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आंध्र प्रदेश : लेपाक्षी मंदिर : एक ‘हवा में झूलता स्तम्भ‘ : मोदी ने किए दर्शन और सुनी चौपाइयाँ: जानिए अयोध्या से इस स्थान का क्या है कनेक्शन

                                          मंदिर में मौजूद पीएम मोदी (चित्र साभार: BJP4India)
अयोध्या में नवनिर्मित भगवान राम के मंदिर में 22 जनवरी 2024 को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आंध्र प्रदेश के लेपाक्षी में स्थित वीरभद्र मंदिर में दर्शन करने पहुँचे। रामायण में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले इस मंदिर में प्रधानमंत्री काफी देर तक रुके। प्रधानमंत्री मोदी ने मंदिर में जाने के बाद रामायण के तेलुगु स्वरुप रंगनाथ रामायण से चौपाइयाँ भी सुनीं।

लेपाक्षी शहर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में स्थित है और कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु से लगभग 120 किलोमीटर दूर है। लेपाक्षी धार्मिक एवं ऐतिहासिक वैभव से भरपूर एक नगर है। यह भारत की समृद्ध वास्तुकला और आध्यात्मिक विरासत को दर्शाता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार, यह वही स्थान है जहाँ भगवान श्रीराम लगभग मृतप्राय जटायु से मिले थे।

राक्षस रावण वह माता सीता को अपहृत करके लंका ले जा रहा था, उस दौरान जटायु ने बड़ी वीरता से लड़ाई लड़ी थी। बताया जाता है कि लेपाक्षी में ही जटायु ने प्रभु राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण को बताया था कि माता सीता का अपहरण कर रावण लंका ले गया है। जटायु ने प्रभु राम से कहा था कि उन्हें माता सीता के पास पहुँचने के लिए समुद्र तट की तरफ बढ़ना चाहिए।

                                   लेपाक्षी में स्थित जटायु की एक मूर्ति (चित्र साभार: NDTV)

इस नगर का नाम लेपाक्षी तेलुगु भाषा का शब्द है। इसका अर्थ होता है, ‘उठो हे पक्षी’। यह जटायु को एक श्रद्धांजलि है, जिन्होंने माता सीता को राक्षस रावण द्वारा अपहरण किए जाने से बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। इस नगर में कई हिन्दू मंदिर हैं। यह मंदिर पौराणिक महत्व के हैं।

                                                      वीरभद्र मंदिर (चित्र साभार: The Hindu)

यहाँ भगवान शिव, विष्णु, पापनाथेश्वर, रघुनाथ श्रीराम और अन्य देवताओं के मंदिर हैं। यहाँ मंदिरों पर की गई नक्काशी और इनकी विहंगमता देखकर श्रद्धालु चकित हो जाते हैं। वीरभद्र मंदिर के खम्भों पर महीन नक्काशी हो या फिर दुनिया के सबसे बड़े नंदी की मूर्ति, विजयनगर राजवंश के कारीगरों का शिल्प कौशल यहाँ की शोभा बढ़ा रहा है।

लेपाक्षी में आकर्षण का मुख्य केंद्र वीरभद्र मंदिर है, जिसे सामान्यतः लेपाक्षी मंदिर के नाम से ही जाना जाता है। यह मंदिर भारत की अद्भुत शिल्पकला के इतिहास का प्रमाण है। यह मंदिर चट्टानों को काटकर बनाया गया है। यह विजयनगर साम्राज्य की भव्यता को भी दिखाता है।

लेपाक्षी मंदिर तब की कला का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यह मंदिर उत्कृष्ट भित्तिचित्रों से भी सुसज्जित है। मंदिर परिसर का एक हिस्सा एक चट्टानी पहाड़ी पर स्थित है, जिसे कुर्मासैलम के नाम से जाना जाता है। यह हिस्सा कछुए के आकार की तरह दिखता है।

मंदिर के महत्वपूर्ण आकर्षणों में से एक ‘हवा में झूलता स्तम्भ‘ है। यह मंदिर के अन्य स्तम्भों जैसा ही है, लेकिन यह भूमि को नहीं छूता है। इस मंदिर में माता सीता के पदचिह्न मिलने की भी बात कही जाती है। यह मंदिर विजयनगर साम्राज्य की भव्यता को दर्शाता है, जो कि कभी दक्षिण के बड़े हिस्से पर राज किया करता था। विजयनगर साम्राज्य ने अपने पूरे राज्य में मंदिर बनवाए थे।

