खामेनेई की हत्या हो या हिंद महासागर में IRIS डेना का डूबना: क्या भारत को ईरान-US-इजरायल युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहा कांग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम

   भारत को घसीटने की कोशिश में इस्लामी-कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इकोसिस्टम, प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: AI ChatGPT)
भारत में विपक्षी नेता, कांग्रेसी इकोसिस्टम, वामपंथी इकोसिस्टम और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम से जुड़े लोग चाहते हैं कि भारत ईरान के साथ युद्ध में कूद जाए और अमेरिका के साथ जंग कर पूरा देश बर्बाद कर ले। दरअसल, ऐसा सिर्फ उनकी हरकतों से लग रहा है। क्योंकि ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से वो भारत सरकार को इस युद्ध में घसीटने की कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे।

पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को निशाने पर लिया और इजरायल के साथ ईरान के युद्ध में भारत की साजिश कहकर घसीटने की कोशिश की। फिर ईरान के कट्टरपंथी तानाशाह खामेनेई की मौत के बाद पीएम मोदी ने दुख क्यों नहीं जताया (हालाँकि डिप्लोमेटिक चैनल्स के माध्यम से तय प्रक्रिया होती है और भारत के विदेश सचिव में ईरान के दूतावास में जाकर रजिस्टर पर हस्ताक्षर किए हैं।) और अमेरिका-इजरायल का विरोध क्यों नहीं किया.. ये कहकर भारत को उकसाने की कोशिश की।

इस बीच, अब जब हिंद महासागर में ईरानी फ्रिगेट IRIS Dena को जब अमेरिकी पनडुब्बी ने मार गिराया, तो उसे भी भारत पर हमले से जोड़कर बयानबाजी करने लगे। राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि ईरानी भारत के मेहमान थे, जब उनकी फ्रिगेट को मार गिराया गया।

हैरानी की बात है कि ईरान समेत 75 देशों की नेवी और उनके जहाज, एयरक्राफ्ट इस International Fleet Review 2026 में शामिल थे, जिसमें ईरान का जहाज भी शामिल था। ये इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू 2026 15 से 25 फरवरी तक विशाखापटनम में हुआ, जो भारतीय नौसेना के ईस्टर्न नेवल कमांड का हिस्सा है। ये कार्यक्रम 25 फरवरी 2026 को खत्म हो गया और सभी देशों की नेवी अपने-अपने गंतव्य की ओर रवाना हो गई।

इसके करीब 1 सप्ताह बाद 4 मार्च 2026 को अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी जहाज IRIS Dena को इंटरनेशनल वॉटर में टारपीडो से मारा। वो भारतीय सीमा से दूर हिंद महासागर में था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की तरफ बढ़ रहा था। ऐसे में उसका भारत से कोई लेना देना नहीं था, लेकिन राहुल गाँधी समेत विपक्षी नेता और वामपंथी-इस्लामी इकोसिस्टम ये अफवाह फैलाने लगा कि अमेरिकी नेवी ने भारत के गेस्ट को मार गिराया।

यहाँ समझने वाली बात ये भी है कि भारत के पानी में जब तक ये जहाज रहा, उसे अमेरिकियों ने हाथ नहीं लगाया। वो हमले से पहले ही इंटरनेशनल वॉटर जोन में था। जहाँ किसी संपर्क कॉल पर जवाब देना भी श्रीलंकाई नेवी का काम था, वो उसने किया भी। लेकिन उसे भारत के पानी में मार गिराया गया, ऐसा दावा करके कांग्रेसी इकोसिस्टम सिर्फ भारतवासियों को गुमराह ही कर रहा है।

वैसे, यहाँ ये बात भी समझनी होगी कि जब युद्ध होता है, तो पनडुब्बियों का काम दुश्मन को पानी में खोज कर खत्म करना है। अमेरिकी नेवी ने ईरानी जहाज को इंटरनेशनल पानी में मारा। डिस्ट्रेस कॉल श्रीलंका में गई, लेकिन छाती यहाँ कांग्रेसियों-वामपंथियों की छाती फटने लगी? क्यों? क्योंकि वो चाहते हैं कि किसी न किसी तरह से भारत सरकार के नेतृत्व को नीचा दिखाया जाए।

इस मामले से कुछ समय पहले ही अमेरिकी मीडिया ने फेक खबरें चलाई कि अमेरिका भारतीय नौसैनिक अड्डों का इस्तेमाल कर रहा है, जोकि पूरी तरह से झूठ था। और अब ऐसी ही फर्जी खबरें बनाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश ये इकोसिस्टम कर रहा है।

