रहे हैं और सरल भाषा में कहा जाए तो किसानों को बरगला रहे हैं ।

पोस्ट मार्टम तथाकथित किसान आंदोलन का

1― बीज खरीदने के लिए सब्सिडी।

2― कृषि उपकरण खरीदने के लिए सब्सिडी

3― यूरिया (खाद) खरीदने के लिए सब्सिडी

4― ट्रेक्टर ट्रोली खरीदने पर सब्सिडी

5― पशुधन खरीदने पर सब्सिडी

6― खेती पर लगने वाले अन्य खर्च के लिए सब्सिडी युक्त कर्ज

7― किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज

8― जैविक खेती करने पर सब्सिडी

9― खेत में डिग्गी बनाने हेतू सब्सिडी

10― फसल प्रदर्शन हेतू सब्सिडी

11― फसल का बीमा

12― सिंचाई पाईप लाईन हेतू सब्सिडी

13― स्वचालित कृषि पद्धति अपनाने वाले किसानों को सब्सिडी

14― जैव उर्वरक खरीदने पर सब्सिडी

15― नई तरह की खेती करने वालो को फ्री प्रशिक्षण

16― कृषि विषय पर पढ़ने वाले बच्चों को अनुदान

17― सोलर एनर्जी के लिए सब्सिडी

18― बागवानी के लिए सब्सिडी

19― पंप चलाने हेतु डीजल में सब्सिडी

20― खेतो में बिजली उपयोग पर सब्सिडी

इसके अलावा

21― सूखा आए तो मुआवजा।

22― बाढ़ आए तो मुआवजा।

23― टिड्डी-कीट जैसे आपदा पर मुआवजा।

24― सरकार बदलते ही सभी तरह के कर्ज माफी।

25― सरकार ने किसानों को आत्मनिर्भर व सशक्त बनाने के लिए अनेकों और तरह की योजनाएं बनाई है, जिसमें डेयरी उत्पाद मत्स्य पालन बागवानी फल व सब्जी पर भी अनेकों प्रकार की सब्सिडी दे रही है।

और इसके अलावा

26― इन्हीं से 20 रुपए किलो गेहूं खरीद कर 2 रुपए किलो में इन्हें दिया जा रहा है।

27― पक्के मकान बनाने के लिए 3 लाख रुपए तक सब्सिडी दी जा रही है।

28― शौचालय निर्माण फ्री में किया जा रहा है।

29― घर पर गंदा पानी की निकासी के लिए होद फ्री में बनवाई जा रही है।

30― साफ पीने का पानी फ्री में दिया जा रहा है।

31― बच्चों को पढ़ने खेलने व अन्य तरह के प्रशिक्षण फ्री में करवाए जा रहे हैं।

32― साल के 6000 रुपए खाते में फ्री में आ रहे हैं।

33― तरह-तरह की पेंशन वगैरा आ रही है।

34― मनरेगा में बिना कार्य किए रुपए दिए जा रहे हैं।

अगर उसके बावजूद भी इस देश के किसानों को सरकार से अपना हक नहीं मिल रहा तो शायद कभी नहीं मिलेगा।

एक निगाह उन मजदूरों, छोटे रेहड़ी वालों, छोटे व्यवसायियों, वकीलों, पढ़े-लिखे बेरोजगारों, ड्राईवरों, कचरा बीन कर पेट पालने वालों पर डालो।

रोज नई नई समस्या से जूझते हैं, रोज रोज मरते हैं परन्तु कभी भीड़ इकट्ठी कर देश के कानून को बंधक नहीं बनाते हैं।

किसान नित अपनी कमजोरी के लिए दूसरों पर आश्रित नहीं होते अपनी कमजोरी का रोना रोकर दूसरों के हक नहीं लेते देश की सरकारों से ब्लैकमेलिंग नहीं करते।

सबसे अधिक गेहूँ कहाँ उगता है ? - पंजाब में । 

सबसे अधिक गेहूं कौन खरीदता है ? - FCI 

FCI किससे खरीदता है ? - बड़े बड़े आड़तियों से । 

पंजाब की सबसे बड़ी आड़ती कंपनी कौन है ? - सुखविंदर एग्रो  

सुखविंदर एग्रो किसकी कंपनी है ?- हरप्रीत बादल की। 

सबसे अधिक गेहूं कहाँ सड़ता है ?- FCI के गोडाउन में ।

सड़ा हुआ गेहूं कहाँ काम आता है ? - सड़ा हुआ गेहूँ शराब बनाने में काम आता है । 

सड़ा गेहूँ कौन बेचता है और वह भी सबसे कम दाम पर ? - FCI बेचता है ।

सबसे अधिक शराब की खपत कहाँ होती है ? - पंजाब में । 

हमेशा "खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय" किसके पास रहता है ? - हरप्रीत बादल के पास रहता है। 

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