दुनिया के 5वें सबसे अधिक आबादी वाले मुल्क पाकिस्तान में बढ़ती आबादी का संकट लगातार गहराता जा रहा है। इस बीच आवाम के लिए गर्भनिरोधक साधन आज भी महँगे और पहुँच से दूर की चीज बने हुए हैं। पाई-पाई को मोहताज पाकिस्तान में हालात ऐसे हैं कि एक साधारण कंडोम का पैकेट भी बड़ी आबादी की पहुँच से बाहर है। इस संकट से निपटने के लिए पाकिस्तान ने एक योजना बनाई कि गर्भनिरोधक उत्पादों पर लगने वाला 18 प्रतिशत जनरल सेल्स टैक्स (GST) हटाकर उन्हें सस्ता किया जाए लेकिन अब यह योजना भी अधर में लटक गई है।
IMF ने कंडोम पर GST हटाने से किया मना
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने पाकिस्तान सरकार को बड़ा झटका देते हुए गर्भनिरोधक उत्पादों पर GST हटाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह फैसला उस समय आया है जब खुद प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ देश की तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर खुले मंच से चिंता जता चुके हैं। पाकिस्तान की आबादी सालाना करीब 2.55 प्रतिशत की खतरनाक रफ्तार से बढ़ रही है और यह पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर और भारी बोझ डाल रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संघीय राजस्व बोर्ड (FBR) ने IMF के सामने प्रस्ताव रखा था कि कंडोम और अन्य गर्भनिरोधक साधनों से 18% GST हटाया जाए जिससे आने वाले बजट से पहले कीमतें कम की जा सकें। IMF ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। नतीजा यह हुआ कि प्रधानमंत्री का अगस्त 2025 का निर्देश भी कागजों तक सीमित रह गया।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने कई महीने पहले ही FBR को निर्देश दिया था कि वह IMF के साथ इस मुद्दे को गंभीरता से उठाए। इसके बाद पाकिस्तानी अधिकारियों ने कई दौर की बातचीत की लेकिन हर बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक में अधिकारियों ने साफ कर दिया कि IMF अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है।
IMF के अधिकारियों ने बंद दरवाजों के पीछे हुई बातचीत में साफ शब्दों में पाकिस्तानी प्रतिनिधियों को बता दिया कि गर्भनिरोधक उत्पादों पर किसी भी तरह की टैक्स राहत पर 2026-27 के बजट से पहले विचार ही नहीं किया जाएगा। यानी आम जनता को राहत देने की बात फिलहाल पूरी तरह टाल दी गई है।
पाकिस्तानी पक्ष ने बातचीत के दौरान सिर्फ कंडोम और गर्भनिरोधक साधनों पर ही नहीं बल्कि महिलाओं की जरूरत से जुड़े सैनिटरी पैड और शिशुओं के लिए इस्तेमाल होने वाले बेबी डायपर पर भी GST घटाने का प्रस्ताव रखा था। हालाँकि, IMF ने इन सभी सुझावों को सख्ती से खारिज कर दिया। IMF का तर्क था कि इन उत्पादों से सरकार को होने वाली टैक्स आय बहुत बड़ी है और इसे छोड़ना उनके हिसाब से ‘आर्थिक अनुशासन’ के खिलाफ होगा।
खास तौर पर बेबी डायपर को लेकर IMF ने कड़ा रुख अपनाया। अधिकारियों के मुताबिक, IMF ने यह दलील दी कि बेबी डायपर का टैक्स बेस करीब 100 अरब पाकिस्तानी रुपए के आसपास है और इसमें किसी भी तरह की छूट देने से सरकारी राजस्व को बड़ा झटका लग सकता है। यानी बच्चों की बुनियादी जरूरत भी पाकिस्तान में सिर्फ एक ‘रेवेन्यू आइटम’ बनकर रह गई है।
इस फैसले का सीधा असर आम पाकिस्तानी परिवारों पर पड़ रहा है। महँगाई पहले ही आसमान छू रही है, स्वास्थ्य सुविधाएँ बदहाल हैं और अब परिवार नियोजन के साधन भी महँगे बने रहेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि गर्भनिरोधक तक आसान पहुँच न होने से अनियोजित जन्म बढ़ेंगे, जिससे गरीबी, बेरोजगारी और कुपोषण जैसी समस्याएँ और गहराएँगी।
बढ़ती आबादी का ‘राष्ट्रीय आपातकाल’
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या फंड (UNPF) के आँकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान की मौजूदा जनसंख्या 25.5 करोड़ के आस-पास है। इसमें 36.4% आबादी 0-14 वर्ष के बीच है जबकि 59.6% आबादी 15-64 साल के बीच की है। वहीं, देश की 4% आबादी की उम्र 65 वर्ष से अधिक है।