इसे इस उदाहरण से समझें कि कोई मेरा गेस्ट कई दिन पहले ही मेरे घर से रवाना हो चुका है। उसका देश जंग में फंसा है और वो रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो इसमें पूर्व मेजबान का क्या लेना देना? लेकिन नहीं… इसे भारत सरकार को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटना है, क्योंकि ये भारत की तरक्की देख नहीं पा रहे हैं। सरकार का जनता के साथ मजबूत कनेक्शन नहीं देख पा रहे हैं।

ऐसे में झूठा माहौल खड़ा किया जा रहा है कि भारत अमेरिका-इजरायल जैसे देशों के दबाव में है, जबकि उनकी सरकारों के समय ये दबाव स्पष्ट दिखता था, जिसमें भारत के वीर सैनिकों ने अपना खून बहाकर जंगें जीती और बातचीत की मेजों पर इनकी सरकारों ने वो बढ़त गवाँ दिए।

चलिए, ये पूरा मामला समझाने के लिए आपको विस्तार से हरेक कड़ी के बारे में बताते हैं। इस रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 की पृष्ठभूमि, युद्धपोत के डूबने की घटना, ईरानी दावे, अमेरिकी पुष्टि, भारतीय सरकार की प्रतिक्रिया और विपक्ष की बयानबाजी शामिल है। हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि कैसे यह कॉन्ग्रेसी-वामपंथी-इस्लामी कट्टरपंथियों का इकोसिस्टम झूठी खबरें फैलाकर भारत को बदनाम करने की कोशिश कर रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू 2026 को समझें

यह सब शुरू होता है फरवरी 2026 में विशाखापत्तनम में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) 2026 से, जो भारतीय नौसेना द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से आयोजित एक प्रमुख समुद्री कार्यक्रम था। यह आयोजन 15 से 25 फरवरी तक चला और इसका उद्देश्य वैश्विक नौसेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाना, समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और भारत की नौसैनिक क्षमताओं का प्रदर्शन करना था।

आईएफआर 2026 में 74 देशों की भागीदारी हुई, जिसमें 66 भारतीय जहाज, भारतीय तटर रक्षक, शिपिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्नोलॉजी के जहाज शामिल थे। विदेशी नौसेनाओं से 19 जहाज और 45 मार्चिंग कंटिंजेंट आए, साथ ही तीन देशों के 60 से अधिक विमान भी भाग लिए।

यह आयोजन पूर्वी नौसेना कमान (ईएनसी) के तहत विशाखापत्तनम में हुआ, जहाँ राष्ट्रपति मुर्मू ने आईएनएस सुमेधा से फ्लीट की समीक्षा की। प्रमुख जहाजों में आईएनएस विक्रांत (भारत का स्वदेशी विमानवाहक पोत), आईएनएस विशाखापत्तनम (विशाखापत्तनम क्लास डिस्ट्रॉयर) और अन्य आधुनिक जहाज शामिल थे। ईरान का युद्धपोत आईआरआईएस डेना भी इस आयोजन में शामिल था, जो एक माउज क्लास फ्रिगेट था।

यह जहाज सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, एंटी-शिप मिसाइलों और टॉरपीडो से लैस (हालाँकि ये साफ है कि किसी एक्सरसाइज में नेवी अपने हथियारों को साथ नहीं रखती, ऐसे में डेना के पास भी हथियार नहीं थे) हो सकता था और इसमें एक हेलीकॉप्टर भी रखने की क्षमता थी। आयोजन 25 फरवरी को समाप्त हुआ, और सभी भाग लेने वाले देशों की नौसेनाएँ अपने गंतव्यों की ओर रवाना हो गईं।

इस समय तक कोई युद्ध की स्थिति नहीं थी, लेकिन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर आश्चर्यजनक हमला किया, जिसमें ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत हो गई। इस हमले ने मध्य पूर्व में संघर्ष को तेज कर दिया और ईरान ने अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमले शुरू कर दिए।

आईएफआर 2026 न केवल एक सैन्य प्रदर्शन था, बल्कि यह भारत की नौसैनिक कूटनीति का प्रतीक था। आयोजन में भाग लेने वाले जहाजों ने बंगाल की खाड़ी में अभ्यास किया, और यह भारत की ‘सागर’ (सिक्योरिटी एंड ग्रोथ फॉर ऑल इन द रीजन) नीति को मजबूत करने का माध्यम था। लेकिन विपक्ष ने इस आयोजन को भी विवादास्पद बनाने की कोशिश की, खासकर जब आईआरआईएस डेना की घटना हुई।

