जब सेना ऑपरेशन सिंदूर में अपना जलवा दिखा रही थी, तब सुप्रीम कोर्ट सेना पर ही बरस रही थी; फिर कहते हैं “हम पर आरोप है कि हम कार्यपालिका में दखल दे रहे हैं”

सुभाष चन्द्र

आपको याद होगा कुछ दिन पहले सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीआर गवई ने कहा था कि “हम पर आरोप लग रहे हैं कि हम कार्यपालिका में दखल दे रहे हैं, हम राष्ट्रपति को कोई आदेश कैसे दे सकते हैं”

दखल देने में तो न्यायपालिका हमारी सेना को भी नहीं छोड़ती जबकि सेना देश की सुरक्षा करने में अग्रणी रहती है। इधर सेना ने ऑपरेशन सिंदूर को सफल बना कर देश को जीत दिलाई और उधर सुप्रीम कोर्ट ने सेना पर ही हथौड़ा चला दिया देश की सेना को भरती और प्रमोशन के नियम भी तैयार करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट नहीं देना चाहता ऐसे में यदि कुछ गलत हो गया सेना से तो क्या सुप्रीम कोर्ट उसकी जिम्मेदारी लेगा?

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इसके पहले 2021 कुछ महिलाओं को Permanent Commission देने के मामले को लेकर जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूरी सेना और सेना प्रमुख पर Contempt of court का केस चलाने की धमकी दे दी थी पूरी सेना मतलब 14 लाख की आर्मी को Contempt of Court में रगड़ना चाहते थे

ऐसे, आपने बहादुर सेना को Demoralise करने की कोशिश की थी

न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति जज ही करते हैं आप किसी का उसमे दखल नहीं चाहते NJAC आपने खारिज कर दिया था कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा समझा आपने

आपने जजों की नियुक्ति के लिए मनमाने नियम बना रखे हैं पूरा का पूरा परिवार जज बना सकते हैं और फिर यशवंत वर्मा की तरह नोट कमाते हैं

हॉस्पिटल के लिए doctors की भरती के लिए medical test ही होगा और उनके interview भी doctor ही लेंगे किसी इंजीनियर का सिलेक्शन इंजीनियर फील्ड के लोग ही करेंगे साइंटिस्ट का सिलेक्शन साइंटिस्ट ही करेंगे

फिर सेना के अधिकारियों को आपके निर्देशों पर क्यों नियुक्त किया जाए?

ऑपेरशन सिंदूर की जीत के बाद एक हफ्ते में सेना पर दो बार हुकुम बजा दिए और सेना के नियमों की धज्जियां उड़ा दी

पहले केस में - जब सेना पाकिस्तान को धुआँ धुआँ कर रही थी उस दिन सुप्रीम कोर्ट 69 Short Service Commissioned Officers को permanent commission देने के लिए सेना को कहा कि “मौजूदा स्थिति में महिला सैन्य अफसरों का मनोबल नहीं गिराएं” 

कोर्ट ने अगस्त की तारीख लगा दी और कहा कि उन 69 अफसरों को सेवामुक्त न किया जाए मतलब जिसका कार्यकाल ख़त्म भी हो रहा है, वह खुद ही बढ़ा दिया कोर्ट ने

सेना वर्ष में 250 ऑफिसर्स को Permanent Commission देती है और वह भी योग्यता के आधार पर कोई कोर्ट पहुँच जाए तो कोर्ट कैसे दखल दे सकता है, आखिर सेना को देश की रक्षा के लिए सोचना है या सब कुछ कोर्ट ही करेगा?

दूसरे मामले में जज ऐडवोकेट जनरल के पद के लिए सेना का नियम है 50-50 का, यानी आधे पुरुष और आधी महिलाएं नियुक्त होंगी, वह भी योग्यता के आधार पर अगर कोई योग्य नहीं तो जबरदस्ती कैसे महिला को पद दिया जा सकता है? कोर्ट ने सवाल खड़ा कर दिया कि यह आधे आधे का नियम क्यों है? और कहा कि जब महिलाएं राफेल उड़ा सकती है तो कानूनी शाखा में संख्या सीमित क्यों है? कम vacancy होने की वजह से 2 महिलाओं का चयन नहीं हुआ

सेना के नियमों को धत्ता बता कर आदेश दे दिया कि अगले ट्रेनिंग प्रोग्राम में दोनों याचिकाकर्ता महिलाओं को शामिल किया जाये और अंतिम आदेश के लिए फैसला सुरक्षित कर लिया

हम जानते हैं आपकी जुडिशरी होने के नाते क्या शक्तियां है और आप क्या कर सकते हैं लेकिन अगर आप हर विभाग की autonamy में टांग अड़ाएंगे तो आपकी न्यायपालिका पर सवाल हर कदम पर उठेंगे 

न्यायपालिका तो एक हाई कोर्ट के हजारों वकीलों में से 1-2 को जज बना देती है जबकि उनके लिए open competition होना चाहिए फिर सेना के कार्य में क्यों टांग फ़साने की जरूरत पड़ती है कोर्ट को?

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