कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा को याद है गुजरात दंगे नहीं याद है गोधरा कांड

कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने स्क्रॉल के लिए एक लेख लिखा है। लेख से बेहतर इसे वैचारिक टट्टी कहना सही होगा, जिसके लिए गुहा जाने जाते हैं। इसमें उन्होंने बताया है कि साल 2022 में अरबिंदो घोष की 150वीं पुण्यतिथि, असहयोग आंदोलन के 100 वर्ष, भारत छोड़ो आंदोलन की 80वीं सालगिरह, भारतीय स्वतंत्रता के 75 साल, पहले आम चुनाव के 70 साल और भारत-चीन युद्ध के 60 वर्ष पूरे होंगे। गुहा ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन सभी मौकों को उत्सव की तरह मनाएँगे और हर कार्यक्रम में अपने व्यक्तित्व को प्रमोट करेंगे।

मोदी पर तंज कसने के साथ ही लेख के तीसरे पैराग्राफ में गुहा ने गोधरा कांड को याद किया और बताया कि गुजरात में हुए दंगों को 20 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन गुहा ने अपने लेख में जो एक विशेष ध्यान दिया है वो शब्द चुनाव का है। अपने इस लेख में उन्होंने  ‘Pogrom’ शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि जो कुछ भी 2002 में हुआ वो असल में Pogrom था यानी एक समुदाय को विशेष तौर पर बनाया गया निशाना।

गुहा के इस ‘एक समुदाय’ में जाहिर है पीड़ित के तौर पर सिर्फ मुस्लिम आते हैं, क्योंकि इसके अलावा अगर कोई और समुदाय भी आता तो गुहा को गुजरात दंगों के साथ कारसेवकों को जिंदा जलाए जाने की बर्बरता याद आती। हालाँकि, लेख में ऐसा कहीं कुछ नहीं है। अगर है तो वो उस गोधरा कांड को जस्टिफाई करने की कोशिश है जिसे 1984 में हुए सिख नरसंहार से जोड़कर बताया गया है।

27 फरवरी पूरे देश के लिए तारीख ही नहीं बल्कि इस तारीख का हमारे देश के अतीत से काला रिश्ता है। ये वो तारीख है जिस पर चढ़ी धूल की परत वक्त गुजरने के साथ साथ और मोटी होती चली गई। हमारे देश के मीडिया का एक बड़ा तबका आज खुद को बहुत ही जागरूक, निष्पक्ष और जिम्मेदार मानता है। लेकिन अफसोस की बात ये है कि इस तारीख में छुपी तकलीफ को दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाने का समय शायद किसी भी न्यूज़ चैनल या अखबार को पिछले 20 वर्षों में नहीं मिला। हम गोधरा की बात कर रहे हैं, जहां 27 फरवरी 2002 को आधुनिक भारत के इतिहास का काला अध्याय लिखा गया था। इस दिन हमारे स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष देश में सुबह 7:43 पर गुजरात के गोधरा स्टेशन पर 23 पुरुष और 15 महिलाओं और 20 बच्चों सहित 58 लोग साबरमती एक्सप्रेस के कोच नंबर S6 में जिंदा जला दिए गए थे। उन लोगों को बचाने की कोशिश करने वाला एक व्यक्ति भी 2 दिनों के बाद मौत की नींद सो गया था।

अयोध्या से वापस लौट रही थी श्रद्धालुओं से भरी ट्रेन
अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद की तरफ से फरवरी 2002 में पूर्णाहुति महायज्ञ का आयोजन किया गया था। देश के विभिन्न कोने से बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहां गए थे। 25 फरवरी 2002 को अहमदाबाद जाने वाली साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में करीब 1700 तीर्थयात्री और कारसेवक सवार हुए थे। ट्रेन 27 फरवरी की सुबह 7 बजकर 43 मिनट पर गोधरा स्टेशन पहुंची। जैसे ही ट्रेन रवाना होने लगी, चेन पुलिंग की वजह से सिग्नल के पास ट्रेन रुक गई। और फिर बड़ी संख्या में भीड़ ने आगजनी की घटना को अंजाम दिया। 

