पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजे आने के कुछ घंटे बाद राज्य के कई इलाकों में भड़की राजनीतिक हिंसा में भाजपा कार्यकर्ता अभिजीत सरकार के अलावा कई हिंदू मारे गए थे। बंगाल में इस तरह के भयावह हालात पैदा हो गए थे कि वहाँ के हिन्दुओं और बीजेपी कार्यकर्ताओं को पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा था, लेकिन उस वक्त कोई भी लिबरल पत्रकार ममता सरकार के खिलाफ नहीं बोला, बल्कि इन लोगों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस का बचाव करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।
वहीं कुछ महीनों बाद ही गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले लिबरल पत्रकारों ने मुस्लिमों के मरने के बाद अपने सुर बदल लिए हैं। अब उन्हें पश्चिम बंगाल में ‘जंगलराज’ नजर आने लगा है। पश्चिम बंगाल के बीरभूम के रामपुरहाट में सत्ताधारी पार्टी के नेता भादू शेख की बम हमले में मौत के बाद TMC समर्थकों ने जमकर हिंसा मचाई। उपद्रवियों ने टीएमसी नेता की मौत का बदला लेने के लिए इलाके के कई घरों को आग के हवाले कर दिया, जिसमें कुल 12 लोगों के जलकर मरने का दावा किया जा रहा है। वहीं पुलिस मृतकों की संख्या 8 बता रही है। देखें लिबरल गिरोह के कुछ ट्वीट्स:
Appalling & gruesome the burning of kids, women & men in West Bengal absolutely sickening politics driving these murders
पत्रकार अभिजीत मजूमदार और राज्य विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी का दावा है कि बंगाल में एक हफ्ते में 26 राजनैतिक हत्याएँ हुई हैं। अब नई घटना में 12 लोगों को जिंदा जला दिया गया है। अभिजीत यह भी दावा करते हैं कि बंगाल अब जिहादी आतंक और कम्युनिस्ट युग के अपराधियों का अड्डा बन गया है, जहाँ हिंदुओं पर अत्याचार बढ़ता जा रहा है।
— Pratik Prasenjit | ପ୍ରତୀକ ପ୍ରସନ୍ନଜିତ (@pratikprasenjit) March 23, 2022
वहीं, तथाकथित बुद्धिजीवियों के पसंदीदा समाचार पत्र टेलीग्राफ की खबर/हैडिंग में इस बार कोई भी रचनात्मकता नहीं दिखी। यहाँ तक कि टेलीग्राफ ने तृणमूल का नाम तक लेना उचित नहीं समझा और, ‘Feud (कलह)’ पर ठीकरा फोड़ दिया। इसको लेकर सोशल मीडिया यूजर्स खासा नाराज नजर आ रहे हैं, उन्होंने टेलीग्राफ के पहले पेज को एडिट करके ट्विटर पर शेयर किया है।
बंगाल से छपने वाले समाचार पत्र ने ममता के शासनकाल में भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या, मजहबी दंगों और राज्य में हो रहे तमाम अपराधों हमेशा चुप्पी साधी है। ऐसे कई मौके हैं, जब इन्होंने अपनी बेहूदा हेडलाइन में मोदी सरकार और बीजेपी नेताओं को जानबूझकर अपना निशाना बनाया है। इनकी हेडलाइंस में केवल जातिवादी घृणा, हिन्दुओं से धार्मिक घृणा ही नजर आती है। बता दें कि बंगाल की घटना पर केंद्र ने उनसे 72 घंटे में जवाब माँगा है। NCPCR ने भी रिपोर्ट देने के लिए 3 दिन का समय दिया है।
योगी-मोदी विरोधी पत्रकारों को लगता है किसी भी करवट नींद नहीं आ रही। ये वही पत्रकार हैं जो हिन्दू होते हुए भी अयोध्या में राममंदिर के विरुद्ध जहर उगलने से नहीं कभी नहीं चुके, हमेशा छद्दम धर्म-निरपेक्षता की चादर ओढ़ सच्चाई को छुपाकर तुष्टिकरण की पत्रकारिता करते रहे और आज भी कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ किस क्षेत्र से चुनावी मैदान में उतरेंगे ये कुछ दिन पहले तक एक बहुत बड़ा सवाल बना हुआ था। कुछ लोग अयोध्या सीट को लेकर कयास लगा रहे थे कि संभव है कि वहाँ बीजेपी ने इतना काम करवाया है तो योगी आदित्यनाथ वहीं से अपनी किस्मत आजमाएँ। हालाँकि ऐसा नहीं हुआ और कल की घोषणा के साथ ये साफ हो गया कि योगी आदित्यनाथ अपनी पुरानी सीट गोरखपुर से ही चुनावी मैदान में उतरेंगे।
इस ऐलान के साथ जहाँ गोरखपुर के लोगों में उत्साह देखने को मिला। वहीं लिबरल धड़े की हिपोक्रेसी भी सामने आई। जो लोग कुछ दिन पहले लंबी-लंबी वीडियोज से आपको ये समझा रहे थे कि आखिर क्यों योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से भाग रहे हैं। वहीं अब उनकी रिपोर्ट हो रही है कि आखिर गोरखपुर से ही योगी आदित्यनाथ क्यों चुनाव लड़ेंगे। इस लिस्ट में अभिसार शर्मा और आशुतोष जैसे पत्रकारों का नाम है। लोग इनकी हिपोक्रेसी देखकर इन्हें ‘द%^ला यूट्यूबर’ कह रहे हैं। इनकी वीडियोज शेयर करके लिखा रहा जा रहा- ‘चित भी मेरी, पट भी मेरी और…’
अभिसार शर्मा जो पहले कह रहे थे कि बीजेपी अयोध्या से योगी को इसलिए चुनाव लड़वा रही है क्योंकि उन्हें लगता है कि जीत का रास्ता सिर्फ कट्टर हिंदुत्तव से ही होकर जाता है। वही अभिसार शर्मा बाद में अपने दर्शकों को ये समझाते नजर आए कि एक तो अयोध्या में समाजवादी पार्टी मजबूत हो रही है इसलिए योगी आदित्यनाथ यहाँ से चुनाव नहीं लड़ रहे और दूसरी बात ये है कि अयोध्या में पिछले दिनों जितने भी कार्यक्रम हुए वहाँ नरेंद्र मोदी ही नजर आ रहे थे इसलिए अब वो नहीं चाहते हैं कि इन कार्यों का श्रेय किसी और को जाए। वह कहते हैं कि अगर सीएम योगी वहाँ से चुनाव लड़ते और जीत जाते तो हो सकता है कि पीएम मोदी को राम मंदिर का सारा श्रेय अपने सीएम के साथ शेयर करना पड़ता।
इसी तरह ‘आशुतोष की बात’ एपिसोड में पहले इस बात पर पैनेलिस्ट बुलाकर चर्चा हुई कि आखिर क्यों योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से क्यों भाग रहे हैं। उन्होंने पूछा था कि क्या गोरखपुर से चुनाव लड़ने से हिंदुत्व की लहर नहीं खड़ी होगी। क्या सिर्फ अयोध्या से ही इस लहर को कायम किया जा सकेगा। आशुतोष के मुताबिक दो दिन पहले तक लोगों का कहना था कि गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ की हार का खतरा है इसलिए वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते। अब यही आशुतोष अपने हालिया एपिसोड में ये समझाते दिखे थे कि आखिर क्यों वो और उनके जैसे लोग ये मान रहे थे कि योगी अयोध्या से चुनाव लड़ेंगे।
एक ओर जहाँ गोरखपुर सीट पर सीएम योगी के नाम का ऐलान होने के बाद लिबरल मीडिया अपने अपने ढंग से अपने पुराने प्रोपगेंडा को जस्टिफाई करने के लिए विभिन्न तर्क दे रही है, वहीं सपा के अखिलेश यादव भी इस खबर को सुनकर बयानबाजी करने में पीछे नहीं हैं। गोरखपुर सीट से सीएम योगी को टिकट मिलने के ऐलान के बाद उन्होंने कहा, “कभी कहते थे मथुरा से लड़ेंगे, कभी कहते थे अयोध्या से लड़ेंगे… मुझे ख़ुशी है कि BJP ने पहले ही उनको अपने घर भेज दिया। अब लगता है कि उनको गोरखपुर में ही रहना पड़ेगा उनको वहाँ से वापस आने की ज़रूरत नहीं उनको बधाई।”
कथित इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने स्क्रॉल के लिए एक लेख लिखा है। लेख से बेहतर इसे वैचारिक टट्टी कहना सही होगा, जिसके लिए गुहा जाने जाते हैं। इसमें उन्होंने बताया है कि साल 2022 में अरबिंदो घोष की 150वीं पुण्यतिथि, असहयोग आंदोलन के 100 वर्ष, भारत छोड़ो आंदोलन की 80वीं सालगिरह, भारतीय स्वतंत्रता के 75 साल, पहले आम चुनाव के 70 साल और भारत-चीन युद्ध के 60 वर्ष पूरे होंगे। गुहा ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन सभी मौकों को उत्सव की तरह मनाएँगे और हर कार्यक्रम में अपने व्यक्तित्व को प्रमोट करेंगे।
मोदी पर तंज कसने के साथ ही लेख के तीसरे पैराग्राफ में गुहा ने गोधरा कांड को याद किया और बताया कि गुजरात में हुए दंगों को 20 साल पूरे हो रहे हैं लेकिन गुहा ने अपने लेख में जो एक विशेष ध्यान दिया है वो शब्द चुनाव का है। अपने इस लेख में उन्होंने ‘Pogrom’ शब्द का इस्तेमाल किया और कहा कि जो कुछ भी 2002 में हुआ वो असल में Pogrom था यानी एक समुदाय को विशेष तौर पर बनाया गया निशाना।
Ramachandra Guha: On the 20th anniversary of the Gujarat pogrom, will Modi finally apologise? https://t.co/zNSC8sIOQc
This man was born 19 years after death of Gandhi and still consider himself to be an authority on any subject related to Gandhi. I will never agree that he is historian.
