तालिबान की वापसी के साथ ही अफगानी महिलाओं के दमन का दौर भी लौटा (प्रतीकात्मक तस्वीर, साभार: इंडिया टुडे)
अफगानिस्तान में तालिबान का शासन स्थापित होने के बाद से हालात अस्थिर हो चुके हैं। काबुल एयरपोर्ट पर देश छोड़ने के लिए आतुर लोगों की भीड़ लगी है। इस बीच औरतों खासकर कम उम्र की लड़कियों में एक अलग तरह का डर देखने को मिल रहा है। मीडिया से कई ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जिनसे पता चलता है कि तालिबानी शासन में औरतों पर नए तरह का खतरा मंडरा रहा है।
अफगानिस्तान में कई जगहों पर ब्यूटी पार्लर और शोरूम्स में लगे महिलाओं के पोस्टर को हटाया जा रहा है। साथ ही महिलाओं की तस्वीरों को हटाने के लिए उन पर सफेद रंग चढ़ाया जा रहा है।
भारत में तीन तलाक पर इस्लाम में महिलाओं के लिए बेहतर अधिकारों की दुहाई देने वाले अब क्यों चुप हैं? महिलाओं के विरुद्ध तालिबान की हरकतों की क्या इस्लाम इजाजत देता है?
Taliban erasing women. Women won't be seen anywhere. They would stay at home as sex slaves and child bearing machines. Islam is a religion of misogyny. pic.twitter.com/vZpvkE0UYw
— taslima nasreen (@taslimanasreen) August 17, 2021
@BDUTT
— 48 Islamic country take afgan refugee (@Abhijjit2) August 17, 2021
Without bloodshed
Our heart is coming out.https://t.co/bu7bSiJoOb
— Amit lamba (@amitkumarlamba4) August 17, 2021
‘I’m waiting for Taliban to come for people like me and kill me’ https://t.co/3Se2GhdvYL
— i newspaper (@theipaper) August 16, 2021
अफगानिस्तान की पहली महिला मेयर जरीफा गफारी, जो कि सबसे युवा मेयर भी हैं, कहती हैं कि वो उनके (तालिबान) आने की प्रतीक्षा कर रही हैं। गफारी ने कहा कि उनकी और उनके परिवार की सहायता करने के लिए कोई नहीं है, वो अपने परिवार के साथ हैं और उन्हें पता है कि तालिबानी आएँगे और उन्हें मार देंगे। गफारी ने एक अंतरराष्ट्रीय अख़बार को इंटरव्यू देते हुए कुछ हफ़्तों पहले यह संभावना जताई थी कि उनके देश का भविष्य सुनहरा है। लेकिन रविवार (15 अगस्त 2021) को उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया।
गफारी की तरह ही अफगानिस्तान की राष्ट्रीय महिला फुटबॉल टीम की पूर्व कप्तान खालिदा पोपल ने द एसोसिएटेड प्रेस को टेलीफोनिक इंटरव्यू में बताया कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से वे अपनी फोटो हटा रही हैं। उन्होंने बताया कि टीम की बाकी सदस्यों को भी अब जान का खतरा हो चुका है। उन्होंने टीम की सदस्यों से कहा है कि वे अपने घर छोड़कर भाग जाएँ और अपने इतिहास को मिटाने की कोशिश करें। पोपल ने बताया कि उन्होंने कभी तालिबान का विरोध ही औरतों के लिए किया था। लेकिन अब इस्लामिक एमिरेट ऑफ अफगानिस्तान की स्थापना के बाद अपनी जान बचानी पड़ रही है और इसका एक ही रास्ता है, घर से भागना और अपनी पहचान को छिपा लेना।
हालाँकि पोपल और उनकी महिला टीम की बाकी सदस्य फिलहाल अपनी सुरक्षा की कोशिशें कर पा रही हैं। लेकिन सैकड़ों ऐसी महिलाएँ हैं जो रातों-रात गायब हो चुकी हैं। दिल्ली में रह रहे एक अफगानी नागरिक ने मीडिया से चर्चा करते हुए बताया कि अफगानी सेनाओं और तालिबान के बीच संघर्ष के चलते सैकड़ों महिलाओं ने राजधानी काबुल के शहर-ए-नाव पार्क में शरण ली थी। लेकिन अब ये औरतें गायब हैं और उनके परिवार उनकी तलाश कर रहे हैं। उस अफगानी नागरिक ने कहा कि वह पूरी जिम्मेदारी के साथ यह जानकारी दे रहा है और यही हालात पूरे अफगानिस्तान में है।
चंडीगढ़ में पिछले 4 सालों से रह रही परवाना हुसैनी अफगानिस्तान के बामियान शहर की रहने वाली हैं। उन्होंने बताया कि पिछले 4-5 सालों से महिलाओं को बाहर निकलने की आजादी मिली थी। लेकिन तालिबान के शासन और शरिया कानून लागू होने के बाद उनके जैसी लड़कियाँ अब घर के बाहर भी नहीं निकल पाएँगी। परवाना ने बताया कि तालिबान अब महिलाओं का उनके घर से अपहरण कर रहा है। पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले एक अन्य अफगानी ने बताया कि महिलाओं का अपहरण करना उनके (तालिबान) लिए सामान्य है और अब अफगानिस्तान उसके अपने लोगों के लिए एक खतरनाक जगह बन चुका है।
इससे पहले द सन की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि तालिबान घर-घर जाकर लड़कियों को उठा रहा है ताकि उन्हें ‘सेक्स गुलाम (स्लेव)’ बनाया जा सके। जुलाई महीने में ही एक खबर आई थी कि तालिबान के सांस्कृतिक आयोग के नाम पर ग्रामीणों को चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें कहा गया था कि वो अपनी बेटियों और बेवा (विधवा) का निकाह तालिबानियों के साथ करें। पत्र में कहा गया था कि उनके कब्जे वाले सभी क्षेत्रों के इमामों और मौलवियों को आदेशित किया जाता है कि वे 15 साल से अधिक उम्र की लड़कियों और 45 वर्ष से कम उम्र की बेवा महिलाओं की सूची जारी करें, जिनका निकाह तालिबानियों के साथ किया जा सके।
तालिबान 90 हजार पुराने हथियार, अफगान सेना 3 लाख आधुनिक हथियार। उनकी 3 लाख की सेना कहां गायब हो गई।
इसके बावजूद एक माह में तालिबान ने पूरे अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया कैसे ??
