कलकत्ता हाई कोर्ट की ममता सरकार को फटकार (साभार : The Hindu & Indianexpress)
70 के दशक में निर्माता-निर्देशक रामानंद सागर की बहुचर्चित फिल्म आयी थी "आंखें" इस फिल्म की शुरुआत "उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता, जिस मुल्क की निग़ाहेंबान है आँखें" देशभक्ति संवाद से होती है। जो बांग्लादेश घुसपैठियों को संरक्षण देने में बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भारत-बांग्लादेश सीमा को खुला रखकर देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही हैं और ममता को समर्थन दे रहा समूचा विपक्ष। घुसपैठियों को भारत में घुसने का खुला रास्ता दिया हुआ है। आखिर इतने सालों बाद 127 किलोमीटर में से सिर्फ 8 किलोमीटर ही जगह देना ममता के डोलते राज की ओर इशारा भी करता है। यही वह खुला इलाका है जहाँ से बांग्लादेशी घुसपैठिए भारत में घुस शेष भारत में फ़ैल रहे हैं। ममता जैसी नेताओं और इन जैसे देश विरोधी नेताओं ने देश की सुरक्षा को खतरे में डाला हुआ है।
भारत-बांग्लादेश सीमा पर कटीले तार(फेंसिंग) लगाने के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट इस बात से बेहद नाराज है कि उसके आदेश के बावजूद राज्य सरकार ने 127 किलोमीटर जमीन में से अब तक सिर्फ 8 किलोमीटर हिस्सा ही सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंपा है।
कलकत्ता HC ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए राज्य सरकार के एक अधिकारी पर 25,000 रुपए का जुर्माना भी ठोक दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि केंद्र से मुआवजा मिलने के बावजूद जमीन न सौंपना चौंकाने वाला है।
कलकत्ता HC की नाराजगी की वजह
कलकत्ता HC ने पाया कि 27 जनवरी को दिए गए आदेश के बाद से अब तक राज्य सरकार ने जमीन सौंपने की प्रक्रिया में कोई खास प्रगति नहीं की है। कोर्ट के मुताबिक, 127.327 किलोमीटर की जमीन ऐसी थी जिसके लिए अधिग्रहण पूरा हो चुका था और केंद्र सरकार ने राज्य को मुआवजा भी दे दिया था।
इसके बावजूद, बंगाल सरकार ने केवल 8 किलोमीटर जमीन ही BSF को दी। कोर्ट ने सरकार की रिपोर्ट को ‘अधूरी और गोलमोल‘ बताते हुए खारिज कर दिया क्योंकि वह शपथ पत्र (Affidavit) पर नहीं दी गई थी।
राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ का मुद्दा
पूर्व डिप्टी आर्मी चीफ सुब्रत साहा द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए HC ने कहा कि सीमा पर कटीले तार लगाना देश की रक्षा, घुसपैठ रोकने और सीमा पार आतंकवाद को खत्म करने के लिए बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार ने भी अदालत से गुहार लगाई थी कि जमीन जल्द दिलाई जाए ताकि फेंसिंग का काम पूरा हो सके।
राज्य सरकार ने भी माना था कि यह राष्ट्रीय हित का काम है, लेकिन इसके बावजूद 9 जिलों (उत्तर व दक्षिण 24 परगना, नादिया, मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर व दक्षिण दिनाजपुर, दार्जिलिंग, जलपाईगुड़ी और कूचबिहार) में जमीन सौंपने का काम लटका हुआ है।
सरकार के बहाने और HC का जुर्माना
राज्य सरकार ने जमीन अधिग्रहण में देरी के लिए राजस्व अधिकारियों के चुनावी रोल के काम में व्यस्त होने का बहाना बनाया था, जिसे कोर्ट ने पूरी तरह नकार दिया। HC ने कहा कि जब मामला राष्ट्रीय महत्व का हो, तो ऐसे बहाने नहीं चलेंगे। स्पेशल सेक्रेटरी के निर्देश के बावजूद जॉइंट डायरेक्टर ने शपथ पत्र पर रिपोर्ट दाखिल नहीं की, जिसकी वजह से कोर्ट ने उन पर 25 हजार का जुर्माना लगाया है।
अगली सुनवाई और सख्त निर्देश
कलकत्ता HC ने अब बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह 13 मई तक एक विस्तृत शपथ पत्र जमा करे। इसमें जिलेवार जानकारी देनी होगी कि 27 जनवरी के आदेश के बाद से हर दिन जमीन सौंपने के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि समय सीमा बीतने के बाद अब और ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
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