रामचंद्र गुहा कभी उन्हें भी याद कर लो जो रामभक्त गोधरा में जिंदा जला दिए गए, क्योंकि रामभक्त भी हाड़-माँस के ही इंसान थे
2गले 🤬🤬
— Vishnu Swaroop Tripathi🟠 (@VishnuSwaroopT1) January 5, 2022
Will you first apologize for the killings of 50+ kar sevaks in Godra by burning their train ? If you expect Modi ji to apologize for an event he was not responsible for ( legally established as well) , we expect you to apologize for many things even though you are not responsible
गुहा के इस ‘एक समुदाय’ में जाहिर है पीड़ित के तौर पर सिर्फ मुस्लिम आते हैं, क्योंकि इसके अलावा अगर कोई और समुदाय भी आता तो गुहा को गुजरात दंगों के साथ कारसेवकों को जिंदा जलाए जाने की बर्बरता याद आती। हालाँकि, लेख में ऐसा कहीं कुछ नहीं है। अगर है तो वो उस गोधरा कांड को जस्टिफाई करने की कोशिश है जिसे 1984 में हुए सिख नरसंहार से जोड़कर बताया गया है।
In Nanavati-Mehta Commission report tabled in Gujarat assembly, it is mentioned that the post Godhra train burning riots were not organized, Commission has given clean chit given to Narendra Modi led Gujarat Govt pic.twitter.com/HzIs0LsEQ1
27 फरवरी पूरे देश के लिए तारीख ही नहीं बल्कि इस तारीख का हमारे देश के अतीत से काला रिश्ता है। ये वो तारीख है जिस पर चढ़ी धूल की परत वक्त गुजरने के साथ साथ और मोटी होती चली गई। हमारे देश के मीडिया का एक बड़ा तबका आज खुद को बहुत ही जागरूक, निष्पक्ष और जिम्मेदार मानता है। लेकिन अफसोस की बात ये है कि इस तारीख में छुपी तकलीफ को दुनिया के कोने कोने तक पहुंचाने का समय शायद किसी भी न्यूज़ चैनल या अखबार को पिछले 20 वर्षों में नहीं मिला। हम गोधरा की बात कर रहे हैं, जहां 27 फरवरी 2002 को आधुनिक भारत के इतिहास का काला अध्याय लिखा गया था। इस दिन हमारे स्वतंत्र धर्मनिरपेक्ष देश में सुबह 7:43 पर गुजरात के गोधरा स्टेशन पर 23 पुरुष और 15 महिलाओं और 20 बच्चों सहित 58 लोग साबरमती एक्सप्रेस के कोच नंबर S6 में जिंदा जला दिए गए थे। उन लोगों को बचाने की कोशिश करने वाला एक व्यक्ति भी 2 दिनों के बाद मौत की नींद सो गया था।
अयोध्या से वापस लौट रही थी श्रद्धालुओं से भरी ट्रेन अयोध्या में विश्व हिंदू परिषद की तरफ से फरवरी 2002 में पूर्णाहुति महायज्ञ का आयोजन किया गया था। देश के विभिन्न कोने से बड़ी संख्या में श्रद्धालु वहां गए थे। 25 फरवरी 2002 को अहमदाबाद जाने वाली साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में करीब 1700 तीर्थयात्री और कारसेवक सवार हुए थे। ट्रेन 27 फरवरी की सुबह 7 बजकर 43 मिनट पर गोधरा स्टेशन पहुंची। जैसे ही ट्रेन रवाना होने लगी, चेन पुलिंग की वजह से सिग्नल के पास ट्रेन रुक गई। और फिर बड़ी संख्या में भीड़ ने आगजनी की घटना को अंजाम दिया।
अक्सर गुजरात दंगों की बात गोधरा कांड पर आकर रुक जाती है यह दलील दी जाती है कि गुजरात दंगे, गोधरा कांड में किए क्रिया की प्रतिक्रिया थी। लेकिन कभी भी इन दोनों घटनाओं को न्याय की एक ही कसौटी पर रखकर नहीं तौला जाता। गोधरा कांड का इंसाफ आज भी अधूरा है। जिसमें 59 लोगों की चीखें छिपी है जिसकी गूंज आज तक किसी नेता के कान तक नहीं पहुंची और ना ही मानवता की दुहाई देने वाले मीडिया को कभी सुनाई थी। मामले पर 2011 में निचली अदालत का फैसला भी आया जिसमें 11 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई। जबकि 20 लोगों को उम्र कैद की सजा हुई। लेकिन गोधरा कांड के ठीक 1 दिन बाद से गुजरात ही नहीं बल्कि पूरे देश की राजनीति हमेशा के बदल गई। एसआईटी रिपोर्ट उसी दिन शाम को गुजरात के मुख्यमंत्री निवास पर बैठक हुई जिसमें नरेंद्र मोदी पर शामिल हुए। इस मीटिंग को लेकर पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट ने दावा किया था कि मोदी ने हिंदुओं की प्रतिक्रिया होने देने की बात कही थी। लेकिन एसआईटी ने संजीव भट्ट के आरोपों को गलत माना और कहा कि वह 27 तारीख की उस मीटिंग में मौजूद ही नहीं थे। एसआईटी ने कहा वह (संजीव भट्ट) तथ्यों को घुमा फिरा रहे हैं और मीडिया को बरगलाने की साजिश रच कर ना सिर्फ एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन बल्कि सुप्रीम कोर्ट पर भी दबाव डालने की कोशिश कर रहे हैं। कारसेवकों के शवों को गोधरा से अहमदाबाद लाने का फैसला हुआ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों ने इसका विरोध किया था। द नमो स्टोरी के लेखक के अनुसार मोदी सरकार के मंत्री हरेन पांड्या ने भी इसका विरोध किया था। 2003 में पांड्या की हत्या कर दी गई थी। इसके लिए उनके पिता ने मोदी को दोषी ठहराया था। हालांकि सीबीआई ने जांच के बाद मोदी को क्लीन चिट दे दी थी। शवों को गोधरा स्टेशन से अहमदाबाद लाया गया और विहिप को सौंपा गया। उस वक्त शहर में कर्फ्यू नहीं लगा था और जल्दी हैं अहमदाबाद में दंगे फैल गए। गोधरा कांड के बाद पूरे गुजरात में हुआ दंगा गोधरा की घटना में 1500 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इस घटना के बाज पूरे गुजरात में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी और जान-माल का भारी नुकसान हुआ। हालात इस कदर बिगड़े कि तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को जनता से शांति की अपील करनी पड़ी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक दंगों में 1200 लोगों की मौत हुई थी।
