क्या प्रियंका ने कांग्रेस की कुटिया में चिंगारी छोड़ दी है? कांग्रेस सांसद के बाद वाड्रा बोले, प्रियंका नेतृत्व संभालें और बने प्रधानमंत्री चेहरा

सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बना कांग्रेस नितरोज मुंगेरी के सपने देख पार्टी को गटर में धकेल रही है। याद होगा, 2004 में यूपीए सरकार जब सोनिया को प्रधानमंत्री बनाने तत्कालीन महामहिम डॉ अबुल कलाम के पास पहुंची और कांटें हाथ आने पर मजबूर कठपुतली डॉ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने पर परिवार भक्तों ने खूब ढोल पीट-पीट कर शोर मचाया "सोनिया गाँधी त्याग की देवी", लेकिन यह नहीं बताया कि संवैधानिक बेड़ियों के चलते सोनिया गाँधी तो क्या राहुल या प्रियंका में से कोई भी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। परिवार गुलामों को मालूम होना चाहिए कि संविधान में चाणक्य नीति को जवाहर लाल नेहरू ने भी अपनाकर इंदौर के राजा की विदेशी पत्नी के बच्चों के हाथ इंदौर का राज नहीं जाने दिया था।      

कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति की कड़ियों को जोड़ें तो यह साफ-साफ नजर आने लगा है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के खेमे खुलकर आमने-सामने आने को आतुर हैं। कांग्रेस की हार-दर-हार से बौखलाए कांग्रेस नेताओं का विश्वास राहुल गांधी से उठने लगा है। यही वजह है कि भाई-बहन (राहुल-प्रियंका) के बीच शीतयुद्ध की खबरें सुर्खियों में हैं। दूसरे यह कि संसद सत्र समाप्त होने पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्षी नेताओं को चाय पर निमंत्रण पर राहुल की गैर-मौजूदगी में प्रियंका वाड्रा में जाना और रक्षामंत्री राजसिंह के साथ बैठने से भी कांग्रेस में हलचल शुरू हो गयी है। सुर्खियों को खुद प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी उस प्रशांत किशोर से मुलाकात करते हवा दी है, जो पिछले दिनों राहुल गांधी के खिलाफ लगातार बयानबाजी कर चुके हैं। प्रशांत तो राहुल गांधी के सबसे अहम मुद्दे ‘वोट चोरी’ की आलोचना कर चुके हैं और उन्होंने यह भी कहा है कि Gen Z को राहुल गांधी को क्यों सुनना चाहिए। जहां कांग्रेस का एक खेमा राहुल गांधी को भविष्य का पीएम प्रोजेक्ट करने में लगा है, वहीं प्रियंका के चाहने वालों का मानना है कि राहुल कभी पीएम नहीं बन सकते। इसलिए 2029 में प्रियंका गांधी को कांग्रेस का पीएम चेहरा बनाना चाहिए। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने साफ तौर पर कहा है कि अब प्रियंका गांधी वाड्रा को ही पीएम फेस के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहिए। गांधी परिवार की इस रार के बीच प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा के बयान ने आग में घी का काम किया है। वाड्रा ने कहा है कि प्रियंका गांधी की पूरे देश में डिमांड है। देश की यह मांग है कि अब प्रियंका आगे आएं और नेतृत्व संभाले। रॉबर्ट के इस बयान ने राहुल गांधी को पूरी तरह हाशिए पर धकेल दिया है।
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नेहरू ने “विदेशी महिला के पुत्र” को इंदौर का राजा बनने से मना करके राहुल गांधी और प्रियंका वाड्
नेहरू ने “विदेशी महिला के पुत्र” को इंदौर का राजा बनने से मना करके राहुल गांधी और प्रियंका वाड्
 

