एक बार माता पार्वती ने खेल-खेल में भगवान शिव के नेत्र बंद कर दिए। संसार में प्रलयंकारी अँधेरा छा गया। उस समय शिवजी के माथे से पसीने की एक बूंद गिरी, जो उनके तेज से मिलकर एक भयंकर काले बालक में बदल गई। अँधेरे में जन्म लेने और जन्म से अंधे होने के कारण उसका नाम 'अंधक' पड़ा। शिव ने उसे असुर हिरण्याक्ष को गोद दे दिया।
2. अहंकार और संघर्ष (युद्ध का कारण):
तपस्या से अजेय वरदान पाकर अंधक अंधा हो गया। उसने तीनों लोकों को जीत लिया। अपने अहंकार में चूर होकर उसने तय किया कि त्रिभुवन की सबसे सुंदर स्त्री उसकी रानी बनेगी। वह यह नहीं जानता था कि माता पार्वती ही उसकी जननी हैं। इसी अज्ञान और कामवासना में उसने कैलाश पर आक्रमण कर दिया।
3. महायुद्ध और रक्त का रहस्य (चरम सीमा):
कैलाश पर भयंकर युद्ध हुआ। भगवान शिव स्वयं युद्धभूमि में उतरे। लेकिन अंधकासुर को वरदान था कि उसके रक्त की एक भी बूंद जमीन पर गिरी, तो उससे सैकड़ों नए अंधकासुर पैदा हो जाएंगे। शिवजी जैसे ही उस पर प्रहार करते, नए असुर पैदा हो जाते।
स्थिति विकट हो गई। तब भगवान शिव के क्रोध से योगेश्वरी और अन्य सप्त मातृकाएं (सात देवियां - जैसे ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी आदि) प्रकट हुईं। इन देवियों ने युद्धभूमि में अंधकासुर का रक्त जमीन पर गिरने से पहले ही पीना शुरू कर दिया, ताकि नए असुर न बन सकें।
अंत में, जब रक्त से नए असुर बनने बंद हो गए, तब महादेव ने अंधकासुर को अपने त्रिशूल पर उठा लिया और हवा में टांग दिया ताकि उसका खून नीचे न गिरे।
हजारों वर्षों तक त्रिशूल पर लटके रहने के बाद अंधकासुर का अहंकार गल गया। उसे ज्ञान प्राप्त हुआ कि वह शिव का ही अंश है और उसने अपनी माता पर ही कुदृष्टि डाली थी। उसने घोर पश्चाताप किया और शिव की स्तुति की। भोलेनाथ प्रसन्न हुए, उसे क्षमा किया और उसे अपना प्रिय गण 'भृंगी' बना लिया।
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