विजयनगर साम्राज्य ने ही वीरभद्र मंदिर की दीवालों पर भी भित्ति चित्र बनवाए थे। मंदिर की दीवालों पर बने भित्ति चित्र माता पार्वती, भगवान गणेश, भगवान शिव, संतों और संगीतकारों के चित्र दर्शाता है। मंदिर के अन्दर 70 स्तम्भ मौजूद हैं, जबकि इसके अंदर स्थित एक गुफा संत अगस्त्य का निवास स्थान मानी जाती है।

यहाँ साँप की एक प्रसिद्ध मूर्ति भी है, जिसे माना जाता है कि मूर्तिकारों के दोपहर के खाने के दौरान एक ही चट्टान से बनाया गया था। इसके अलावा, पास की पहाड़ियों पर पापनाथेश्वर, रघुनाथ, श्रीराम और दुर्गा के मंदिर बने हुए हैं। इन पहाड़ियों को कुर्मासैला के नाम से जाना जाता है।

स्वतंत्रता का प्रतीक ‘सेंगोल’, जब संविधान में श्रीराम-श्रीकृष्ण विराजमान, लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए बदल दिया वेदों की भूमि का इतिहास

                यही है वो 'सेंगोल', जिसे चोल काल में सत्ता हस्तांतरण के लिए इस्तेमाल किया जाता था (फाइल फोटो)
मोदी विरोधियों द्वारा संसद के नए भवन के उद्घाटन के विरोध करने को गंभीरता से लेना चाहिए। ये मोदी विरोध नहीं बल्कि सनातन का विरोध का है। ये विरोध कई विरोधों का भी पटाक्षेप करता है। दोगले नेताओं द्वारा अक्सर यह कहते सुना जाता है कि 'देश संविधान से चलेगा', सत्य वचन, क्योकि जब संविधान में श्री राम और श्रीकृष्ण के चित्र विराजमान हैं, देश उन्ही के अनुसार चलना चाहिए, लेकिन जनता जिन्हें जनहितैषी मानती रही, वह सनातन विरोध कर भारतीय संस्कृति और सनातन का अपमान करते रहे हैं। यदि ये सनातन विरोधी विरोध करने की बजाए सम्मिलित हो जाते हैं, फिर इनका तुष्टिकरण कार्ड पूर्णरूप से फेल हो जाता। 

अब ज्वलंत प्रश्न है कि "क्या विरोध करने वाले अब नए संसद भवन में जायेंगे या फिर चुनाव प्रक्रिया का भी हमेशा के लिए बहिष्कार करेंगे, क्योकि जीतने के बाद भी इसी भवन के प्रांगण में ही जाना है?" जनता इनसे पूछे कि अपनी तुच्छ सियासत के लिए गौरवशाली चोल साम्राज्य को धूमिल करने का दुस्साहस क्यों किया? जब संविधान में श्रीराम और श्रीकृष्ण के चित्र हो उन्हीं के जन्मस्थलों को क्यों विवादित बनाया? जो कुर्सी की खातिर अपने धर्म का नहीं हुआ, वह किसी भी धर्म/मजहब का नहीं हो सकता। 

भारत सनातन की भूमि है। ये वेदों की भूमि है। ये धरती है भगवान श्रीराम की, श्रीकृष्ण की, रामायण-महाभारत की। ये वो भूमि है जहाँ वेद व्यास और वाल्मीकि जैसे विद्वान ऋषि एवं लेखक हुए। जिस महाराज भरत के नाम पर इस देश का नामकरण हुआ, उनका जिक्र भी पुराणों से ही आया है। आजकल इनकी चर्चा करने पर कह दिया जाता है कि ये सब तो हिन्दू धर्म की बातें हैं, इनसे भय का माहौल बनता है और एक सेक्युलर देश में ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए।

हम ये क्यों नहीं सोचते कि ये चीजें भारतीय पहले है, बाद में धार्मिक। क्या इस देश का नाम सिर्फ इसीलिए बदल दिया जाए क्योंकि ये पुराणों में वर्णित एक राजा के नाम पर है? रामायण-महाभारत भारत भूमि की कथाएँ हैं, इतिहास हैं, बाद में इसमें हिन्दू धर्म आता है। यहाँ रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और जगद्गुरु श्रीकृष्ण पर गौरव होना चाहिए, क्योंकि वो इसी भूमि पर मानवता के नए मूल्य स्थापित कर के गए, जीवन की कई समस्याओं का समाधान बता कर गए।

