दामाद यासीन मलिक ने हाइड्रोजन/परमाणु बम फोड़ कांग्रेस और INDI गठबंधन को कर दिया बेनकाब; क्या जनता आतंकवाद समर्थक इन जनविरोधियों को अब भी देगी वोट?

 

कोर्ट में यूपीए के सम्मानित दामाद यासीन मलिक द्वारा हाइड्रोजन/परमाणु बम फोड़ने से सच्चाई सामने आयी कि आखिर बाटला हाउस में आतंकवादी के मरने पर सोनिया गाँधी को क्यों रोना आया? कांग्रेस और INDI गठबंधन द्वारा सर्जिकल/एयर स्ट्रीक के सबूत मांगना और Operation Sindoor में पाकिस्तान की बोली बोलना कि पाकिस्तान ने हमारे कितने विमान बर्बाद किए आदि आदि बताता है कि क्यों पाकिस्तान को समर्थन किया जाता रहा है? क्या ऐसी पार्टियों के हाथ देश सुरक्षित रह सकता है?     
सत्य परेशान हो सकता है पराजित नहीं यानि कांग्रेस की वो कुरीतियां और देश विरोधी करतूतों का धीरे-धीरे  पर्दाफाश होने से कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम कर अराजकता का माहौल बनाने में लगी हुई है। कांग्रेस को ना ही जनता की चिंता है और ना ही देश की। समय आ गया है जनता को कांग्रेस और INDI गठबंधन से दूरी ही नहीं अपने वोट से इन्हे चारों खाने चित करना चाहिए। 
लेकिन मलिक ने इसको अदालत में साफ-साफ कहकर सबको सकते में डाल दिया। जो पार्टी या पार्टियां आतंकवादी को शांतिदूत बना सकती है क्या जनता की हितैषी हो सकती है?

 
कांग्रेसी दामाद और मनमोहन सिंह के जिगरी दोस्त कुख्यात आतंकी और हत्यारा यासीन मलिक ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक एफिडेविट में बेहद खतरनाक खुलासा किया है। 

यासीन मलिक ने एफिडेविट में लिखा कि उसकी गतिविधियां किसी निजी जिद या किसी सीमित आतंकी संगठन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वह एक बड़े और सुनियोजित “राज्य प्रायोजित बैकचैनल” का हिस्सा था। 

मलिक का दावा था कि इस नेटवर्क में सिर्फ कुछ आतंकी समूह ही नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्रियों कई पूर्व प्रधानमंत्री बीपी सिंह, इंद्र कुमार गुजराल, मनमोहन सिंह सोनिया गांधी से लेकर लेफ्ट पार्टियों के सभी सांसद और बड़े नेता सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल, वरिष्ठ केंद्रीयमंत्री, खुफिया एजेंसियों के प्रमुख, AS  S दुलत बड़े कारोबारी घराने और कश्मीर की राजनीति को दिशा देने वाली पार्टियां जैसे कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी तक शामिल थीं। 

उसका आरोप था कि यह सब एक बड़े राजनीतिक-ब्यूरोक्रेटिक खेल का हिस्सा था जिसके दम पर कश्मीर में दशकों तक हिंसा, अशांति और अलगाववाद की आग सुलगती रही। वह सिर्फ एक छोटा-मोटा मोहरा था प्यादा था।  

लेकिन जिन लोगों ने यह पूरा साजिश रचा वह आज मौज कर रहे हैं लेकिन वह आजीवन कारावास की सजा भुगत रहा है और कुछ केसों में उसे मौत की सजा होने की संभावना है।

यह एफिडेविट  अपने आप में किसी राजनीतिक बम से कम नहीं था। खासकर उस समय जब कांग्रेस के राहुल गांधी “हाइड्रोजन बम” जैसे बयान देकर सुर्खियां बटोर रहे थे और मीडिया उनके कथनों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है कि राहुल गांधी किसी बड़े खुलासे से भारतीय राजनीति में धमाका करेंगे, लेकिन उनका कथन महज खोखला साबित हुआ। 

इसके उलट, यासीन मलिक ने अदालत में जो बातें कहीं, उसने वाकई एक राजनीतिक परमाणु बम गिरा दिया जिसने न सिर्फ कांग्रेस बल्कि कश्मीर की राजनीति में दशकों से भूमिका निभाने वाले कई दलों और नेताओं पर सवाल खड़े कर दिए।

