बांग्लादेश में भारत विरोध की आड़ में बड़ा खेल : यूनुस की शह पर हिंदुओं और ‘बंगालियों’ को खत्म कर रहे कट्टरपंथी

बांग्लादेश आजकल सड़कों पर खूनखराबे और आगजनी की आग में जल रहा है। एक तरफ छात्रों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका, तो दूसरी तरफ उसी आग में अब इस्लामी कट्टरपंथियों का उभार हो रहा है। लेकिन असली खेल क्या है? यह सब भारत से घृणा फैलाने की आड़ में चुनाव टालने और लोकतंत्र को खत्म करने की साजिश है।

किसी देश में चुनाव होना या नहीं होना वहां का आतंरिक मामला है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं अपनी कुर्सी की खातिर हिन्दुओं के खून की होली खेली जाए। गाज़ा और फिलिस्तीन पर छाती पीटने वाले/वालियां किस बिल में छुपे बैठे हैं? इसलिए चुप है कि हिन्दुओं के साथ घटित हो रहा है, और बेशर्म हिन्दू ऐसे ही लोगों को वोट देते हैं। हिन्दुओं को सेकुलरिज्म के नशे से बाहर आना होगा। बांग्लादेश में जो रहा है खुलेआम आतंकवादी हरकतें हैं।     

जमात-ए-इस्लामी, नेशनल सिटिजन पार्टी और छात्र शिबिर जैसे गुट सड़कों पर कोहराम मचा रहे हैं। वे हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं, भारत से जुड़ी हर चीज को जलाने पर तुले हैं। शेख हसीना की आवामी लीग को बैन कर उसके नेताओं और कार्यकर्ताओं का सफाया हो रहा है। लोकतंत्र की बहाली को पीछे धकेलकर अब इस्लामी शासन लाने की कोशिश हो रही है और इसके लिए रेफरेंडम की ढाल इस्तेमाल की जा रही है।

बांग्लादेश में सेकुलरिज्म को जड़ से उखाड़ा जा रहा है। शेख मुजीबुर रहमान की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, उनके परिवार की यादें मिटाई जा रही हैं और बांग्लादेश के जन्म की असली कहानी को भुला दिया जा रहा है।

जो देश कभी बांग्ला अस्मिता के नाम पर पाकिस्तान से अलग हुआ था, आज वही इस्लामी खिलाफत की ओर बढ़ रहा है। पाकिस्तान की जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर जिसने 1971 में बंगालियों का कत्लेआम किया था, वही ताकतें अब आईएसआई के साथ हाथ मिलाकर बंगाली संस्कृति को नष्ट कर रही हैं।

बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएँ चरम पर हैं और कट्टरपंथी ताकतें हावी हो रही हैं। मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार में शामिल युवा नेता बार-बार भारत के खिलाफ बयान दे रहे हैं। हिंदुओं पर हमले बढ़ रहे हैं, मंदिर तोड़े जा रहे हैं और अल्पसंख्यकों की जान-माल की रक्षा नहीं हो पा रही। अब जबकि फरवरी 2026 में चुनाव होने वाले हैं, ठीक दो महीने पहले हिंसा का दौर फिर शुरू हो गया है। सवाल यह है कि यह सब क्यों हो रहा है? क्या यह भारत से घृणा फैलाने की आड़ में चुनाव टालने की कोशिश है?

बज रही खतरे की घंटी

बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह सिर्फ आंतरिक अस्थिरता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय खतरा है। भारत-घृणा की आड़ में इस्लामी शासन लाने की साजिश सफल हुई, तो पूर्वोत्तर असुरक्षित हो जाएगा। हिंदू अल्पसंख्यकों का सफाया होगा और पाकिस्तान का प्रभाव बढ़ेगा। अंतरिम सरकार को सख्ती से कट्टरपंथियों पर अंकुश लगाना चाहिए। रेफरेंडम को बहाने न बनाएँ, चुनाव समय पर कराएँ।

बांग्लादेश के जो लोग 1971 में भारत के साथ मिलकर पाकिस्तानी अत्याचारों के खिलाफ लड़े थे, अब फिर से सेकुलर बांग्ला अस्मिता को बचाने के लिए खड़े हों। वरना जो देश बंगाली गौरव का प्रतीक था, वह इस्लामी तानाशाही का शिकार हो जाएगा। समय रहते सजग रहें, वरना इतिहास खुद को दोहराएगा।

सत्ता बचाए रखने के लिए भारत विरोधी लहर को और भड़का रही यूनुस सरकार

सारे घटनाक्रमों के तार जोड़ें, तो साफ है कि बांग्लादेश में अस्थिरता पैदा करके चुनाव टालने की साजिश रची जा रही है। अगर चुनाव टल गए, तो यूनुस सरकार बिना वोट के ही सत्ता में बनी रहेगी। ऐसे में इस्लामी कट्टरपंथी लोकतंत्र को हमेशा के लिए खत्म कर देंगे। भारत विरोध का नैरेटिव इसी साजिश का हिस्सा है, जो राजनीतिक अस्थिरता बढ़ाता है और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करता है।