ये कितना बेहूदा तर्क है कि ‘जय श्री राम’ या ‘जय श्री कृष्ण’ नहीं बोलना चाहिए, क्योंकि इस देश में अन्य मजहबों के लोग भी रहते हैं। अमेरिका का राष्ट्रपति बाइबिल पर हाथ रख कर शपथ लेता है, इंग्लैंड के राजा का राज्याभिषेक ईसाई पादरियों की निगरानी में होता है और मलेशिया जैसे लोकतांत्रिक मुल्क का भी आधिकारिक मजहब इस्लाम वहाँ के संविधान में वर्णित है। फिर भारत में यहाँ के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं का पालन करना, इसकी चर्चा करना और इस पर गौरव करना कैसे ‘सेक्युलर’ विचारधारा के विपरीत हो गया?

‘सेंगोल’: भारतीय परंपरा का ऐसा प्रतीक जिसे नेहरू ने भुला दिया

उदाहरण के लिए, ‘सेंगोल’ को ही ले लीजिए। ये शब्द आजकल काफी चर्चा में है। ‘सेंगोल’ अर्थात, चोल वंश का राजदंड। इसे मुख्य पुरोहित द्वारा एक शासक को सौंपा जाता था, जिसके साथ ही उसके शासन का शुभारंभ हो जाता था। चोल साम्राज्य भारत के सबसे प्राचीन और सबसे लंबे समय तक राज करने वाले राजवंशों में से एक रहा है। 300 ईसापूर्व में भी इसका वर्णन मिलता है। 1500 से भी अधिक वर्षों तक इस राजवंश ने शासन किया।
11वीं शताब्दी में इस साम्राज्य ने अपने शिखर को छुआ। चेरा और पंड्या के अलावा चोल राजवंश ने दक्षिण भारत में अपनी प्रभुता स्थापित की और कई मंदिर बनवाए। सामान्यतः, चोल राजा शिवभक्त होते थे। यही कारण है कि ‘सेंगोल’ में सबसे ऊपर भगवान शिव के वाहन वृषभ की, नंदी की प्रतिमा है। तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर चोल राजवंश की निर्माण कला का सबसे उत्कृष्ट नमूना है। राजेंद्र चोल को इस राजवंश का सबसे महान शासक माना जाता है।
                                             ऐसा दिखता है ‘सेंगोल’, जो था चोल वंश का राजदंड
जब से ये सामने आया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस ‘सेंगोल’ को ग्रहण किया जाएगा और इसे नए संसद भवन में स्थापित किया जाएगा, तब से एक बार फिर से ‘सेक्युलरिज्म’ का नाम लेकर रोना-धोना शुरू हो गया है। न तो वेद विदेशी है और न ही ‘सेंगोल’, जब दोनों ही भारतीय परंपरा और सभ्यता का हिस्सा रहे हैं तो फिर ऐसी चर्चा क्यों हो रही है कि इससे ‘सेक्युलरिज्म’ को नुकसान पहुँचेगा? ‘सेंगोल’ तो न्यायप्रियता, सत्य और शक्ति का प्रतीक है।
वेदों की धरती पर अगर वैदिक मंत्रोच्चार नहीं होने तो क्या फिर अरब और यूरोंप की परंपराएँ उधार ली जाएँगी? हाल ही में हम सबने देखा कि कैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के पीएम एंथोनी अल्बानीज सिडनी स्थित कुडोस बैंक एरिना में प्रवासी भारतीयों के कार्यक्रम में पहुँचे तो वहाँ वैदिक मंत्रोचार के साथ उनका स्वागत किया। जब आसट्रेलिया में इससे कोई समस्या नहीं है तो फिर वेदों की धरती पर वेद से किसी को दिक्कत क्यों?
आगे बढ़ने से पहले ‘सेंगोल’ के बारे में थोड़ा और जान लेते हैं। इसके लिए हमें चलना होगा तब के ज़माने में, जब इस देश को आज़ादी मिल गई थी और बस इसकी औपचारिकता बाक़ी थी। इस देश का दुर्भाग्य है कि जब पंडित जवाहरलाल नेहरू से अंग्रेजों के अंतिम गवर्नर-जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने पूछा कि आपके देश में सत्ता हस्तांतरण को लेकर क्या रीति-रिवाज हैं, तो नेहरू को कुछ जवाब नहीं सूझा। आखिर वो ‘सेक्युलर’ जो ठहरे!