असल में, यह कोई नई बात नहीं है कि कश्मीर में लंबे समय तक जारी अशांति और आतंकी गतिविधियों के पीछे केवल हथियारबंद गिरोह नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संस्थागत और राजनीतिक ढांचा भी खड़ा रहा है। बिना बड़े नेताओं, नौकरशाहों, खुफिया तंत्र और बाहरी फंडिंग के सहयोग के इतने लंबे समय तक घाटी को अशांत रखना संभव ही नहीं था। लेकिन मलिक ने इसको अदालत में साफ-साफ कहकर सबको सकते में डाल दिया।

यह पूरा मामला केवल एक आतंकी या एक संगठन की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की राजनीति, उसकी नीतियों और उसके संस्थागत तंत्र पर गहरे सवाल खड़ा करता है। क्या सचमुच इतने वर्षों तक कश्मीर की आग केवल कुछ उग्रवादियों की देन थी, या फिर यह एक सुनियोजित खेल था जिसमें सत्ता, पैसा और सियासत का गहरा ताना-बाना शामिल था?

आने वाले समय में यह देश की न्यायपालिका, राजनीतिक नेतृत्व और जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल बनने वाला है।

कल सबसे बड़ा हाइड्रोजन बम क्या आतंकी यासीन मलिक ने दिल्ली हाई कोर्ट को दिए अपनी एफिडेविट में फोड़ा।

उसने कहा कि सोनिया गांधी के घर पर जहां खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपस्थित थे और अमीर वाइज सहित कई कुख्यात आतंकी थे मैं खुद था, वहां बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने हमें भरोसा दिया कि आप निश्चिंत होकर पूरा भारत भूमि है हम कश्मीर मुद्दे को बातचीत के द्वारा सॉल्व करने के पक्षधर हैं हम आप में से किसी भी आतंकी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाएंगे हम आपको पूरी मदद देंगे,

उसने कहा कि जब पूरा भारत स्टेट भारत का प्रधानमंत्री और उस वक्त की ताकतवर नेता सोनिया गांधी और अहमद पटेल के साथ मेरी बैठक होती थी तब मुझे भारतीय पासपोर्ट दिया जाना और मेरे ऊपर यह आरोप लगाना कि मैं वीजा नियम का उल्लंघन किया यह गलत है

लेकिन आप यह सोचिए कांग्रेस आखिर इस देश को किस तरह ले जाना चाहती है ?

विंग कमांडर रवि खन्ना सहित भारतीय एयरफोर्स के चार अधिकारियों, जम्मू हाई कोर्ट के जज नीलकंठ गंजू सहित 40 लोगों के हत्यारे यासीन मलिक के साथ उस समय सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह मेहमान नवाजी कर बैठक करते हैं उसे आश्वासन देते हैं 

जबकि इतने कुख्यात आतंकी की असली जगह तो जेल में होनी चाहिए थी

अपने एफिडेविट के समर्थन में उसने कई सबूत भी अटैच किए हैं जैसे बैठक में शामिल सभी लोगों के दस्तखत का रजिस्टर तथा बैठक के लिए उसे हवाई टिकट भेज कर बुलाया जाना उसके लिए कश्मीर भवन में गेस्ट हाउस की बुकिंग इत्यादि।

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यहां अब आतंकियों को हवाई टिकट भेज कर बिरयानी खिलाकर बैठक नहीं किया जाता बल्कि उन्हें जेल में सड़ा दिया जाता है या एनकाउंटर होता है(23:13, 19/09/2025) दिल्ली हाईकोर्ट में हाल ही में हुई एक सुनवाई ने भारतीय राजनीति और सुरक्षा तंत्र के गलियारों में अचानक हलचल पैदा कर दी है। यह मामला जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता यासीन मलिक से जुड़ा है, जिस पर आतंकवादी फंडिंग और भारत सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने जैसे गंभीर आरोप हैं। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने अदालत से मलिक को मृत्युदंड देने की मांग की है और देशभर की निगाहें इस केस के नतीजे पर टिकी हुई हैं। लेकिन इस सुनवाई में जो घटनाक्रम सामने आया उसने अदालत कक्ष को ही नहीं बल्कि पूरे राजनीतिक माहौल को हिला कर रख दिया।

यासीन मलिक ने अदालत में अपनी दलीलों के दौरान एक ऐसा खुलासा किया जिसने सबको चौंका दिया। उसने कहा कि उसकी गतिविधियां किसी निजी जिद या किसी सीमित आतंकी संगठन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वह एक बड़े और सुनियोजित “राज्य प्रायोजित बैकचैनल” का हिस्सा था। 

