आखिर चीफ जस्टिस सूर्यकांत को सख्त क्यों होना पड़ा, उसकी असली वजह यह है कि ऊंट अब पहाड़ के नीचे आया है। जब अपने सिर पर डंडा पड़ता है तभी सच्चाई सामने आती है। ठीक वही हाल ममता ने सुप्रीम कोर्ट को दिखा दिया। नेताओं के लिए लचीला रुख अदालतों पर ही भारी पड़ रहा है। अभी ममता ने आईना दिखाया है बाकी नेताओं की लम्बी लिस्ट है। आगे-आगे देखिए होता है क्या!
बंगाल के मालदा में 7 जजों पर भीड़ ने बंधक बना कर हमला किया। उन 7 में से 3 तो महिला जज थी और ममता बनर्जी ने सफाई दे दी कि उसको तो इस घटना का पता ही नहीं था और राज्य का Law & Order तो वैसे भी अब उसके हाथ में नहीं है (मतलब वह अब चुनाव आयोग के हाथ में है)। अगर वह ममता सरकार के हाथ में नहीं है तो कपिल सिब्बल और अन्य वकील कैसे सुप्रीम कोर्ट में उसकी सरकार की तरफ से खड़े थे। चीफ जस्टिस को आदेश देना चाहिए कि उन वकीलों की फीस राज्य सरकार की तरफ से न दी जाए।
![]() |
| लेखक चर्चित YouTuber |
सुप्रीम कोर्ट ने इन अधिकारियों को virtually कोर्ट में पेश होने को कहा -
Chief Secretary of West Bengal
Director General of Police (DGP) of West Bengal
District Magistrate (DM) of Malda
Superintendent of Police (SSP/SP) of Malda
इन लोगों से सीधा सवाल पूछा जाना चाहिए कि आपने किसके कहने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? क्या चुनाव आयोग ने रोका या ममता ने रोका? उनसे सवाल जरूर होने चाहिए, कहीं ऐसा न हो, बस बुला के बिठा लिया और जिरह वकीलों से होती रहे। चंद्रचूड़ ने मणिपुर के DGP को बुला कर ऐसा ही किया था। पूरा दिन वह कोर्ट में बैठे रहे किसी जज ने एक सवाल नहीं पूछा।
चीफ जस्टिस का कहना कि इस घटना ने सीधा “authority” को चुनौती दी है लेकिन सच तो यह है कि ममता अपने आपको राज्य में supreme authority मानती है जो सुप्रीम कोर्ट से भी ऊपर है।
चीफ जस्टिस साहब ममता राज में लोगों पर खासकर हिंदुओं पर अनेक घोर अत्याचार हुए हैं जिनके लिए भी आपको रात रात भर जाग कर monitoring करनी चाहिए थी लेकिन वह आपने केवल तब किया जब judicial officers पर हमले हुए। एक बड़ा सीधा सा सिद्धांत (कानून) है कि सरकारी अधिकारी के काम में बाधा डालना और उसे काम करने से रोकना अपराध है। वह अपराध ममता ने IPAC की ED की रेड में किया लेकिन सुप्रीम कोर्ट उस मामले को भी अभी तक लिए बैठा है जबकि ममता ने माना वह वहां गई लेकिन पार्टी अध्यक्ष के नाते लेकिन कोई भी हो वह ED के काम में रुकवाट नहीं डाल सकता। उस पर तो निर्णय दिया होता।
बहुत लोगों का कहना है केंद्र को बंगाल में राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। केंद्र को ऐसा करने में कोई दिक्कत नहीं थी लेकिन अब ठीक चुनाव से पहले किया नहीं जा सकता। पहले किया जाता तब यही सुप्रीम कोर्ट जो आज उबल रहा है सवाल उठाता कि जिस सरकार के पास करीब तीन चौथाई बहुमत है आपने उसे कैसे गिरा दिया। और फिर जनता भी ममता को “पीड़ित” मानकर फिर उसे वोट देती।
इतना ही नहीं जब 2 मई, 2021 को चुनाव नतीजे आए तो उसी दिन से हिंदुओं पर हमले शुरू हो गए और 80 हजार लोगों को घर से बेघर होना पड़ा। उसके लिए भी PIL दायर हुई थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे भी ठंडे बस्ते में डाल दिया। उस दिन जो भी चीफ जस्टिस था उसे नींद नहीं आनी चाहिए थी।
एक बात तो निश्चित है इस महीने के चुनाव में ममता अगर जीत गई तो 2021 की तरह फिर हिंदुओं पर हमले होंगे और उसके लिए यह नहीं देखा जाएगा कि कौन दलित है, आदिवासी है, OBC है या सवर्ण है।

No comments:
Post a Comment