जवाहर लाल नेहरू ने भले ही ‘भारत: एक खोज’ लिखी, लेकिन ये आश्चर्य की बात है कि इस धरती की परंपराओं को आगे बढ़ाने में उन्हें शर्म महसूस होती थी। उन्होंने ‘स्वतंत्रता पार्टी’ के संस्थापक रहे चक्रवर्ती राजगोपालचारी से इस बारे में पूछा, जो भारतीय संस्कृति की गहरी समझ रखते थे। चक्रवर्ती राजगोपालचारी बाद में भारत के गवर्नर-जनरल और गृह मंत्री भी बने। उन्होंने इस समस्या का समाधान ‘सेंगोल’ के रूप में किया।
जवाहरलाल नेहरू से ज्यादा चिंता तो लॉर्ड माउंटबेटन को थी कि इस सत्ता हस्तांतरण की प्रतीकात्मकता क्या हो और इस समारोह को विशेष बनाने के लिए क्या किया जाए। इस तरह चोल राजाओं का एक विधि अनुष्ठान भारत की आज़ादी के सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम का हिस्सा बना। प्राचीन काल में गैर-ब्राह्मण ‘आधीनम्‌’ पुरोहितों द्वारा इस अनुष्ठान को संपन्न कराया जाता था। ये शैव संप्रदाय में आते थे। थिरुवावदुथुरई मठ से राजाजी के आग्रह पर स्वतंत्रता समारोह में परंपराओं के वहन का कार्य संभाला।
इस दौरान तमिल कवि संत थिरुज्ञानसंबंधर द्वारा रचित ‘कोलारु पदिगम’ का गायन किया गया। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच 14 अगस्त, 1947 को सेंगोल को जवाहर लाल नेहरू को सौंपा गया, पुरोहितों द्वारा इसे शुद्ध जल से पवित्र किए जाने के बाद। जिस ‘सेंगोल’ का उस समय इस्तेमाल हुआ था, उसे मद्रास के स्वर्णकार वुम्मिडि बंगारू चेट्टी ने हस्तशिल्प कारीगरी द्वारा बनवाया था। दुर्भाग्य है कि जवाहरलाल नेहरू और फिर कॉन्ग्रेस ने दशकों तक इस देश पर राज करने के बावजूद ‘सेंगोल’ को कभी याद नहीं किया। आखिर ‘सेकुलरिज्म’ जो खतरे में आ जाता।
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात तो ये है कि तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी DMK भी नए संसद भवन के उद्घाटन के बॉयकॉट कर रही है। उन्हें तो खुश होना चाहिए, जिस तमिलनाडु की जनता ने उन्हें चुना है उस तमिल संस्कृति को दिल्ली में अपना कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का ध्येय लेकर चल रहे हैं। जो लोग दक्षिण भारत में क्षेत्रीय कट्टरवादी विचारधारा को पोषण देते हैं और आर्य-द्रविड़ वाले खेल से भारतीय समाज को विभाजित करने का उपक्रम चलाते हैं, उन्हें भला ‘सेंगोल’ का दिल्ली में स्थापित किया जाना कैसे पसंद आएगा?
‘सेंगोल’ तमिलनाडु को दिल्ली से जोड़ रहा है। ‘सेंगोल’ चोल राजवंश की अनुष्ठान परंपरा को जीवंत कर रहा है। ‘सेंगोल’ भारत के इतिहास, प्राचीन सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक बन कर सामने आ रहा है। ‘सेंगोल’ की स्थापना वेदों की इस भूमि पर वैदिक रीति-रिवाजों का सम्मान है। ‘सेंगोल’ हजारों वर्ष पुरानी इस जीवंत सभ्यता की समृद्धि का प्रतीक है। ‘सेंगोल’ सत्ता को शिव से जोड़ता है। ‘सेंगोल’ सत्ताधीशों को सत्य और न्याय की याद दिलाता रहेगा।