नानावटी आयोग की 15 सौ पन्नों की रिपोर्ट 27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों को जलाने की घटना के प्रतिक्रियास्वरूप समूचे गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। इसकी जांच के लिए तीन मार्च 2002 को सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज न्यायमूर्ति जीटी नानावती की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया गया। न्यायमूर्ति केजी शाह आयोग के दूसरे सदस्य थे। शुरू में आयोग को साबरमती एक्सप्रेस में आगजनी से जुड़े तथ्य और घटनाओं की जांच का काम सौंपा गया। लेकिन जून 2002 में आयोग को गोधरा कांड के बाद भड़की हिंसा की भी जांच करने के लिए कहा गया। आयोग ने दंगों के दौरान नरेंद्र मोदी, उनके कैबिनेट सहयोगियों व वरिष्ठ अफसरों की भूमिका की भी जांच की। आयोग ने सितंबर 2008 में गोधरा कांड पर अपनी प्राथमिक रिपोर्ट पेश की थी। इसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को क्लीन चिट दी गई थी। उस समय आयोग ने साबरमती एक्सप्रेस की बोगी संख्या-छह में आग लगाने को सुनियोजित साजिश का परिणाम बताया था। 2009 में जस्टिस शाह के निधन के बाद अक्षय मेहता को सदस्य बनाया गया। आयोग ने 45 हजार शपथ पत्र व हजारों गवाहों के बयान के बाद करीब 15 सौ पेज की रिपोर्ट तैयार की। अब इस रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा गया। नानावटी कमीशन ने उन्हें क्लीन चिट दी और तमाम तरह के प्रोपोगैंडा जो न सिर्फ देश बल्कि पूरी दुनिया में फैलाए गए उसे सिरे से खारिज किया गया। इस रिपोर्ट में ये बताया गया कि वहां पर कोई भी ऐसा काम नहीं किया गया जो राज्य सरकार को नहीं करना चाहिए थे। सिलसिलेवार घटनाक्रम पर एक नजर.. 27 फरवरी 2002 : गोधरा रेलवे स्टेशन के पास साबरमती ट्रेन के एस-6 कोच में आग लगाने से 59 से अधिक कारसेवकों की मौत हुई थी। 28 फरवरी 2002 : गुजरात के कई इलाकों में दंगा भड़कने से 1200 से अधिक लोग मारे गए।
03 मार्च 2002 : गोधरा ट्रेन जलाने के मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों के खिलाफ आतंकवाद निरोधक अध्यादेश (पोटा) लगाया गया।
25 मार्च 2002 : केंद्र सरकार के दबाव की वजह से सभी आरोपियों पर से पोटा हटाया गया।
18 फरवरी 2003 : गुजरात में भाजपा सरकार के दोबारा चुने जाने पर आरोपियों के खिलाफ फिर से आतंकवाद निरोधक कानून लगा दिया गया। 21 सितंबर : नवगठित संप्रग सरकार ने पोटा कानून को खत्म कर दिया और अरोपियों के खिलाफ पोटा आरोपों की समीक्षा का फैसला किया। 17 जनवरी 2005 : यूसी बनर्जी समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में बताया कि गोधरा कांड महज एक ‘दुर्घटना’थी। 13 अक्टूबर 2006 : गुजरात उच्च न्यायालय ने कहा कि यूसी बनर्जी समिति का गठन ‘अवैध’ और ‘असंवैधानिक’ है, क्योंकि नानावटी-शाह आयोग पहले ही दंगे से जुड़े सभी मामले की जांच कर रहा है। 26 मार्च 2008 : सुप्रीम कोर्ट ने गोधरा कांड और फिर हुए दंगों से जुड़े आठ मामलों की जांच के लिए विशेष जांच आयोग बनाया। 18 सितंबर : नानावटी आयोग ने गोधरा कांड की जांच सौंपी। इसमें कहा गया कि यह पूर्व नियोजित षड्यंत्र था। 22 फरवरी : विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 31 लोगों को दोषी पाया, जबकि 63 अन्य को बरी किया। 1 मार्च 2011: विशेष अदालत ने गोधरा कांड में 11 को फांसी, 20 को उम्रकैद की सजा सुनाई।
गोधरा कांड को छिपाने के लिए कॉन्ग्रेस का महिमामंडन
इस दिशा में भी गुहा संतुलित नहीं हो पाए और गोधरा कांड व सिख नरसंहार के बूते कॉन्ग्रेस के छवि निर्माण में जुट गए। उन्होंने बताया कि कैसे सिख नरसंहार के बाद 1999 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनते ही सोनिया गाँधी ने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में माफी माँगी थी और मनमोहन सिंह 2005 में प्रधानमंत्री बनाए गए थे। उनके अलावा जनरल जेजे सिंह पहले सिख आर्मी स्टाफ के चीफ बने थे और मोंटेक सिंह आहलूवालिया प्लॉनिंग कमीशन के डिप्टी चेयरमैन बनाए गए थे।
अब गुहा का इन बिंदुओं को समझाने का क्या अर्थ है? ये बात लेख मेंं आगे पता चलती है जब वो कहते हैं कि उन्होंने उस समय (यूपीए काल में) सिखों से बात की थी और उन्हें (सिखों) इस नेतृत्व में हुए बदलाव से ऐसा लगा था कि ये देश उनका है। वहीं गुजरात पर आते हुए उन्होंने कहा कि आज भी गुजरात के मुसलमान उतने ही डरे हुए है जितने वो 2002 में थे।
कॉन्ग्रेस काल से बीजेपी की तुलना करते हुए गुहा ने ये दिखाया कि देखो सोनिया गाँधी ने माफी माँगी लेकिन नरेंद्र मोदी ने गुजरात दंगों पर कोई बात तक नहीं की। या कह सकते हैं कि गुहा अपने उदाहरण इसलिए समझा रहे थे कि उनको चाहिए कि जैसे कॉन्ग्रेस ने सिखों का विश्वास जीतने के लिए उन्हें बड़े पद दिए। वैसे नरेंद्र मोदी की सरकार भी उस समुदाय के हाथ में नेतृत्व दे दे जिसे गुजरात दंगों के बाद डरा हुआ महसूस होता है।
गुहा के इस लेख को पढ़ते-पढ़ते आपको उनकी ये अनकही इच्छा और स्पष्ट हो जाएगी जब वो खुलकर कहते हैं कि मोदी काल में मुस्लिम प्रधानमंत्री आना मुश्किल ही है। उनके मुताबिक मुस्लिमों के साथ मोदी सरकार अभी लंबा भेदभाव करने वाली है और उनकी पार्टी से जुड़े संगठन तो मुस्लिमों को सड़क चलते ढूँढ-ढूँढकर परेशान करते ही हैं। गुहा की शिकायत है कि मोदी आज भी गुजरात दंगों के लिए मुस्लिमों से माफी नहीं माँगते और इसके पीछे की वजह वो आंशिक रूप से उनके घमंड को मानते हैं और ज्यादा जिम्मेदार वो उस राष्ट्रवाद के उनके आदर्शों को मानते हैं जो संविधान के बिलकुल विपरीत थे।
गुजरात दंगों में मोदी को क्लीन चिट
साल 2002 में 27 फरवरी को साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में गुजरात के गोधरा स्टेशन पर समुदाय विशेष के कुछ लोगों ने आग लगा दी थी, जिसमें 59 लोगों की मौत हो गई थी। मृतकों में अधिकतर कार सेवक थे। इस घटना के बाद 28 फरवरी से 31 मार्च तक गुजरात में दंगे भड़के। जिसके कारण 1200 से अधिक लोग मारे गए थे और साथ ही 1500 लोगों के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। इस मामले पर जाँच के लिए नानावती आयोग गठित हुआ था। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट का पहला हिस्सा 2009 को विधानसभा में पेश किया। फिर अगली रिपोर्ट 18 नवंबर 2014 को दी गई और। साल 2019 में नानावती-मेहता आयोग की फाइनल रिपोर्ट विधानसभा में पेश हुई। इस अंतिम रिपोर्ट में नरेंद्र मोदी पर लगे आरोपों से उन्हें क्लीन चिट दे दी गई थी। इस रिपोर्ट में साफ लिखा था गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस की बोगी जलाए जाने के बाद हुई सांप्रदायिक हिंसा सुनियोजित नहीं थी। इसलिए, आयोग ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली तत्कालीन गुजरात सरकार को अपनी रिपोर्ट में क्लीन चिट दी है।
आपातकाल से लेकर कश्मीर पंडितों का नरसंहार…कौन माँगेगा माफी?
