इस धरती पर आज भी श्रीकृष्ण, वीर हनुमान और भगवान विश्वकर्मा आदि प्रकट होते हैं। ओडिसा के पुरी में तो भगवान जगन्नाथ के रूप में श्रीकृष्ण विराजमान हैं। शनि धाम में शनि देव स्वयं। शनि धाम क्षेत्र में किसी मकान में दरवाजे बंद नहीं होते और ताला नहीं पड़ता।
अगर त्रेता युग में पुरुषोत्तम श्रीराम की लीलाओं और धर्म दार्शनिकता से भरा है तो द्वापर युग भी श्रीकृष्ण की असंख्य लीलाओं से भरा हुआ है। परन्तु इस कलयुग में भी प्रभु की लीलाओं की कोई कमी नहीं। यह वह युग है जहां प्रभु ने अपने परमभक्त हनुमान की महिमा को प्रकाशमय कर रहे हैं।
ओडिसा के पुरी में स्थित जगन्नाथ जी(जगत पालनकर्ता श्रीविष्णु) महाराज की महिमा देखते ही बनती है।
एकादशी के दिन जगन्नाथ जी के दर्शन करने का अवसर मिला। सुना था कि जगन्नाथ धाम के दर्शन करने बाद चावल खा सकते हैं। लेकिन जब भंडारे में रूपए देने उपरान्त पंडित जी ने भंडारे की रसीद लेकर परिवार के सभी सदस्यों के लिए भोजन लाए। भोजन में नाना प्रकार के चावल, दाल और सब्जी आदि होने पर पंडितजी महाराज को एकादशी व्रत होने से चावल खाने से मना करने पर बोले कि एकादशी को सिर्फ जगन्नाथ धाम के प्रांगण में खा सकते हो बाहर नहीं। खोल लो व्रत। प्रभु का प्रसाद है। जीवन का शायद का पहला और आखिरी व्रत होगा जब प्रभूधाम में व्रत चावल से खोला। व्रत खोलने के बाद फिर उन्होंने एकादशी माता के उल्टा लटके मूर्ति के भी दर्शन करवाने के बाद कथा बताई।
आइए देखते हैं इस कथा में।
श्री जगन्नाथ मंदिर में आज एकादशी के दिन भात बन रहा है। हां, भात बन रहा है। दाल बन रही है। अनेकों प्रकार के व्यंजन और सब्जियां बन रही हैं।
अरे इस कलयुग में जहां एकादशी के दिन भात खाना तो दूर की बात उसका विचार करना भी महापाप माना जाता है, वहां श्री क्षेत्र पुरी के जगन्नाथ मंदिर में आज उत्सव का माहौल है। भक्तगण आनंद बाजार में बैठकर तृप्त होकर महाप्रसाद से आनंदित हो रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों? क्यों यहां एकादशी माता का चाबुक नहीं चलता?
बात उस समय की है जब सतयुग का सवेरा था। भगवान विष्णु के श्री अंग से एक परम तेजस्वी शक्ति उत्पन्न हुई जिनका नाम था एकादशी देवी। उनका जन्म ही इसलिए हुआ था कि वे संसार से पाप का नाश कर सकें।
ठाकुर जी ने उन्हें निहारते हुए एक विशेष वरदान दिया। बोले देवी, महीने में दो दिन तुम्हारा राज चलेगा। जो भी मनुष्य उस तिथि पर अन्न, विशेषकर चावल पाएगा, उसके सारे संचित पाप उस अन्न में समा जाएंगे और जो तुम्हारी शरण में रहकर व्रत करेगा उसे साक्षात मेरा धाम प्राप्त होगा।
एकादशी माता को अपनी इस शक्ति पर बड़ा गर्व हो गया। हो भी क्यों ना, तीनों लोकों में उनका भय था। स्वर्ग हो या पाताल, उस दिन कहीं चूल्हा नहीं जलता था। पापी से पापी मनुष्य भी एकादशी के दिन चावल को छूने से कांपता था।
अपनी विजय पताका फहराती हुई अहंकार में डूबी एकादशी माता एक दिन नीलांचल धाम यानी हमारे जगन्नाथ पुरी पहुंची। जैसे ही उन्होंने मंदिर के सिंह द्वार में अपना पहला कदम रखा, उनको लगा कि शायद वे रास्ता भटक गई हैं।
आज एकादशी की पावन तिथि थी, पर यहां का नजारा तो बिल्कुल उलट था। आनंद बाजार में हजारों भक्त बैठे थे। कोई भूखा नहीं था, कोई प्यासा नहीं था। सबके सामने मिट्टी के कुल्हड़ों में गरमागरम अन्न परोसा जा रहा था। भक्त बड़े चाव से “जय जगन्नाथ” का उद्घोष करते हुए उस भात का आनंद ले रहे थे।
एकादशी माता का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। वे व्याकुल हो उठीं। सोचने लगीं, यह मेरा अपमान है। मेरे ही दिन यहां चावल! क्या जगन्नाथ जी मेरा नियम भूल गए?