जिस संविधान की देते हैं दुहाई, उसमें भी भगवान श्रीराम

आपने अक्सर ‘सेक्युलर’ ब्रिगेड को बात-बार पर संविधान की चर्चा करते हुए देखा होगा। भारतीय संस्कृति के हर प्रदर्शन को वो संविधान से जोड़ कर कहने लगते हैं कि इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है। लेकिन, ये लोग भूल जाते हैं कि उसी संविधान की मूल प्रति में भगवान श्रीराम की तस्वीर है। आज ‘जय श्री राम’ को असंवैधानिक ठहराने की हर कोशिश हो रही है। संविधान भारतीय कलाकृति का भी एक उत्कृष्ट उदाहरण है, आइए बताते हैं कैसे।
रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘विश्व भारती’ के कलाकारों ने इसे बनाया था, जिसमें 5 वर्ष लगे थे। भारत के संविधान की मूल प्रति में कलाकारी की शुरुआत सिंधु घाटी सभ्यता के प्रतीक वृषभ से होती है, अर्थात साँड़। इसे उस समय के सील पर देखा गया था, जो आज तक इतिहासकारों में चर्चा का विषय है। भारत के वैदिक युग को भी हमारे संविधान की मूल प्रति में दर्शाया गया है, एक गुरुकुल के रूप में। इसी तरह ‘मूलभूत अधिकारों’ वाला हिस्सा भगवान श्रीराम से शुरू होता है।
रामायण से जो तस्वीर ली गई है, उसमें भगवान श्रीराम, उनके भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता को वनवास के लिए जाते हुए दिखाया गया है। भगवान राम को अदालत द्वारा ‘संवैधानिक देवता’ भी घोषित किया जा चुका है और उनकी इस तस्वीर का इस्तेमाल अयोध्या के एक जजमेंट में भी हुआ था। इसी तरह ‘राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांत’ वाले हिस्से में श्रीकृष्ण और अर्जुन हैं। युद्ध भूमि में श्रीकृष्ण के अर्जुन को भगवद्गीता का ज्ञान दिया था, उसी तस्वीर को यहाँ उकेरा गया है।
                                    युद्ध भूमि में अर्जुन को गीता का ज्ञान देते श्रीकृष्ण – संविधान की मूल प्रति में ये तस्वीर
इतना ही नहीं, महात्मा बुद्ध और महावीर भी हमारे संविधान की मूल प्रति में मौजूद हैं। यहाँ भी चोल राजवंश का कलेक्शन दिखता है। चोल राजवंश की नटराज प्रतिमा की तस्वीर उकेरी गई है। भाग-13, जिसमें व्यापार एवं वाणिज्य के बारे में बताया गया है, उसमें महाबलीपुरम में अर्जुन को तपस्या करते हुए दिखाया गया है। इसी तरह छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह की भी तस्वीर है। क्या राम, कृष्ण, अर्जुन, तपस्या और नटराज की बात करना ‘सेक्युलर’ नहीं है? वामपंथी अब भी ऐसा कहेंगे।
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हिन्दू संस्कृति : पति की दीर्घायु हेतु वट वृक्ष की पूजा

वट सावित्री व्रत का पूजन 19जून को विधि-विधान से होगा। इस दिन सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ की पूजा कर फेरें लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों । प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव इस देश में सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी कहता है। ये तो छद्दम धर्म-निरपेक्षों दूसरे अर्थों में कहा जाये तो "वर्तमान के जयचंद" का बस चला नहीं, वरना ये सनातन विरोधी करवाचौथ की तरह इस त्यौहार पर भी कीजड़ फेंकने से बाज़ नहीं आते। आज आधुनिकता के नाम पर सनातनी परम्परा को छोड़ पश्चिमी सभ्यता के त्यौहार जैसे Mothers' Day, Fathers' Day, Sisters' Day, Brothers'Day आदि मनाने में खुश होते हैं, जबकि हमारे सनातनी में एक से बढ़कर एक ऐसे त्यौहार हैं, जिनमें माता-पिता, भाई-बहन, मित्रता आदि का भाव देखने को मिलता है, जिसकी विश्व में कहीं कोई तुलना नहीं। खैर, अब कल 19 जून को सुहागिन महिलाओं द्वारा मंगलकारी त्यौहार पर विचार करते हैं। जिसकी महानता करवाचौथ से काम नहीं। यह वह व्रत है, जो हमें शिक्षा देता है कि कैसे एक सुहागिन सावित्री यमराज देवता को उसका सुहाग वापस करने के लिए विवश कर देती है। इसलिए महान है वट वृक्ष पूजा का त्यौहार।  
सनातन धर्म के धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसे व्रत त्योहारों का उल्लेख मिलता है जिन्हें करना सौभाग्य माना जाता है. इन्हीं में से एक है वट सावित्री व्रत। इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं। पूजा के दौरान बरगद के पेड़ में कच्चा सूत लपेटने की परंपरा भी है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रलय के अंत में भगवान कृष्ण भी वट वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे। इसके अलावा इस दिन शनि जयंती और ज्येष्ठ अमावस्या भी पड़ रही है। इस वर्ष वट सावित्री व्रत पर ग्रहों की स्थिति बेहद खास होने वाली है। इस दिन शनिदेव अपनी स्वयं की राशि कुंभ में विराजमान होंगे. जिससे शश योग का निर्माण होगा। ऐसे में इस दिन शनि देव की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति की जा सकती है।