साल 2024 के कथित छात्र विद्रोह के बाद से यूनुस सरकार के दौरान यह नैरेटिव तेज हुआ है, जहाँ प्रदर्शनकारियों ने भारत विरोधी नारे लगाए और आरोप लगाया कि हमलावर भारत भाग गए हैं। इससे देश में ध्रुवीकरण बढ़ता है और चुनाव का माहौल बिगड़ता है, जिससे चुनाव टालने का बहाना मिल जाता है।

भारत-पाक 1971 युद्ध और कट्टरपंथ की जड़ों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना जरूरी

बांग्लादेश का इतिहास समझे बिना वर्तमान स्थिति को नहीं समझा जा सकता। 1971 में पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना था। उस समय पाकिस्तानी सेना ने बंगालियों पर अत्याचार किए थे। लाखों लोगों का कत्लेआम किया गया। लाखों महिलाओं का बलात्कार हुआ और संपत्ति का विनाश किया गया।
इन सबमें जमात-ए-इस्लामी जैसी इस्लामी पार्टियों ने पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात के नेता और कार्यकर्ता पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर बंगाली राष्ट्रवादियों को मारते थे और वे रजाकार नामक मिलिशिया बनाकर अत्याचार करते थे। भारत ने मुक्ति वाहिनी का साथ देकर बांग्लादेश की आजादी में मदद की थी, जिससे लाखों बंगालियों की जान बची। लेकिन अब वही जमात-ए-इस्लामी फिर से सक्रिय हो गई है और पाकिस्तान की मदद से बांग्लादेश को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है।

बांग्लादेशियों पर जुल्म ढाने वाले जमात को यूनुस सरकार ने दी है खुली छूट

जमात-ए-इस्लामी का इतिहास पाकिस्तान समर्थक रहा है। 1971 की युद्ध में इसने पाकिस्तानी सेना की मदद की थी और युद्ध अपराधों में शामिल थी। युद्ध के बाद शेख मुजीब ने इसे बैन किया था, लेकिन बाद में यह फिर उभरी। अब यूनुस सरकार ने जमात पर से बैन हटा लिया है, और इसके नेता जेल से बाहर हैं। इससे कट्टरपंथ को बल मिला है। पाकिस्तान की आईएसआई जमात के जरिए बांग्लादेश में अराजकता फैला रही है, ताकि भारत के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सके। पूर्व भारतीय राजनयिक वीना सिकरी ने कहा है कि जमात पाकिस्तान के इशारे पर काम कर रही है और भारत विरोधी प्रदर्शनों में इसकी भूमिका है।

अपनी पुरानी रणनीति पर काम कर रहा है पाकिस्तान

पाकिस्तान की पुरानी रणनीति है- भारत को दुश्मन बनाकर पड़ोसी देशों में अस्थिरता फैलाना। 1971 की हार की यादों को मिटाने के लिए पाकिस्तान इस्लामी ताकतों को मजबूत कर रहा है। शेख हसीना के बेटे ने भी कहा है कि पाकिस्तान बांग्लादेश को भारत के खिलाफ बेस बनाना चाहता है और यूनुस शासन में यह बढ़ रहा है।

यह ऐतिहासिक घाव अब फिर से खुल रहे हैं। शेख मुजीब की मूर्तियाँ तोड़ी जा रही हैं, जो बांग्लादेश के जन्म का प्रतीक हैं। बांग्ला संस्कृति और राष्ट्रवाद को दबाकर इस्लामी पहचान थोपी जा रही है। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसी संगठन, जो मदरसों से जुड़े हैं, अब सड़कों पर हैं। वे शिया-सुन्नी झगड़ों में शामिल हैं और अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहे हैं। इससे बांग्लादेश की सेकुलर छवि पूरी तरह से खतरे में आ चुकी है।

अशांति के दौर में यूनुस सरकार की भूमिका

पिछले साल अगस्त में शेख हसीना को सत्ता से हटाए जाने के बाद बांग्लादेश में हिंसा का सिलसिला शुरू हो गया। छात्र विद्रोह के नाम पर प्रदर्शन हुए, लेकिन जल्दी ही यह कट्टरपंथियों के हाथ में चला गया। यूनुस को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया गया, लेकिन उन्होंने लोकतंत्र बहाल करने का वादा निभाया नहीं। इसके बजाय, इस्लामी समूहों को बढ़ावा दिया गया। जमात-ए-इस्लामी और छात्र शिबिर जैसे संगठन अब खुलेआम सक्रिय हैं। वे सड़कों पर हिंसा कर रहे हैं, अवामी लीग के दफ्तर जला रहे हैं और मीडिया पर हमले कर रहे हैं।

