RTI समेत सारे कानून राजनीतिक दलों पर लागू करेंगे; लेकिन मीलॉर्ड की बेशर्मी की पराकाष्ठा है जो खुद पर कोई कानून लागू नहीं होने देते ; आप कॉलेजियम में क्या गोलमाल करते हैं, कोई RTI में नहीं पूछ सकता

सुभाष चन्द्र

फरवरी 14 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने कहा कि राजनीतिक दलों को RTI के दायरे में लाने की मांग पर 21 अप्रैल से नियमित सुनवाई होगी और कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और छह राजनीतिक दलों को उत्तर-प्रतिउत्तर व लिखित दलीलें दाखिल करने की प्रक्रिया पूरी करने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से पारदर्शिता बढ़ेगी और काले धन पर रोक लग सकेगी

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इस बारे में 2 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर हैं, एक तो वही वामपंथी ADR की जिसका वकील है प्रशांत भूषण और दूसरी है अश्विनी उपाध्याय की प्रशांत भूषण ने कोर्ट में कहा कि यह मामला 10 साल से लंबित है और यह चुनावी बांड फैसले से कवर होता है जस्टिस खन्ना ने कहा कि इसमें मेरिट पर सुनवाई की जरूरत है ADR की याचिका 7 जुलाई, 2015 को दायर हुई थी और उपाध्याय ने 2019 में एक और याचिका दायर की

इस मामले में कलेश पैदा किया था मुख्य सूचना आयोग के 3 जून, 2013 के आदेश ने जिसमें कहा गया कि क्योंकि राजनीतिक दलों को सरकार से टैक्स में छूट मिलती है और जमीन मिलती है, इसलिए उन्हें राजनीति में पारदर्शिता लाने के लिए RTI के अंतर्गत “Public Authority” माना जाना चाहिए और Section 2(h)(d) of the RTI Act, 2005  के दायरे में लाना चाहिए

सुप्रीम कोर्ट में 25 जुलाई, 2023 को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था क़ि CIC का आदेश राजनीतिक दलों को RTI में लाने का आधार नहीं बन सकता जस्टिस चंद्रचूड़ की बेंच ने स्पष्ट किया था कि “Political parties had a point in being concerned about disclosing details of their internal discussions. They have a point when they say, don’t ask us to disclose how we choose our candidates,” 

आपको याद होगा पहले संविधान में कोई संशोधन अथवा प्रावधान लागू करते हुए लिखा जाता था कि यह पूरे देश पर लागू होगा सिवाय जम्मू कश्मीर के आज सुप्रीम कोर्ट भी जम्मू कश्मीर सा हो गया है जो सभी कानून पूरे देश में और राजनीतिक दलों पर तो लागू होते हैं और सुप्रीम कोर्ट लागू करवाता है लेकिन स्वयं वह अपने पर कुछ लागू नहीं होने देता सभी के पारदर्शिता चाहिए लेकिन खुद सब काम काले अंधेरे में करते हैं जिसका कानों कान किसी को पता नहीं चलता

-एक पार्षद, विधायक या सांसद  का चुनाव लड़ने वाला अपनी संपत्ति का ब्यौरा कानूनी तौर पर चुनाव आयोग को देता है लेकिन आप हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के जज और चीफ जस्टिस बन जाते हैं लेकिन किसी को आपकी और आपके परिवार के सदस्यों की संपत्ति का पता नहीं चलता क्या यही पारदर्शिता है?;

-राजनीतिक दलों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के मुकदमे चलते हैं लेकिन आप के ऊपर कोई भ्रष्टाचार का आरोप पहले तो लगता नहीं और लग जाए तो उसकी जांच के लिए चीफ जस्टिस की अनुमति लेनी होती है क्या यही पारदर्शिता है?;

-सरकार की हर सूचना आपको खुले में चाहिए लेकिन आप कॉलेजियम में क्या गोलमाल करते हैं, कोई RTI में नहीं पूछ सकता; क्या यही पारदर्शिता है?;

-नेताओं को सजा भी हो जाए तो भी आप उन्हें जमानत पर छोड़ कर मौज करने देते हैं और आजकल तो कोर्ट फैसले करने की बजाय “Bail Court” ज्यादा हो गए है जहां से हर अपराधी को या तो बेल दे दी जाती है या उसकी गिरफ़्तारी पर रोक लगा दी जाती है

सुप्रीम कोर्ट में पारदर्शिता नाम की कोई चीज है ही नहीं बल्कि पूरा सिस्टम Opaque है

सूचना आयोग का आदेश वैसे भी गैर कानूनी था क्योंकि किसी संस्था को Public Authority तब माना जा सकता जब या तो उसे सरकार से उसके funds के 50% से ज्यादा योगदान मिले या Substantial funding मिले, कुछ टैक्स लाभ या Political Parties को ऑफिस बनाने के लिए जमीन मिलना इतनी बड़ी funding नहीं मानी जा सकती कि उन्हें Public Authority कहा जा सके

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