हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने संभल के SP और DM को बड़ी सरलता से कह दिया कि अगर rule of law enforce नहीं कर सकते तो या तो त्यागपत्र दे दो या अपना ट्रांसफर मांग लो।
सच्चाई है कि जजों की जुबान बेलगाम होती जा रही है। कानून व्यवस्था कायम करना कोई मिठाई नहीं है जो किसी को पुलिस अधिकारी खिला दें। आपने मुस्लिमों की मस्जिद में संख्या में संख्या सीमित करने का विरोध तो ऐसे कर दिया जैसे आप विपक्ष के लिए मुस्लिम वोटों का जुगाड़ कर रहे हो जबकि आप संभल का दंगों का इतिहास भूल गए। आज हिंदू संभल में मात्र 20% बचे हैं और लगता है आप हिंदुओं का पूरी तरह सफाया चाहते हैं।
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| लेखक चर्चित YouTuber |
एक नहीं अनेक बार मस्जिदों से तकरीरों के बाद दंगे भड़कते हैं। कौन संभालता है तब कानून व्यवस्था को। प्रशासन को मौके पर निर्णय लेने होते हैं। कानून व्यवस्था किसी जज के चैंबर में बैठ कर आदेश देने से नहीं संभलती। जजों को प्रशासन के काम में इतना ही शौक है टांग अड़ाने का तो संवेदनशील मस्जिदों के नमाज के बाद पुलिस अधिकारियों के साथ मौके पर खड़े हुआ करें और अगर दंगा हो तो उसे पुलिस साथ झेलने का साहस दिखाया करें।
जिस कथित मस्जिद की बात पर उन्होंने अधिकारियों को नौकरी छोड़ने के लिए कहा, वह घर किसी मोहन सिंह और भूराज सिंह के नाम पर रजिस्टर है जिसे जबरन कब्ज़ा कर मस्जिद बनाया हुआ है और ऐसा कहते है गांव के दोनों समुदायों ने निर्णय लिया था कि 20 लोग नमाज पढ़ेंगे और बाहर के लोग उसमे शामिल नहीं होंगे।
पुलिसकर्मी दंगों की ड्यूटी दंगों में मरने की नहीं होती। बरेली का मौलाना तौकीर रजा खुली धमकी देता था कि हमारे लोग सड़कों पर आ गए तो हिंदुओं को निकलने का रास्ता भी नहीं मिलेगा। क्या आप उसे फूलों की माला पहनाएंगे?
एक समय था जब सुप्रीम कोर्ट कश्मीर में आतंकियों की गोली का जवाब गोली से भी देने पर रोक लगाता था और पैलेट गन भी चलाने से रोक लगा दी थी। प्लास्टिक की गोली चलाने के लिए कहते थे।
कथित किसान आंदोलन में 26 जनवरी, 2021 से पहले दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने सुप्रीम कोर्ट से आंदोलन पर उस दिन बैन लगाने के लिए कहा था तो चीफ जस्टिस बोबडे ने भी 2 छटांक की जुबान हिला कर कह दिया था कि कानून व्यवस्था संभालना आपका काम है। और नतीजा लाल किले पर सबने देखा। बोबडे साहब पुलिस कमिश्नर की टीम के साथ खड़ा होने की हिम्मत दिखाते तो बात थी लेकिन एक आदत बन चुकी है कि सारा दोष पुलिस के मत्थे मढ़ दिया जाए।
2020 के सुनियोजित दंगों और 26 जनवरी 2021 के दिन अगर पुलिस ने संयम से काम न लिया होता तो कुछ भी अनहोनी हो सकती थी जैसा विपक्ष चाहता था।
अगर योगी प्रशासन के अधिकारियों को जजों ने ऐसे ही जलील करना है तो जो चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने हाल ही में योगी जी और उनके प्रशासन की प्रशंसा की थी, वह वापस ले लेनी चाहिए वरना अपने जजों को नियंत्रित करना चाहिए जो वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जलील न करें।

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