EVM पर रायता फ़ैलाने वालों की कितनी याचिका सुनेगा सुप्रीम कोर्ट; तुच्छ याचिकाओं को खारिज क्यों नहीं करते? क्या 40 याचिकाएं खारिज होना काफी नहीं है?

सुभाष चन्द्र

अपने 26 अप्रैल, 2024 के लेख में  EVM / VVPAT के मिलान के बारे में प्रशांत भूषण की याचिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर मैंने विस्तार से बताया था कि प्रशांत भूषण ने Frivolous Petition में कहा था कि अभी तक EVM/VVPAT के मिलान में कोई गड़बड़ नहीं हुई है लेकिन होने की सम्भावना है। इस दलील पर भी याचिका सुनी गई और उस पर जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता ने साफ़ कह दिया था कि EVM और VVPAT का 100% मिलान नहीं हो सकता और ऐसी मांग करना पुराने दौर में वापस जाना होगा जो संभव नहीं है 

उसके बाद जस्टिस दीपांकर दत्ता ने यह भी कहा था कि कुछ ताकतें हमारे लोकतंत्र को कमजोर करना चाहती हैं

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प्रशांत भूषण पर ऐसी तुच्छ दायर करने के लिए कोई जुर्माना नहीं लगाया गया जबकि उसी दिन सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार की मेघालय हाई कोर्ट के एक निर्णय पर अपील करने के लिए 5 लाख का जुर्माना लगाते हुए कहा कि भविष्य में ऐसी तुच्छ याचिकाएं दायर न की जाएं यानी केंद्र सरकार को किसी हाई कोर्ट के निर्णय के विरुद्ध अपील करने का भी अधिकार नहीं है

लेकिन EVM पर 40 याचिकाएं खारिज होने पर भी याचिकाएं दायर होती रही लेकिन उन्हें तुच्छ याचिका नहीं समझा गया और किसी पर कोई जुर्माना नहीं लगाया गया 

अब ADR ने EVM पर एक और याचिका दायर की है जिस पर चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता ने ही चुनाव आयोग को कोई नोटिस तो जारी नहीं किया लेकिन आयोग से जवाब मांगा है कि EVM की Burnt Memory और microcontroller के प्रमाणीकरण और जांच की क्या प्रक्रिया है इसके लिए ADR ने दिशा निर्देश तय करने के लिए मांग की है प्रमाणीकरण न होने के कोई सबूत हैं क्या ADR के पास

आयोग के वकील मनिंदर सिंह ने कोर्ट को बताया कि ADR ने पहले भी ऐसी याचिका दायर की थी लेकिन वापस ले ली थी और वर्तमान याचिका में उसका जिक्र तक नहीं किया जबकि वकील वही है इसलिए इस याचिका पर विचार नहीं करना चाहिए आयोग सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुरूप ही प्रमाणीकरण की प्रक्रिया अपनाता है

ADR की इस याचिका से साबित होता है कि उसका उद्देश्य केवल स्वस्थ चुनाव प्रक्रिया में खलल डालना है प्रश्न यह उठता है कि यह याचिका लेकर पहले ADR दिल्ली हाई कोर्ट क्यों नहीं गया और सुप्रीम कोर्ट ने उस पर बिना हाई कोर्ट भेजे हुए सुनवाई कैसे कर ली? सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को Frivolous समझ कर ADR पर जुर्माना क्यों नहीं लगाया जो अत्यंत आवश्यक था? ADR लगता है विपक्ष और वामपंथियों की प्रायोजित संस्था है क्योंकि इसके कई केस प्रशांत भूषण जैसा वामपंथी भी लड़ता रहा है

जिस मामले में जस्टिस खन्ना और जस्टिस दीपांकर दत्ता निर्णय ले चुके है, वैसे ही मामले में वे फिर से सुनवाई कैसे कर सकते हैं जबकि वही मामला घुमा फिरा कर फिर से कोर्ट के सामने लाया गया है

सरकार और स्वायत्त संस्थाओं के मामलों में बेवजह सुप्रीम कोर्ट का दखल उचित नहीं है जबकि सुप्रीम कोर्ट ऐसा करता आ रहा है अब क्या चुनावों की निगरानी भी सुप्रीम कोर्ट स्वयं करना चाहता है, तो फिर चुनाव खुद ही करा लें?

सुप्रीम कोर्ट में पहले ही बहुत मामले लंबित हैं, उन पर ध्यान दीजिए, ऐसी फालतू याचिकाओं पर समय बर्बाद करना उचित नहीं है EVM पर याचिकाओं अब विराम लगना चाहिए जिससे कोर्ट का समय और जनता का पैसा बर्बाद होने से बचे

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