2014 में मोदी सरकार बनने से पूर्व आतंकवादी हमला होने पर हमारी सरकार अमेरिका आदि देशों के आगे गिरगिराया करती थी, लेकिन सत्ता परिवर्तन होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विश्व के सम्मुख आतंकवाद की आवाज़ उठाने पर पाकिस्तान के अलावा समस्त विश्व मोदी के पीछे खड़ा हो गया। लेकिन राजनीतिक संरक्षण मिलने के कारण यहाँ स्लीपर सेल की कमी नहीं। 1961 इंडो-चीन युद्ध हो या फिर 1965 इंडो-पाक युद्ध गवाह हैं कि कितने ग़द्दार सामने आये थे। वर्तमान पीढ़ी के लिए अफवाह हो सकती है लेकिन जब आतंकवाद पर मोदी सरकार द्वारा आतंकवाद पर एयर और सर्जिकल स्ट्राइक करने पर सरकार के साथ खड़े होने की बजाए दुश्मन देश की बोली बोलने वालों को तो देखा यानि सबूत मांगने वाला गैंग। खैर, इजराइल सुप्रीम कोर्ट की तर्ज पर क्या भारत सरकार और अदालतें निर्णय लेने का साहस कर सकती हैं?
इजरायल का जन्म फिलिस्तीन से हुआ है। दोनों देशों की सीमाएँ लगती हैं। इजरायल और फिलिस्तीन के बीच सीमा विवाद नया नहीं है। आए दिन युद्ध की स्थितियाँ बनी रहती हैं। इस बीच इजरायल के सुप्रीम कोर्ट ने देश की सुरक्षा के मद्देनजर 21 जुलाई 2022 को एक फैसला सुनाया कि देश के प्रति वफादार नहीं रहने वाले फिलिस्तीनी नागरिकों की नागरिकता को छीन लिया जाएगा। इसमें ऐसे लोग शामिल हैं, जो कि इजरायल के खिलाफ जासूसी और आतंक जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।
फ्रांस में जिहादी ने एक नागरिक का गला काटा तो सरकार ने 5 कानून बदल दिया Those who support Zubair are posting selfies with him
भारत में जिहादियों ने सैकड़ों लोगों की हत्या कर दिया लेकिन सरकार ने एक भी कानून नहीं बदला
शठे शाठ्यम समाचरेत
लोहा ही लोहे को काटता है
कठोर कानून ही जिहाद का स्थाई इलाज है@narendramodi @AmitShah
Those who support Nupur Sharma are losing their lives
Conclusion: Hindus are intolerant
इजरायल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार, देश में आतंकवाद, जासूसी या राजद्रोह सहित देश के प्रति ‘वफादारी का उल्लंघन’ करने वाले व्यक्तियों की नागरिकता को रद्द कर सकता है। हालाँकि, मानवाधिकार संगठनों को इस बात की आशंका सता रही है कि कोर्ट के इस फैसले को केवल गैर यहूदी नागरिकों पर थोपा जाएगा।
ये फैसला इजरायल में 2008 के नागरिकता कानून को संबोधित करते हुए दिया गया है। इसमें राज्य को ‘वफादारी का उल्लंघन’ करने वाले कार्यों के आधार पर नागरिकता रद्द करने का अधिकार दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला इजरायल के दो फिलिस्तीनी नागरिकों के मामलों में अलग-अलग अपीलों के बाद आया था, जिन्हें इजरायली नागरिकों पर हमलों को अंजाम देने का दोषी ठहराया गया था। दोनों को लंबी सजा सुनाई गई, लेकिन राज्य ने उनकी नागरिकता छीनने की कोशिश की।
मुस्लिमों को सताया डर
इजरायल के सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से मुस्लिमों के लिए काम करने वाले संगठनों में नाराजगी है। इसी क्रम में इजरायल में नागरिक अधिकारों के लिए एसोसिएशन और एक अरब अधिकार समूह अदलाह ने इसकी आलोचना की। संगठन ने कोर्ट के फैसले को भेदभावपूर्ण करार देते हुए आशंका व्यक्ति की कि इसका इस्तेमाल इजरायल के फिलिस्तीनी नागरिकों खिलाफ विशेष रूप से इस्तेमाल किया जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक, इजरायल के लगभग 20% नागरिक फिलिस्तीनी हैं।
दुनिया के कई देशों में ऐसे कानून हैं, जिनके जरिए किसी विशेष मामले में दोषी पाए जाने पर व्यक्ति की नागरिकता को खत्म करने की इजाजत है। बीते दो दशक से आतंकवाद के खिलाफ युद्ध के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। हालाँकि, सरकारों की इस नीति को काफी विवादित माना जाता है। अंतरराष्ट्रीय कानून किसी देश की सरकार को उसके नागरिकों की नागरिकता की स्थिति को रद्द करने से रोकता है।

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