सतही तौर पर पाकिस्तान में बढ़ती आबादी का खतरा ना दिखे लेकिन पाकिस्तान के आर्थिक हालात आबादी के बोझ को सहने लायक नहीं बचे हैं। विश्व बैंक के रिकॉर्ड के मुताबिक, पाकिस्तान की आबादी में करीब 45% आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने को मजबूर है।
खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने आबादी के संकट को स्वीकार किया है। अगस्त 2025 में एक बैठक के दौरान उन्होंने देश में बढ़ती जनसंख्या दर को ‘चिंताजनक और खतरनाक रुझान’ बताया और कहा है कि इससे निपटने के लिए तुरंत राष्ट्रीय नीति की जरूरत है।
وزیراعظم محمد شہباز شریف کی زیر صدارت ملک میں بڑھتی ہوئی آبادی اور اسکے حوالے سے مسائل کے حل کے لئے اقدامات کے حوالے سے اجلاس
— Senator Musadik Malik (@Team_Musadik) August 7, 2025
پاکستان میں آبادی کے بڑھنے کی سالانہ شرح 2.55 فیصد ہے، وزیراعظم
تیزی سے بڑھتی ہوئی آبادی کی ترقی اور انکو اپنی معیشت کا فعال حصہ بنانے کے لئے… pic.twitter.com/myZxtGmQ08
पाकिस्तान की आबादी के संकट को खुद सरकार ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ मान रही है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के योजना, विकास और विशेष पहल मंत्री एहसान इकबाल ने जनसंख्या प्रबंधन पर हुई एक उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करते हुए साफ शब्दों में कहा कि आबादी का मामला देश के लिए बेहद गंभीर और खतरनाक रूप ले चुका है। बैठक में बोलते हुए एहसान इकबाल ने माना कि जनसंख्या नियोजन का असर नागरिक के जीवन के हर पहलू पर पड़ता है अब चाहे वह स्वास्थ्य हो, शिक्षा हो या रोजगार।
इकबाल ने कहा कि मौजूदा 2.55% की सालाना जनसंख्या वृद्धि दर के हिसाब से 2050 तक पाकिस्तान की आबादी 38.6 करोड़ से भी ज्यादा हो सकती है। यह अनुमान साफ संकेत देता है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान पर जनसंख्या का दबाव कई गुना बढ़ने वाला है। वह भी ऐसे समय में जब पाकिस्तान पहले से ही आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी और संसाधनों की कमी से जूझ रहा है।
पाकिस्तान में बढ़ती आबादी से और बढ़ता संकट
पाकिस्तान की आबादी अब उसका संकट बनती जा रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार से लेकर खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास पर इसका गंभीर असर दिखाई पड़ रहा है। जुलाई 2025 में पाकिस्तान के स्वास्थ्य मंत्री सैयद मुस्तफा कमाल ने विश्व जनसंख्या दिवस 2025 पर आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि पाकिस्तान में आबादी बढ़ने की रफ्तार ‘खतरनाक स्तर’ तक पहुँच चुकी है।
इसी दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने जनसंख्या संकट के गंभीर नतीजों की ओर इशारा करते हुए चौंकाने वाले आँकड़े पेश किए। उन्होंने बताया कि देश में 2.5 करोड़ से अधिक बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल से बाहर हैं क्योंकि बढ़ती आबादी का दबाव शिक्षा व्यवस्था झेल नहीं पा रही। यह आँकड़ा अपने आप में पाकिस्तान के भविष्य पर बड़ा सवाल खड़ा करता है, जहाँ अगली पीढ़ी बिना शिक्षा के आगे बढ़ रही है।
सरकारी अस्पतालों की हालत पर टिप्पणी करते हुए मंत्री ने कहा कि वहाँ मरीजों की भीड़ किसी सार्वजनिक रैली जैसी दिखाई देती है। यह बयान पाकिस्तान की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई बयान करता है, जहाँ अस्पताल इलाज के केंद्र कम और अव्यवस्था की तस्वीर ज्यादा बन चुके हैं। वित्त मंत्री मुहम्मद औरंगजेब ने भी जनसंख्या वृद्धि के आर्थिक असर को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित आबादी देश के संसाधनों, सामाजिक ढाँचे और आर्थिक स्थिरता पर भारी दबाव डाल रही है।
