प्रतीकात्मक
भारत में रहकर इस्लामी मुल्कों के लिए अपनी ईमानदारी दिखाना और यहाँ की सरकार व सैनिकों का अपमान करना कट्टरपंथियों के लिए कोई नई बात नहीं है। पिछले 12 सालों में ऐसे कई मामले देखे गए जब ये लोग कैमरे पर देश के खिलाफ स्पष्ट रूप से जहर उगलते कैद हुए। इस बार इन्होंने ये काम ईरान के नाम पर किया है। इन कट्टरपंथियों से कोई पूछे कि वहां महिलाएं बुर्का/हिजाब के विरोध में सड़क पर उतरने की हिम्मत करती है, क्या भारतीय कट्टरपंथी इस मुद्दे पर ईरानी महिलाओं का साथ देंगी? अगर नहीं तो इसे दोगलापन ही कहा जाएगा।
हाल में एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। इसमें बुर्काधारी महिला सैनिकों को ‘शराबी-कबाबी’ कहती नजर आ रही है। उसका कहना है कि वो लोग जो दान कर रहे हैं वह उनके अपने ‘रहबर’ शिया मुल्क ईरान के लिए है। उनके लिए अभी भारतीय सेना या कुछ और बिलकुल जरूरी नहीं है।
हिंदुओं देख रहे हो कश्मीरी मुस्लिम अपने घर से ईरान द्वारा इजरायल को मारने के किए फंडिंग जमा कर रहे है
— The Hindu Association (@HinduAsociation) March 23, 2026
इन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के समय पाकिस्तान को मारने के
लिए फंडिंग नहीं जमा की ना पाकिस्तान मुर्दाबाद कहा था
क्या हम अपने देश में सांप पाल रहे है .? pic.twitter.com/r75ynzFum3
यह पहला मौका नहीं है जब ऐसा बयान सामने आया हों। ईरान से जुड़े तनाव या पश्चिम एशिया की घटनाओं के दौरान कई बार ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें शिया समुदाय की भीड़ सड़कों पर उतरकर खुले तौर पर विदेशी ताकतों के समर्थन में नारे लगाती और हल्ला करते हुए दिखी।
…and now this Burkha Clad Kashmiri aunty says we will not donate to Indian army because they get drunk and that is haram and anti Islam. This lady claims she will only donate to the Iranian Regime because she only recognises Iranian Shia army and not Indian army. I am ready to… pic.twitter.com/NM4Ydc4kRe
— Nikhil Chandwani (@NikhilChandwani) March 31, 2026
लखनऊ में जहाँ बुर्काधारी महिला ने तो यहाँ तक कहा कि खामेनेई के लिए उनकी जान भी हाजिर है वही दिल्ली में प्रदर्शन करते हुए बुर्काधारी महिलाएँ बोलीं कि उनके लिए सबसे जरूरी ईरान ही है।
#WATCH | Lucknow, UP | On killing of Iran's Supreme Leader Ayatollah Ali Khamenei, a protestor says, "Those who have treachery in their blood have killed Khamenei with deception... If one Khamenei is killed, a thousand Khameneis will rise... Israel and America are cheaters..." https://t.co/nn9suO356l pic.twitter.com/DXAGHYZjXH
— ANI (@ANI) March 1, 2026
इस बीच कुछ मुल्ला-मौलाना के बयान भी गौर देने वाले थे। जैसे मौलाना साजिद रशीदी ने कैमरे पर ये कहा था कि अगर कभी ऐसा समय आया कि ईरान और भारत आमने-सामने हुए तो भारत के मुस्लिम ईरान का ही साथ देंगे।
“यदि भारत और ईरान में युद्ध होता है तो भारतीय मुसलमान ईरान के साथ खड़ा होगा”
— ANUPAM MISHRA (@scribe9104) March 10, 2026
~ मौलाना साजिद राशीदी
मौलाना की साफ़गोई की तारीफ़ होनी चाहिए
pic.twitter.com/Fr4q7alySM
