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ब्रा, पैंटी, योनि, सेक्स, लिंग, वीर्य से करियर बनाने वाले लल्लनटॉप, संपादक के पत्रकारिता वाले कुछ प्रयोग

पत्रकारिता लल्लनटॉप गोपालगंजसौरभ द्विवेदी-लल्लनटॉप
एक तरफ देश कोरोना जैसी माहमारी से लड़ रहा है, लेकिन कुछ दी लल्लनटॉप जैसे मीडिया ब्रा,पैंटी आदि में फंसे जा रहे हैं। केंद्र सरकार के प्रयासों पर विवाद करने पर इन जैसे मीडिया को लोगों के गुस्से का सामना करने के कारण अब इन्होने महिलाओं के अंतर्वस्त्रों पर अपनी पत्रकारिता केंद्रित कर ली है। शर्म करो भाई। 
ब्रा, पैंटी, लिंग, लिपस्टिक.. इन जैसे ही कुछ मिलते-जुलते विषयों में अगर आप रूचि रखते हैं तो आपकी पहली मंजिल दिल्ली पालिका बाजार या सरोजिनी मार्किट नहीं बल्कि दी लल्लनटॉप होना चाहिए।
लेकिन आप दी लल्लनटॉप की क्षमताओं को आँकने की जल्दबाजी भी नहीं कर सकते क्योंकि आज के दौर में जब सड़क, मोहल्लों में बसे हुए हाशमी दवाखाने विलुप्त होने के कगार पर हैं, ऐसे में पत्रकारिता का हाशमी दवाखाना बनकर दी लल्लनटॉप ही विलुप्त होती इस दुर्लभ सभ्यता का खेवनहार बना था।
सवाल ये है कि आखिर टाइम मशीन में जाकर जर्मन तानाशाह हिटलर के लिंग की नाप ढूँढकर ‘पत्रकारिता की गरिमा’ बचाने का दावा करने वाली जमात-ए-लल्लनटॉप आखिर एकबार फिर चर्चा का विषय क्यों बने हैं?
इसका उत्तर यह है कि ‘दी लल्लनटॉप’ के सम्पादक सौरभ द्विवेदी ने जिस द्वेष भावना को पत्रकारिता के मानकों के ऊपर रखकर पत्रकारिता सिखाने का दावा ऑपइंडिया की एक रिपोर्ट के एक कथित फैक्ट चेक, में ‘हाथों ही हाथों’ की कला से किया है, उसने ‘द लल्लनटॉप’ को सस्ती लोकप्रियता दिलाने का काम किया है।
अब बारी ‘द लल्लनटॉप’ के इस फर्जी फैक्ट चेक के वास्तविक फैक्ट चेक की आ चुकी है, क्योंकि गोपालगंज के मृतक बालक की माँ के सबसे ताजा बयान भी अब मीडिया में है।
शोषित और गरीब वर्ग की वास्तविकता को ‘प्रोपेगेंडा’ का नाम देने वाले सौरभ द्विवेदी अपने फैक्ट चेक में इस बात का जिक्र तो करते हैं कि वह पत्रकारिता के नियम, कायदे कानून जानते हैं, लेकिन वह कैमरा के सामने हाव-भावों पर ज्यादा ध्यान देने के चक्कर में यही ज्ञान देते हुए इस बात को खुद पर लागू करना भूल गए।
कुछ दिनों से सोशल मीडिया से लेकर जमात-ए-पत्रकारिता गैंग के बीच एक खबर ने जमकर अपने लिए जगह बनाई, वो ये कि गोपालगंज में मृतक बालक का अनकहा पक्ष रखने के लिए ऑपइंडिया पर FIR दर्ज हुई है।
