आज चने चबाते निगम पार्षद/विधायक या फिर सांसद बनते हैं लेकिन कुछ ही महीनों बाद तिजोरियां भरने शुरू हो जाती और हम मूर्ख जनता गरीबों का मसीहा बता गलियाने लगते हैं। लेकिन इसी देश में ऐसे भी नेता हुए जो राजनीति में उच्च पद पर रहते हुए भी अपने बच्चों को देकर गए कर्जा। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की ताशकंत में अकस्मात् मृत्यु पर उन्हीं की पार्टी ने भ्रष्टाचारी होने का आरोप लगाया था और जब जाँच हुई तो बैंक खाते में लगभग 365 रूपए और कार खरीदने पर पंजाब नेशनल बैंक से लिया लोन। उसी तरह जननायक कर्पूरी ठाकुर हुए।
जब जननायक कर्पूरी ठाकुर का निधन हुआ, तो दिल्ली से लेकर पटना तक के गलियारों में सन्नाटा पसर गया। लोग हैरान थे कि दो बार मुख्यमंत्री और सालों तक विधायक रहा शख्स आखिर अपने पीछे क्या छोड़ गया होगा?
अगले दिन जब उनके पैतृक गांव की सुध ली गई, तो जो दिखा उसने पूरी दुनिया की आंखों में आंसू ला दिए।
वहां कोई आलीशान कोठी नहीं थी। कोई स्विमिंग पूल या मार्बल के फर्श नहीं थे। मिट्टी की दीवारों और कच्ची खपरैल वाली एक पुरानी झोपड़ी खड़ी थी, जिसकी दीवारें गरीबी की गवाही दे रही थीं।
हैरानी की बात जानते हैं क्या है?
जब वो मुख्यमंत्री थे, तो उनका एक कुर्ता कंधे से फटा हुआ था। युगोस्लाविया के दौरे पर विदेशी नेताओं ने जब भारत के एक मुख्यमंत्री के फटे कपड़े देखे, तो दंग रह गए। वहां के मार्शल टीटो ने उन्हें सम्मान में एक नया कोट गिफ्ट किया।
लेकिन असली 'तमाशा' तो भारत लौटकर हुआ। कर्पूरी ठाकुर ने उस कीमती कोट को अलमारी में रखने के बजाय सरकारी खजाने में जमा करा दिया। बोले— "यह तोहफा मुझे नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री को मिला है, और इस पर जनता का हक है।"
जब उनकी बेटी की शादी हुई, तो लोगों को लगा कि अब तो सरकारी तामझाम दिखेगा। लेकिन उस 'फकीर' मुख्यमंत्री ने अपनी बहन की शादी के लिए बैंक से एक आम आदमी की तरह लोन मांगा। किसी की सिफारिश नहीं ली, किसी उद्योगपति का अहसान नहीं लिया।
उनकी कुल जमापूंजी क्या थी?
* फटे हुए पुराने कुर्ते।
* एक टूटी हुई खाट।
* और करोड़ों गरीबों की दुआएं।
जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी उनके गांव पहुंचे, तो उस टूटी झोपड़ी को देखकर उनके मुंह से निकला था— "क्या इतने बड़े नेता का घर ऐसा होता है?"
आज हम छोटी सी नौकरी पाकर रुतबा दिखाने लगते हैं, एक सफेद कुर्ता पहनकर खुद को भगवान समझने लगते हैं। लेकिन उस शख्स ने सत्ता के शिखर पर बैठकर भी 'फकीरी' नहीं छोड़ी।
कर्पूरी ठाकुर ने सिखाया कि "राजनीति मेवा खाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के आखिरी आदमी की सेवा के लिए होती है।"
आज के दौर में जहाँ भ्रष्टाचार और घमंड की राजनीति चलती है, वहां कर्पूरी ठाकुर का जीवन एक आईना है। हाल ही में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' देकर इस सादगी को सलाम किया है।
इस 'जननायक' की ईमानदारी के सम्मान में एक 'नमन' तो बनता है।
अगले दिन जब उनके पैतृक गांव की सुध ली गई, तो जो दिखा उसने पूरी दुनिया की आंखों में आंसू ला दिए।
वहां कोई आलीशान कोठी नहीं थी। कोई स्विमिंग पूल या मार्बल के फर्श नहीं थे। मिट्टी की दीवारों और कच्ची खपरैल वाली एक पुरानी झोपड़ी खड़ी थी, जिसकी दीवारें गरीबी की गवाही दे रही थीं।
हैरानी की बात जानते हैं क्या है?
जब वो मुख्यमंत्री थे, तो उनका एक कुर्ता कंधे से फटा हुआ था। युगोस्लाविया के दौरे पर विदेशी नेताओं ने जब भारत के एक मुख्यमंत्री के फटे कपड़े देखे, तो दंग रह गए। वहां के मार्शल टीटो ने उन्हें सम्मान में एक नया कोट गिफ्ट किया।
लेकिन असली 'तमाशा' तो भारत लौटकर हुआ। कर्पूरी ठाकुर ने उस कीमती कोट को अलमारी में रखने के बजाय सरकारी खजाने में जमा करा दिया। बोले— "यह तोहफा मुझे नहीं, बिहार के मुख्यमंत्री को मिला है, और इस पर जनता का हक है।"
जब उनकी बेटी की शादी हुई, तो लोगों को लगा कि अब तो सरकारी तामझाम दिखेगा। लेकिन उस 'फकीर' मुख्यमंत्री ने अपनी बहन की शादी के लिए बैंक से एक आम आदमी की तरह लोन मांगा। किसी की सिफारिश नहीं ली, किसी उद्योगपति का अहसान नहीं लिया।
उनकी कुल जमापूंजी क्या थी?
* फटे हुए पुराने कुर्ते।
* एक टूटी हुई खाट।
* और करोड़ों गरीबों की दुआएं।
जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी उनके गांव पहुंचे, तो उस टूटी झोपड़ी को देखकर उनके मुंह से निकला था— "क्या इतने बड़े नेता का घर ऐसा होता है?"
आज हम छोटी सी नौकरी पाकर रुतबा दिखाने लगते हैं, एक सफेद कुर्ता पहनकर खुद को भगवान समझने लगते हैं। लेकिन उस शख्स ने सत्ता के शिखर पर बैठकर भी 'फकीरी' नहीं छोड़ी।
कर्पूरी ठाकुर ने सिखाया कि "राजनीति मेवा खाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के आखिरी आदमी की सेवा के लिए होती है।"
आज के दौर में जहाँ भ्रष्टाचार और घमंड की राजनीति चलती है, वहां कर्पूरी ठाकुर का जीवन एक आईना है। हाल ही में भारत सरकार ने उन्हें 'भारत रत्न' देकर इस सादगी को सलाम किया है।
इस 'जननायक' की ईमानदारी के सम्मान में एक 'नमन' तो बनता है।
इसे इतना शेयर करो कि आज के नेताओं और घमंड में चूर लोगों को पता चले कि असली 'अमीरी' बैंक बैलेंस में नहीं, किरदार में होती है।
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