अक्सर  गुजरात दंगों की बात गोधरा कांड पर आकर रुक जाती है यह दलील दी जाती है कि गुजरात दंगे, गोधरा कांड में किए क्रिया की प्रतिक्रिया थी। लेकिन कभी भी इन दोनों घटनाओं को न्याय की एक ही कसौटी पर रखकर नहीं तौला जाता। गोधरा कांड का इंसाफ आज भी अधूरा है। जिसमें 59 लोगों की चीखें छिपी है जिसकी गूंज आज तक किसी नेता के कान तक नहीं पहुंची और ना ही मानवता की दुहाई देने वाले मीडिया को कभी सुनाई थी। मामले पर 2011 में निचली अदालत का फैसला भी आया जिसमें 11 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। जबकि 20 लोगों को उम्र कैद की सजा हुई। लेकिन गोधरा कांड के ठीक 1 दिन बाद से गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति हमेशा के बदल गई।
एसआईटी रिपोर्ट
उसी दिन शाम को गुजरात के मुख्यमंत्री निवास पर बैठक हुई जिसमें नरेंद्र मोदी पर शामिल हुए। इस मीटिंग को लेकर पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट ने दावा किया था कि मोदी ने हिंदुओं की प्रतिक्रिया होने देने की बात कही थी। लेकिन एसआईटी ने संजीव भट्ट के आरोपों को गलत माना और कहा कि वह 27 तारीख की उस मीटिंग में मौजूद ही नहीं थे। एसआईटी ने कहा वह (संजीव भट्ट) तथ्यों को घुमा फिरा रहे हैं और मीडिया को बरगलाने की साजिश रच कर ना सिर्फ एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन बल्कि सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं।
कारसेवकों के शवों को गोधरा से अहमदाबाद लाने का फैसला हुआ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने इसका विरोध किया था। द नमो स्टोरी के लेखक के अनुसार मोदी सरकार के मंत्री हरेन पांड्या ने भी इसका विरोध किया था। 2003 में  पांड्या की हत्या कर दी गई थी। इसके लिए उनके पिता ने मोदी को दोषी ठहराया था। हालांकि सीबीआई ने जांच के बाद मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। शवों को गोधरा स्टेशन से अहमदाबाद लाया गया और विहिप को सौंपा गया। उस वक्त शहर में कर्फ्यू नहीं लगा था और जल्दी हैं अहमदाबाद में दंगे फैल गए।
गोधरा कांड के बाद पूरे गुजरात में हुआ दंगा
गोधरा की घटना में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इस घटना के बाज पूरे गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी और जान-माल का भारी नुकसान हुआ। हालात इस कदर बिगड़े कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जनता से शांति की अपील करनी पड़ी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दंगों में 1200 लोगों की मौत हुई थी।

नानावटी आयोग की 15 सौ पन्नों की रिपोर्ट 
27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों को जलाने की घटना के प्रतिक्रियास्वरूप समूचे गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। इसकी जांच के लिए तीन मार्च 2002 को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति जीटी नानावती की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। न्यायमूर्ति केजी शाह आयोग के दूसरे सदस्य थे। शुरू में आयोग को साबरमती एक्सप्रेस में आगजनी से जुड़े तथ्य और घटनाओं की जांच का काम सौंपा गया। लेकिन जून 2002 में आयोग को गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा की भी जांच करने के लिए कहा गया। आयोग ने दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी, उनके कैबिनेट सहयोगियों व वरिष्ठ अफसरों की भूमिका की भी जांच की। आयोग ने सितंबर 2008 में गोधरा कांड पर अपनी प्राथमिक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी गई थी। उस समय आयोग ने साबरमती एक्सप्रेस की बोगी संख्या-छह में आग लगाने को सुनियोजित साजिश का परिणाम बताया था। 2009 में जस्टिस शाह के निधन के बाद अक्षय मेहता को सदस्य बनाया गया। आयोग ने 45 हजार शपथ पत्र व हजारों गवाहों के बयान के बाद करीब 15 सौ पेज की रिपोर्ट तैयार की। अब इस रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा गया। नानावटी कमीशन ने उन्हें क्लीन चिट दी और तमाम तरह के प्रोपोगैंडा जो न सिर्फ देश बल्कि पूरी दुनिया में फैलाए गए उसे सिरे से खारिज किया गया। इस रिपोर्ट में ये बताया गया कि वहां पर कोई भी ऐसा काम नहीं किया गया जो राज्य सरकार को नहीं करना चाहिए थे। 
सिलसिलेवार घटनाक्रम पर एक नजर..
27 फरवरी 2002 : गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में आग लगाने से 59 से अधिक कारसेवकों की मौत हुई थी। 
28 फरवरी 2002 : गुजरात के कई इलाकों में दंगा भड़कने से 1200 से अधिक लोग मारे गए।