लेकिन इस गिरोह ने बेहद शातिराना तरीके से यह बात सामने नहीं रखी कि यह FIR किसी तथ्य के कारण नहीं बल्कि एक विचार और वास्तविकता के विरोध के फलस्वरूप की गई थी। वास्तविकता यह कि जिस बच्चे को मार दिया गया था, उसके परिवार के पक्ष को, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और ‘एक महीने पुरानी खबर’ जैसे तथ्यों को बीच से गायब कर दिया गया।
ऑपइंडिया के रिपोर्टर ने जब इस पहलू की ओर मीडिया का ध्यान दिलवाने की कोशिश की तो वर्षों से कुंठित मीडिया के लिबरल-गिरोह के विरोध का वो सैलाब उमड़ पड़ा, जो बस ऐसे ही एक अवसर की तलाश में था।
फैक्ट चेकर्स ने दावा किया कि ऑपइंडिया ने साम्प्रदायिक रंग देने का प्रयास किया है। लेकिन आज ही रोहित जायसवाल की माँ ने पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा है कि उनके बेटे का पोस्टमॉर्टम तक भी ठीक से नहीं किया गया। लाश को छुआ तक नहीं गया और रिपोर्ट बना दी गई। थानाध्यक्ष अश्विनी तिवारी ने आरोप वापस लेने के एवज में रोहित के पिता को 4 लाख रुपए दिलाने का प्रलोभन दिया था।
हिटलर का लिंग नापने वाली वेबसाईट ‘द लल्लनटॉप’ के सम्पादक और फैक्ट चेकर सौरभ द्विवेदी अपने इस तथाकथित फैक्ट चेक में कई दावे करते देखे गए। इनमें से एक यह भी था कि ऑपइंडिया एक प्रोपेगेंडा वेबसाइट है। लेकिन असल संघर्ष सौरभ द्विवेदी का यहाँ से शुरू होता है।
प्रोपेगेंडा का असल मकसद विरोधी विचार को कुचल देना होता है। ऐसी हर आवाज, जो आकार लेती नजर आ रही हो, उसे येन-केन-प्रकारेण झूठा साबित करना वामपंथी गर्भ से सीखकर नहीं आते, बल्कि उस इकोसिस्टम का हिस्सा बनकर सीखते हैं, जिसकी वाह-वाही के लिए वो एक मृतक बेटे की माँ के बयान को प्रोपेगेंडा का हिस्सा बताते हैं।
कुत्सित मानसिकता 
ऑपइंडिया पर पिछले कुछ दिनों में इसी खबर को लेकर खूब आरोप लगाए गए। लेकिन पत्रकारिता के मापदन्डों को लेकर त्राहिमाम करने वाले ये लोग क्या यह दावा उसी आत्मविश्वास के साथ मृतक रोहित जायसवाल की माँ के सामने जा कर सकते हैं कि उनकी कही गई बातें प्रोपेगेंडा का हिस्सा हैं और वो अपने बेटे की हत्या में हुई जाँच पर सवाल उठाकर समाज में साम्रदायिक सौहार्द बिगाड़ रही हैं?
ऑपइंडिया की रिपोर्ट का फैक्ट चेक करने का दावा करके अपनी छाती ठोकने वालों को क्या अब ऑपइंडिया की तरह ही रोहित जायसवाल की माँ पर भी एक FIR नहीं करनी चाहिए कि आखिर उन्होंने ऑपइंडिया की पहल के बाद अपने बेटे के लिए न्याय माँगने का साहस क्यों कर दिखाया, जबकि कैमरा के सामने खड़े ‘दी लल्लनटॉप’ के सम्पादक के हाथों में पास उनके बेटे की कथित हत्या की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट है?
