PML Act में नित नई व्याख्या करने से बेहतर है मीलॉर्ड, या तो खुद पूरा कानून लिख दो और या इस कानून को रद्द कर दो; लेकिन अपराधियों को संरक्षण देना बंद कीजिए ; #हेमंत सोरेन और #sec 45

सुभाष चन्द्र 

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस खानविलकर की बेंच ने 27 जुलाई, 2022 को PML Act, 2002 और प्रवर्तन निदेशालय (ED) को दी गई की शक्तियों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं खारिज करते हुए कानून को सही कहा था। 

लेकिन तब ही से लगातार अलग अलग हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट इस कानून के बारे में नई नई व्याख्या देकर उसे कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं और इस तरह भ्रष्टाचारियों को बचने के रास्ते मिल रहे हैं जिसकी वजह से ऐसे अपराधियों को कानूनी संरक्षण मिल रहा है। विपक्ष तो चाहता ही है कि कानून ख़त्म हो जाए और उसकी मुहीम में अदालतें भी सहयोग कर रही हैं जिससे कानून कुंद होता जाए और प्रधानमंत्री मोदी की भ्रष्टाचार पर चोट कमजोर पड़ जाए

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चर्चित YouTuber 
इससे तो बेहतर है मीलॉर्ड एक बार में पूरे कानून को ही रद्द कर दीजिए और या नित नई व्याख्या करके नए कानून में संशोधन करने की बजाय खुद ही पूरा PML Act लिख दो

दो दिन पहले झारखंड हाई कोर्ट ने हेमंत सोरेन को जमानत दे दी और जमानत देते हुए जो कहा, उसे पढ़ कर मेरा दिमाग चकरा गया।जस्टिस आर मुखोपाध्याय की अदालत ने जमानत देते हुए कहा कि - 

“ED ने हेमंत सोरेन पर जमीन कब्ज़ा करने का जो आरोप लगाया है, उससे संबंधित एक भी दस्तावेज़ ED अभी तक कोर्ट में पेश नहीं कर सकी; ED ने इस मामले में जिन लोगों ने बयान लिए हैं, उससे भी साबित नहीं हो रहा कि वह जमीन हेमंत सोरेन से जुड़ी है”। 

हाई कोर्ट ने 13 जून को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया था जो 28 जून को सुनाया है और जज साहब की यह दोनों टिप्पणियां कह रही हैं कि हेमंत सोरेन निर्दोष है और ED का उसके खिलाफ कोई केस नहीं बनता। 

जस्टिस मुखोपाध्याय बताएं कि ED ने 31 मार्च को दायर 5500 पन्नों की चार्जशीट में क्या कोई भजन संग्रह दिया था, फिर ट्रायल कोर्ट ने उस पर संज्ञान कैसे ले लिया और 5 महीने तक हेमंत की जमानत की अर्जियां ट्रायल कोर्ट, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक में कैसे ख़ारिज होती रहीं

अगर ED के पास कुछ साबित करने के है ही नहीं तो जमानत क्यों दी आपने, आप उसे बरी ही कर देते

याद रहे ये मुखोपाध्याय जी उसी हाई कोर्ट के जज हैं जहां लालू यादव की 32 साल की सजा के खिलाफ 5 अपील 5 से 11 साल से लंबित हैं

कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने एक और महान व्याख्या की है - 16 मई को जस्टिस AS Oka और जस्टिस Ujjal Bhuyan ने फैसला दिया कि यदि कोई आरोपी special court के summons पर पेश होता है, तो उसे custody में नहीं माना जा सकता और उसे PML Act के कठोर प्रावधानों में (Draconian Conditions) जमानत की अर्जी देने की जरूरत नहीं है CRPC की धारा 88 में कोर्ट उसे बांड भरने को कह सकता है उसके लिए PML Act की section 45 की twin conditions उस पर लागू नहीं होंगी

Section 45 कहता है - “bail can be granted to an accused in a money laundering case only if twin conditions are satisfied, there should be prima facie satisfaction that the accused has not committed the offence and that he is not likely to commit any offence while on bail”.

अब सवाल उठता है मीलॉर्ड कि PML Act में कोई ट्रायल कोर्ट सीधा summon कैसे कर सकता है जबकि यह काम जांच एजेंसी का होता है। अगर ED/CBI के लगातार summons पर कोई हाज़िर नहीं होता जैसे केजरीवाल नहीं हुआ था, तब एजेंसी कोर्ट में शिकायत करती है और तब कोर्ट उसे summon करता है लेकिन वह कोई जांच में भाग लेना नहीं होता। ऐसे में जो व्याख्या की दोनों माननीय जजों ने उसके मायने तो वे ही जाने अलबत्ता उससे अपराधियों को संरक्षण जरूर मिल सकता है

भ्रष्टाचार को कम आंकने की कोशिश मत कीजिए मीलॉर्ड, इसकी आग में एक दिन आपके भी हाथ जल जाएंगे

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