इतिहास खुद को दोहराता है, लेकिन विडंबना देखिए कि हम इतिहास से सीखने के बजाय बार-बार वही गलतियां दोहराने में गर्व महसूस करते हैं। आज जो लोग सोशल मीडिया पर बैठकर पूछते हैं कि "मोदी-शाह कड़ा फैसला क्यों नहीं लेते?" उन्हें एक बार 1992 और 2004 के आईने में अपनी तस्वीर देख लेनी चाहिए।
जिस दिन मोदी ने कड़े फैसले लेने शुरू कर दिए, कोई यह सोंचकर मोदी सरकार को वापस लाने की बात नहीं करेगा कि इसने देश को कहां से कहां पहुंचा दिया, आतंकवाद और इसके समर्थकों को नेस्ताबूत किया जा रहा है, किस तरह तीन तलाक और हलाला के नाम मुस्लिम महिलाओं का शोषण किया जा रहा था, किस तरह जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 का दुरुपयोग हो रहा था, कल तक जो अनाज गोदामों में सड़ता था और किसी काम का नहीं रहता था उसे BPL के नाम पर उपयोग किया जा रहा है, किस तरह सनातन को धूमिल किया जा रहा था आदि आदि एक लम्बी सूची है मुस्लिम महिलाएं तो क्या हिन्दू भी भूल कर विरोधियों को वोट देने में देर नहीं करेगा।
कल्याण सिंह: शौर्य का वह उपहार, जिसे 'अपनों' ने ठुकराया। 1992 में अयोध्या में कलंक का ढांचा गिरा, तो कल्याण सिंह ने एक क्षण की भी परवाह किए बिना अपनी सत्ता का बलिदान दे दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि "राम मंदिर के लिए एक नहीं, सौ सरकारें कुर्बान।" लेकिन इसके बाद क्या हुआ? जिन कारसेवकों पर मुलायम सिंह ने गोलियां चलवाई थीं, उन्हीं को हिंदू समाज के एक बड़े हिस्से ने 'जाति' के नाम पर वोट देकर सत्ता की दहलीज पार करा दी। यह वही दौर था जब "मिले मुलायम-कांशीराम हवा में उड़ गए जय श्रीराम" के नारों ने सांस्कृतिक पुनरुत्थान की कमर तोड़ दी थी।
अटल बिहारी वाजपेयी: विकास को 'व्यक्तिगत लालच' की भेंट चढ़ाया
2004 का चुनाव भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा 'धोखा' था। अटल जी ने देश को सड़कों का जाल दिया, परमाणु शक्ति बनाया और अर्थव्यवस्था को गति दी। लेकिन जनता ने क्या दिया? छोटे-छोटे व्यक्तिगत स्वार्थों और विपक्षी 'गठबंधन' के भ्रमजाल में फंसकर एक तपस्वी को सत्ता से बाहर कर दिया। परिणाम? 10 साल का वह रिमोट कंट्रोल शासन, जिसने देश को भ्रष्टाचार और आतंकवाद के गहरे गर्त में धकेल दिया। बारूद के ढेर पर बैठे भारत में इस्लामिक आतंकियों को बचाने बेकसूर हिन्दू साधु/संत और साध्वियों को जेल में डाल भगवा आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद के नाम पर हिन्दुओं को बदनाम किया जा रहा था। और हिन्दू सेकुलरिज्म के नशे में धुत होकर झूठ को सच मान रहा था।
लालबहादुर शास्त्री : लालबहादुर शास्त्री की अकाल मृत्यु का असली कारण था 1965 इंडो-पाक युद्ध के दौरान देश में छुपे गद्दारों पर कार्यवाही। आज कितने नेता शास्त्री जी का नाम लेते हैं? इस बौने प्रधानमंत्री ने अपने साहसिक कार्यों से नेहरू के 18 सालों को अपने अल्प 18 महीने के कार्यकाल से दाब दिया था। अगर शास्त्री जी के काम उजागर किये जाएं तो देश स्तब्ध रह जाएगा की ऐसा था हमारा "बौना" प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री।
आज मोदी और शाह के सामने दुश्मन केवल बाहर नहीं, बल्कि भीतर की 'जातिवादी दीवारों' के रूप में खड़ा है।
खालिस्तानी और वामपंथी संगठन: ये संगठन जानते हैं कि वे सीधे तौर पर मोदी सरकार से नहीं लड़ सकते। इसलिए वे क्या करते हैं? वे 'किसान', 'दलित' या 'पिछड़ा' कार्ड खेलते हैं।
हिंदुओं की कमजोरी: दुर्भाग्य यह है कि जब भी राष्ट्रवाद की बात आती है, विपक्ष एक ऐसी 'जातिगत ढाल' आगे कर देता है जहाँ हिंदू बिखर जाता है। जैसे ही हिंदू अपनी 'जाति' में सिमटता है, मोदी और शाह की वह ताकत आधी हो जाती है जो 'तांडव' करने की क्षमता रखती है
2026 का सच: मलाई बनाम राष्ट्रवाद
आज 2026 में भी स्थिति वही है। दशकों तक जिन्होंने सिस्टम की मलाई खाई, जिनके लिए भ्रष्टाचार ही ऑक्सीजन था, उन्हें आज सूखी हड्डी भी नसीब नहीं हो रही। इसीलिए ये 'बलवा' का रास्ता चुन रहे हैं। कभी डकैत संगठनों के नाम पर, कभी विदेशी फंडिंग के दम पर अराजकता फैलाई जा रही है। मोदी-शाह का धैर्य उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि उनकी 'मजबूरी' है, क्योंकि उन्हें डर है कि अगर उन्होंने कड़ा कदम उठाया, तो उनका अपना ही 'हिंदू भाई' किसी अफवाह या जातिगत राजनीति के कारण फिर से 2004 न दोहरा दे।
2014 चुनाव के बाद जिस बात को मुसलमान, मुस्लिम कट्टरपंथी और इनको समर्थक देने वाली पार्टियां समझ गयी कि बीजेपी को हराना है तो एकजुट होकर वोट दो। लेकिन हिन्दू आरक्षण और जातिगत सियासत से बाहर नहीं आ पाया। अगर हिन्दू आरक्षण और जातिगत सियासत से बाहर आ गया होता जातियों पर आधारित चाहे वह सत्ता में हैं या विपक्ष में कभी इन पार्टियों को वोट नहीं देता। रामायण को फाड़ने की और सनातन को कलंकित करने की किसी की हिम्मत नहीं होती।
जब तक हिंदू 'वोटर' रहेगा, 'नागरिक' नहीं बनेगा...जब तक हिंदू खुद को 'ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, जाट या दलित' के खांचे में रखकर देखेगा, तब तक देश के दुश्मनों को ऑक्सीजन मिलती रहेगी। मोदी-शाह को 'फ्री हैंड' कानून नहीं देता, बल्कि जनता की अटूट एकजुटता देती है।
अगर हम चाहते हैं कि देशद्रोहियों के खिलाफ 'तांडव' हो, तो पहले हमें अपनी 'जातिवादी ढालों' को तोड़कर एक मजबूत सनातनी दीवार बनना होगा। वरना इतिहास फिर से वही लिखेगा—कि नायक लड़ते रहे, और हम स्वार्थ में अपनों को ही धोखा देते रहे। मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिशर्स अपने साथ फौज नहीं लेकर आए थे उनको मालूम था भारत में थोक के भाव में बिकाऊ जयचन्द और मीर ज़ाफ़र मिल जाएंगे।
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