क्या यह सिर्फ एक संयोग नहीं है कि इनके अपने प्रोपेगेंडा और व्यक्तिगत नैरेटिव से हटकर आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक को नकार देने वाला यह मीडिया गिरोह कुछ दिनों से बस एक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट हाथों में लेकर दुहाई देता फिर रहा है? द लल्लनटॉप को कम से कम रवीश कुमार के शब्दों को तो ध्यान से सुनना चाहिए कि मीडिया पर FIR मीडिया की स्वतन्त्रता को खत्म करता है।
सौरभ द्विवेदी से सीखिए पत्रकारिता 
हालाँकि, ऑपइंडिया ने इस स्वतन्त्रता का प्रयोग कभी भी रवीश कुमार, दी वायर, दी क्विंट या फिर दी लल्लनटॉप आदि की तरह सिर्फ संस्थाओं को बदनाम करने और कॉन्सपिरेसी थ्योरी गढ़ने के लिए नहीं किया।
ऑपइंडिया की रिपोर्ट का कथित फैक्ट चेक करने का दावा करने वाले सौरभ द्विवेदी ने अपने वीडियो में एक और दावा किया कि वो सच के साथ खड़े हैं और वो सिर्फ सच की ही बात करते हैं। आखिरी बार जब सौरभ द्विवेदी सच के साथ खड़े थे, तब उन्होंने पाया था की हिटलर के लिंग का आकार और नाप वो नहीं थी, जिसके बारे में ‘वोक-लिबरल’ बात करते हैं, बल्कि उसकी बात कुछ और ही थी।
इसके बाद जब दी लल्लनटॉप सच के साथ खड़ा था, तब वो हास्य-व्यंग्य पोर्टल द्वारा बनाई गई एक रिपोर्ट का फैक्ट चेक कर रहा था। इसके बाद पत्रकारिता के इस आखिरी मसीहा ने एक बार सारी जनता के सामने केंद्र सरकार की NPR-NRC नीतियों पर अपने पत्रकारिता के गुरु राजदीप सरदेसाई के साथ बैठकर खुलेआम झूठे आँकड़े पेश किए थे और पकड़े जाने पर बेहद बेशर्मी से यूट्यूब से वीडियो को ना हटाकर चुपके से इसके विवरण में इस ‘भूल’ के बारे में लिख दिया।
MEME और फेकिंग न्यूज़ का फैक्ट चेक करना तो दी लल्लनटॉप के मूल्यों का पहला सबक है ही। एक बार तो लल्लनटॉप पाद के महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर भी साहित्य लिखकर पत्रकारिता के स्वर्णिम कीर्तिमान रचे थे –
दी लल्लनटॉप की ‘सेक्यूलरियत’ का सच से सबसे नजदीकी सामना तब हुआ था जब उन्होंने शूटिंग कर रहे कुछ कलाकारों को मुस्लिम पर हो रहा अत्याचार बताकर दी लल्लनटॉप और उनकी टीम ने जमकर सेक्युलर साहित्य लिखा था।
सौरभ द्विवेदी और उनके दी लल्लनटॉप गिरोह की पत्रकारिता के मूल्य इतने ऊँचे हैं कि कई बार उन्हें खुद उन तक पहुँचने में समस्याओं का सामना करना पड़ा है। मसलन, एक साल पुरानी खबर, जिसे पुलिस की जाँच में महीनों पहले फर्जी बता दिया गया था, को ठीक होली के ही दिन दोबारा इसलिए प्रकाशित किया गया ताकि होली को वीर्य का त्यौहार साबित कर कुछ सस्ती लोकप्रियता का जुगाड़ किया जा सके।
ये पत्रकारिता के वही प्रतिमान हैं जो मजाक-मजाक में अपने पिताजी को ही कंडोम पहनने की सलाह दे बैठे थे। हालाँकि, इसके बाद उन्होंने एक सभ्य नागरिक और आदर्श बेटे की तरह इसे भी भूल ही बताया था।
खैर, यहाँ पर अभी भी विंग कमांडर अभिनन्दन की निजी जानकारी पाकिस्तानियों को उपलब्ध करवाने वाली जैश-ए-पत्रकारिता का जिक्र करना बिलकुल ठीक नहीं होगा।
यही नहीं, द लल्लनटॉप के दल में मौजूद हस्तियों ने तो मानो पीएचडी ही ऐसे विषयों में की है जो एकदम मारक मजा देते हैं और जो विषय फितरत से एकदम लल्लनटॉप हैं। नीचे दी गई एक रिपोर्ट की झलक इसका सबसे पुख्ता उदाहरण है –
ब्रा, पैंटी और पेटीकोट ... लल्लनटॉप  
आज तक जो जमात-ए-लिबरल-गिरोह पितृसत्ता, लिपस्टिक नारीवाद, ब्रा, पैंटी और पेटीकोट से बाहर नहीं आ सकी है (मुद्दों से), वह आखिर अपने बालों में धार उतारने के लिए शीशा रोज सुबह किस आत्मविश्वास के साथ देख पाता होगा?
