भारत में शरिया नहीं चल सकता, जिसे जाना हो पाकिस्तान जाए, कोई नहीं रोकेगा, वहां पूरा शरिया मिलेगा मुस्लिमों को; अब देश नहीं टूटेगा; AIMPLB पर महिला आयोग कार्रवाई करे

सुभाष चन्द्र

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने तलाक के बाद मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता का हनन कहा है और कहा कि यह फैसला शरीयत से मतभेद पैदा करता है और गुजारा भत्ता महिलाओं के लिए “भीख” है। अगर तलाकशुदा महिला को गुजाराभत्ता मांगना भीख है तो हज के लिए सब्सिडी भीख नहीं? 

सबसे बड़ी बात है कि AIMPLB की सदस्य प्रो.मुनिसा बुशरा आबिदी ने महिला होते हुए गुजारे भत्ते को भीख बताते हुए कहा कि “जब महिला अपने पति से सारे रिश्ते ख़त्म कर चुकी है तो उसके सामने भीख मांगने क्यों जाए? उसकी जगह वह खुद से कुछ काम-धंधा कर सकती है

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“पति-भाई भी उसका गुजारा उठा सकते हैं”, वह उस पति की बात कर रही है जिसने तलाक दे दिया और भाई पर जिम्मेदारी क्यों? यहाँ बुशरा का दोगलापन साफ नज़र आ रहा है जो इसे बताना पड़ेगा कि "पति-भाई" से क्या मतलब है? क्या महिला पति को भाई बनाए या भाई को पति बनाए? इस रिश्ते को खुलकर बताना होगा। जब पति ने तलाक दे दिया, और उससे गुजरा भत्ता लेने को भीख बता रही तो "पति-भाई" से क्या मतलब है?

मुस्लिम बोर्ड की महिला आबिदी का बयान अत्यंत शर्मनाक है वह भूल गई, गुजारा भत्ता पाना  जैसे किसी भी तलाकशुदा महिला का अधिकार होता है वैसे मुस्लिम महिला का भी है लेकिन बोर्ड का और खासकर महिला सदस्य का ऐसे अधिकार को “भीख” कहना मुस्लिम महिलाओं का घोर अपमान है और इस तरह के अपमान के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग को संज्ञान लेकर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए

मोहतरमा आबिदी और पर्सनल लॉ बोर्ड की ऐसी सोच की वजह से ही मुस्लिम पुरुषों को बढ़ावा मिलता है आए दिन महिलाओं को तलाक देकर बार बार शादी करने के लिए मैडम आबिदी, तलाक में महिला अपने पति से सारे रिश्ते ख़त्म नहीं करती, बल्कि उसका शौहर उसे तलाक देकर उससे अपने रिश्ते ख़त्म  करता है और उसके लिए उसे गुजारा भत्ता देना लाजमी है महिला तलाक नहीं देती, बल्कि मुस्लिम महिला तो “खुला” देती है जिसे शौहर माने या न माने

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो के फैसले के बाद भी उत्पात मचाया था और अब फिर वह तकरार के रास्ते पर है लेकिन शाहबानो के समय राजीव गांधी झुक गए थे लेकिन अब बोर्ड को पता है कि जिस मोदी ने ट्रिपल तलाक ख़त्म कर दिया वह उनके दबाव में नहीं आना वाला चाहे मुस्लिम महिलाओं ने ट्रिपल तलाक से मुक्ति पाने के बाद भी मोदी को वोट नहीं दिया लेकिन मोदी ने समाज के हित में वह काम किया एक साधू की तरह और अब यह मुस्लिम महिलाओं की मूर्खता थी जो उन्होंने मोदी के उपकार को नहीं समझा

सबसे बड़ी बात यह है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठन Civil Laws के मामले में तो संविधान की दुहाई देकर शरिया के अनुसार चलने की बात करते हैं लेकिन जब मामला Criminal Laws का होता है तो उसमे शरिया के अनुसार फैसले नहीं चाहता शरिया की याद महिलाओं के अधिकार के समय ही क्यों आती है? अगर शौहर ने गलती से भी तलाक दे दिया तो बीबी को हलाला करना है, क्यों? शौहर को क्यों नहीं? इससे बड़ा दोगलापन नहीं हो सकता यह धार्मिक स्वतंत्रता नहीं है कि सब कुछ आपकी मर्जी से हो

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य मुस्लिम संगठन जिस तरह चल रहे हैं उसे देख कर लगता है वे देश तोड़ने की फ़िराक में हैं लेकिन देश तो अब नहीं टूटेगा और उन्हें अगर शरिया ही चाहिए तो उसके लिए मुस्लिम पाकिस्तान ले चुके हैं और शरिया के लिए वे वहां जा सकते हैं। भारत में न्याय से और संविधान से ही शासन चलेगा

   

जब पाकिस्तान बना था उस वक्त पाकिस्तान और उसके पूर्वी पाकिस्तान की आबादी कुल मिला कर 7.5 करोड़ थी और भारत में मुसलमान 3.5 करोड़ थे पाकिस्तान और बांग्लादेश की आबादी आज 42 करोड़ है यानी 6 गुना बढ़ी है जबकि भारत में मुसलमान 8 गुना बढ़ कर 20 से 25 करोड़ हैं, यानी गांधी और नेहरू का एक और पाकिस्तान बनाने का सपना सच करने की फ़िराक में हैं भारत के मुस्लिम 

ये मुसलमानों को सोचना होगा वो चाहते क्या है?

कांग्रेस और इंडी ठगबंधन के सभी “खलीफा” महिलाओं के गुजारा भत्ते पर खामोश हैं

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