दिलचस्प और ध्यान देने वाली बात है ये है कि गुजरात दंगे जिसमें मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार को क्लीन चिट मिली हो और दूसरी ओर कारसेवकों को जलाए जाने की घटना को भी 20 वर्ष पूरे हो रहे हों, उस समय में गुहा के लिए चर्चा का विषय गुजरात दंगे इसलिए हैं क्योंकि निशाने पर मुस्लिम थे। वरना सोचिए उन कारसेवकों की गलती ही क्या थी जो आज उनका जिक्र भी लिबरल मीडिया, वामपंथी इतिहासकार करने से गुरेज करते हैं और ये दिखाते हैं कि साल 2002 में सीधे गुजरात दंगे हुए, जिसकी पृष्ठभूमि उनके हिसाब से कुछ थी ही नहीं। मोदी माफी माँगेगे या नहीं इस पर सवाल ये लोग आए दिन करते हैं लेकिन क्या इनसे नहीं पूछा जाना चाहिए कि जिस कॉन्ग्रेस का वो महिमामंडन करते नहीं थकते वो 1975 के आपातकाल के लिए कब माफी माँगेगे, कब कश्मीर में उपजे हालातों के लिए शर्मिंदा होंगे। सिख नरसंहार के लिए 14-15 साल बाद माफी माँगना क्या इस सवाल को खत्म कर देता है कि आखिर दिल्ली के बिगड़े हालातों पर कानून व्यवस्था क्यों विफल हुई थी।
ये पहली बार नहीं है कि गुजरात दंगों पर दुख मनाते हुए लिबरल गोधरा कांड को भूले हों। पिछले साल भी स्वरा भास्कर समेत कई लिबरलों ने गुजरात मुद्दे पर नरेंद्र मोदी को घेरने का प्रयास किया था और हर साल की तरह इस साल भी वो इस्लामी बर्बरता पर पर्दा डालने का काम शुरू हो गया है जिसकी आग में 59 कारसेवक जलाकर मारे गए।
वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द वायर’ के सह संस्थापक और महिलाकर्मियों के साथ यौन शोषण के आरोपित सिद्धार्थ भाटिया को मुंबई प्रेस क्लब का अध्यक्ष चुना गया है। शनिवार (6 फरवरी 2021) को मुंबई प्रेस क्लब के चुनाव हुए थे, जिसमें सिद्धार्थ भाटिया ने सुधाकर कश्यप के खिलाफ जीत दर्ज की।
पत्रकार स्मिता देशमुख ने ट्वीट करते हुए इस बात की जानकारी दी कि घनघोर वामंथी पत्रकारों ने ‘प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक अलायन्स’ (Progressive Democratic Alliance) नाम का समूह बना कर मुंबई प्रेस क्लब का चुनाव लड़ा। इसमें सिद्धार्थ भाटिया ने अध्यक्ष पद के लिए, इंडियन एक्सप्रेस के वामपंथी पत्रकार गुरबीर सिंह ने चेयरमैन और महाराष्ट्र टाइम्स के समर खलदस ने वाइस चेयरमैन पद के लिए चुनाव लड़ा था।
They invited @AtishiAAP to have a PC when she was passing by Mumbai but forgot to invite Yogiji when he was in Mumbai. I asked them why such discrimination? They said Atishi PC was paid.
एक अन्य पत्रकार श्रीकांत भोंसले के मुताबिक़ प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक अलायन्स ने क्लब के पदाधिकारियों के लिए 6 उम्मीदवार उतारे थे और 10 अन्य को समिति के सदस्यों के लिए उतारा था। इन सभी 16 उम्मीदवारों की अगुवाई घनघोर वामपंथी ‘पत्रकार’ सिद्धार्थ भाटिया ने की थी और सभी ने मुंबई प्रेस क्लब के चुनावों में जीत हासिल की है।
2018 के दौरान #Metoo अभियान काफी चर्चा में था। इसमें तमाम दिग्गजों पर कई गंभीर आरोप सामने आए थे। उसी दौरान एक महिला ने सिद्धार्थ भाटिया पर यौन शोषण का आरोप लगाया था।
सहकर्मियों ने लगाया था यौन शोषण का आरोप
#Metoo अभियान के दौरान दो अलग-अलग घटनाओं में, दो अलग-अलग महिलाओं ने सिद्धार्थ भाटिया पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपनी पावर और पोजिशन का इस्तेमाल करके उनका शोषण किया था। एक महिला के मुताबिक़ भाटिया DNA में रहते हुए नई इंटर्न्स को लिखने से जुड़ी बारीकियाँ समझाने के बहाने अपने झाँसे में लेता था। वहीं एक ट्विटर यूजर ने आरोप लगाया था भाटिया दफ्तर में महिलाकर्मियों की ब्रा की स्ट्रिप देख कर होठों का निचला हिस्सा चाटना शुरू कर देता था।
हालाँकि DNA के कार्यकाल से जुड़े महिला के आरोपों को भाटिया ने खारिज कर दिया था। भाटिया के मुताबिक़ जब वो DNA में काम करते थे, तब वहाँ इस नाम की कोई महिला काम नहीं करती थी। इसके अलावा भाटिया ने द वायर की कर्मचारी रह चुकी महिला के आरोपों पर कहा कि वो सच नहीं है क्योंकि द वायर हिन्दी में कोई महिला कर्मचारी नहीं थी।
इस तरह के तमाम आरोपों के सामने आने के बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी कि उन पर आरोप लगाने वाले ट्विटर हैंडल्स की जाँच हो। भाटिया ने यहाँ तक दावा किया था कि उन्होंने महिलाओं से कहा था कि वह मामले से जुड़ी अधिक जानकारी के साथ आगे आएँ लेकिन ऐसा किसी ने नहीं किया।
ख़बरों से ज़्यादा विवादों के चलते सुर्ख़ियों में रहने वाले वामपंथी मीडिया समूह ‘द वायर’ हिन्दू विरोधी विचारधारा और देश विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देने के लिए मशहूर है। स्वघोषित ‘समाचार वेबसाइट’ की शुरुआत अमेरिकी नागरिक सिद्धार्थ वरदराजन, एमके वेणु और सिद्धार्थ भाटिया ने की थी। ये वेबसाइट फर्जी ख़बरें फैलाने और प्रोपेगेंडा प्रचार करने के लिए मशहूर है।
ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जब द वायर झूठ परोसते हुए नज़र आया है लेकिन इन्होंने अपने झूठ के लिए कभी माफ़ी नहीं माँगी। उन तमाम झूठों में ये कुछ झूठ हैं, जो द वायर ने पत्रकारिता के नाम पर परोसे हैं।
द वायर के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर फेक न्यूज़ फैलाने पर एफ़आईआर दर्ज की गई थी। इसके अलावा पूर्व न्यूज एंकर विनोद दुआ पर भी दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों के दौरान गलत रिपोर्टिंग करने और जनता के बीच भ्रम पैदा करने के आरोप में मामला दर्ज किया गया था। विनोद दुआ पर भी यौन शोषण के आरोप लगाए गए थे।