ऐसे कई उदाहरण हैं, जब लिबरल गिरोह को पत्रकारिता के वास्तविक मूल्यों का पालन करते हुए, अपना आत्मविश्लेषण करने की जरूरत थी, लेकिन दी लल्लनटॉप के सौरभ द्विवेदी ने ऐसा नहीं किया।
ऐसे भी कुछ उदाहरण हैं, जब सच के साथ खड़े रहने का दावा करने वाले सौरभ द्विवेदी और उनकी ‘टीम लल्लनटॉप’ महज ‘जय श्री राम’ और ‘जय बजरंगबली’ के नारे के प्रयोग को पढ़कर बिदक गई थी, लेकिन उन पर बात कभी बाद में और सही अवसर पर की जाएगी।
फिलहाल रोहित जायसवाल की माँ कुछ कहना चाह रही हैं, दी लल्लनटॉप और उसके सम्पादक को उन्हीं पत्रकारिता के मूल्यों का वास्ता है, जिनका जिक्र उन्होंने ऑपइंडिया की रिपोर्ट का कथित तौर पर फैक्ट चेक करते हुए किया था, कि वो उनकी बात सुनकर अपने चिरपरिचित अंदाज में उस पर भी अपने विचार रखें। साथ ही कम से कम 15 साल के मृतक पुत्र की माँ या पिता को सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाला ना ठहराएँ।

कोरोना : दुनिया लॉकडाउन में लेकिन लल्लनटॉप ढूंढ रहा सेक्स पावर

इंडिया लॉकडाउन
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
संकट की इस घडी में कुछ मीडिया गैंग गैर-जिम्मेदारी फूहड़ पत्रकारिता कर रहे हैं। पता नहीं कब पत्रकारिता सीखेंगे। कहते अपने आपको गंभीर और खोजी पत्रकारिता के शहंशाह। और इन गंभीर गंभीर और खोजी पत्रकारों ने कोरोना जैसी संक्रामक बीमारी पर कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जैसी पत्रकारिता का नमूना देखिए। क्या ऐसे लोगों को पत्रकार कहना चाहिए? क्या इनकी किसी भी रिपोर्ट पर विश्वास किया जा सकता है? बेशर्मी की भी हद होती है।   
अगर आपको लगता है कि जब आप 21 दिन तक कोरोना के संक्रमण के खतरे से घर पर बैठे हुए हैं, और ऐसे में सिर्फ पुलिस और प्रशासन ही आम आदमी की मदद कर रहे हैं तो आप एक सौ एक प्रतिशत गलत हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो अपने दिमाग और हुनर का सौ प्रतिशत इस्तेमाल करके आजकल लोगों को घर बैठे मारक मजा दे रहे हैं। इनमें से कुछ चुनिन्दा नाम हैं- इन्टरनेट का हाशमी दवाखाना ये, दी लल्लनटॉप, छुपी हुई प्रतिभाओं का मंच टिकटोक और शाहीन बाग़ से गानों की प्रेक्टिस कर हाल ही में घर पर कैद हो चुके लेफ्टिस्ट सुर-कोकिलाएँ।
सबसे पहले बात करते हैं हाशमी दवाखाना की। हिटलर के लिंग की सटीक नाप बताकर चर्चा में आए दी लल्लनटॉप आजकल किलोमीटर के हिसाब से (लोकोक्ति) यूट्यूब पर वीडियो बनाते हुए देखे जा रहा है, इनमें से एक सबसे ज्यादा जोशीला वीडियो, जिसने घर पर बंद बैठे युवाओं का ध्यान आकर्षित किया, वो था – “सेक्स पावर बढ़ाने जैसी चाहत से आया कोरोना वायरस”
