वट सावित्री व्रत का पूजन 19जून को विधि-विधान से होगा। इस दिन सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ की पूजा कर फेरें लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों । प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव इस देश में सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी कहता है। ये तो छद्दम धर्म-निरपेक्षों दूसरे अर्थों में कहा जाये तो "वर्तमान के जयचंद" का बस चला नहीं, वरना ये सनातन विरोधी करवाचौथ की तरह इस त्यौहार पर भी कीजड़ फेंकने से बाज़ नहीं आते। आज आधुनिकता के नाम पर सनातनी परम्परा को छोड़ पश्चिमी सभ्यता के त्यौहार जैसे Mothers' Day, Fathers' Day, Sisters' Day, Brothers'Day आदि मनाने में खुश होते हैं, जबकि हमारे सनातनी में एक से बढ़कर एक ऐसे त्यौहार हैं, जिनमें माता-पिता, भाई-बहन, मित्रता आदि का भाव देखने को मिलता है, जिसकी विश्व में कहीं कोई तुलना नहीं। खैर, अब कल 19 जून को सुहागिन महिलाओं द्वारा मंगलकारी त्यौहार पर विचार करते हैं। जिसकी महानता करवाचौथ से काम नहीं। यह वह व्रत है, जो हमें शिक्षा देता है कि कैसे एक सुहागिन सावित्री यमराज देवता को उसका सुहाग वापस करने के लिए विवश कर देती है। इसलिए महान है वट वृक्ष पूजा का त्यौहार।
सनातन धर्म के धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसे व्रत त्योहारों का उल्लेख मिलता है जिन्हें करना सौभाग्य माना जाता है. इन्हीं में से एक है वट सावित्री व्रत। इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान बरगद के पेड़ में कच्चा सूत लपेटने की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रलय के अंत में भगवान कृष्ण भी वट वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे। इसके अलावा इस दिन शनि जयंती और ज्येष्ठ अमावस्या भी पड़ रही है। इस वर्ष वट सावित्री व्रत पर ग्रहों की स्थिति बेहद खास होने वाली है। इस दिन शनिदेव अपनी स्वयं की राशि कुंभ में विराजमान होंगे. जिससे शश योग का निर्माण होगा। ऐसे में इस दिन शनि देव की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति की जा सकती है।
वट वृक्ष बरगद को जल चढ़ाना केवल एक प्रथा नहीं बल्कि सुख शांति तरक्की का माध्यम है। प्रश्न यह भी होता है कि वट वृक्ष बरगद ही क्यों? सनातन धर्म में अन्य दूसरे वृक्षों में पीपल और वट वृक्ष बरगद को सबसे पवित्र एवं दीर्घ आयु वाले वृक्ष हैं। इन दोनों ही वृक्षों में परमपिता विष्णु का वास होता है। इसी कारण वट वृक्ष बरगद को ही पूजा जाता है। इन वृक्षों की महानता का वर्णन वेद और पुराणों में भी किया गया है।
ऐसी मान्यता है कि इसी दिन देवी सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। सनातन परंपरा में वट सावित्री पूजा स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे करने से हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त होता है।
कथाओं में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है।
जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।
सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, आम फल और मिठाई से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री, सत्यवान और यमराज की कथा श्रवण कर पूजा करें। ब्राह्मण देव को दक्षिणा आदि सामग्री दान करें।
वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल से सींचें। इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए कम से कम तीन बार, 5 बार, 8 बार, 11 बार, 21 बार, 51, 108 जितनी परिक्रमा कर सके करें। पूजा के बाद वटवृक्ष से सावित्री और यमराज से पति की लंबी आयु एवं संतान हेतु प्रार्थना करें।
बरगद की पूजा
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वटवृक्ष की पूजा का विधान है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन
वटवृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और
सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
बरगद के पेड़ को वट का वृक्ष कहा जाता है।
पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वटवृक्ष की
जड़ों में ब्रह्माजी, तने में विष्णुजी और डालियों
एवं पत्तों में शिव का वास है। इसके नीचे बैठकर
पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।
हिन्दू धर्मानुसार 5 वटवृक्षों का महत्व अधिक
अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट
इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त 5 वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है।
प्रयाग में अक्षयवट,
नासिक में पंचवट,
वृंदावन में वंशीवट,
गया में गयावट
और
उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है।
जहाँ प्रत्येक चौदस अमावस्या के पहले वाली तिथि को पित्रो को दूध अर्पित किया जाता है।
मानस से-
तहं पुनि संभु समुझिपन आसन।
बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक
कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।
वट और पीपल के वृक्ष पहले बहुत लगाये जाते थे, ये धर्म से जुड़ा हुआ वृक्ष है, लेकिन आज वर्तमान के लिए यह वृक्ष अति आवश्यक है। क्या आप जानते हैं कि वर्तमान में पड़ रहे सूखे, अत्यधिक गर्मी और प्रदूषण की वजह क्या है?
आज प्रदूषण के नाम पर जनता को गुमराह किया जा रहा है। वास्तव में बरगद और पीपल के वृक्षों की कमी होना।
विकास के नाम पर इस प्रकार के बड़े पेड़ों को काटना, इनके नए पेड़ नहीं लगाना, इन पेड़ों के संरक्षण, संवर्धन में कमी।।
आप को लगेगा अजीब बकवास है किन्तु यही अटल सत्य है.. .।
पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द कर दिया गया है।
पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड को 100% सोख लेता है, बरगद़ 80% और नीम 75 %
हमने इन पेड़ों से दूरी बना लिया तथा इसके बदले यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो जमीन को जल विहीन कर देता है।
अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नही रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही ।
हर 500 मीटर की दूरी पर एक बरगद का, पीपल का पेड़ लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त हिन्दुस्तान होगा।
वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए, बरगद और पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है जिसकी वजह से शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं। वैसे भी बरगद और पीपल को वृक्षों का राजा कहते है।
इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए-
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,वृक्षराज नमस्तुते।
भावार्थ तो समझ ही गए होंगे।
अब करने योग्य कार्य
इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगायें तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगाया जाये इसके साथ नीम और आम के पौधे भी लगाएं । हर शहरों में ऐसा नियम बनाया जाये की हर घर के आसपास पेड़ जरूर लगाना है, जैसे वाटर हार्वेस्टिंग को जरूरी नियम बनाया गया है वैसे ही हर घर में वृक्ष का नियम भी होना चाहिए।
जिसके घर में ये बड़े पेड़ लगाने की जग़ह न हो वह तुलसी जी का पौधा जरूर लगाये*
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