न्यायालयों में अराजकता फैला कर काम में बाधा डालने की प्रथा शुरू हो चुकी है; लेकिन जब अराजकता और हिंसा सड़कों पर होती है तो अदालतें उस पर ध्यान नहीं देती

साभार सोशल मीडिया 
सुभाष चन्द्र

पिछले महीने 3 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट में एक महिला वकील ने हंगामा खड़ा कर दिया कि उसके केस की सुनवाई पहले की जाए उसे बहुत समझाया गया कि कोर्ट में केस लिस्ट करने की प्रक्रिया का पालन करे लेकिन वह नहीं मानी और फिर उसे मार्शलों की मदद से कोर्ट के बाहर किया गया

इस घटना से सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस को समझना चाहिए कि जब संसद में ऐसा हंगामा विपक्ष करता है तो क्या हाल होता है जब 100-100 से भी ज्यादा सांसद होते हैं जो ऐसे विषय पर हंगामा करते हैं जिसे वो पहले ही सुप्रीम कोर्ट में ले गए है। आप एक महिला वकील के हंगामे को सहन नहीं कर सके और मार्शल बुला लिए, तो सोचिए लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा के सभापति उपराष्ट्रपति कैसे काम करते हैं

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इसके बाद 22 दिसंबर को लखनऊ की MP/MLA कोर्ट में राहुल गांधी की विदेशी नागरिकता से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने वो हंगामा किया किया कि कोर्ट को कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी फिर उसकी सुनवाई जनवरी के पहले सप्ताह में शुरू हुई ये सुनवाई उस व्यक्ति के मामले की थी जो लोकसभा में LoP है यानी संवैधानिक पद पर विराजमान है और उसकी तरफ से हंगामा किया गया उसके अपने Gen Z द्वारा

फिर 9 जनवरी को कोलकाता हाई कोर्ट में जब ED की IPAC की रेड के दौरान ममता और TMC के लोगों द्वारा दस्तावेजों को छीनकर ले जाने के खिलाफ शिकायत पर जब सुनवाई शुरू हुई तो TMC के गुंडों ने कोर्ट में ऐसा हंगामा किया और जस्टिस सुरवा घोष इस कदर भयभीत हो गई कि उन्हें सुनवाई छोड़ कर कोर्ट से जाना पड़ा और अगली तारीख तय कर दी 

इस तरह अब अदालतों में जजों को अगर डरा कर अपने विरुद्ध कोई सुनवाई ही नहीं होने दी जाएगी तो अदालतों का काम तो बंद ही हो जाएगा एक समय था उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट के अनेक जजों की मुख्तार अंसारी और अतीक अहमद जैसे खूंखार अपराधियों के मुकदमों की सुनवाई करने की हिम्मत नहीं होती थी लेकिन योगी आदित्यनाथ के आने बाद यूपी की अदालतों में आमूलचूल परिवर्तन हुए जिसकी वजह से कल चीफ जस्टिस सूर्यकांत को कहना पड़ा कि जो काम योगी जी ने किया वह अन्य राज्यों के लिए उदहारण बनना चाहिए 

अब संसद में अराजकता के अलावा विपक्ष की सड़कों पर अराजकता भी आम बात हो चुकी है जिसे सुप्रीम कोर्ट ही प्रदर्शन का मौलिक अधिकार और कानून व्यवस्था की समस्या कह कर टालता रहा है आपको याद होगा 26 जनवरी, 2021 से  पहले दिल्ली पुलिस ने तत्कालीन चीफ जस्टिस बोबडे के सामने याचिका की थी कि 26 जनवरी को आंदोलन पर रोक लगाई जाए क्योंकि उससे बड़े पैमाने पर हिंसा होने का डर है लेकिन CJI बोबडे ने टका सा जवाब दिया कि कानून व्यवस्था संभालना आपका काम है

अब तमिलनाडु सरकार ने इस कानून व्यवस्था के भंग होने के नाम पर कार्तिगाई दीपम प्रज्वलित करने के हाई कोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं किया इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि किसान आंदोलन की 26 जनवरी, 2021 की हिंसा के लिए CJI बोबडे जिम्मेदार थे

कहने का सार यह है कि अदालतों को कानून व्यवस्था बनाने में सरकार का सहयोग करना चाहिए लेकिन कभी कभी अदालतें कर्मठ पुलिस कर्मियों पर बेवजह राजनीतिक दबाव में आकर कार्यवाही करती हैं जो उचित नहीं है अभी हाल ही में संभल की जिला अदालत ने DSP अनुज चौधरी और अन्य 15 पुलिसकर्मियों पर FIR करने के आदेश दिया हैं जबकि चौधरी ने कानून व्यवस्था संभालने में हर तरह कोशिश की - ऐसे में  क्या पुलिस वालों मनोबल नहीं गिरेगा

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