राहुल गांधी जनता के साथ संवाद में सहज नहीं रह पाते

दरअसल, अब कांग्रेस के भीतर यह धारणा मजबूत हुई है कि राहुल गांधी जनता से संवाद में सहज नहीं रह पाते हैं। कई बार संसद से लेकर चुनावी सभाओं तक में इसके जीवंत उदाहरण मिले हैं। इसके अलावा राहुल गांधी सीमित कोर टीम पर निर्भर रहते हैं और संगठन की शिकायतें सुनने के लिए उतने उपलब्ध नहीं दिखते। राहुल गांधी ने अपने चारों ओर सलाहकारों का ऐसा चक्रव्यूह बना लिया है, जिसे भेदकर कोई सच्चा, समर्पित कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि वरिष्ठ कांग्रेस नेता भी सही बात राहुल तक नहीं पहुंचा पाता। इसके विपरीत कांग्रेस कार्यकर्ताओं में फिलहाल तो प्रियंका गांधी वाड्रा को एक आसान‑सुलभ, सुनने वाली नेता के रूप में देखा जा रहा है, जो कठिन मुद्दों पर भी हल्की भाषा में सख्त बात कहने की क्षमता रखती हैं। प्रियंका गांधी खेमे के नेता संसद के शीतकालीन सत्र में उनके भाषण को राहुल गांधी से कहीं बेहतर मानते हैं।

