Lokpal and Lokayuktas Act, 2013 में लोकपाल की नियुक्ति हुई थी जिसका काम है :
“To investigate corruption allegations against high-level public officials, including the Prime Minister and Ministers. Its motto emphasizes Accountability, Transparency, and Justice, serving as India's apex body for clean governance”.
लेकिन लोकपाल एक दंतहीन संस्था बन कर रह गया है और भारत सरकार के लिए एक महंगा “सफ़ेद हाथी” प्रतीत हो रहा है। यह एक संवैधानिक संस्था है लेकिन शक्तिहीन है क्योंकि इसके आदेश को कोई भी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट रोक सकता है और खारिज कर सकता है।
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अब दिल्ली हाई कोर्ट ने 19 दिसंबर, 2025 को महुआ मोइत्रा के खिलाफ CBI को चार्जशीट दायर करने के लोकपाल के आदेश पर रोक लगा दी। हाई कोर्ट की जस्टिस अनिल क्षेत्रपाल और जस्टिस वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने कहा कि Lokayuktas Act, 2013 के प्रावधानों के अनुसार लोकपाल अपने 12 नवंबर के आदेश पर एक महीने में पुनर्विचार करे।
“जिसमें उसने CBI को 4 सप्ताह में चार्जशीट दाखिल करने और एक प्रति लोकपाल कार्यालय में जमा करने के लिए कहा था - The court ruled that the Lokpal has erred in its understanding and interpretation of the relevant provisions of the Lokpal and Lokayuktas Act and had not properly considered Moitra's submissions before issuing the sanction”.
शायद हाई कोर्ट के जज भूल गए कि लोकपाल सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश हैं जिनकी कानूनी जानकारी हाई कोर्ट के जजों से बेहतर ही होगी।
लोकपाल पर क्या खर्च हुआ और क्या काम किया उसने:
-लोकपाल मार्च, 2019 से प्रभावी हुआ और 2021- 22 से 2023 -24 तक उस पर 279.52 करोड़ रुपए खर्च हुए खर्च हुए;
-शुरुआती खर्च (FY 2019-20): Over ₹11.6 crore खर्च हुए January 15, 2020 तक ;
-अगस्त 2021 से जुलाई 2024 के बीच 37.82 लाख रुपए प्रति शिकायत खर्च हुए;
-वर्ष 2019 -20 से अब तक 8703 शिकायत लोकपाल को प्राप्त हुई जिनमें से 68% का निपटारा कर दिया गया जो या तो रिजेक्ट कर दी गई या सही प्रारूप में नहीं पाई गई;
-जनवरी, 2025 तक 24 मामलों में Full Investigation के आदेश दिए गए; और
-केवल 6 मामलों में "अभियोजन स्वीकृति" यानी Prosecution sanction दी गई।
ऐसी परिस्थिति में मुझे नहीं लगता लोकपाल को जारी रखना उचित होगा। बहुत शोर मचाया था अन्ना हज़ारे ने लोकपाल का लेकिन उसका काम अगर ऐसा ही होना था तो इसे शुरू ही नहीं करना चाहिए था।
महुआ मोइत्रा का केस भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकपाल में दर्ज किया। उसका CBI के सामने शिकायत दर्ज करना उचित था और उस पर CBI को कार्रवाई करने की शक्ति होनी चाहिए। हाई कोर्ट के जजों पर लोकपाल की जांच को सुप्रीम कोर्ट बिना किसी कारण लिए बैठा है क्योंकि लोकपाल ने चीफ जस्टिस के सामने जजों पर आपराधिक कार्रवाई करने का संज्ञान लेने के लिए भेजा था।

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