क्रोध में जलती हुई वे सीधे मंदिर के गर्भगृह में घुस गईं। सामने रत्न सिंहासन पर ठाकुर जी अपने बड़े भाई बलभद्र और लाडली बहन सुभद्रा के साथ मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे।
एकादशी माता ललकार कर बोलीं, “प्रभु, यह क्या अनर्थ हो रहा है? आपने ही तो मुझे वरदान दिया था कि एकादशी को चावल में पाप का वास होगा। तो आज आपके इस धाम में यह पाप क्यों बह रहा है? रोकिए इन भक्तों को, वरना मेरा श्राप सबको भस्म कर देगा।”
ठाकुर जी ने बड़े प्रेम से देखा और शांत स्वर में बोले, “देवी, शांत हो जाओ। तुम जो देख रही हो वह साधारण चावल नहीं है। वह कैवल्य है, वह मेरा महाप्रसाद है। यह साक्षात मेरी जूठन है और मेरी जूठन में कभी कोई पाप निवास नहीं कर सकता। इसके सामने कोई तिथि, कोई नियम बड़ा नहीं है।”
परंतु एकादशी माता का अहंकार बहुत बढ़ चुका था। वे बोलीं, “नहीं प्रभु, नियम तो नियम होता है। अगर सारी दुनिया चावल नहीं खा रही तो पुरी में भी कोई नहीं खाएगा।”
जैसे ही उन्होंने महाप्रसाद को रोकने के लिए हाथ उठाया, अचानक मंदिर का वातावरण बदल गया। ठाकुर जी की मुस्कान गायब हो गई और उनकी आंखों में प्रचंड तेज आ गया।
वे कड़क स्वर में बोले, “रुको देवी! तुमने मेरे महाप्रसाद को पाप कहने का दुस्साहस कैसे किया? यह महाप्रसाद साक्षात ब्रह्म है। इसके सामने वेद-पुराण भी छोटे पड़ जाते हैं।”
पर एकादशी माता नहीं मानीं। उन्होंने कहा, “मैं यह अन्याय नहीं होने दूंगी।”
अब ठाकुर जी का धैर्य समाप्त हो चुका था। उन्होंने अपनी योगमाया का आह्वान किया। अगले ही पल दिव्य जंजीरों ने एकादशी माता को जकड़ लिया। उन्हें मंदिर के ईशान कोण में ले जाकर उल्टा लटका दिया गया।
ठाकुर जी बोले, “अब तुम यहीं बंदी बनकर रहोगी। तुम्हारी आंखों के सामने मेरे भक्त महाप्रसाद पाएंगे, लेकिन तुम किसी को रोक नहीं पाओगी।”
एकादशी माता रोने लगीं। बोलीं, “प्रभु, यह अन्याय है। अगर मैं यहां बंदी रहूंगी तो संसार मेरा सम्मान करना छोड़ देगा।”
उनका अहंकार टूट चुका था।
ठाकुर जी का हृदय पिघल गया। उन्होंने कहा, “देवी, घबराओ मत। मैं तुम्हारा सम्मान बनाए रखूंगा। पुरी में एकादशी के दिन भक्त महाप्रसाद खाएंगे, पर उससे पहले उसे अपने मस्तक से लगाकर तुम्हें प्रणाम करेंगे।”
यह सुनकर एकादशी माता प्रसन्न हो गईं और बोलीं, “जो भक्त इस भाव से महाप्रसाद ग्रहण करेगा, मैं उसके पाप नहीं गिनूंगी, बल्कि उसे दुगुना पुण्य दूंगी।”
यही कारण है कि आज भी जगन्नाथ पुरी में एकादशी के दिन हजारों भक्त आनंद से महाप्रसाद ग्रहण करते हैं।
और मान्यता है कि यदि उस दिन महाप्रसाद को व्रत के कारण ठुकरा दिया जाए, तो वह भगवान का अपमान माना जाता है।
आज भी मंदिर के पास एकादशी माता की मूर्ति स्थापित है, जहां वे मौन रहकर सब देखती हैं।
यह कथा हमें सिखाती है कि धर्म में नियम बहुत हैं, पर प्रेम और भगवान का प्रसाद उन सभी नियमों से ऊपर है।
जय जगन्नाथ जी की
जय एकादशी माता
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