राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन श्री इक़बाल सिंह लालपुरा ने कहा है कि भारत अल्पसंख्यकों के लिए स्वर्ग है। उन्होंने कुछ उदाहरण दिए इस विषय में-1951 में अल्पसंख्यकों की आबादी 16% थी जबकि बहुसंख्यकों की 84%, तब से 4 अल्पसंख्यक राष्ट्रपति बने और एक प्रधानमंत्री बना। आज केंद्रीय सेवाओं में 62 अधिकारी मुस्लिम हैं और 11 जैन समुदाय के हैं, जो भी सक्षम है वह जहां चाहे पहुंच सकता है।
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इतना ही नहीं सभी केंद्रीय योजनाओं का लाभ लेने के बाद भी मुस्लिम समुदाय के लोग मोदी को हटाने के लिए आमादा रहते हैं। कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति ने उन्हें देश के संसाधनों पर पहला अधिकार दिया। वक्फ बोर्ड बना दिया और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बनाया, दूसरी तरफ मुस्लिमों के विश्वविद्यालयों में SC/ST के लिए कोई आरक्षण न देने की इजाजत दी।
संविधान में ऐसे प्रावधान हैं जो केवल मुस्लिमों के लिए हैं और वो और ईसाई समुदाय धर्मान्तरण का सबसे भयानक खेल खेलते हैं।
मुस्लिमों का 100 से ज्यादा लोकसभा सीटों पर प्रभाव रहता है - फरवरी 5 को दिल्ली के हुए चुनाव में 7 सीट पर उनका वर्चस्व है - वे विधानसभा सीटें हैं मुस्तफाबाद, चांदनी चौक, मटिया महल, बाबरपुर, सीलमपुर, ओखला और बल्लीमारान। और इन 7 सीटों के लिए सियासतखोर पागल होकर बहुसंख्यक को सेकुलरिज्म के नाम पर गुमराह कर रहे हैं।
बंगाल विधानसभा की 294 सीटों में से 120 सीटों को मुस्लिम प्रभावित करते हैं। ऐसे ही कई राज्यों में उनका ही खेल चलता है और चुनाव के समय मुस्लिम समुदाय सौदेबाजी के लिए सेक्युलर दलों से हिंदू विरोधी मांगे मंगवाते हैं और RSS को बैन करने की मांग करते हैं। इतना ही नहीं मुस्लिम समुदाय के लोग खाने पीने की चीज़ों में थूकते हैं और पेशाब मिलाते हैं।
जब कोई अल्पसंख्यक समुदाय बहुसंख्यक समुदाय पर इस तरह हावी होगा तो उसे किसी तरह अल्पसंख्यक नहीं माना जाना चाहिए। जबकि ऐसे अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अक्सर दंगों और आतंकी हमलों में शामिल पाए जाते हैं।2047 तक भारत में गज़वा-ए-हिंद का प्रयास मुस्लिम ही कर रहे हैं। ये डरे हुए समुदाय का हाल है, अगर डरा हुआ नहीं होता बहुसंख्यक को अपने घर में भी पूजा करने नहीं देते। जो इनकी वोटों के लिए पागल हुए नेताओं और उनकी पार्टियों को समझ नहीं आता।
सेकुलर दलों के अलावा देश की अदालतें भी मुस्लिमों की तरफ जरूरत से ज्यादा झुकी रहती हैं। मुस्लिमों के संगठन आमतौर पर दंगाइयों और आतंकियों को कानूनी मदद करने आगे आते हैं। सोचने का विषय है कि डॉक्टर भी क्या किसी खास समुदाय के लिए इलाज कर सकता है लेकिन मुस्लिम समुदाय ने केवल मुस्लिम डॉक्टरों की संस्था बनाई हुई है जो केवल मुस्लिमों का इलाज करने की कोशिश करते हैं, परंतु कोई कोर्ट इस पर संज्ञान नहीं लेता। अगर हिंदू ऐसा करने लगें तो सुप्रीम कोर्ट तांडव कर देगा।
अब अल्पसंख्यकों की परिभाषा तय होनी चाहिए। जिस समुदाय की आबादी देश की जनसंख्या के 5% से अधिक है, उसे अल्पसंख्यक न माना जाए और न उसे अल्पसंख्यकों के निमित्त कोई लाभ मिले। इसके लिए संसद में कानून पारित हो सकता है और यह कोई संविधान संशोधन भी नहीं होगा जबकि इसके पारित होने के संविधान में मुस्लिमों के लिए आर्टिकल स्वतः ही निष्क्रिय हो जाएंगे।
सरकार को वक्फ बोर्ड कानून में बदलाव के बाद इस विषय में अब ठोस कदम उठाना चाहिए।
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