वट वृक्ष बरगद को जल चढ़ाना केवल एक प्रथा नहीं बल्कि सुख शांति तरक्की का माध्यम है। प्रश्न यह भी होता है कि वट वृक्ष बरगद ही क्यों? सनातन धर्म में अन्य दूसरे वृक्षों में पीपल और
वट वृक्ष बरगद को सबसे पवित्र एवं दीर्घ आयु वाले वृक्ष हैं। इन दोनों ही वृक्षों में परमपिता विष्णु का वास होता है। इसी कारण वट वृक्ष बरगद को ही पूजा जाता है। इन वृक्षों की महानता का वर्णन वेद और पुराणों में भी किया गया है।
ऐसी मान्यता है कि इसी दिन देवी सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। सनातन परंपरा में वट सावित्री पूजा स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे करने से हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त होता है।
कथाओं में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है।
सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं।
जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।
सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, आम फल और मिठाई से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री, सत्यवान और यमराज की कथा श्रवण कर पूजा करें। ब्राह्मण देव को दक्षिणा आदि सामग्री दान करें।
वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल से सींचें। इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए कम से कम तीन बार, 5 बार, 8 बार, 11 बार, 21 बार, 51, 108 जितनी परिक्रमा कर सके करें। पूजा के बाद वटवृक्ष से सावित्री और यमराज से पति की लंबी आयु एवं संतान हेतु प्रार्थना करें।
बरगद की पूजा
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वटवृक्ष की पूजा का विधान है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन
वटवृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और
सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
बरगद के पेड़ को वट का वृक्ष कहा जाता है।
पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वटवृक्ष की
जड़ों में ब्रह्माजी, तने में विष्णुजी और डालियों
एवं पत्तों में शिव का वास है। इसके नीचे बैठकर
पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।
हिन्दू धर्मानुसार 5 वटवृक्षों का महत्व अधिक
अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट
इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त 5 वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है।
प्रयाग में अक्षयवट,
नासिक में पंचवट,
वृंदावन में वंशीवट,
गया में गयावट
और
उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है।
जहाँ प्रत्येक चौदस अमावस्या के पहले वाली तिथि को पित्रो को दूध अर्पित किया जाता है।
मानस से-
तहं पुनि संभु समुझिपन आसन।
बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक
कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।

वट और पीपल के वृक्ष पहले बहुत लगाये जाते थे, ये धर्म से जुड़ा हुआ वृक्ष है, लेकिन आज वर्तमान के लिए यह वृक्ष अति आवश्यक है। क्या आप जानते हैं कि वर्तमान में पड़ रहे सूखे, अत्यधिक गर्मी और प्रदूषण की वजह क्या है?
आज प्रदूषण के नाम पर जनता को गुमराह किया जा रहा है। वास्तव में बरगद और पीपल के वृक्षों की कमी होना।
विकास के नाम पर इस प्रकार के बड़े पेड़ों को काटना, इनके नए पेड़ नहीं लगाना, इन पेड़ों के संरक्षण, संवर्धन में कमी।।
आप को लगेगा अजीब बकवास है किन्तु यही अटल सत्य है.. .।
पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द कर दिया गया है।
पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड को 100% सोख लेता है, बरगद़ 80% और नीम 75 %
हमने इन पेड़ों से दूरी बना लिया तथा इसके बदले यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो जमीन को जल विहीन कर देता है।
अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नही रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही ।
हर 500 मीटर की दूरी पर एक बरगद का, पीपल का पेड़ लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त हिन्दुस्तान होगा।
वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए, बरगद और पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है जिसकी वजह से शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं। वैसे भी बरगद और पीपल को वृक्षों का राजा कहते है।
इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए-
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,वृक्षराज नमस्तुते।
भावार्थ तो समझ ही गए होंगे।
अब करने योग्य कार्य
इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगायें तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगाया जाये इसके साथ नीम और आम के पौधे भी लगाएं । हर शहरों में ऐसा नियम बनाया जाये की हर घर के आसपास पेड़ जरूर लगाना है, जैसे वाटर हार्वेस्टिंग को जरूरी नियम बनाया गया है वैसे ही हर घर में वृक्ष का नियम भी होना चाहिए।
जिसके घर में ये बड़े पेड़ लगाने की जग़ह न हो वह तुलसी जी का पौधा जरूर लगाये*