जब 2002 में अमेरिका ने अफगानिस्तान से तालिबानी सरकार को उखाड़ कर नई सरकार स्थापित की थी तब सारे तालिबानी कहां गायब हो गए थे।
वे गायब नही हुए थे उन्होंने अपनी इस्लामिक सोच का पूरा फायदा उठाया था। सिर्फ उनके कुछ टॉप लीडर्स गायब हुए बाकी वही तालिबानी अधिकतर संख्या में अफगानिस्तान की नई सेना में भर्ती होते गए और अमेरिका को मूर्ख बनाते रहे। माल भी खाते रहे मजे भी लेते रहे और नाम से सिर्फ अमेरिकी सरकार के अधीन रहे असल में थे वे तालिबान ही।
ट्रंप यह सब कुछ समझ चुके थे ,मोदीजी भी यह सब समझते थे। इसीलिए ट्रंप ने अफगानिस्तान छोड़ने की योजना बना ली थी ...क्योंकि अमेरिका बेकार में धन बरबाद कर रहा था। इसीलिए मोदीजी ने भी समझदारी से काम लेकर भारत का कोई सैनिक दखल अंदाजी का रिस्क नहीं किया।
क्योंकि इस्लाम कुछ सिखाए या ना सिखाए यह जरूर सिखाता है की चालें कैसे खेली जाए। पाकिस्तान भी इन्ही चालों से कई दशकों तक अमेरिका का धन खाता रहा और अब चीन को मूर्ख बना रहा है।
अब जैसे ही अमेरिका ने अपनी सेना को अफगानिस्तान से बाहर निकाला एक माह के अंदर अफगानिस्तान की नई तीन लाख की सेना ने तालिबान का कोई मुकाबला नहीं किया जबकि उनके पास आधुनिक हथियार और वायुसेना भी थी। वे थोड़ा बहुत दिखावटी विरोध करते रहे और तालिबान एक के बाद एक शहर को कब्जे में करता रहा।
सिखों के गुरु गोविंद सिंह जी ने कहा था कि अगर कोई मुस्लिम तेल में अपने हाथ डूबो कर फिर तिल की बोरी में डाल दे जितने तिल उसके हाथ पर चिपक जाएं अगर कोई मुस्लिम उतनी बार भी कसम खा ले उसका विश्वास मत करो।
लेकिन हमारे यहां के तथाकथित सेकुलर और मैकाले बुद्धि के लोगों को पता नही कब समझ आएगी। क्योंकि इस्लामिक विचारधारा है ही ऐसी।
ये लोग सौ साल तक आपकी सेवा कर लेंगे लेकिन उद्देश्य एक ही कि कब मौका मिले और आपकी राम नाम सत्य कर दें।
यही #सद्दाम_हुसैन के समय इराक में भी हुआ था, अमेरिका के एक आक्रमण के साथ ही वहां की सारी सेना गायब हो गई ! अमेरिका ने वहां एक कठपुतली सरकार स्थापित की लेकिन बाद में वही सेना ISIS के रूप में सामने खड़ी हो गई थी।
क्योंकि इस्लाम के लोग सिर्फ कुरान और अपने पैगम्बर से ऊपर किसी को नही मानते।
ये वही करेंगे जो कुरान में लिखा है। चाहे इनको हजारों साल का इंतजार करना पड़े।
इसी समस्या का सामना मोदीजी को करना पड़ रहा है, सत्तर सालों से भारत की ब्यूरोक्रेसी, अफसरशाही , नयापालिका और लगभग हर संस्थान , सिनेमा चाहे मीडिया सब में कम्युनिस्ट, भ्रष्ट, इस्लामिक, चर्च के लोगों का कब्जा है। इनमे बहुत ही कम राष्ट्रीय विचारधारा के लोग है।
और ये लोग शांति से मकरे बन कर व्यवस्था में बैठे हुए हैं। आईएएस लॉबी अस्सी प्रतिशत इन्ही लोगों की है।
इसीलिए अगर भारत में राष्ट्रवादी व्यवस्था कायम करनी है तो कम से कम दस साल और राष्ट्रवादी लोगो का शासन कायम रहना चाहिए।
2014 तक सरकारी नौकरी करने वाले लोगों के बीच लेन देन की बातें खुले आम होती थी और इस बात को इज्जत से देखा जाता था कि फलां अफसर इतनी कमीशन लेता है। यह व्यवस्था बदलते समय लगेगा।
नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला पश्तो हैं
जब धारा 370 हटा तब मलाला का कहना था कि लड़कियाँ स्कूल नहीं जा पाएँगी। आज उनकी पश्तो लड़कियों का बलात्कार हो रहा है, तालिबानी आतंकियों से ज़बरन उनका विवाह किया जा रहा है। तब मलाला को कोई मलाल ही नहीं है।
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