कल और परसों मैंने राहुल गांधी की ब्रिटिश नागरिकता को लेकर विस्तार से लिखा था। 18 अप्रैल को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने राहुल गांधी पर FIR दर्ज कर CBI से जांच कराने के आदेश दिए थे क्योंकि उन्होंने पाया था कि प्रथम दृष्टया ये अपराध बनता है।
लेकिन फिर उसी दिन अपने आदेश पर रोक लगा कर राहुल गांधी को नोटिस जारी कर आज की तारीख तय की थी।
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यह साफ़ दर्शाता है कि कोई राजनीतिक दबाव जज साहब पर डाला गया क्योंकि हो सकता था वो सही दिशा में चल कर राहुल गांधी की जाँच CBI से ही कराने के आदेश पर कायम रहते।
आज जस्टिस विद्यार्थी ने कहा “टिप्पणी की कि इस मामले में वकील, जिसमें राज्य सरकार के वकील और डिप्टी सॉलिसिटर जनरल भी शामिल हैं, सही कानून और संबंधित केस लॉ अदालत के सामने रखने में विफल रहे। अदालत ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के खिलाफ बोलना कैसे उचित हो सकता है और शिशिर ने अपने राजनीतिक लाभ के लिए कोर्ट का इस्तेमाल किया है, साथ ही मीडिया में दिए गए उनके बयान भी आपत्तिजनक हैं। सरकार के वकील और डिप्टी एसजीआई ने भी कहा कि आवेदक के सोशल मीडिया पोस्ट का बचाव नहीं किया जा सकता”।
आप क्या लोगों को मूर्ख समझ बैठे है। अगर याचिकाकर्ता और राज्य के वकील सही कानून और संबंधित केस लॉ अदालत में रखने में विफल रहे तो आपने किस आधार पर राहुल के खिलाफ केस दर्ज कर राज्य सरकार से CBI जांच कराने के आदेश दिए। ये हाई कोर्ट है या किसी भड़भूजे की दुकान। MPMLA कोर्ट ने 27 घंटे सुनवाई करके यह कह कर केस खारिज कर दिया कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है और जस्टिस विद्यार्थी ने याचिकाकर्ता, राज्य सरकार के वकील और गृह मंत्रालय के दस्तावेज़ देख कर पहले राहुल के खिलाफ केस दर्ज कर CBI जांच के आदेश दिए और आज कह दिया कि ये सभी वकील केस प्रस्तुत करने में विफल रहे, ये कैसे न्यायालय हैं और क्या इनसे किसी को न्याय की आशा करनी चाहिए।
इतना बड़ा झोल न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करता है। कोई भी कह सकता है जस्टिस विद्यार्थी को खरीद लिया गया।
विग्नेश शिशिर एक याचिकाकर्ता है और आपके आज के निर्णय से पीड़ित है। उसे सोशल मीडिया तो क्या कही भी कुछ भी कहने का अधिकार है। आप उसकी बातों पर एतराज कर रहे हैं लेकिन कोर्ट की असली अवमानना तो आपने खुद की है।
सुप्रीम कोर्ट पहले भी इलाहाबाद हाई कोर्ट के जजों की कुछ बातों पर suo moto ले चुका है। यह मामला भी इतना गंभीर है कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस सूर्यकांत को suo moto संज्ञान लेकर जांच करनी चाहिए कि किन परिस्थितियों में जस्टिस सुभाष विद्यार्थी केस से अलग हुए।
काका हाथरसी ने एक कविता में लिखा था “वो ही सच्चा विद्यार्थी, जो निकाल कर दिखा दे विद्या की अर्थी”। जस्टिस विद्यार्थी ने भी अपनी विद्या की अर्थी निकाल दी।
भगवान ही जानता है देश की न्यायपालिका का क्या होगा जो वर्तमान में दिशाहीन लगती है, जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप प्रथम दृष्टया सच लगते है और यही Public Perception है।
अवलोकन करें:-
जब तक न्यायपालिका सोशल मीडिया में लोगों की बातों पर ध्यान देना शुरू नहीं करेगी, कोई सुधार संभव नहीं है।

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