पाकिस्तान में UNFPA के प्रतिनिधि Luay Shabaneh ने करीब एक हफ्ते पहले ‘डॉन’ में लिखा, “25 करोड़ से अधिक आबादी वाले देश में बेसिक रिप्रोडक्टिव हेल्थ सर्विस तक पहुँच लोगों के लिए आज भी एक संघर्ष है। 16% शादीशुदा महिलाओं को आज भी फैमिली प्लानिंग की सुविधा नहीं मिलती है और गर्भनिरोधक इस्तेमाल करने की दर लगभग 32% पर अटकी हुई है।” उन्होंने लिखा, “पाकिस्तान में सालाना 3.5 मिलियन अनचाही प्रेग्नेंसी होती हैं और इनमें से 61% का नतीजा इंड्यूस्ड अबॉर्शन (गर्भपात) होता है, जो अक्सर असुरक्षित होता है।”
पाकिस्तान में ‘प्रजनन संकट’
IMF से पाकिस्तान को मिला झटका इसलिए भी मुश्किलें बढ़ाने वाला है क्योंकि पाकिस्तान अनचाही प्रेग्नेंसी से जूझ रहा है। पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हर साल पाकिस्तान में करीब 1 करोड़ 27 लाख गर्भधारण होते हैं। इनमें से लगभग 60 लाख गर्भ ऐसे होते हैं, जिनकी योजना पहले से नहीं बनाई गई होती। यानी औसतन हर साल होने वाला हर दूसरा गर्भ अनचाहा होता है। यह स्थिति साफ दिखाती है कि देश में प्रजनन स्वास्थ्य सेवाएँ, गर्भनिरोधक साधनों तक पहुँच और परिवार नियोजन को लेकर जागरूकता कितनी कमजोर है।
पाकिस्तान के फेडरल हेल्थ सेक्रेटरी हामिद याक़ूब शेख ने इसे राष्ट्रीय आपात स्थिति बताया है। उनके मुताबिक बिना योजना के होने वाले जन्म सिर्फ जनसंख्या का मसला नहीं हैं बल्कि यह शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण व्यवस्था पर सीधा असर डालने वाली विकास की बड़ी समस्या है। आजादी के 77 साल में पाकिस्तान की आबादी 7 गुना बढ़ गई है जबकि अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक विकास की रफ्तार कछुए जैसी है।
पाकिस्तान में गर्भनिरोधकों की पहुँच को लेकर पहले से ही संकट है और IMF ने इसे और बढ़ा दिया है। ग्रामीण और गरीब इलाकों में रहने वाली लाखों महिलाओं तक आधुनिक गर्भनिरोधक साधन नहीं पहुँच सके हैं। पाकिस्तान में कम साक्षरता और स्वास्थ्य शिक्षा की कमी के चलते गर्भनिरोधक को लेकर कई गलत धारणाएँ फैली हुई हैं। बहुत-सी महिलाओं को लगता है कि परिवार नियोजन से हमेशा के लिए बाँझपन हो जाता है या फिर यह धर्म के खिलाफ है।
एक बड़ी समस्या महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को लेकर भी है। कब-कितने बच्चे पैदा हो महिलाओं को पाकिस्तान में इसका अधिकार ही नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वो अपने फैसले खुद नहीं ले पाती हैं।
ऐसी अनचाही प्रेगनेंसी का असर हर स्तर पर दिखता है। अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, मातृ-मृत्यु दर बढ़ी हुई है और करीब 40% बच्चे कुपोषण से जूझ रहे हैं। बेरोजगारी-गरीबी भी लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में पहले से खस्ताहाल आर्थिक ढाँचे पर बोझ बढ़ता ही जा रहा है। अपने आर्थिक फैसलों के लिए IMF पर मजबूर पाकिस्तान की समस्याएँ दिन-ब-दिन बढ़ती ही जा रही हैं।
क्या पाकिस्तान की बढ़ती आबादी भारत के लिए चिंता की बात है?
1944 में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) के फिलाडेल्फिया घोषणा पत्र में संगठन के सिद्धांतों में कहा गया था कि ‘कहीं भी गरीबी, हर जगह समृद्धि के लिए एक खतरा है’। यह बात आज भी लागू होती है। यही समस्या भारत के लिए भी है। पाकिस्तान की तेजी से बढ़ती आबादी भारत के लिए सबसे पहले सुरक्षा के लिहाज से चिंता पैदा करती है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 तक पाकिस्तान की जनसंख्या 35 करोड़ तक जा सकती है। इतनी बड़ी आबादी को रोजगार, शिक्षा और संसाधन न मिलने की स्थिति में आंतरिक अस्थिरता बढ़ना तय है। पड़ोसी होने के नाते इसका असर सबसे अधिक भारत पर ही पड़ने की संभावना है।
पाकिस्तान की बढ़ती आबादी के साथ पानी, जमीन और रोजगार का संकट गहराता जा रहा है। अधिकतर इलाकों में संसाधनों की कमी पहले से ही मुश्किलें पैदा कर रही है। आगे चलकर अगर परिस्थितियाँ बिगड़ती हैं तो में सीमावर्ती इलाकों में अवैध घुसपैठ, तस्करी और अपराध बढ़ने की आशंका रहती है। भारत-पाकिस्तान सीमा पहले ही संवेदनशील है और यदि पाकिस्तान में जनसंख्या दबाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर भारत की आंतरिक सुरक्षा पर पड़ सकता है।
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