एसटी आरक्षण की माँग के कारण राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा जल रहा है। क्या उदयपुर और डूंगरपुर में आगजनी के पीछे वही आदिवासी-ईसाई नेक्सस है, जो झारखण्ड में पत्थलगड़ी को अंजाम देता है और पालघर में साधुओं की हत्या करता है? राजस्थान में चल रहे दंगे व आगजनी को रोकने में विफल गहलोत सरकार अब आदिवासी क्षेत्रों के लोगों को बातचीत के टेबल पर लाना चाहती है, लेकिन क्या मिशनरियों का आदिवासी-ईसाई गठजोड़ ऐसा होने देगा? देश की तथाकथित सेक्युलर मीडिया का एक बार फिर दोगलापन सामने आया है। शिक्षक भर्ती में अनारक्षित पद को एसटी अभ्यार्थियों से भरने की मांग को लेकर राजस्थान के डूंगरपुर में हिंसा थमने का नाम ही नहीं ले रही है लेकिन देश तथाकथित सेक्लुयर मीडिया इसे दिखाने और छापने के बजाय विपक्षी पार्टियों द्वारा प्रयोजित किसानों के प्रदर्शन में व्यस्त है। कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में बड़े पैमाने पर हिंसा के बावजूद तथाकथित सेक्युलर मीडिया इसे नहीं दिखा रहा है और इसे लेकर सोशल मीडिया पर इसको लेकर कई प्रकार के सवाल उठाए जा रहे हैं।
राजस्थान में अध्यापक पात्रता परीक्षा को लेकर चल रहा विरोध-प्रदर्शन इतना उग्र हो गया है कि अब अशोक गहलोत की सरकार केंद्र से ‘रैपिड एक्शन फोर्स (RAF)’ की माँग कर रही है। इस विरोध-प्रदर्शन से राजस्थान का उदयपुर और डूंगरपुर सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। राज्य के पूरे दक्षिणी हिस्से की क़ानून-व्यवस्था एक तरह से राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है।
डूंगरपुर में गोली लगने के कारण शनिवार (सितम्बर 26, 2020) की शाम एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। साथ ही कई घायल भी हुए। इस प्रदर्शन में न सिर्फ सम्पत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, बल्कि कई वाहनों को भी फूँक दिया गया। पुलिस ने कहा है कि उसे रबर की गोलियाँ दागनी पड़ीं। राज्य के पुलिस महानिरीक्षक एमएल लाठड़ को सीएम ने डूंगरपुर भेजा है। सीएम लगातार लोगों से शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।
राज्यपाल कालराज मिश्र की भी पूरे घटनाक्रम पर नजर है और उन्होंने मुख्यमंत्री से फोन पर बात कर स्थिति के बारे में जाना। गुरुवार की शाम को ये प्रदर्शन तब उग्र हो गया, जब युवाओं ने पुलिस के साथ संघर्ष किया। पुलिस दल पर पथराव के साथ-साथ पुलिस के वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया था। जनप्रतिनिधियों ने भी आंदोलनकारी युवाओं के साथ बैठकें की, लेकिन इसका कोई परिणाम निकल नहीं पाया।
प्रदर्शनकारियों की माँग है कि तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा-2018 में जनजाति बहुल (एसटी) क्षेत्र में रिक्त रहे सामान्य वर्ग के 1167 पदों को जनजाति वर्ग (एसटी) के अभ्यर्थियों से ही भरा जाए और इस पर एससी, ओबीसी या सामन्य वर्ग के अभ्यर्थियों की भर्ती न होने पाए। सोशल मीडिया से भी भड़काऊ वीडियो जारी कर राजस्थान सरकार को चुनौती दी जा रही है। जंगलों और पहाड़ियों के कारण पुलिस प्रदर्शनकारियों से निपटने में असफल रही है।
हालत इतने बेकाबू हो गए कि शनिवार की रात राज्य सरकार को कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को हेलीकॉप्टर से डूंगरपुर भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालाँकि, सीएम कह रहे हैं कि उनकी सरकार प्रदेश के हर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध है तथा समाज के किसी भी वर्ग की कानून-सम्मत व न्यायोचित माँगों पर विचार करने या संवाद के लिए हर समय तैयार है। उन्होंने टीएसपी क्षेत्र के विद्यार्थियों एवं युवाओं से अपील की है कि वे हिंसा को छोड़े और सरकार के समक्ष अपनी बात रखने के लिए आगे आएँ।
ट्विटर यूजर राकेश गोस्वामी ने लिखा कि दक्षिण राजस्थान 3 दिनों से जल रहा है। 4 जिलों में इंटरनेट को निलंबित कर धारा 144 लगा दिया गया है। कई वाहनों को आग लगा दी गई है, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कंट्रोल रूम में 7 आईपीएस अधिकारी कैंप कर रहा हैं फिर भी कोई राष्ट्रीय आक्रोश नहीं हैं।
अभिषेक नामक ट्विटर हैंडल से भी लिखा गया है कि वास्तविक विरोध राजस्थान में हो रहा है जहां आदिवासी कांग्रेस सरकार के खिलाफ हैं। 4 जिलों में 1 व्यक्ति की मौत के साथ धारा 144 लागू कर इंटरनेट को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन क्योंकि यह कांगेस शासित है इसलिए मीडिया द्वारा ब्लैक आउट किया गया है।
Actual protest is happening in Rajasthan where tribals are up against Cong govt.
1 person dead, section 144 imposed in 4 districts, internet suspended
But because it is Cong ruled, blacked out by media
Instead media searching for protests against farm bill, but nobody came out
Agreed that left and Congi biased media is not reporting. What about right wing media? What stops them from reporting it and taking it to a larger scale? Had this been in UP or Gujrat, the likes of Rajdeep and NDTV would have gone on for hours peddling propaganda.