 कांग्रेस सांसद इमरान ने प्रियंका को पीएम फेस बनाने की पैरवी की

यही वजह है कि अब राहुल के खिलाफ प्रियंका का समर्थन खुलकर सामने आने लगा है। यूपी के सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की खुली वकालत कर दी। मसूद ने कहा कि कांग्रेस ने प्रियंका को पीएम चेहरा बनाया और अगले लोकसभा चुनाव में वो पीएम बनीं तो इंदिरा गांधी की तरह बांग्लादेश और पाकिस्तान को करारा जवाब देंगी। मसूद ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस में प्रियंका ही विदेश नीति के मोर्चे पर सशक्त नेता के रूप में स्थापित हो सकती है। मसूद के बयान ने कांग्रेस में तूफान ला दिया। इसके बाद में पार्टी ने ऐसा दबाव बनाया कि मसूद को अपने बयान पर सफाई देनी पड़ी। हालांकि इसने इस सवाल को धार दे दी कि क्या वास्तव में कांग्रेस में ‘राहुल हटाओ, प्रियंका लाओ’ की पुकार चल रही है ? इस प्रकरण ने मीडिया और राजनीतिक हलकों में यह सवाल और तेज कर दिया कि क्या कांग्रेस सचमुच राहुल की जगह प्रियंका को आगे लाने पर विचार कर रही है या यह केवल नाराज नेताओं की आकांक्षाओं की प्रतिध्वनि है?
प्रियंका की बढ़ती स्वीकार्यता: कार्यकर्ताओं से संगठन तक
कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि पार्टी को प्रियंका गांधी को कम से कम राहुल के समकक्ष सार्वजनिक भूमिका देनी चाहिए, क्योंकि वे नेताओं‑कार्यकर्ताओं से सहज संवाद करती हैं और निर्णय लेने से पहले अलग‑अलग धाराओं को सुनती भी हैं। कुछ नेताओं ने तो दबी जुबान से यहां तक सुझाव दे डाला कि राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को हटाकर पार्टी की बागडोर प्रियंका को सौंप दी जाए। जिन नेताओं ने इसे खुलकर बोला, उन पर तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई भी हुई। हालांकि, सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक, राहुल गांधी की लगातार हार और विवादित बयानों की तुलना में प्रियंका की छवि को कांग्रेस ऐसे पेश करने की कोशिश में दिखाई देती है, जैसे उनके आने से मृतप्राय हो रही कांग्रेस को नई ऑक्सीजन मिल जाएगी।
‘प्रियंका फॉर पीएम’ के पक्षधर में रॉबर्ट वाड्रा का नाम आगे
प्रियंका गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री मानने वालों की कतार अलग‑अलग कारणों से बढ़ती नजर आर रही है। पहला कारण तो राहुल गांधी का हर स्तर पर बुरी तरह फेल हो जाना है। इसके अलावा कांग्रेस के भीतर सांसद इमरान मसूद, ओडिशा के विधायक मोहम्मद मोक़ीम जैसे नेता और कुछ अन्य प्रदेश स्तर के चेहरे खुले तौर पर चाहते हैं कि प्रियंका को पार्टी शीर्ष नेतृत्व सौंपा जाए। सबसे बड़ी बात तो यह है कि राहुल गांधी के जीजा ने भी पहली बार सार्वजनिक तौर पर प्रियंका को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। गांधी परिवार की इस रार के बीच प्रियंका के पति रॉबर्ट वाड्रा के बयान ने आग में घी का काम किया है। वाड्रा ने कहा है कि प्रियंका गांधी की पूरे देश में डिमांड है। देश की यह मांग है कि अब प्रियंका आगे आएं और नेतृत्व संभाले। रॉबर्ट के इस बयान ने राहुल गांधी को हाशिए पर धकेल दिया है। वाड्रा ने इस पर जोर देते हुए कहा है कि लोगों को प्रियंका में इंदिरा गांधी की झलक दिखती है और समय आने पर वे शीर्ष पद पर अनिवार्य रूप से दिखेंगी।
दो चेहरों में से एक को चुनना कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
आज की तस्वीर यह है कि प्रियंका गांधी वाड्रा का राजनीतिक कद केवल राहुल गांधी के समानांतर नहीं, बल्कि कई मायनों में उनसे आगे बढ़ता दिख रहा है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या कांग्रेस नेतृत्व इस उभार को औपचारिक मान्यता देने की हिम्मत जुटा पाएगा या फिर उसे एक और ‘अन्यथा संभावित’ ब्रह्मास्त्र बनाकर फिर से चुप्पी साथ लेगा? और फिर राहुल गांधी की फेल विचारधारा को ही आगे बढ़ाएगा। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की राजनीति की बिसात पर सच यही है कि जैसे‑जैसे ‘प्रियंका फॉर पीएम’ का शोर और तेजी से जोर पकड़ेगा, वैसे-वैसे दोनों भाई‑बहन के बीच की रेखाएं और दूरियां बढ़ती जाएंगी। गांधी परिवार में बड़ी दरार और दीवार के बाद तय होगा कि चुनावी पोस्टर पर असली चेहरा कौन होगा?
राहुल को कोसने वाले प्रशांत से प्रियंका की मुलाकात के मायने
कांग्रेस के नेता और प्रियंका के पति ही नहीं, खुद प्रियंका वाड्रा की गतिविधियों में ‘राहुल-विरोध’ की झलक दिखाई देने लगी है। इसका पता इससे चलता है कि बिहार चुनाव में राहुल गांधी की पानी पी-पीकर बुरी तरह से कोस चुके प्रशांत किशोर के साथ प्रियंका की नजदीकी बढ़ी है। इन दिनों जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर और प्रियंका गांधी के बीच एक अहम मुलाकात हुई है। इसके बाद कांग्रेस के साथ-साथ राजनीति भी गर्मा गई है। माना जा रहा है कि प्रशांत के आने से वर्ष 2029 का लोकसभा का चुनावी जंग एक नए गठबंधन के साथ हो सकता है। क्योंकि जंग हारने वाले जब दो दल मिलते हैं तो जीत के नए समीकरण पर ही बात को केंद्रित करते हैं। वर्ष 2025 के चुनावी जंग में महागठबंधन की बात करें तो कांग्रेस गठबंधन की राजनीति में सहज नहीं रही है। कई बार तो अकेले दम पर चुनाव लड़ने की बात तक कर डाली। ऐसा संभव है कि प्रियंका गांधी से प्रशांत किशोर की बात एक चुनावी रणनीतिकार के रूप में हुई हो। लेकिन दोनों के गठबंधन की खबरें हवा में हैं। बता दें कि कांग्रेस के साथ पंजाब में प्रशांत किशोर काम भी कर चुके हैं।
राहुल बनाम प्रशांत किशोर: राजनीति में नैरेटिव की लड़ाई
बिहार चुनाव राहुल वर्सेज प्रशांत किशोर का ताजा उदाहरण हैं। दरअसल, भारतीय राजनीति में जब कोई चुनावी रणनीतिकार सीधे किसी नेता को चुनौती देता है, तो वह सिर्फ व्यक्ति पर नहीं, पूरी राजनीति की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है। प्रशांत किशोर के राहुल गांधी के खिलाफ हालिया बयान इसी श्रेणी में आते हैं। ये बयान केवल आलोचना नहीं, बल्कि कांग्रेस की सोच, नेतृत्व और जमीनी राजनीति से उसके कटाव का आईना हैं। यह आलोचना राहुल गांधी को एक ऐसे नेता के रूप में पेश करती है जो सिर्फ भाषणों में जिंदा रहते हैं, लेकिन चुनावी जमीन गंवा देते हैं। किशोर ने कहा था कि राहुल गांधी न तो बिहार में टिकते हैं, न वहां की सामाजिक-आर्थिक जटिलताओं को आत्मसात करते हैं। गांव में रात बिताने की चुनौती देकर उन्होंने राहुल गांधी की जमीनी पकड़ पर सीधा प्रश्नचिह्न लगा दिया था।
आखिर राहुल गांधी को क्यों सुने Gen-Z – प्रशांत किशोर