आईआरआईएस डेना के डूबने से जुड़ी घटनाएँ

आईआरआईएस डेना को बुधवार (4 मार्च 2026) को अमेरिकी वर्जीनिया क्लास परमाणु पनडुब्बी ने हिंद महासागर में अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में टॉरपीडो से मार गिराया। यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट से करीब 40 किलोमीटर दूर हुई, जो भारतीय क्षेत्र से काफी दूर थी।

जहाज पर सवार कम से कम 87 नाविकों की मौत हो गई, जबकि 32 को बचाया गया और गाले अस्पताल में भर्ती किया गया। दर्जनों अभी भी लापता हैं। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने इसकी पुष्टि की और कहा कि यह द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका द्वारा टॉरपीडो से किसी जहाज को डुबाने की पहली घटना है। उन्होंने इसे ‘साइलेंट डेथ’ करार दिया।

ईरान ने इस हमले पर तीखी प्रतिक्रिया दी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराकची ने कहा कि आईआरआईएस डेना ‘भारतीय नौसेना का मेहमान’ था और अमेरिका इसे बिना चेतावनी के मार गिराया। उन्होंने अमेरिका को चेतावनी दी कि ‘अमेरिका इस कायराना हरकत (बिना चेतावनी हमला, वैसे युद्धकाल में कैसी चेतावनी?) का कड़वा अफसोस करेगा।’

ईरान का दावा था कि जहाज आईएफआर 2026 से लौट रहा था, इसलिए यह भारत से जुड़ा था। लेकिन तथ्य बताते हैं कि जहाज 25 फरवरी को विशाखापत्तनम से रवाना हो चुका था और श्रीलंका का चक्कर लगाकर ईरान की ओर जा रहा था। डिस्ट्रेस सिग्नल श्रीलंका की नौसेना को 5:08 बजे सुबह मिला, और बचाव अभियान श्रीलंका ने चलाया।

इस घटना ने मध्य पूर्व में संघर्ष को और तेज कर दिया। ईरान ने इजरायली और अमेरिकी ठिकानों पर नए हमले किए, जबकि इजरायल ने तेहरान पर ‘बड़े पैमाने’ के हमले शुरू किए। वैश्विक स्तर पर यह घटना हिंद महासागर में युद्ध के विस्तार का संकेत थी, जो 2500 नॉटिकल मील दूर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से काफी दूर था।

भारत सरकार की तटस्थता सही, प्रतिक्रिया भी संतुलित, फेक न्यूज की भी खोली पोल

भारतीय सरकार ने इस घटना पर सतर्क रुख अपनाया। सरकारी सूत्रों ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि आईआरआईएस डेना और उसके क्रू केवल 16 से 25 फरवरी 2026 तक भारत के मेहमान थे। 28 फरवरी 2026 को युद्ध घोषित होने के बाद जहाज ने भारत से कोई मदद नहीं माँगी। घटना भारतीय क्षेत्र से बाहर अंतरराष्ट्रीय जल में हुई, इसलिए भारत का इससे कोई सीधा लेना-देना नहीं था।

विदेश मंत्रालय की फैक्ट-चेकिंग यूनिट ने अमेरिकी मीडिया की उन खबरों का खंडन किया, जिसमें दावा किया गया कि अमेरिकी नौसेना भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए कर रही है। मंत्रालय ने कहा, “अमेरिकी चैनल ओएएन पर किए जा रहे दावे फेक और झूठे हैं।” यह स्पष्टीकरण सेवानिवृत्त अमेरिकी आर्मी कर्नल डगलस मैकग्रेगर के दावे के जवाब में आया, जिन्होंने कहा था कि अमेरिका मध्य पूर्व में अपने बेस नष्ट होने के बाद भारतीय बंदरगाहों पर निर्भर है।

भारत ने संघर्ष पर तटस्थ रुख अपनाते हुए संवाद और कूटनीति की अपील की। सरकार ने पश्चिम एशिया में रहने वाले करीब 10 मिलियन भारतीयों के हितों की रक्षा पर जोर दिया। यह रुख भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को दर्शाता है, जहाँ वह किसी गुट में शामिल नहीं होता।