नवभारत टाइम्स डॉट कॉमके मुताबिक कांकरा डूंगरी से शुरू हुआ उपद्रव खेरवाड़ा तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारियों की ओर से मचाये गए उत्पात के बाद पुलिस ने भी तीन राउंड फायरिंग के साथ आंसू गैस छोड़ी, इसके बाद मामला कुछ शांत हुआ, लेकिन रात एक बजे प्रदर्शनकारी एक बार फिर उग्र हो गए। बताया जा रहा है कि इस घटना में एक व्यक्ति की सीने में गोली लगने से मौत हो गई, जबकि एक घायल हो गया। खबर के मुताबिक इस मामले में प्रशासन की ओर से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। डूंगरपुर के जिला कलेक्टर की मानें, तो इस हिंसा में झारखंड से आए विशेष विचारधारा वाले गुट ने हिंसा भड़काई है। लिहाजा अब सरकार ने भी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अपने चार ऑफिसर्स को भेजा है, जिनमें डीजी क्राइम एमएल लाठर, एसीबी के एडीजी दिनेश एमएन, जयपुर कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव और जयपुर ग्रामीण एसपी शंकरदत्त शर्मा शामिल हैं।
कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में हिस्सा की तस्वीरें-
जनजाति क्षेत्र विकास मंत्री अर्जुन बामणिया और उदयपुर से पूर्व सांसद रघुवीर मीणा को सीएम गहलोत ने कई अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ उदयपुर भेजा, जहाँ उनकी विरोध-प्रदर्शन कर रहे युवाओं के साथ लगभग 3 घंटे तक बैठक हुई। पूर्व-सांसदों और वर्तमान विधायकों के अलावा कॉन्ग्रेसी जनप्रतिनिधियों के साथ कुछ वकील भी मौजूद थे। भारतीय ट्राइबल पार्टी के विधायक राजकुमार रोत ने पुलिस-प्रशासन को ही कोसा है।
उन्होंने कहा कि भले ही आंदोलन की शुरुआत युवाओं ने की हों, लेकिन उनके पास सूचनाएँ हैं कि पुलिस ने स्थानीय ग्रामीणों को निशाना बनाया और उन्हें गिरफ्तार किया, जिससे ये विरोध-प्रदर्शन और ज्यादा उग्र हो गया। उन्होंने कहा कि अब ये मामला ग्रामीण बनाम पुलिस-प्रशासन का हो गया है। एनएच 7-8 पर वाहनों को जलाया गया। एक युवक की मौत पर पुलिस का कहना है कि गोली कहाँ से चली, उसे कुछ नहीं पता।
पिछले 2 दिनों में ही 20 से ज्यादा गाड़ियों को आग के हवाले किया गया है। पेट्रोल पंप और एक होटल में लूटपाट की भी खबर आई है। पुलिस का कहना है कि डूंगरपुर के एसपी का भी वाहन नहीं बख्शा गया। 35 पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है, जिसके बाद क़रीब 30 लोगों को वहाँ गिरफ्तार किया गया। क़रीब 25 किलोमीटर तक राजमार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप्प हो चुका है।
उदयपुर रेंज की आईजी विनीता ठाकुर ने कहा है कि क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है, ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। इंटरनेट बंद कर दिया गया है। खेरवाड़ा और ऋषभदेव में भी विरोध-प्रदर्शन जारी है। टोल प्लाजा को भी जलाने का प्रयास किया गया। क़रीब 20 किलोमीटर तक प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थर बिछाए जाने के बाद उदयपुर-अहमदाबाद हाइवे 3 दिनों से जाम है।
वहीं राजस्थान पुलिस का कहना है कि झारखण्ड से आए विशेष विचारधारा के गुट ने हिंसा भड़काई है। पुलिस का कहना है कि जहाँ कुछ लोग हिंसा भड़का कर चले गए हैं, वहीं कुछ अभी भी आसपास के गाँवों में छिपे हुए हैं। झारखण्ड में फ़िलहाल हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जो सकरार चल रही है, उसमें कॉन्ग्रेस भी भागीदार है। राज्य में कॉन्ग्रेस के 4 मंत्री हैं, जो वित्त, कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय सँभाल रहे हैं। फिर भी कॉन्ग्रेस अपने में भी ब्लेम-गेम खेल रही है।
प्रदेश भाजपा ने भी पुलिस के बयान का समर्थन किया है। प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियाँ ने कहा कि आशंका पहले लग रही थी, अब प्रशासन ने भी पुष्टि कर दी है कि ये बाहरी तत्व कौन हैं? उन्होंने कहा कि ये लोग झारखंड से आए, कुछ चले गए, कुछ अभी भी छुपे हैं, जो हमेशा से हमारे आदिवासी क्षेत्रों में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने आशा जताई कि ये लोग सफल नहीं होंगे, लेकिन साथ ही चेताया कि उनको जल्द बेनकाब किया जाना चाहिए।
मेवाड़ क्षेत्र को नक्सलियों का अड्डा बनाने की साजिश चल रही है और इस कार्य में झारखण्ड के पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों की भागीदारी है। पत्थलगड़ी ईसाई-आदिवासी नेक्सस का एक ऐसा उदाहरण है, जो देश का क़ानून नहीं मानता। लोगों ने दबे जुबान से बताया कि राजस्थान के कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि भी इस खेल में शामिल हैं, भले ही वो किसी भी पार्टी के हों।
एक प्राध्यापक अभ्यर्थी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राज्य लोक सेवा आयोग ने प्राध्यापक भर्ती में सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ अन्याय किया है, और ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्हें छिपाने के लिए ये सब किया जा रहा है। उसने कहा कि राज्य में 5000 पदों के लिए 2018 में विज्ञप्ति निकाली निकली थी और EWS आरक्षण की घोषणा के बाद प्रक्रियाधीन नियुक्तियों में 14% अतिरिक्त पद सृजित करने की घोषणा हुई थी, लेकिन बिना 700 पद बढ़ाए ही दोगुने अभ्यर्थियों को बुला लिया गया।
जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ढिंढोरा पीट रहे हैं कि उनकी सरकार ने पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में 501 घोषणाओं में से 252 को पूरा कर दिया है और राहुल गाँधी सोशल मीडिया पर ‘प्रदर्शनकारी किसानों’ के समर्थन में लगे हुए हैं, कॉन्ग्रेस को इस सवाल का जवाब देना होगा कि दक्षिणी राजस्थान में चल रहे उग्र हिंसक प्रदर्शन को रोकने में, युवाओं को समझाने में एवं बाहरी तत्वों को चिह्नित कर उन पर कार्रवाई करने में उसकी सरकार नाकाम क्यों रही है?