छात्र नेता शरीफ ओस्मान हादी की मौत के बाद हिंसा भड़क उठी। प्रदर्शनकारियों ने भारत विरोधी नारे लगाए, भारतीय उच्चायोग पर हमला किया और हिंदुओं को निशाना बनाया। मायमेंसिंह जिले में एक हिंदू मजदूर को ब्लासफेमी के आरोप में लिंच कर दिया गया। हिंदू मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और अल्पसंख्यक डर के साए में जी रहे हैं। पत्रकारों, मीडिया दफ्तरों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन यूनुस सरकार इस पर चुप है। यूनुस ने हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हुए इसे ‘फ्रिंज एलिमेंट्स की हरकत करार दिया है। हालाँकि यूनुस भारत पर फेक न्यूज फैलाने का आरोप लगाते रहे हैं।

अवामी लीग को बैन करने के खिलाफ प्रदर्शन हुए, लेकिन उन्हें दबाया जा रहा है। 2025 में अवामी लीग बैन विरोधी प्रदर्शन देशव्यापी हो गए, लेकिन सरकार ने उन्हें कुचला। इससे लोकतंत्र कमजोर हो रहा है। यूनुस पर आरोप है कि वे चुनाव में धांधली करके इस्लामी ताकतों को सत्ता सौंपना चाहते हैं। पाकिस्तान समर्थित समूह अराजकता फैला रहे हैं, ताकि चुनाव टल जाएँ। सड़कों पर प्रदर्शनकारियों का राज है, और हिंसा का उद्देश्य अस्थिरता पैदा करना है।

भारत विरोध के नैरेटिव को हवा दे रहा है पाकिस्तान

बांग्लादेश में चुनाव से पहले भारत विरोधी नैरेटिव तेज हो जाता है। इसका मुख्य कारण राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना है। हाल की रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2024 के छात्र विद्रोह के बाद से यह बढ़ा है। प्रदर्शनकारी भारत विरोधी स्लोगन लगा रहे हैं, और अवामी लीग के ऑफिसों पर हमले हो रहे हैं। इस आग को पाकिस्तान समर्थित तत्व और इस्लामी ग्रुप हवा दे रहे हैं। भारत ने पाकिस्तान की भूमिका को चिन्हित किया है।

पाकिस्तान की भूमिका पुरानी है। वह भारत को दुश्मन बनाकर बांग्लादेश में अराजकता फैलाता है। हाल की घटनाओं में पाकिस्तान का रोल बताया गया है, जो 1971 की यादों को मिटाने की कोशिश है। आईएसआई जमात-ए-इस्लामी के जरिए काम कर रही है। पूर्व राजदूत वीना सिकरी ने कहा कि पाकिस्तान ने शेख हसीना को हटाने में जमात का इस्तेमाल किया। बांग्लादेश में पाकिस्तान मजबूत सरकार नहीं चाहता, क्योंकि इससे भारत से रिश्ते मजबूत होते हैं। कमजोर सिस्टम से वह बांग्लादेश को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर सकता है।

इस्लामी कट्टरपंथ के उभार से लोकतंत्र और सेकुलरिज्म पर बढ़ा खतरा

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथ तेजी से बढ़ रहा है। यूनुस सरकार ने जमात और अन्य समूहों पर बैन हटा लिया, जिससे वे मजबूत हुए। ये समूह पाकिस्तान समर्थित हैं और अराजक माहौल से फायदा उठा रहे हैं। वे खुलकर काम कर रहे हैं, और लोकतंत्र को कमजोर कर रहे हैं। हेफाजत-ए-इस्लाम जैसे संगठन मदरसों से जुड़े हैं, और वे शिया-सुन्नी झगड़ों में शामिल हैं। सेकुलरिज्म को खत्म किया जा रहा है। शेख मुजीब की यादों को मिटाया जा रहा है और बांग्ला संस्कृति दबाई जा रही है।

रेफरेंडम की आड़ में इस्लामी शासन लाने की कोशिश है। हिंदू, ईसाई और अहमदिया जैसे अल्पसंख्यकों पर हमले हो रहे हैं, लेकिन सरकार चुप है। यूनुस ने कहा कि बांग्लादेश में इस्लामी अतिवाद नहीं है, लेकिन पिछले दिनों चार मंदिरों पर हमले हुए और एक पुजारी की हत्या हुई। यह सब लोकतंत्र को निशाना बना रहा है। हिंसा से चुनावी प्रक्रिया बाधित हो रही है और जानकार कहते हैं कि यूनुस सरकार हिंसा का इस्तेमाल करके चुनाव टाल रही है।

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हिंसा का असली मकसद है चुनाव को टालना

फरवरी 2026 के चुनाव से पहले हिंसा बढ़ना संयोग नहीं है। इसका उद्देश्य अराजकता फैलाकर चुनाव टालना है। आलोचक कहते हैं कि यह अस्थिरता को इस्तेमाल करके चुनाव असुरक्षित बताने की रणनीति है। यूनुस सरकार की चुप्पी मिलीभगत का संकेत है। वे हिंसा को फेक न्यूज कहते हैं, लेकिन इससे चुनाव में देरी हो सकती है। इस्लामी कट्टरपंथी छात्र पार्टियाँ चुनाव टालने की माँग कर रही हैं और पाकिस्तान की छाया में यह साजिश रची जा रही है।

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