वहीं कट्टरपंथ में सने बच्चे भी ये कहते नजर आए थे कि उन्हें भारत देश की सरकार से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अगर मौका मिला तो वह ईरान का बदला लेकर इजरायल में घुसकर चाकूबाजी कर सकते हैं।
अभिव्यक्ति के नाम पर जहर उगलने का काम पुराना
लोकतांत्रिक भारत में यह एक बड़ी विडंबना है कि हम इन लोगों के विचारों से अवगत होते हुए भी अक्सर इनका खुलकर विरोध नहीं कर पाते। कारण वो सेकुलरिज्म का बोझ है जिसे ढोने की जिम्मेदारी सिर्फ हिंदुओं को दी गई है। देश का लेफ्ट-लिबरल इसी सहिष्णुता का फायदा उठाता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कभी देश की संप्रभुता-सुरक्षा-सद्भाव को ठेस पहुँचाई जाती है, कभी इसका इस्तेमाल सेना को गाली देने के लिए किया जाता है।
व्यक्तिगत राय और लोकतंत्र की मजबूती की बात करते-करते सेकुलर हिंदुओं को ये समझ नहीं आता कि जो लोग कट्टरपंथ के कारण अपनी मातृभूमि के नहीं हो पा रहे हैं वो उनके कैसे होंगे। क्या ये सोचने वाली बात नहीं है कि आखिर क्यों ईरान को अपना रहबर और देश भर के मुस्लिमों को अपना भाई बताने वाले इस्लामी कट्टरपंथी हिंदुओं को ‘काफिर’ क्यों कहते हैं।
खैर! ईरान से पहले फिलीस्तीन के लिए भी भारत के मुस्लिम ऐसा रोना रो चुके हैं। उस वक्त भी सेकुलर हिंदुओं का काम सिर्फ इनका ‘पिछलग्गू’ बने रहने का था। उन्हें न हमास आतंकियों के बारे में कोई बात करनी थी और न ही 7 अक्तूबर 2023 को क्या हुआ इसकी जानकारी थी। ये लोग उस समय भी घूम-फिराकर ये नैरेटिव आगे बढ़ाते रहे कि इजरायल बेवजह ही फिलीस्तीनियों को निशाना बना रहा है और गाजा के लिए रोना रोने वाले मुस्लिम ही इंसानियत के साथ खड़े हैं।
आपने कभी हमास-इजरायल युद्ध के दौरान में इस्लामी कट्टरपंथी जमात को हमास आतंकियों की हरकत पर बात करते नहीं सुना गया। उन्होंने न उस घटना की निंदा की थी और न ही विरोध।
मजहब देखकर दिखाते हैं मानवता
आज फिर मानवता का हवाला देकर ईरान के लिए भी वैसी सहानुभूति दिखाई जा रही है, लेकिन इन सब घटनाक्रमों के बीच विचार करने वाली बात ये है कि ईरान-फिलीस्तीन के लिए छाती पीटने वालों के मन में कभी भारत के लोगों के लिए ये दर्द नहीं उठा। तमाम मौके थे जब ये लोग मजहब से ऊपर उठकर गैर-मुस्लिमों के लिए इंसानियत दिखा सकते थे लेकिन इन्होंने कभी ऐसा नहीं किया।
चाहे 2001 में गुजरात के भुज में भूकंप की घटना हो या 2015 में नेपाल में भीषण त्रासदी ऐसी घटनाओं में हमेशा देशभर से मदद पहुँचीं लेकिन क्या वो दृश्य आपको देखने को मिले जो ईरान के वक्त कश्मीर में दिखे? क्या आपने जगह-जगह से मुस्लिमों को गैर-मुस्लिमों के लिए जकात काम काम करते देखा?
नहीं, ये कट्टरपंथी जमात मजहब देखकर सबाब का काम करती है और ये भूल जाती है कि जिस सेना को ये लोग ‘शराबी-बलात्कारी’ बताते हैं वही सेना हर मुश्किल घड़ी पर सबसे आगे मदद के लिए रहती है। वो समय चाहे प्राकृतिक आपदा के कारण आया हो या फिर विश्व में अलग-अलग चल रहे युद्ध की वजह से… भारतीय सेना अपने देश के नागरिकों की रक्षा में जान की परवाह किए बिना तैनात रहती है, तभी कश्मीर में कट्टरपंथियों से लेकर केरल के वामपंथी तक सुकून से सो पाते हैं।
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