सितम्बर 24 को राजस्थान में हिंसा भड़कने के बावजूद इसके अगले ही दिन अशोक गहलोत किसानों के मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। वो राजग सरकार द्वारा ‘बनाए गए हालत’ को पूरे देश के किसानों के ‘सड़कों पर आने’ के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे। राजस्थान प्रदेश कॉन्ग्रेस के सभी प्रमुख पदाधिकारी वहाँ मौजूद थे। जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस चलती रही, उधर उदयपुर और डूंगरपुर जलता रहा।
राजस्थान ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से भी लोगों के आकर स्थानीय युवाओं को भड़काने की बातें पुलिस-प्रशासन ने कही है। सड़क पर शराब की बोतलों से भरे एक ट्रक तक को लूट लिया गया। हालाँकि, कई एसटी अभ्यर्थी कह रहे हैं कि ये उनका काम नहीं है, वो हिंसा नहीं कर सकते। कहा गया है कि बगल के गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों से भी कुछ भड़काऊ लोग आए हैं। सरकार अब अपनी अक्षमता का पूरा ठीकरा बाहरी राज्यों पर फोड़ने के लिए तैयार है।
ऐसी कोई घटना हो और उस पर राजनीति न हो, ये तो हो ही नहीं सकता। नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने जब इसके लिए कॉन्ग्रेस सरकार को पूरी तरह फेल करार दिया तो कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य एवं पूर्व सांसद रघुवीर मीणा ने हिंसक प्रदर्शनों के लिए भाजपा तथा भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) के नेताओं को जिम्मेदार ठहरा डाला। जैसा कि हमने बताया, BTP इसके लिए पुलिस को दोषी ठहरा रही है।
उदयपुर-अहमदाबाद हाईवे पर उपद्रवियों का कब्जा है..होटल-मकान फूंके जा रहे हैं...एक मौत हो गई है...यह गुस्से का मासूम इज़हार नहीं है..पूरी प्लानिंग दिख रही है....हालात बिगड़ रहे हैं लेकिन बीस दिनों से उदयपुर का पुलिस-प्रशासन यही कह रहा है...स्थिति नियंत्रण में है..!!! pic.twitter.com/kSJdtJobdC
टीवी न्यूज चैनलों ने स्वयं ही न्यूज सेंसर कर दी। काग्रेंस पार्टी का कितना ख्याल रखते हैं। बीजेपी सत्ता में होती तब ये बहना, का भाई पप्पू, चैनल वाले सीएम की खाल खींच रहे होते। काग्रेंस शासित राज्यों का कोई विरुद्ध समाचार न्यूज चैनल पर नही आता। ☹️
ऐसा नहीं है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा जो माँगें उठाई जा रही हैं, उन्हें लेकर वो कोर्ट नहीं गए थे। हाईकोर्ट पहले ही उनकी याचिका रद्द कर चुका है। इसके बाद कांकरी डूंगरी में एसटी अभ्यर्थी धरने पर बैठे थे, जो अब खुद के इस आगजनी का हिस्सा न होने की बातें कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये काम ‘उत्पाती आदिवासियों’ का है। शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने शांति की अपील करते हुए कहा कि बहकावे में आकर ऐसी हरकतें की जा रही हैं।
नेता प्रतिपक्ष कटारिया का कहना है कि चूँकि इन माँगों को माने जाने में ही क़ानूनी अड़चनें हैं, गहलोत सरकार को अभ्यर्थियों को इसके बारे में अच्छी तरह समझाना चाहिए, जिसमें वो विफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि निर्दोष पिसे जा रहे हैं, परेशान हो रहे हैं। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि सारे वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ही 200 आंदोलनकारियों ने इतना नुकसान कर दिया।
उन्होंने क़ानून-व्यवस्था के लिए सख्ती की ज़रूरत पड़ने पर वो भी करने की अपील की है और छात्रों को समझाया है कि आगजनी करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। उन्होंने भी गुजरात, झारखण्ड और मध्य प्रदेश के भड़काऊ लोगों को यहाँ आकर स्थिति बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि इनमें अधिकतर ‘कन्वर्टेड आदिवासी’ शामिल हैं, जो ईसाई मिशनरियों के चक्कर में आकर धर्मान्तरण कर चुके हैं।
भाजपा ये समझाने में लगी हुई है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के क्षेत्रों में इसी वर्ग को नौकरी के लिए ज्यादा आरक्षण देने का फैसला भैरों सिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल में ही हुआ था और वसुंधरा राजे ने इसे आगे बढ़ाया। इससे कई युवाओं की नौकरी लगी। भाजपा ने इस बात से निराशा जताई है कि आज ये नौकरीपेशा लोग भी अपने समुदाय के इन युवाओं को समझा नहीं पा रहे। भाजपा इस मामले में फ़िलहाल फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है।(एजेंसीज इनपुट्स सहित)
एक तरफ देश कोरोना जैसी माहमारी से लड़ रहा है, लेकिन कुछ दी लल्लनटॉप जैसे मीडिया ब्रा,पैंटी आदि में फंसे जा रहे हैं। केंद्र सरकार के प्रयासों पर विवाद करने पर इन जैसे मीडिया को लोगों के गुस्से का सामना करने के कारण अब इन्होने महिलाओं के अंतर्वस्त्रों पर अपनी पत्रकारिता केंद्रित कर ली है। शर्म करो भाई। ब्रा, पैंटी, लिंग, लिपस्टिक.. इन जैसे ही कुछ मिलते-जुलते विषयों में अगर आप रूचि रखते हैं तो आपकी पहली मंजिल दिल्ली पालिका बाजार या सरोजिनी मार्किट नहीं बल्कि दी लल्लनटॉप होना चाहिए। लेकिन आप दी लल्लनटॉप की क्षमताओं को आँकने की जल्दबाजी भी नहीं कर सकते क्योंकि आज के दौर में जब सड़क, मोहल्लों में बसे हुए हाशमी दवाखाने विलुप्त होने के कगार पर हैं, ऐसे में पत्रकारिता का हाशमी दवाखाना बनकर दी लल्लनटॉप ही विलुप्त होती इस दुर्लभ सभ्यता का खेवनहार बना था। सवाल ये है कि आखिर टाइम मशीन में जाकर जर्मन तानाशाह हिटलर के लिंग की नाप ढूँढकर ‘पत्रकारिता की गरिमा’ बचाने का दावा करने वाली जमात-ए-लल्लनटॉप आखिर एकबार फिर चर्चा का विषय क्यों बने हैं?
इसका उत्तर यह है कि ‘दी लल्लनटॉप’ के सम्पादक सौरभ द्विवेदी ने जिस द्वेष भावना को पत्रकारिता के मानकों के ऊपर रखकर पत्रकारिता सिखाने का दावा ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट के एक कथित फैक्ट चेक, में ‘हाथों ही हाथों’ की कला से किया है, उसने ‘द लल्लनटॉप’ को सस्ती लोकप्रियता दिलाने का काम किया है। अब बारी ‘द लल्लनटॉप’ के इस फर्जी फैक्ट चेक के वास्तविक फैक्ट चेक की आ चुकी है, क्योंकि गोपालगंज के मृतक बालक की माँ के सबसे ताजा बयान भी अब मीडिया में है। शोषित और गरीब वर्ग की वास्तविकता को ‘प्रोपेगेंडा’ का नाम देने वाले सौरभ द्विवेदी अपने फैक्ट चेक में इस बात का जिक्र तो करते हैं कि वह पत्रकारिता के नियम, कायदे कानून जानते हैं, लेकिन वह कैमरा के सामने हाव-भावों पर ज्यादा ध्यान देने के चक्कर में यही ज्ञान देते हुए इस बात को खुद पर लागू करना भूल गए। कुछ दिनों से सोशल मीडिया से लेकर जमात-ए-पत्रकारिता गैंग के बीच एक खबर ने जमकर अपने लिए जगह बनाई, वो ये कि गोपालगंज में मृतक बालक का अनकहा पक्ष रखने के लिए ऑपइंडिया पर FIR दर्ज हुई है। लेकिन इस गिरोह ने बेहद शातिराना तरीके से यह बात सामने नहीं रखी कि यह FIR किसी तथ्य के कारण नहीं बल्कि एक विचार और वास्तविकता के विरोध के फलस्वरूप की गई थी। वास्तविकता यह कि जिस बच्चे को मार दिया गया था, उसके परिवार के पक्ष को, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और ‘एक महीने पुरानी खबर’ जैसे तथ्यों को बीच से गायब कर दिया गया। ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने जब इस पहलू की ओर मीडिया का ध्यान दिलवाने की कोशिश की तो वर्षों से कुंठित मीडिया के लिबरल-गिरोह के विरोध का वो सैलाब उमड़ पड़ा, जो बस ऐसे ही एक अवसर की तलाश में था। फैक्ट चेकर्स ने दावा किया कि ऑपइंडिया ने साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया है। लेकिन आज ही रोहित जायसवाल की माँ ने पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि उनके बेटे का पोस्टमॉर्टम तक भी ठीक से नहीं किया गया। लाश को छुआ तक नहीं गया और रिपोर्ट बना दी गई। थानाध्यक्ष अश्विनी तिवारी ने आरोप वापस लेने के एवज में रोहित के पिता को 4 लाख रुपए दिलाने का प्रलोभन दिया था। हिटलर का लिंग नापने वाली वेबसाईट ‘द लल्लनटॉप’ के सम्पादक और फैक्ट चेकर सौरभ द्विवेदी अपने इस तथाकथित फैक्ट चेक में कई दावे करते देखे गए। इनमें से एक यह भी था कि ऑपइंडिया एक प्रोपेगेंडा वेबसाइट है। लेकिन असल संघर्ष सौरभ द्विवेदी का यहाँ से शुरू होता है। प्रोपेगेंडा का असल मकसद विरोधी विचार को कुचल देना होता है। ऐसी हर आवाज, जो आकार लेती नजर आ रही हो, उसे येन-केन-प्रकारेण झूठा साबित करना वामपंथी गर्भ से सीखकर नहीं आते, बल्कि उस इकोसिस्टम का हिस्सा बनकर सीखते हैं, जिसकी वाह-वाही के लिए वो एक मृतक बेटे की माँ के बयान को प्रोपेगेंडा का हिस्सा बताते हैं। कुत्सित मानसिकता ऑपइंडिया पर पिछले कुछ दिनों में इसी खबर को लेकर खूब आरोप लगाए गए। लेकिन पत्रकारिता के मापदन्डों को लेकर त्राहिमाम करने वाले ये लोग क्या यह दावा उसी आत्मविश्वास के साथ मृतक रोहित जायसवाल की माँ के सामने जा कर सकते हैं कि उनकी कही गई बातें प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं और वो अपने बेटे की हत्या में हुई जाँच पर सवाल उठाकर समाज में साम्रदायिक सौहार्द बिगाड़ रही हैं? ऑपइंडिया की रिपोर्ट का फैक्ट चेक करने का दावा करके अपनी छाती ठोकने वालों को क्या अब ऑपइंडिया की तरह ही रोहित जायसवाल की माँ पर भी एक FIR नहीं करनी चाहिए कि आखिर उन्होंने ऑपइंडिया की पहल के बाद अपने बेटे के लिए न्याय माँगने का साहस क्यों कर दिखाया, जबकि कैमरा के सामने खड़े ‘दी लल्लनटॉप’ के सम्पादक के हाथों में पास उनके बेटे की कथित हत्या की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है? क्या यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इनके अपने प्रोपेगेंडा और व्यक्तिगत नैरेटिव से हटकर आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक को नकार देने वाला यह मीडिया गिरोह कुछ दिनों से बस एक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट हाथों में लेकर दुहाई देता फिर रहा है? द लल्लनटॉप को कम से कम रवीश कुमार के शब्दों को तो ध्यान से सुनना चाहिए कि मीडिया पर FIR मीडिया की स्वतन्त्रता को खत्म करता है। सौरभ द्विवेदी से सीखिए पत्रकारिता हालाँकि, ऑपइंडिया ने इस स्वतन्त्रता का प्रयोग कभी भी रवीश कुमार, दी वायर, दी क्विंट या फिर दी लल्लनटॉप आदि की तरह सिर्फ संस्थाओं को बदनाम करने और कॉन्सपिरेसी थ्योरी गढ़ने के लिए नहीं किया। ऑपइंडिया की रिपोर्ट का कथित फैक्ट चेक करने का दावा करने वाले सौरभ द्विवेदी ने अपने वीडियो में एक और दावा किया कि वो सच के साथ खड़े हैं और वो सिर्फ सच की ही बात करते हैं। आखिरी बार जब सौरभ द्विवेदी सच के साथ खड़े थे, तब उन्होंने पाया था की हिटलर के लिंग का आकार और नाप वो नहीं थी, जिसके बारे में ‘वोक-लिबरल’ बात करते हैं, बल्कि उसकी बात कुछ और ही थी। इसके बाद जब दी लल्लनटॉप सच के साथ खड़ा था, तब वो हास्य-व्यंग्य पोर्टल द्वारा बनाई गई एक रिपोर्ट का फैक्ट चेक कर रहा था। इसके बाद पत्रकारिता के इस आखिरी मसीहा ने एक बार सारी जनता के सामने केंद्र सरकार की NPR-NRC नीतियों पर अपने पत्रकारिता के गुरु राजदीप सरदेसाई के साथ बैठकर खुलेआम झूठे आँकड़े पेश किए थे और पकड़े जाने पर बेहद बेशर्मी से यूट्यूब से वीडियो को ना हटाकर चुपके से इसके विवरण में इस ‘भूल’ के बारे में लिख दिया। MEME और फेकिंग न्यूज़ का फैक्ट चेक करना तो दी लल्लनटॉप के मूल्यों का पहला सबक है ही। एक बार तो लल्लनटॉप पाद के महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर भी साहित्य लिखकर पत्रकारिता के स्वर्णिम कीर्तिमान रचे थे – दी लल्लनटॉप की ‘सेक्यूलरियत’ का सच से सबसे नजदीकी सामना तब हुआ था जब उन्होंने शूटिंग कर रहे कुछ कलाकारों को मुस्लिम पर हो रहा अत्याचार बताकर दी लल्लनटॉप और उनकी टीम ने जमकर सेक्युलर साहित्य लिखा था। सौरभ द्विवेदी और उनके दी लल्लनटॉप गिरोह की पत्रकारिता के मूल्य इतने ऊँचे हैं कि कई बार उन्हें खुद उन तक पहुँचने में समस्याओं का सामना करना पड़ा है। मसलन, एक साल पुरानी खबर, जिसे पुलिस की जाँच में महीनों पहले फर्जी बता दिया गया था, को ठीक होली के ही दिन दोबारा इसलिए प्रकाशित किया गया ताकि होली को वीर्य का त्यौहार साबित कर कुछ सस्ती लोकप्रियता का जुगाड़ किया जा सके। ये पत्रकारिता के वही प्रतिमान हैं जो मजाक-मजाक में अपने पिताजी को ही कंडोम पहनने की सलाह दे बैठे थे। हालाँकि, इसके बाद उन्होंने एक सभ्य नागरिक और आदर्श बेटे की तरह इसे भी भूल ही बताया था। खैर, यहाँ पर अभी भी विंग कमांडर अभिनन्दन की निजी जानकारी पाकिस्तानियों को उपलब्ध करवाने वाली जैश-ए-पत्रकारिता का जिक्र करना बिलकुल ठीक नहीं होगा। यही नहीं, द लल्लनटॉप के दल में मौजूद हस्तियों ने तो मानो पीएचडी ही ऐसे विषयों में की है जो एकदम मारक मजा देते हैं और जो विषय फितरत से एकदम लल्लनटॉप हैं। नीचे दी गई एक रिपोर्ट की झलक इसका सबसे पुख्ता उदाहरण है – ब्रा, पैंटी और पेटीकोट ... लल्लनटॉप आज तक जो जमात-ए-लिबरल-गिरोह पितृसत्ता, लिपस्टिक नारीवाद, ब्रा, पैंटी और पेटीकोट से बाहर नहीं आ सकी है (मुद्दों से), वह आखिर अपने बालों में धार उतारने के लिए शीशा रोज सुबह किस आत्मविश्वास के साथ देख पाता होगा? ऐसे कई उदाहरण हैं, जब लिबरल गिरोह को पत्रकारिता के वास्तविक मूल्यों का पालन करते हुए, अपना आत्मविश्लेषण करने की जरूरत थी, लेकिन दी लल्लनटॉप के सौरभ द्विवेदी ने ऐसा नहीं किया। ऐसे भी कुछ उदाहरण हैं, जब सच के साथ खड़े रहने का दावा करने वाले सौरभ द्विवेदी और उनकी ‘टीम लल्लनटॉप’ महज ‘जय श्री राम’ और ‘जय बजरंगबली’ के नारे के प्रयोग को पढ़कर बिदक गई थी, लेकिन उन पर बात कभी बाद में और सही अवसर पर की जाएगी। फिलहाल रोहित जायसवाल की माँ कुछ कहना चाह रही हैं, दी लल्लनटॉप और उसके सम्पादक को उन्हीं पत्रकारिता के मूल्यों का वास्ता है, जिनका जिक्र उन्होंने ऑपइंडिया की रिपोर्ट का कथित तौर पर फैक्ट चेक करते हुए किया था, कि वो उनकी बात सुनकर अपने चिरपरिचित अंदाज में उस पर भी अपने विचार रखें। साथ ही कम से कम 15 साल के मृतक पुत्र की माँ या पिता को सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाला ना ठहराएँ।