प्रशांत किशोर का सवाल है कि राहुल गांधी को क्यों सुने Gen-Z. यह सवाल साधारण नहीं है। यह सीधा हमला है राहुल गांधी की प्रासंगिकता पर। किशोर का तर्क है कि आज का युवा—खासतौर पर बिहार और उत्तर भारत का युवा—भावनात्मक भाषणों या प्रतीकात्मक यात्राओं से नहीं, बल्कि स्थायी समाधान और ठोस रोडमैप से जुड़ता है। उनके अनुसार राहुल गांधी की राजनीति इवेंट-ड्रिवन है, जबकि युवा रिजल्ट-ड्रिवन राजनीति चाहता है। प्रशांत ने तो यहां तक कहा था कि राहुल गांधी ने “दिल्ली में बैठकर बिहार को समझने का भ्रम पाल लिया गया है।” इतना ही नहीं जिस वोट चोरी के मुद्दे पर राहुल गांधी ने यात्रा निकाली थी, उस पर ही किशोर का कहना था कि “वोट चोरी” जैसे मुद्दे केवल एक राजनीतिक बहाना है। इससे जनता का प्राथमिक सरोकार नहीं जुड़ा है।
96 चुनाव हारने के बाद कांग्रेस का बदलता नैरेटिव
कांग्रेस के भीतर बढ़ती इस बहस और हाल के बयानों ने साफ कर दिया है कि प्रियंका गांधी वाड्रा का कद राहुल गांधी की तुलना में तेजी से उभर रहा है। प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस के प्रधानमंत्री चेहरे के रूप में देखने वाले पार्टी नेताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। यह उभार केवल रिश्तेदारी या किसी करिश्मे की देन नहीं है, बल्कि पार्टी‑संगठन, संसद और जनमानस में लगातार फेल हो रहे राहुल गांधी के चलते बदल रहे समीकरणों का परिणाम है। कांग्रेस लंबे समय से राहुल गांधी को विचारधारा और नेतृत्व का केंद्रीय चेहरा बनाकर चल रही थी, लेकिन राहुल गांधी ने जब से पहला चुनाव लड़ा है और कांग्रेस का नेतृत्व संभाला है, तब से कांग्रेस लोकसभा और विधानसभा के 96 चुनाव हार चुकी है। लगातार चुनावी पराजयों और आंतरिक असंतोष ने उनके नेतृत्व के प्रति भरोसे में खतरनाक दरार डाल दी है। यह दरार हर चुनावी हार के बाद और चौड़ी होती जा रही है। ताजा उदाहरण बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली करारी हार है।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को एक और हार का सामना करना पड़ा है। देश की राजनीति में कांग्रेस पार्टी के लिए चुनावी हार अब एक दुखद ‘पैटर्न’ बन चुकी है। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के निराशाजनक नतीजों ने एक बार फिर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी 10 के आंकड़े तक पहुंचने के लिए संघर्ष कर रही है। जब से राहुल गांधी ने सक्रिय रूप से पार्टी की कमान संभाली है, तब से कांग्रेस लगातार एक के बाद एक राज्यों में अपनी जमीन खोती जा रही है। हर चुनाव में नई रणनीति, नए गठबंधन और नए वादों के बावजूद, पार्टी की ‘हार की राह’ खत्म होती नहीं दिख रही है। बिहार में महागठबंधन की हार ने यह स्थापित कर दिया है कि राहुल गांधी का नेतृत्व न तो मतदाताओं को आकर्षित कर पा रहा है और न ही पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं को एकजुट रख पा रहा है। चुनावों के आंकड़े गवाह हैं कि राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी में जैसे-जैसे जिम्मेदारी ज्यादा हुई। वैसे-वैसे कांग्रेस की दुर्दशा बद से बदतर होती गई। राहुल गांधी ने 2004 में लोकसभा का पहला चुनाव लड़ा था। वे सांसद से लेकर पार्टी महासचिव और अखिल भारतीय कांग्रेस अध्यक्ष पद पर भी रहे। लेकिन हालात ये हैं कि पिछले दो दशक के उनके राजनीतिक जीवन के दौरान कांग्रेस हार की सैंचुरी लगाने के करीब पहुंच चुकी है। कांग्रेस पिछले 21 साल की अवधि में लोकसभा और विधानसभाओं के 96 चुनाव हार चुकी है।

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