किसी रेप केस का वीडियो पेश नहीं कर सकता अभियोजन जो सुप्रीम कोर्ट ने पिथौरागढ़ की बच्ची के रेप और हत्या के आरोपी को बरी कर दिया; ट्रायल और हाई कोर्ट का क्या फायदा जब सब कुछ सुप्रीम कोर्ट ने तय करना है

सुभाष चन्द्र

सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर नाबालिग बच्ची के रेप और हत्या के दो आरोपियों (जिनमे एक मुस्लिम है) को बरी कर दिया। मामला 2014 का था जिसमें ट्रायल कोर्ट के स्पेशल जज ने 11 मार्च, 2016 को अख्तर अली को दोषी पाते हुए मौत की सजा सुनाई और उसके साथी प्रेम पाल वर्मा को 7 साल की सजा दी जबकि तीसरे अभियुक्त को बरी कर दिया गया हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने दोनों को बरी कर दिया जैसे बच्ची के साथ बलात्कार और उसकी हत्या हुई ही नहीं 

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ऐसे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा यह होता है कि क्या ट्रायल कोर्ट और हाई कोर्ट के जज बेवकूफ थे जो उन्होंने अख्तर अली को मौत की सजा सुनाई? सच में देखा जाए तो ट्रायल कोर्ट का निर्णय 100% निष्पक्ष था क्योंकि उसमें एक अभियुक्त को तो बरी किया गया वह फैसला गलत होता तो वो तीसरे अभियुक्त को भी सजा दे सकते थे लेकिन ट्रायल कोर्ट ने ऐसा नहीं किया जबकि सुप्रीम कोर्ट ने पूरा केस ही ख़त्म कर दिया 

सुप्रीम कोर्ट ने कुछ बातें बड़ी अजीब कही है अपने फैसले में जो जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय कलोल और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने सुनाया पहली बात बेंच ने कही कि “where the case rests on circumstantial evidence, every link in the chain must be firmly and conclusively established but the prosecution failed to prove motive, the last seen theory stands contradicted and alleged scientific evidences is marred by inconsistencies and serious loopholes. In such circumstances, it would be wholly unsafe to hold a conviction much less the extreme penalty of death” court said that prosecution failed to establish a complete and unbroken chain of evidence - इसका मतलब है कोर्ट रेप और हत्या की वीडियो चाहता था ऐसा लगता है

मीलॉर्ड अपराधियों को बरी करते हुए भूल जाते हैं कि अभियोजन पक्ष के पास किसी भी Criminal case की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं होती कुछ बातें circumstantial evidence से जोड़नी जरूरी होती हैं आपने तो एक लाइन में कह दिया कि अभियोजन पक्ष अपराध का motive साबित नहीं कर सका तो फिर आप ही बता दीजिए कि एक बच्ची को फिर किसने रेप  किया और किसने उसकी हत्या की अगर आपके द्वारा छोड़े गए “बेकसूर” थे? आप इस प्रश्न का जवाब दीजिए कि आरोप अख्तर अली और प्रेम पाल पर ही क्यों लगे क्योंकि आप भी अपने फैसले में पुलिस पर ऊँगली नहीं उठा सके कि पुलिस वालों की किसी अभियुक्त से कोई निजी दुश्मनी थी जो उन्हें जानबूझकर फंसाया गया

रेप के लिए कोई motive साबित नहीं होता, रेप तो रेप होता है जो अपराधी अपनी हवस मिटाने के लिए करता है, बस इतना ही motive होता है आपने हर सबूत को ठुकरा दिया तो क्या फिर अपराध हुआ ही नहीं और अगर ऐसा है तो बच्ची को तो अभी सही सलामत जीवित होना चाहिए लेकिन वो तो है नहीं, तो फिर उसके अपराधियों को ढूढ़ने की जिम्मेदारी आप लीजिए अपराधियों को छोड़ना तो सुप्रीम कोर्ट ने एक मजाक बना लिया है क्योंकि जजों के परिवारों के लोग कभी अपराध के शिकार नहीं होते

कोर्ट ने कहा कि “capital punishment is irreversible and must only be imposed in the ‘rarest of rare’ cases. जब आप अपराधियों को निर्दोष मानते हुए बरी कर रहे हो तो फिर “rarest of rare” doctrine को कहने की क्या जरूरत है? इसका मतलब तो साफ निकलता है कि आपकी नज़र में भी अपराध हुआ है मगर फांसी लायक नहीं

मीलॉर्ड, आप यह बात कह कर खुद उलझ गए हो और अपने फैसले में loophole छोड़ दिया लेकिन उसे भरा नहीं जा सकता क्योंकि आप तो ईश्वर से भी बड़े हो जो मर्जी फैसला दे सकते हो 

बच्चियों पर हो रहे बलात्कारों और उनकी हत्याओं के लिए सुप्रीम कोर्ट बहुत हद तक दोषी है, बच्चियों और बालिग लड़कियों के रेप के मुक़दमे Yogi Doctrin से ही निबटा देना चाहिए

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