यह बयान अपने आप में किसी राजनीतिक बम से कम नहीं था। खासकर उस समय जब कांग्रेस के राहुल गांधी “हाइड्रोजन बम” जैसे बयान देकर सुर्खियां बटोर रहे थे और मीडिया उनके कथनों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा रहा है कि राहुल गांधी किसी बड़े खुलासे से भारतीय राजनीति में धमाका करेंगे, लेकिन उनका कथन महज खोखला साबित हुआ। 

इसके उलट, यासीन मलिक ने अदालत में जो बातें कहीं, उसने वाकई एक राजनीतिक परमाणु बम गिरा दिया जिसने न सिर्फ कांग्रेस बल्कि कश्मीर की राजनीति में दशकों से भूमिका निभाने वाले कई दलों और नेताओं पर सवाल खड़े कर दिए।

सवाल यह है कि क्या मलिक का यह खुलासा सच है, या फिर यह केवल अदालत से अपने लिए नरमी हासिल करने की एक चाल है? जब किसी दोषी के लिए सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं तो अक्सर वह दूसरों को भी अपने साथ घसीटने का प्रयास करता है। संभव है कि यासीन मलिक जानता हो कि अब उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है, इसलिए उसने यह “राजनीतिक एटम बम” फोड़कर खुद पर से ध्यान हटाने की कोशिश की हो।

अब अदालत को यह तय करना है कि क्या सचमुच यासीन मलिक का अपराध “rarest of rare” श्रेणी का है और क्या उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए। साथ ही अदालत को यह भी देखना होगा कि कहीं मलिक का यह बयान किसी नए राजनीतिक खेल की चाल तो नहीं। इस केस की अगली सुनवाई 10 नवंबर को होगी, और तब यह साफ हो सकता है कि मलिक का दावा कितना ठोस है और किन-किन चेहरों का असली रूप जनता के सामने आएगा।

यह पूरा मामला केवल एक आतंकी या एक संगठन की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की राजनीति, उसकी नीतियों और उसके संस्थागत तंत्र पर गहरे सवाल खड़ा करता है। क्या सचमुच इतने वर्षों तक कश्मीर की आग केवल कुछ उग्रवादियों की देन थी, या फिर यह एक सुनियोजित खेल था जिसमें सत्ता, पैसा और सियासत का गहरा ताना-बाना शामिल था? 

आने वाले समय में यह देश की न्यायपालिका, राजनीतिक नेतृत्व और जनता के लिए सबसे बड़ा सवाल बनने वाला है।

यासीन मलिक के दावे

मलिक ने अदालत में चौंकाने वाला खुलासा किया है कि उसकी गतिविधियां किसी निजी जिद या सीमित आतंकी संगठन तक सीमित नहीं थीं, बल्कि वह एक बड़े "राज्य प्रायोजित बैकचैनल" का हिस्सा था। उसका दावा है कि इस नेटवर्क में तत्कालीन प्रधानमंत्री, वरिष्ठ केंद्रीय मंत्री, खुफिया एजेंसियों के प्रमुख, बड़े कारोबारी घराने और कश्मीर की राजनीति में सक्रिय पार्टियां जैसे कांग्रेस, नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी शामिल थीं।

सवाल और संदेह

सवाल यह है कि क्या मलिक का यह खुलासा सच है या यह अदालत से नरमी हासिल करने की एक चाल है? जब किसी दोषी के लिए सारे दरवाजे बंद हो जाते हैं, तो अक्सर वह दूसरों को भी अपने साथ घसीटने का प्रयास करता है।

मलिक की पिछली गतिविधियां

यासीन मलिक ने 1994 में हिंसा छोड़कर गांधीवादी बनने का दावा किया है। वह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के अध्यक्ष हैं और टेरर फंडिंग मामले में तिहाड़ जेल में सजा काट रहे हैं।

अदालत की चुनौती

अब अदालत को तय करना है कि क्या यासीन मलिक का अपराध "rarest of rare" श्रेणी का है और क्या उसे मृत्युदंड मिलना चाहिए। इस केस की अगली सुनवाई 10 नवंबर को होगी, जिससे पता चल सकता है कि मलिक का दावा कितना ठोस है।

व्यापक प्रभाव

यह मामला केवल एक आतंकी या संगठन की कहानी नहीं है, बल्कि भारत की राजनीति, नीतियों और संस्थागत तंत्र पर गहरे सवाल खड़े करता है। कश्मीर में दशकों तक अशांति और आतंकी गतिविधियों के पीछे सिर्फ हथियारबंद गिरोह नहीं, बल्कि एक सुनियोजित संस्थागत और राजनीतिक ढांचा भी शामिल था।

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