इस वीडियो की गहराई में जाने की जरूरत तो नहीं है लेकिन इस वीडियो को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस वायरस के खिलाफ वैक्सीन तैयार करने में जुटे हुए वैज्ञानिकों को तो दे ही देना चाहिए। अगर यह सम्भव ना हो तो इस विडियो की यूट्यूब लिंक कम से कम से कम नॉर्थ कोरिया को तो दे ही देनी चाहिए। क्योंकि जो लोग हिटलर की मौत के इतने वर्षों बाद भी उसके गुप्तांग पर पीएचडी कर सकते हैं, वो कोरोना के लिए कोई एंटीडॉट भी जरूर तैयार कर देंगे।
यही नहीं, दी लल्लनटॉप अपनी ऑडियंस का ख़ास ध्यान रखते हुए उनके मतलब का फैक्ट चेक करते हुए यह भी साबित करते हुए देखा गया है कि सरसों के तेल से कोरोना वायरस से बचाव नहीं हो पाता है। यह वो ऑडियंस है जो दैनिक सस्ते इन्टरनेट की पूरी डेढ़ जीबी या तो टिकटॉक, या फिर दी लल्लनटॉप के चरणों में ही समर्पित करती है।

 
दी लल्लनटॉप के बाद नम्बर आता है उसी की सम्पादकीय नीतियों से मिलते-जुलते एक अन्य वैचारिक मंच का, जिसे ‘फाल्ट न्यूज़’ के वैज्ञानिकों ने मानव सभ्यता के लिए हुई सबसे बड़ी खोज में शरीक माना है- TikTok। किसने सोचा था कि ट्विटर और फेसबुक पर दिन-रात टिकटोकवासियों पर चुटकुले बनाने वाले लॉकडाउन की घोषणा के अगले ही मिनट पहली फुर्सत में अपने मोबाइल पर टिकटॉक इनस्टॉल करते हुए देखे जाएँगे।
यदि टिकटॉक सभ्यता का समय पर पता न चलता तो विश्व की कुछ चुनिन्दा उन्नत सभ्यताओं में से एक यह टिकटॉक भी आज विलुप्त हो चुकी होती। कुछ सूत्रों का तो यह भी कहना है कि चीन ने हमें सिर्फ वामपंथ और कोरोना जैसे वायरस ही नहीं दी बल्कि टिकटॉक भी दिया है इसलिए हमें उनका शुक्रगुजार होना चाहिए। एवेंजर्स फिल्म में थानोस ने भी कहा था कि यही ब्रह्माण्ड का संतुलन है।
इसके बाद नम्बर आता है उस हस्ती का जिसके आप दीवाने हैं। यह नाम है उस स्वर कोकिला का, जिसने तीन महीने तक शाहीन बाग़ में कुछ कविताओं की रिहर्सल तो की लेकिन करमजले कोरोना ने उसकी इस सारी तैयारियों पर पानी फेर दिया। अब उन्होंने इसका बदला लेने का खुद को वचन दे दिया है और लॉकडाउन के दौरान रोजाना ट्विटर पर अपनी सुरीली नज्में पोस्ट कर के लोगों को लॉकडाउन की बोर जिन्दगी में बाहर लाने की कोशिश कर रही हैं। हालाँकि, राष्ट्रवादी किसी का एहसान मानते नहीं हैं लेकिन वह अनवरत रूप से अपने कर्तव्यपथ पर आगे बढ़ रही हैं।
एक नाम, जिसने सोशल मीडिया पर कोरोना वायरस जितना ही समानांतर आपदा को जारी रख रखा है, वह है वाट्सएप यूनिवर्सिटी के कुलपति रवीश कुमार। रवीश कुमार ने जिस महामारी का नेतृत्व किया है, वह कोरोना से भी कई वर्ष पहले से सोशल मीडिया पर मौजूद थी, बस लोग इसकी मारक क्षमता से अनजान थे। यकीन ना हो तो खुद देख लो –
घर से निकलते ही –










कुछ दूर चलने बाद 

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