खालिद उमर और शरजील इमाम को जमानत देने में सुप्रीम कोर्ट ने अपना नजरिया बदला है; ट्रायल में देरी आधार नहीं है बेल का, अब दोनों ट्रायल में खुद देरी नहीं करेंगे

सुभाष चन्द्र

5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने खालिद उमर और शरजील इमाम की जमानत अर्जी ख़ारिज करके अपने दृष्टिकोण में लगता है “आमूल परिवर्तन” (Paradigm Shift) किया है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में देरी जमानत का आधार नहीं हो सकता। बहुत समय से खासकर चंद्रचूड़ के कार्यकाल से एक नया doctrin सुप्रीम कोर्ट चल रहा था कि “Bail is a rule, Jail is an Exception” जिसका मतलब यह भी निकलता था कि जितनी जल्दी हो सके जमानत दे दी जाए

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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस Aravind Kumar and N.V. Anjaria ने 5 आरोपियों Gulfisha Fatima, Meeran Haider, Shifa Ur Rehman, Mohd Saleem Khan, Shadab Ahmed की जमानत अर्जी मंजूर करते हुए कहा कि खालिद और इमाम पर UAPA में आरोप  ज्यादा गंभीर हैं। लेकिन अन्य को आरोपों के लिए कोई छूट नहीं दी। कोर्ट ने कहा कि वे एक साल बाद “Protected Witnesses” के बयानों के दर्ज होने के बाद पुनः जमानत के लिए अर्जी लगा सकते हैं

दूसरी तरफ 15 जून, 2021 को दिल्ली दंगों के 3 प्रमुख आरोपियों देवांगना कलिता, नताशा (दोनों पिंजड़ा गैंग की सदस्य) और आसिफ इक़बाल को जमानत देते हुए दोनों जजों ने कहा कि नताशा पर लगाए गए आरोप सबूतों और तथ्यों की आधार पर साबित नहीं होते। और कलिता को केवल कुछ महिला समूहों ने विरोध प्रदर्शन करने में मदद की और ये तो उनका मौलिक अधिकार है। 

मतलब मौलिक अधिकार ऐसे है कि लोगो को भड़का का चाहे दंगा ही करा दो जिसमें बेशक 53 लोग मारे जाएं। नताशा पर लगाए गए आरोप सबूतों और तथ्यों के आधार पर साबित नहीं होते, यह कहना जजों का अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकलने वाली बात है। क्योंकि आरोप सिद्ध होते हैं या नहीं, यह देखना ट्रायल कोर्ट का काम होता है न कि हाई कोर्ट का लेकिन जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और एजे भंभानी ने तो हुकुमनामा जारी कर दिया।

 

खालिद उमर के लिए जोहरान ममदानी का भी दबाव डालना किसी काम नहीं आया लेकिन एक बात पर ध्यान देना आवश्यक है कि इन सात आरोपियों के वकीलों की 30-35 लाख के रोज की फीस किसने दी? उनके वकीलों के नामों पर ध्यान दीजिए-

उमर खालिद - कपिल सिब्बल;

शरजील इमाम - सिद्धार्थ दवे;

गुलफिशा फातिमा - अभिषेक मनु सिंघवी;

शिफा उर रहमान - सलमान खुर्शीद;

मीरान हैदर - सिद्धार्थ अग्रवाल;

शादाब अहमद - सिद्धार्थ लूथरा; और 

मोहम्मद सलीम खान - गौतम खजांची 

दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस की तरफ कोर्ट में खड़े थे - सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू

एक भ्रम फैलाया हुआ है कि 5 साल से पुलिस की जांच भी पूरी नहीं हुई है जबकि सत्य यह है कि दंगों के आरोपी इन लोगों के खिलाफ आरोप पत्र ट्रायल कोर्ट में दायर हो चुका है और उस पर संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने आरोप भी तय कर दिए हैं। लेकिन ट्रायल को लंबा खींचने का प्रयास आरोपियों ने ही किया है जिससे उन्हें ट्रायल में देरी के आधार पर जमानत मिल सके और केस 20 साल चलता रहे। सिब्बल गिरोह का यह पासा उल्टा पड़ गया और अब ये ही लोग स्वयं ही ट्रायल को जल्दी ख़त्म कराने की कोशिश करेंगे वरना जेल में ही पड़े रहेंगे क्योंकि कोर्ट ने अपना रुख साफ़ कर दिया है

वो बात अलग है कि विदेशी ताकतों से मिलकर फिर से दंगे भड़काने की कोशिश की जाए। इन दंगों की दोषी तो सोनिया गांधी भी है जिसने लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए आहवाहन किया था और अगले दिन दंगे भड़क गए थे

पिछले वर्ष एक ट्रायल कोर्ट ने दंगाइयों के वकीलों की फीस देने वालों की जांच करने के लिए कहा था। इस केस में आवश्यक है कि जांच होनी चाहिए। कैसे करनी है यह सरकार को तय करना चाहिए

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