03 मार्च 2002 : गोधरा ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया।

25 मार्च 2002 : केंद्र सरकार के दबाव की वजह से सभी आरोपियों पर से पोटा हटाया गया।

18 फरवरी 2003 : गुजरात में भाजपा सरकार के दोबारा चुने जाने पर आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया गया।
21 सितंबर : नवगठित संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और अरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया।
17 जनवरी 2005 : यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि गोधरा कांड महज एक ‘दुर्घटना’थी।
13 अक्टूबर 2006 : गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि यूसी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है, क्योंकि नानावटी-शाह आयोग पहले ही दंगे से जुड़े सभी मामले की जांच कर रहा है। 
26 मार्च 2008 : सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा कांड और फिर हुए दंगों से जुड़े आठ मामलों की जांच के लिए विशेष जांच आयोग बनाया।
18 सितंबर : नानावटी आयोग ने गोधरा कांड की जांच सौंपी। इसमें कहा गया कि यह पूर्व नियोजित षड्‍यंत्र था।
22 फरवरी : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, जबकि 63 अन्य को बरी किया।
1 मार्च 2011: विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई।

गोधरा कांड को छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस का महिमामंडन

इस दिशा में भी गुहा संतुलित नहीं हो पाए और गोधरा कांड व सिख नरसंहार के बूते कॉन्ग्रेस के छवि निर्माण में जुट गए। उन्होंने बताया कि कैसे सिख नरसंहार के बाद 1999 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनते ही सोनिया गाँधी ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में माफी माँगी थी और मनमोहन सिंह 2005 में प्रधानमंत्री बनाए गए थे। उनके अलावा जनरल जेजे सिंह पहले सिख आर्मी स्टाफ के चीफ बने थे और मोंटेक सिंह आहलूवालिया प्लॉनिंग कमीशन के डिप्टी चेयरमैन बनाए गए थे।
अब गुहा का इन बिंदुओं को समझाने का क्या अर्थ है? ये बात लेख मेंं आगे पता चलती है जब वो कहते हैं कि उन्होंने उस समय (यूपीए काल में) सिखों से बात की थी और उन्हें (सिखों) इस नेतृत्व में हुए बदलाव से ऐसा लगा था कि ये देश उनका है। वहीं गुजरात पर आते हुए उन्होंने कहा कि आज भी गुजरात के मुसलमान उतने ही डरे हुए है जितने वो 2002 में थे।
कॉन्ग्रेस काल से बीजेपी की तुलना करते हुए गुहा ने ये दिखाया कि देखो सोनिया गाँधी ने माफी माँगी लेकिन नरेंद्र मोदी ने गुजरात दंगों पर कोई बात तक नहीं की। या कह सकते हैं कि गुहा अपने उदाहरण इसलिए समझा रहे थे कि उनको चाहिए कि जैसे कॉन्ग्रेस ने सिखों का विश्वास जीतने के लिए उन्हें बड़े पद दिए। वैसे नरेंद्र मोदी की सरकार भी उस समुदाय के हाथ में नेतृत्व दे दे जिसे गुजरात दंगों के बाद डरा हुआ महसूस होता है।
गुहा के इस लेख को पढ़ते-पढ़ते आपको उनकी ये अनकही इच्छा और स्पष्ट हो जाएगी जब वो खुलकर कहते हैं कि मोदी काल में मुस्लिम प्रधानमंत्री आना मुश्किल ही है। उनके मुताबिक मुस्लिमों के साथ मोदी सरकार अभी लंबा भेदभाव करने वाली है और उनकी पार्टी से जुड़े संगठन तो मुस्लिमों को सड़क चलते ढूँढ-ढूँढकर परेशान करते ही हैं। गुहा की शिकायत है कि मोदी आज भी गुजरात दंगों के लिए मुस्लिमों से माफी नहीं माँगते और इसके पीछे की वजह वो आंशिक रूप से उनके घमंड को मानते हैं और ज्यादा जिम्मेदार वो उस राष्ट्रवाद के उनके आदर्शों को मानते हैं जो संविधान के बिलकुल विपरीत थे।