विपक्ष कर रहा भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश

विपक्ष ने इस घटना को भारत सरकार पर हमला करने का मौका बना लिया। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने एक्स पर पोस्ट किया, “दुनिया एक अस्थिर चरण में प्रवेश कर चुकी है। आगे तूफानी समुद्र हैं। भारत की तेल आपूर्ति खतरे में है, क्योंकि 40% से अधिक आयात होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। एलपीजी और एलएनजी की स्थिति और भी खराब है। संघर्ष हमारे पिछवाड़े तक पहुँच गया है, जहाँ हिंद महासागर में एक ईरानी युद्धपोत डुबो दिया गया। फिर भी प्रधानमंत्री ने कुछ नहीं कहा। ऐसे समय में हमें पहिये पर मजबूत हाथ की जरूरत है। इसके बजाय भारत के पास एक समझौता करने वाला पीएम है जिसने हमारी रणनीतिक स्वायत्तता को आत्मसमर्पण कर दिया है।”
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी एक्स पर लिखा: “वाशिंगटन की कार्रवाई का भारत के लिए अपार प्रभाव है और यह चौंकाने वाला है कि अब तक डूबने पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। मोदी सरकार का इस मामले पर कोई आधिकारिक बयान न देना आश्चर्यजनक नहीं होना चाहिए, क्योंकि सरकार ने अभी तक ईरान में टारगेटेड हत्याओं पर अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है, जो ईरानी सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या का संदर्भ है। भारतीय सरकार कभी इतनी डरपोक और भयभीत नहीं लगी।”
ये बयान विपक्ष की रणनीति को दर्शाते हैं, जहाँ वे भारत को युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहे हैं। पहले उन्होंने पीएम मोदी की इजरायल यात्रा को निशाना बनाया और इसे ईरान-इजरायल युद्ध में भारत की साजिश बताया। फिर, खामेनेई की मौत पर दुख न जताने और अमेरिका-इजरायल का विरोध न करने पर आलोचना की। अब, आईआरआईएस डेना को ‘भारत का मेहमान’ बताकर अमेरिका के हमले को भारत से जोड़ा जा रहा है।
राहुल गाँधी ने तो यहाँ तक कहा कि ईरानी भारत के मेहमान थे जब उनकी फ्रिगेट मार गिराई गई। लेकिन तथ्य है कि जहाज 25 फरवरी को रवाना हो चुका था, और घटना 4 मार्च को हुई।

फर्जी नरेटिव को आगे बढ़ाने में जुटा वामपंथी इकोसिस्टम

वामपंथी और कट्टर इस्लामी इकोसिस्टम भी इस नरेटिव को बढ़ावा दे रहा है। वे अफवाह फैला रहे हैं कि अमेरिकी नौसेना ने भारत के गेस्ट को मार गिराया, जबकि पनडुब्बियों का काम युद्ध में दुश्मन को खोजकर खत्म करना है। यह सब भारत सरकार को नीचा दिखाने का प्रयास है। उदाहरण के लिए, अगर कोई मेहमान कई दिन पहले घर से रवाना हो चुका है और रास्ते में दुश्मन के हाथों मारा जाता है, तो पूर्व मेजबान का क्या दोष? लेकिन विपक्ष इसे भारत को ईरानी-इजरायली युद्ध में घसीटने का बहाना बना रहा है।

मेजों पर जीते युद्ध गँवाने वाले दे रहे कूटनीति का ज्ञान

यह इकोसिस्टम भारत की तरक्की नहीं देख पा रहा। मोदी सरकार का जनता से मजबूत कनेक्शन उन्हें खटक रहा है। वे दावा कर रहे हैं कि भारत अमेरिका-इजरायल के दबाव में है, जबकि पिछली कॉन्ग्रेस सरकारों में दबाव स्पष्ट था, जहाँ भारतीय सैनिकों ने खून बहाकर जंगें जीतीं, लेकिन बातचीत की मेज पर बढ़त गँवा दी।
चाहे वो लाहौर जीतकर भी ताशकंद में उसे लौटा देना हो, या ढाका से लेकर सियालकोट शहर तक पहुँचकर भी उसे शिमला समझौते में छोड़ देना, जबकि उस समय का नेतृत्व चाहता तो पाकिस्तान को अपनी शर्तों पर घुटने को मजबूत करता और पूरा कश्मीर विवाद खत्म करा सकता था। जबकि इसकी जगह हमने 93 हजार पाकिस्तानी फौजियों को ‘पालने’ की सेवा की।

आम जन को विपक्ष के नरेटिव को समझने की जरूरत

सभी घटनाक्रमों को जोड़ देखने पर ये साफ हो जाता है कि जिन चीजों से भारत का कोई लेना-देना नहीं, उन बातों को लेकर मोदी सरकार को बेवजह घसीटकर भारत के अंदर का माहौल खराब करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में ये साफ है कि राहुल गाँधी और उनके पूरे गैंग बयानबाजी सिर्फ राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश भर है, जो राष्ट्रीय हितों को भी नुकसान पहुँचा सकती है।
यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे विपक्ष भारत को युद्ध में घसीटकर देश को बर्बाद करने की कोशिश कर रहा है। बहलहाल, भारत देश के लोग इतने समझदार हैं कि वो वैश्विक मुद्दों पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने की कोशिश कर रहे विपक्ष की बातों में नहीं ही जाएगी।

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