आज कपिल सिब्बल जैसे वकील अदालतों को उनकी औकात दिखा रहे हैं यह तो होना ही था। ये वही अदालतें जिन्होंने इन वकीलों को अपना सिरमौर बना रखा था। अभी भी समय है अदालतें, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक, इन वकीलों द्वारा फाइल होने वाले मुकदमों को तर्जी देना बंद कर दें जिस अदालतों ने ऐसे किया ये जो अपने आपको को नामी वकील कहते फिरते हैं सब जमीन पर आ जाएंगे। जहाँ तक अरविन्द केजरीवाल की बात है उसने तो सियासत के मैदान में आने पर ही साफ शब्दों में कहा था "हाँ मैं anarchy हूँ", तो anarchi से किसी ढंग की बात सुनने को नहीं मिलेगी, और जो उम्मीद करते हैं उनसे बड़ा महा-महामूर्ख दुनियां में कहीं नहीं मिल सकता।
कल केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा को 24 पॉइंट का पत्र लिख कर उन पर पक्षपाती होने का फिर से आरोप लगाते हुए CBI की ट्रायल कोर्ट के खिलाफ अपील में खुद पेश होने से मना कर दिया और अपना कोई वकील भी अपनी तरफ से पेश करने से मना कर दिया। आज जस्टिस शर्मा की अदालत का बहिष्कार करने का ऐलान मनीष सिसोदिया ने भी कर दिया। क्या यह contempt of court नहीं?
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| लेखक चर्चित YouTuber |
पत्र की भाषा देख कर साफ़ लग रहा था कि केजरीवाल जैसा मूढ़मति ऐसा नहीं लिख सकता क्योंकि उसमे ऐसा लिखने की क्षमता ही नहीं है। वह पत्र किसी वरिष्ठ वकील ने लिखा है, ऐसा प्रतीत हो रहा था।
उसके पत्र भेजने के अगले दिन आज कपिल सिब्बल का बयान आया कि “अब भारत में सभी अदालतें सरकार जो कहती हैं, उसे ही सच मान लेती हैं। मैं रोजाना अदालतों में देख रहा हूं”।
सिब्बल के बयान से साफ़ झलकता है कि केजरीवाल का पत्र उसी ने लिखा है और अब वही उसका मार्गदर्शक है। सिब्बल ने ही उसे जस्टिस शर्मा पर आरोप लगा कर अपमानित करने के लिए कहा होगा? सिब्बल के बयान जस्टिस शर्मा की तरफ भी इशारा है।
सिब्बल का बयान और केजरीवाल का आचरण Judicial Institution का घोर अपमान है। सिब्बल ने कभी कहा था कि “अब सुप्रीम कोर्ट से कोई उम्मीद नहीं बची। जो अब देखना पड़ रहा वह अपने 50 साल के करियर में नहीं सोचा था कि ऐसा भी होगा”।
सिब्बल ने आज पूरी न्यायिक व्यवस्था पर हमला करते हुए साफ़ कहा है कि “सभी अदालतें” सरकार के पक्ष में रहती हैं। ऐसा है तो फिर शराब घोटाले में ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल & कंपनी को Discharge कैसे कर दिया?
सिब्बल का बयान एडवोकेट राकेश किशोर द्वारा फेंके गए जूते से भी न्यायपालिका के मुंह पर मारा हुआ बड़ा जूता है। राकेश किशोर को बार कौंसिल ने तुरंत निलंबित कर दिया था और फिर उसकी प्रैक्टिस पर बैन लगा दिया था।
सिब्बल और केजरीवाल के आचरण पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत और बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया को तुरंत स्वतः संज्ञान लेना चाहिए और इन पर अदालतों की अवमानना का केस दर्ज करना चाहिए। बार कौंसिल और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन को सिब्बल की सदस्यता निलंबित करनी चाहिए। उसे कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछना चाहिए कि तुम्हारे बयान को सत्य साबित करने के लिए तुम्हारे पास क्या सबूत हैं।
सिब्बल या किसी भी वकील ने केजरीवाल को पढ़ा तो दिया लेकिन उन्हें पता नहीं जस्टिस शर्मा उसके खिलाफ पहले जमानती और फिर गैर जमानती वारंट भी जारी कर सकती हैं। वे चाहें तो किसी को उसके लिए न्यायमित्र भी नियुक्त कर सकती हैं लेकिन जब केजरीवाल को जस्टिस शर्मा पर ही भरोसा नहीं है तो न्यायमित्र पर भी कैसे होगा?
न्यायपालिका पर सिब्बल और केजरीवाल ने सीधा हमला बोला है। इसे नहीं रोका गया तो निकट भविष्य में और भयानक मंजर दिखाई देगा। न्यायपालिका की सकारात्मक आलोचना की जा सकती है लेकिन सिब्बल और केजरीवाल ने तो मर्यादा की सभी सीमाएं पार कर दी।

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