गुजरात दंगों में मोदी को क्लीन चिट

साल 2002 में 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर समुदाय विशेष के कुछ लोगों ने आग लगा दी थी, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में अधिकतर कार सेवक थे। इस घटना के बाद 28 फरवरी से 31 मार्च तक गुजरात में दंगे भड़के। जिसके कारण 1200 से अधिक लोग मारे गए थे और साथ ही 1500 लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। इस मामले पर जाँच के लिए नानावती आयोग गठित हुआ था। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट का पहला हिस्सा 2009 को विधानसभा में पेश किया। फिर अगली रिपोर्ट 18 नवंबर 2014 को दी गई और। साल 2019 में नानावती-मेहता आयोग की फाइनल रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई। इस अंतिम रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी पर लगे आरोपों से उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी। इस रिपोर्ट में साफ लिखा था गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी जलाए जाने के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा सुनियोजित नहीं थी। इसलिए, आयोग ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी है।

आपातकाल से लेकर कश्मीर पंडितों का नरसंहार…कौन माँगेगा माफी?

दिलचस्प और ध्यान देने वाली बात है ये है कि गुजरात दंगे जिसमें मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार को क्लीन चिट मिली हो और दूसरी ओर कारसेवकों को जलाए जाने की घटना को भी 20 वर्ष पूरे हो रहे हों, उस समय में गुहा के लिए चर्चा का विषय गुजरात दंगे इसलिए हैं क्योंकि निशाने पर मुस्लिम थे। वरना सोचिए उन कारसेवकों की गलती ही क्या थी जो आज उनका जिक्र भी लिबरल मीडिया, वामपंथी इतिहासकार करने से गुरेज करते हैं और ये दिखाते हैं कि साल 2002 में सीधे गुजरात दंगे हुए, जिसकी पृष्ठभूमि उनके हिसाब से कुछ थी ही नहीं। मोदी माफी माँगेगे या नहीं इस पर सवाल ये लोग आए दिन करते हैं लेकिन क्या इनसे नहीं पूछा जाना चाहिए कि जिस कॉन्ग्रेस का वो महिमामंडन करते नहीं थकते वो  1975 के आपातकाल के लिए कब माफी माँगेगे, कब कश्मीर में उपजे हालातों के लिए शर्मिंदा होंगे। सिख नरसंहार के लिए 14-15 साल बाद माफी माँगना क्या इस सवाल को खत्म कर देता है कि आखिर दिल्ली के बिगड़े हालातों पर कानून व्यवस्था क्यों विफल हुई थी।
ये पहली बार नहीं है कि गुजरात दंगों पर दुख मनाते हुए लिबरल गोधरा कांड को भूले हों। पिछले साल भी स्वरा भास्कर समेत कई लिबरलों ने गुजरात मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को घेरने का प्रयास किया था और हर साल की तरह इस साल भी वो इस्लामी बर्बरता पर पर्दा डालने का काम शुरू हो गया है जिसकी आग में 59 कारसेवक जलाकर मारे गए।

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