सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 22 को स्पष्ट कहा है कि ED की जांच में कोई मुख्यमंत्री बाधा नहीं डाल सकता और इसका मतलब साफ़ है कि सुप्रीम कोर्ट के विचार में ममता बनर्जी ने ED के काम में बाधा डाली।
हंसी आती है उन वरिष्ठ पत्रकारों पर जो टीवी पर बैठ ममता को बहुत मजबूत नेत्री कहते हैं। ममता नेत्री नहीं बल्कि किसी मवाली से कम नहीं। महिला होकर उन गालियों को देती है जो गली-कूचे में गुंडे देते हैं। अभी तीन/चार पहले ही प्रधानमंत्री मोदी के लिए किन आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया, जो साबित करता है कि ममता कोई नेत्री नहीं मवाली है। वैसे पहले भी अभद्र(मर्द गुप्तांग) भाषा का इस्तेमाल कर चुकी है। हैरानी होती है ऐसी मवाली आदत की नेत्री को वोट देने वालों पर। क्या वह भी इसी बिरादरी से आते हैं?
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सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस प्रशांत कुमार और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने सख्त टिप्पणियां करते हुए कहा कि “यह एक असाधारण मामला है; यह केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि संवैधानिक अधिकारों में बाधा डालने से संबंधित है; जब कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप करता है, तो इसे केंद्र सरकार और राज्य सरकार के बीच का विवाद नहीं कहा जा सकता; यह एक ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कृत्य है, जो संयोगवश मुख्यमंत्री भी है, जिसने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को ही खतरे में डाल दिया; कभी ऐसी कल्पना नहीं की गई थी कि छापेमारी के दौरान मुख्यमंत्री वहां पहुंच जाए”।
पुलिस अधिकारियों की वकील मेनका गुरुस्वामी ने तो ED के आर्टिकल 32 में याचिका को भी गलत ठहरा दिया और कहा कि मामला केंद्र और राज्य सरकार के बीच का विवाद है। तब जस्टिस प्रशांत कुमार ने कहा कि इसमें राज्य का कौन सा अधिकार शामिल है, किसी राज्य का मुख्यमंत्री चल रही जांच में आकर लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकता। इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जा सकता।
पता नहीं कहां सही है लेकिन ऐसा बताया जा रहा है कि मेनका गुरु स्वामी ने कोर्ट में कहा कि सुप्रीम कोर्ट “महारानी” के काम पर टिप्पणी नहीं कर सकता और इस पर एक जज ने पूछा “कौन है रानी”।
अवलोकन करें:-
सुप्रीम कोर्ट का कहना कि मुख्यमंत्री ने पूरी व्यवस्था और लोकतंत्र को खतरे में डाल दिया।
अब यह तो सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं माना है कि ममता ने ED की जांच में बाधा डाली। ममता ने खुद माना था कि वह वहां पार्टी अध्यक्ष के नाते गई थी। जो फाइल और अन्य दस्तावेज़ वह वहां से जबरन ले गई थी वे भी अभी तक ED को नहीं लौटाए है। सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में ममता का अपराध सिद्ध हो गया है लेकिन सुप्रीम कोर्ट सख्त टिप्पणियां तो कर रहा है लेकिन उसके लिए सजा का ऐलान नहीं कर रहा। वह सजा का मामला कहीं ट्रायल कोर्ट के पास न भेज दिया जाए।
सरकारी काम में बाधा डालने के लिए सजा के प्रावधान हैं -
-Whoever voluntarily obstructs any public servant in the discharge of their public functions can be punished with:
Imprisonment of either description (simple or rigorous) for a term that may extend to three months, OR
Fine that may extend to five hundred rupees (increased to ₹2500 under BNS 221), OR
Both
If the interference involves more than simple obstruction, heavier penalties apply:
Assault or Criminal Force to Deter Duty (IPC 353): If a person assaults or uses criminal force to prevent an official from doing their job, the sentence can be up to 2 years imprisonment, a fine, or both.
ममता का अपराध use of criminal force की श्रेणी में आता है।
हो सकता है सुप्रीम कोर्ट भी 4 मई के नतीजों की प्रतीक्षा कर रहा हो। अगर ममता हार गई तो मामला तुरंत निपटा दिया जाएगा।

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